aromatic electrophilic substitution reaction in hindi ऐरोमैटिक इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ

ऐरोमैटिक इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ क्या है aromatic electrophilic substitution reaction in hindi ?

ऐरोमैटिक इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाऐं (Aromatic electrophilic substitution reactions)

बेंजीन वलय पर उपस्थित फीनोलिक – OH समूह पर दो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होते हैं जो बेंजीन वलय के इलेक्ट्रॉनों के संयुग्मी हैं। एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म +R प्रभाव (अनुनाद प्रभाव ) के द्वारा बेंजीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देता है। अतः बेंजीन वलय को इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन के लिए सक्रिय कर देता है।

खण्ड 3.6 में दी गई फीनोल की अनुनादी संरचनाओं ( II-IV) से स्पष्ट है कि बेंजीन वलय में 0- एवं p-स्थितियों पर अनुनाद के कारण ऋणात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है। अतः इलेक्ट्रॉन स्नेही इन स्थितियों पर आक्रमण करके o- एवं p-प्रतिस्थापित यौगिक ही बनाते हैं, अर्थात् फीनोल में – OH समूह o- और p-निर्देशी हैं।

(1) हैलोजनीकरण (Halogenation) ध्रुवीय विलयन में फीनोल की हैलोजनीकरण अभिक्रिया तीव्र गति से होती है तथा प्राप्त उत्पाद में सभी o- एवं p स्थितियों पर प्रतिस्थापन हो जाता है। जैसे- ब्रोमीन जल के आधिक्य के साथ फीनोल अभिक्रिया करके 2,4, 6- ट्राईब्रोमो फीनोल बनाता है।

यदि अध्रुवीय विलायक (solvent) जैसे CS2 या CCl4 में उपर्युक्त अभिक्रिया की जाये तो o- और p-ब्रोमोफीनोल का मिश्रण प्राप्त होता है।

आयोडीन एवं आयोडिक अम्ल के मिश्रण की तनु कॉस्टिक सोडा की उपस्थिति में फीनोल से अभिक्रिया पर o-और p-आयोडोफीनोल का मिश्रण प्राप्त होता है।

फीनोल में – OH समूह का सक्रियता प्रभाव इतना तीव्र होता है कि o- या p-स्थितियों पर उपस्थित -SO,H, NO2 आदि समूह को भी हैलोजन के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

(2) नाइट्रीकरण (Nitration)- तनु HNO3 य HNO3 – CCI मिश्रण से फीनोल का नाइट्रीकरण करने पर o- और p- नाइट्रोफीनोल का मिश्रण प्राप्त होता है।

यदि नाइट्रीकरण सान्द्र HNO, अम्ल व सान्द्र H2SO4 अम्ल के मिश्रण में किया जाता है तो 2,4,6- ट्राई नाइट्रोफीनोल (पिक्रिक अम्ल) बनता है।

– OH समूह की क्रियाशीलता (activity) के कारण उपर्युक्त अभिक्रिया तीव्र गति से होती है किन्तु पिक्रिक अम्ल की लब्धि (yield) बहुत कम प्राप्त होती है। नाइट्रिक अम्ल एक ऑक्सीकारक अभिकर्मक है अतः फीनोल का ऑक्सीकरण हो जाता है।

(3) नाइट्रोसोकरण (Nitrosation)- सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में फीनोल, नाइट्रस अम्ल (NaNO2 + H2SO4) के साथ अभिक्रिया करके p-नाइट्रोसोफीनोल मुख्य उत्पाद बनाता है।

जब फीनोल को (NaNO 2 + H2SO4) के मिश्रण के साथ गर्म करते हैं तो हरा रंग प्राप्त होता है। इसे जल से तनु करने पर यह लाल रंग का हो जाता है तथा इसमें क्षार विलयन मिलाने पर यह नीले रंग का हो जाता है। यह लीबरमान नाइट्रोसो अभिक्रिया कहलाती है तथा यह अभिक्रिया फीनोल के परीक्षण में प्रयुक्त होती है।

फनोल इन्डोफीनोल (लाल रंग) फीनोल इन्डोंफीनोल का सोडियम लवण (नीला रंग ) (4) सल्फोनीकरण (Sulphonation)- फीनोल की सान्द्र H2SO4 अम्ल के साथ अभिक्रिया से कर ताप पर o- (आर्थो) तथा अधिक ताप पर p- (पैरा) फीनोल सल्फोनिक अम्ल प्राप्त होते हैं।

(5) C- ऐल्किलीकरण (C-Alkylation) फ्रीडेल क्राफ्ट अभिक्रिया (Friedel-Crafts reaction)- निर्जल AICI3 के आधिक्य की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइड, फीनोल से अभिक्रिया करके o-और p- ऐल्किल व्युत्पन्न बनाते हैं। फीनोल निर्जल AICI2 से अभिक्रिया करके क्लोरो ऐलुमिनियम लवण बनाता है अतः ऐलुमिनियम क्लोराइड की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

ऐल्कीन से भी C – ऐल्किलीकरण करवाया जा सकता है।

(6) C–ऐसिलीकरण (C-acylation) (i) फ्रीडेल क्राफ्ट अभिक्रिया निर्जल AICI, के आधिक्य में फीनोल की ऐसिड क्लोराइड (Acid chloride) या ऐसिडऐनहाइड्राइड (acid anhydride) से अभिक्रिया होने पर o- तथा p-हाइड्रॉक्सीकीटोन प्राप्त होते हैं।

(ii) फ्रीस पुनर्विन्यास (Frie’s rearrangement )- फीनोल की ऐसीटिल क्लोराइड के साथ अभिक्रिया से प्राप्त फेनिल एस्टर को नाइट्रोबेंजीन विलयन में निर्जल AICI, की उपस्थिति में गर्म करने पर इसका पुनर्विन्यास हो जाता है जिसमें COR समूह का स्थानान्तरण फीनोलिक समूह की o और P- स्थितियों पर हो जाता है। 60° अथवा इससे निम्न ताप पर p- और 160°C अथवा उच्च ताप पर 0- समावयदी मुख्य उत्पाद होते हैं।

क्रियाविधि – वाल्टजली (Baltzly, 1948) के अनुसार फ्रीस पुनर्विन्यास की अन्तराआण्विक क्रियाविधि है जबकि क्रॉफॉर्ड (Crawford 1959) के अनुसार इसकी क्रियाविधि अन्तः आण्विक है। अतः यह माना जाता है कि फ्रीस पुनर्विन्यास इन दोनों क्रियाविधियों का परिणाम है।

(7) फॉर्मिलिकरण (Formylation)-

(i) गाटरमान संश्लेषण ( Gatterman synthesis ) – फीनोलिक ऐल्डिहाइड प्राप्त करने की यह एक महत्वपूर्ण अभिक्रिया है। जब फीनोल की अभिक्रिया हाइड्रोजन साइनाइड और हाइड्रोजन क्लोराइड के मिश्रण के साथ निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड उत्प्रेरक की उपस्थिति में की जाती है तो p-हाइड्रॉक्सी बेंजेल्डिहाइड मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।

गाटरमान अभिक्रिया में मुख्य उत्पाद के रूप से -CHO समूह p-स्थिति पर प्रतिस्थापित होता है। यदि p-स्थिती पर अन्य समूह उपस्थित हो तो -CHO समूह o- स्थिति पर प्रतिस्थापित होता है।

(ii) राइमर-टीमान अभिक्रिया (Reimer- Tiemann reaction)- फीनोल के क्षारीय विलयन को क्लोराफॉर्म के साथ 60° ताप पर पश्चवाहित करे और इस प्रकार प्राप्त अभिक्रिया मिश्रण को अम्लीकृत करने पर फीनोल की आर्थो और पैरा स्थितियों पर – CHO समूह स्थापित हो जाता है। p-प्रतिस्थापित यौगिक की मात्रा कम प्राप्त होती है। दोनों समावयवी को वाष्प आवसन से अलग किया जा सकता है।

क्रियाविधिः- विनबर्ग (Wynberg, 1954) एवं रोबिन्सन (Robinson, 1961) के अनुसार अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्न प्रकार है-

(i) क्लोरोफॉर्म क्षार के साथ अभिक्रिया करके डाइक्लोरोकार्बीन बनता है।

(ii) डाइक्लोरोकार्बन फीनोल के साथ निम्नलिखित पदों में अभिक्रिया करके सैलिसिल ऐल्डिहाइड देता है।

यदि अभिक्रिया फीनॉल के स्थान गुआइआकॉल से करते हैं तो वेनिलीन प्राप्त होता है।

वैनिलीन सुगन्धित पदार्थ होने के कारण इसका उपयोग आइसक्रीम तथा कन्फेशनरी उद्योग में होता

(ii) राइमर टीमान कार्बोक्सिलीकरण – यदि क्लोरोफॉर्म के स्थान पर कार्बनटेट्राक्लोराइड प्रयुक्त करें तो सैलिसिलिक अम्ल बनता है।

(8) कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation)-

(i) कोल्बे अथवा कोल्बे श्मिट अभिक्रिया (Kolbe or Kolbe Schmidt reaction)- जब सोडियम अथवा पोटैशियम फीनॉक्साइड को कार्बनडाइऑक्साइड के साथ उच्च दाब तथा 125°C ताप पर गर्म किया जाता है तो सोडियम सैलिसिलेट बनता है। उपर्युक्त अभिक्रिया इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया का एक और उदाहरण है जिसमें एक दुर्बल इलेक्ट्रॉन स्नेही अभिकर्मक (CO2) प्रतिस्थापन अभिक्रिया करता है।

क्रियाविधि- इस अभिक्रिया की क्रियाविधि निश्चित नहीं है लेकिन सम्भव क्रियाविधि निम्न प्रकार जा सकती है।

(9) होबेनहॉश अभिक्रिया (Hauben Hoesch Reaction)

वे पॉलीहाइड्रॉक्सी फीनोल जिनमें OH समूह एक दूसरे की तुलना में m -स्थिति पर उपस्थित होते हैं, ऐल्किल सायनाइड और हाइड्रोजन क्लोराइड के मिश्रण के साथ निर्जल ZnCI2 या निर्जल AICI की उपस्थिति में ईथर विलायक में अभिक्रिया करके कीटिमीनहाइड्रोक्लोराइड बनाते हैं। ये कीटिमीनहाइड्रोक्लोराइड भाप के साथ जल अपघटन पर फीनोल के ऐसिल व्युत्पन्न अर्थात पॉलीहाइड्रॉक्सी ऐरोमैटिक कीटोन बनाते है। ऐसिल (RCO) समूह OH समूह के o स्थिति पर जाता है।

क्रियाविधि – अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्न प्रकार दी जा सकती है-

(10) मर्क्युरीकरण (Mercuration)- जब फीनोल को जलीय मर्क्यूरिक एसीटेट के साथ पश्चवाहित किया जाता है तो o- ऐसीटॉक्सी-मर्क्युरी फीनोल बनता है।

(11) युग्मन अभिक्रिया (Coupling reaction)- फीनोल की ऐरीन डाइऐजोनियम लवण के साथ दुर्बल क्षारीय माध्यम में 0°C ताप पर अभिक्रिया से चमकीले रंगीन यौगिक प्राप्त होते हैं। ये यौगिक ऐजोरंजक (azo dyes) कहलाते हैं।

3.7.3. संघनन अभिक्रियाऐं (Condensation Reactions)

(I) फीनोल की फार्मेल्डिहाइड से लैडररमानेसे अभिक्रिया (With formaldehyde – Lederer- Manasse reaction)—–— फीनोल, ऐलिफैटिक तथा ऐरोमेटिक ऐल्डिहाइड के साथ अम्लीय या क्षारीय उत्प्रेरक की उपस्थिति में o- तथा p-स्थितियों पर संघनन अभिक्रियाऐं देता है। उदाहरणार्थ- फार्मेल्डिहाइड की फीनोल के साथ तनु अम्ल या तनु क्षार की उपस्थिति में अभिक्रिया से p-हाइड्रॉक्सीबेंजिलऐल्कोहॉल तथा -हाइड्रॉक्सीबेंजिल ऐल्कोहॉल बनता है।

इस अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्न प्रकार है-

(i) अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में-

फार्मेल्डिहाइड की अधिकता में बिसहाइड्रॉक्सीमेथिल फीनोल प्राप्त होते हैं जबकि फीनोल की अधिकता में p,p-डाइहाइड्रॉक्सीडाइफेनिलमेथेन प्राप्त होती है।

उपर्युक्त हाइड्रॉक्सीमेथिल फीनोल परस्पर संघनित होकर बैकेलाइट (Bakelites) बनाते हैं।

(2) ऐसीटोन से फीनोल, ऐसीटोन के साथ सान्द्र HCI की उपस्थिति में अभिक्रिया कर एक यौगिक बनता है जिसे बिस फीनोल – A कहते है ।।

(3) थैलिक ऐनहाइड्राइड से – फीनोल थैलिक ऐनहाइड्राइड के साथ सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में अभिक्रिया करके फीनॉलफ्थेलिन (Phenolphthalein) बनाता है।

रिसार्सिनॉल की थैलिक ऐनहाइड्राइड के साथ अभिक्रिया पर फ्लुओरेसीन (fluorescein) प्राप्त होता है जो क्षारीय माध्यम में हरा-पीला चमकीला विलयन बनाता है।

उपयोग : फीनॉल के उपयोग निम्नलिखित हैं-

(i) रेजिन, प्लास्टिक, बैकेलाइट, साबुन, क्रीम, ऐस्परिन, फिनेसिटीन ऐजॉरजक पिक्रिक अम्ल आदि के निर्माण में फीनॉल का उपयोग होता है।

(ii) कई कीटनाशी दवाईयों के निर्माण में इसका उपयोग होता है।

(iii) स्याही में परिरक्षक (Preservative) के रूप में फीनॉल का उपयोग होता है।

(iv) कीटनाशी पदार्थों तथा दवाईयों के निर्माण में इसका उपयोग होता है।

(v) साइक्लो हैक्सेनोल के निर्माण में इसका उपयोग होता है।

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