अपठित बोध की परिभाषा क्या है | अपठित बोध किसे कहते है | उत्तर किस प्रकार दे apathit bodh hindi

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apathit bodh hindi अपठित बोध की परिभाषा क्या है | अपठित बोध किसे कहते है | उत्तर किस प्रकार दे ?

अपठित बोध
अपठित अवतरण को पढ़कर बसके अर्थ को समझना ‘अपठित बोध‘ कहलाता है। अपठित अनुच्छेद में कुछ ऐसे शब्द भी हो सकते है जिनके अर्थ से आप सुपरिचित न हों, किन्तु आपको बिना घबराये हुए पूरे अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़कर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि इस अवतरण का मूल विषय क्या है ओर उसमें क्या बात कही गई है। यहद आपने अपठित अवतरण के विचारों को समझ लिया तो अवतरण पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर आसानी से दे सकेंगे। अपठित अवतरण को दो-तीन बार पढ़ने से अनुच्छेद में आए हुए भावांे एवं विचारों को अपने शब्दों में व्यक्त करने की क्षमता व्यक्ति में आ जाती है। इससे विद्यार्थियों की बोध शक्ति (समझ) एवं भाषा पर उनके अधिकार की भी परीक्षा हो जाती है।
अपठित अवतरण पर कई तरह के प्रश्न पूछे जा सकते हैं, यथा-
1. अपठित अवतरण का सार या भावर्थ
2. अपठित अवतरण से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर
3. अपठित अवतरण का शीर्षक
4. अपठित अवतरण में आए कुछ शब्दों के अर्थ
5. अपठित अवतरण के कुछ वाक्यों की व्याख्या
अपठित अवतरण को हल करने की विधि
1. अवतरण को कम-से-कम दो बार ध्यान से पढ़ना चाहिए।
2. यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि अपठित अवतरण की विषय-वस्तु क्या है।
3. अवतरण के मूलभाव को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
4. अवतरण को पढ़कर उसके प्रमुख विचारों को रेखांकित कर अलग से लिख लेना चाहिए।
5. अवतरण का केन्द्रीय भाव (ब्मदजतंस प्कमं) ही उसका शीर्षक होता है।
6. अवतरण का शीर्षक यथासम्भव संक्षिप्त, सटीक एवं अवतरण से सुसम्बद्ध होना चाहिए।
7. पूछे गए प्रश्नों के उत्तर अवतरण में से ही छाँटकर देने चाहिए अपनी ओर से व्यकत विचार ठीक नहीं माने जाते।
8. उत्तर संक्षिप्त एवं सारगर्भिग हो, भाषा सरल हो तथा उŸारो में अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए।
9. काले छपे अंशों की व्यख्या इस प्रकार करनी चाहिए जिससे उनका मन्तव्य पूरी तरह सपष्ट हो जाए।
अपठित अवतरण का सार लेखन
1. अपठित अवतरण का सार लेखन करने के लिए दिए गए अवतरण का कम-से-कम दो बार ध्यान से पढ़ना चाहिए।
2. सार लेखन के लिए विद्यार्थियों को अपनी सूझ-बुझ एवं विवके से यह निर्णय करना होता है कि इस अवतरण के अनावश्यक अंश को हटा दें तथा आवश्यक अंग छूटने न पावें।
3. मूल अवतरण को पढ़कर उसके केन्द्रीय भाव को समझने का प्रयास करें
4. अवतरण में जो वाक्य, अंश, बातें महत्वपूर्ण लगें उन्हें रेखांकित कर लें।
5. अवतरण का सार मूल अवतरण का लगभग एक-तिहाई होना चाहिए। अवतरण में आए शब्दों की संख्या जाानने के लिए यदि एक पंक्ति में 15 शब्द हों तथा पंक्तियों की कुल संख्या 12 हो तो अवतरण की शब्द संख्या 15 ग 12 त्र 180 होगी। इसका सार लगभग 60 शब्दों में लिखा जाना चाहिए।
6. सार लेखन अपनी भाषा में होना चाहिए। भाषा सरल हो तथा उसमें कम-से-कम शब्दों में अधिक बात कह सकने की क्षमता भी होनी चाहिए।
7. अवतरण की जो बातें आपको आवश्यक लगें उन्हें अलग से लिख लेना चाहिए। यह सार का प्रथम प्रारूप है।
8. प्रथम प्रारूप को पूरा पढ़कर अनावश्यक अंश काट दें ओर जो अनावश्यक शब्द हों उन्हें निकाल दें। इस प्रकार दूसरा प्रारूप तैयार करें ओर यह सुनिश्चित कर लें कि इसमें सभी महŸावपूर्ण बातें आ गई हैं या नहीं, यदि कोई बात छूट गई हो तो जोड़ लें। यह दूसरा प्रारूप है।
9. ‘सार‘ की शब्द संख्या गिनें ओर देखंे कि यह मूल अवतरण की लगभग एक-तिहाई है या नहीं। यदि अधिक हो तो पुनः इनका सम्पादन कर अनावश्यक शब्द काट दें ओर कम हो तो कुछ जोड़ दें। इस प्रकार अन्तिम प्रारूप तैयार करें।
10. सर रूप में लिखा गया अवतरण एक स्वतन्त्र, सुगठित और प्रवाहपूर्ण अनुच्छेद होना चाहिए।
शीर्षक लेखन
1. मूल अवतरण का केन्द्रीय भाव ही अपठित का शीर्षक होता है।
2. शीर्षक संक्षिप्त, सारगर्भित एवं मूल अवतरण से जुड़ा होना चाहिए।
3. शीर्षक सरल एवं आकर्षक भी होना चाहिए।
4. शीर्षक अवतरण के मूल भाव या मूल विचार का द्योतक होना चाहिए।
5. शीर्षक अपठित के सभी विचारों का प्रतिनिधित्व करने पर श्रेष्ठ माना जाता है।
6. अवतरण को ध्यानपूर्वक दो तीन बार पढ़ने से यह पता चल जाता है कि इसका मूल विषय क्या है तथा उसी से शीर्षक बनाना चाहिए।
7. अवतरण के लिए जो शीर्षक समझ में आए उन्हें लिख लें तथा लिखे हुए शीर्षकों में से जो सर्वांेŸाम लगे चुनाव शीर्षक के रूप में करें।
गद्यांश 1
गाँधी जब स्वदेश लौटे उस समय भारत में बहुत से बड़े नेता मौजूद थे। फिर भी देश के दुखी मजदूर किसान और जनता मदद के लिए दक्षिण अफ्रीका के यशस्वी सेनानी गांधी के ही पास आई। गाँधी द्वारा की गई कोशिश ये बिहार में सौ वर्ष से चली आ रही नील की मजबूरन खेती की प्रथा खत्म हुई और गिरमिटिया या शर्तबन्ध मजदूरों को विदेशों में भेजना रोक दिया गया। अगर किसी क्षेत्र में लोगों को कोई अन्याय की शिकायत होती तो गांधी उसे दूर करने के लिए लोगों को स्वयं प्रयत्न करने को कहते थे। गांधी ने इस प्रकार अन्याय ओर जबरदस्ती के विरूद्ध जो भी आन्दोलन किए, उसकी प्रतिध्वनि सारे भारत में हुई। भारत में गाँधी ने जो भी जन-आन्दोलन चलाया, उन सबमें उनका तरीका एक ही था – शान्ति ओर दृढ़ता से अपनी बात कहना और उसके लिए अहिंसात्मक आन्दोलन करना। चम्पारन, खेड़ा और बारडोली के प्रसिद्ध आन्दोलनों के अलावा उन्होंने तीस वर्षों में भारत में चार बड़े आन्दोलनों का नेतृत्व कियां उन्होंने पूरे भारत का दोरा किया ओर लोगों से मिलकर अपनी दशा देखी ओर उनकी समस्याओं को समझा।
जब भी वह सरकार के खिलाफ कोइ्र आन्दोलन छेड़ते वह हजारों व्यक्तियों से भेंट करते थे ओर सारी सूचनाएं ओर तथ्य एकत्र करने के लिए रोजाना अठारह-बीस घण्टे काम करते थे। उन्होंने हजारों सभाओं में भाषण दिए और लोगों के अनुशासन का पठ पढ़ायां गांधी ने लोगों को अहिंसा का महŸव समझायां उन्होंने कहा ‘‘देश के सामने एक दूसरा रस्ता भी है- तलवार खींचकर लड़ना। यदि यह तरीका सम्भव होता तो भारत के लोग अहिंसा के संदेश को नहीं सूनतें सिर्फ भाषणों और जुलूसों से हमें स्वराज नहीं प्राप्त होगा, उसके लिए हमें काम हासिल करने की शक्ति और दृढ़ता दिखानी होगी। हमें ऐसे वीर सैनिक बनाना होगा जो मैदान छोड़कर भागते नहीं। हमें अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार रहना होगा। स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए मर्दानगी जरूरी है। माने के बजाय जरूरत हो तो खुद मर जाए। आखिर किसी को मारने के लिए भी तो मरने की जोखिम उठानी पड़ती है, तो किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालना कठिन क्यों लगे? दूसरों की जान लेने में बहादुरी नहीं है। बहादुरी है अपने सम्मान और स्वतन्त्रता के लिए मरने में।‘‘
गाँधी की अहिंसा सेना में स्त्री, बच्चे और बूढे़ भी शामिल थे। बच्चों की सेना ‘वानर सेना‘ कहलाती थी। गांधी अहिंसा पर इतने दृढ़ थे कि आन्दोलन में कहीं भी हिंसा हो जाने पर अपने सत्याग्रह को वापस ले लेते थे। वह छिपी लड़ाई नहीं खुली लड़ाई लड़ते थे। और डंके की चोट पर घोषित कर देते थे कि वह क्या करने जा रहे है। वह अपने अनुयायियों से आशा करते थे कि अपने मन से भय, क्रोध घृणा और प्रतिशोध की भावना निकाल दें।
गांधी लोगों को झूठी आशा कभी नहीं बंधाते थे। अपने सैनिकों को बता देते थे ‘‘आपको लाठियों और गोलियों का सामना करना पडे़गा। जेल जाना होगा, आपकी सम्पति जब्त हो सकती है और आपको फांसी पर भी चढ़ना पड़ सकता है। यह सब शान्त भाव से बिना विरोध किए सहना होगा।‘‘ उनके मन्त्र ‘करेंगे या मरेंगे‘ का अर्थ था ‘कष्टों को सहन करना‘ और वह जानते थे कि कष्टों के सहने से विरोधी हृदय पिघलेगा।
प्रश्न-
1. उक्त गद्यांश का उपायुक्त शीर्ष बताइए।
2. गांधी ने नील की खेती कहाँ बन्द करवाकर किसानों की अंग्रजों के शोषण से मुक्ति दिलाई?
3. ‘गिरमिटिया‘ का क्या अर्थ है?
4. गाँधीजी ने भी सरकार के खिलाफ कोई आन्दोलन छेड़ते तब क्या करते थे?
5. गाँधीजी ने स्वतन्त्रता पाने कि लिए क्या आवश्यक माना?
6. गाँधीजी के अनुसार बहादुरी क्या है?
7. गाँधीजी की अंिहंसक सेना में शामिल बच्चों की सेना को क्या कहा जाता था?
8. गाँधीजी अपने अनुयायियों से क्या आशा करते थे?
9. गाँधीजी अपने सैनिकों को क्या समझाकर आन्दोलन के लिए भेजते थे?
10. ‘करेंगे या मरेंगे‘ का अर्थ वे क्या मानते थे?
11. गाँधीजी कहाँ से स्वदेश लौटकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे?
12. भारत के लोग गांधीजी की ओर आशाभरी नजरों से क्या देख रहे थे?
उत्तर-
1. उक्त अवतरण का शीर्षक है- ‘अहिंसक सेनानी‘।
2. गांधी ने बिहार के चम्पारण में होने वाली नील की खेती बन्द करवाकर किसानों को अंग्रेजों के शोषण से मुक्ति दिलवाई।
3. ‘गिरमिटिया‘ शब्द ‘एग्रीमेंट‘ (।हतममउमदज) से बना है। भारत से विदेशों में जो मजदूर (कुली) ‘एग्रीमेंट‘ या शर्तबन्दी (करार) के अन्तर्गत भेजे जाते थे, उन्हें ‘गिरमिटिया‘ कहा जाता था।
4. गाँधीजी जब भी अंग्रेजों के खिलाफ कोई आन्दोलन छेड़ते थे वह हजारों व्यक्यिों से भेंट करते थे और सारी सूचनाएं एकत्र करने के लिए रोजाना अठारह-बीस घण्टे काम करते थे।
5. गाँधीजी के अनुसार स्वतन्त्रता पाने के लिए हमें कठिन संघर्ष करना होगा, अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार रहना होगा। स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए मर्दानगी (वीरता) जरूरी है।
6. गाँधीजी के अनुसार अपने सम्मान और स्वतन्त्रता के लिए मरने में ही बहादुरी है, दूसरों की जान लेने में बहादुरी नहीं है।
7. गाँधीजी की अहिंसक सेना में शामिल बच्चों को ‘वानर सेना‘ कहा जाता था।
8. गाँधीजी अपने अनुयायियों से आशा करते थे कि अपने मन से भय, क्रोध, घृणा और प्रतिशोध की भावना निकाल दें।
9. गाँधीजी स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने वाले सैनिकों (अनुयायियों) को यह बता देते थे कि तुम्हें लाठियों और गोलियों का सामना करना पडे़गा, जेल जाना होगा, आपकी सम्पति से हाथ भी धोना पड़ सकता है तथा फांसी पर भी चढ़ना पड़ सकता है। आप लोगों को यह सब बिना विरोध किए सहना होगा।
10. ‘करेंगे या मरेंगे‘ का अर्थ था कष्टों को सहन करना।
11. गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे।
12. भारत के लोग गांधीजी की ओर आशा भी नजरों से इसलिए देख रहे थे, क्योंकि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष करके भारतीयों की बहुत से अधिकार दिलाए थे।
गद्यंाश 2
पे्रम की भाषा शब्द रहित है, नेत्रों की, कपोली की, मस्तक की, भाषा भी शब्द रहित है। जीव का तत्व भी शब्दों से परे है। सच्चा आचरण-प्रभावशील आचरण न तो साहित्य के लम्बे व्याख्यानों से गढ़ा जा सकता हैय न वेद की श्रुतियों के मीठे उपदेश सेय न अंजील सेय न कुरान सेय धर्मचर्चा सेय न केवल समसंग से। जीवन के अरण्य में धंसे हुए पुरूष के हृदय पर प्रकृति और मनुष्य के जीवन के मौन व्याख्यानों के यतन से सुनार के छोटे हथौड़े की मंद-मंद चोटों की तरह आचरण का रूप प्रतयक्ष होता है।
बर्फ का दुपट्टा बांधे हुए हिमालय इस समय तो अति सुन्दर, अति ऊँचा ओर अति रूप प्रत्यक्ष मालूम होता है, परन्तु प्रकृति ने अगणित शताब्दियों के परिश्रम से रेत का एक-एक परमाणु समुद्र के जल में डुबो-डुबोकर ओर उनको अपने विचित्र हथौड़े से सुडोल करके इस हिमालय के दर्शन कराए हैं। आचरण भी हिमालय की तरह एक ऊंचे कलश वाला मन्दिर है। यह वह आम का पेड़ नहीं जिसको मदारी एक क्षण में, तुम्हारी आंखों मंे मिट्टी डालकर, अपनी हथेली पर जमा दे। इसके बनने में अन्नत काल लगा है पृथ्वी बन गई, सूर्य बन गया, तारागण आकाश में दौड़ने लगे, परन्तु अभी तक आचरण के सुन्दर रूप के पूर्ण दर्शन नहीं हुए। कहीं-कहीं अत्यल्प छटा अवश्य दिखाई देती है।
पुस्तकों में लिखे हुए नुस्खों से तो और भी अधिक बदहजमी हो जाती है। सारे वेद और शास्त्र भी यदि घोलकर पी लिए जाये ंतो भी आदर्श आचरण की प्राप्ति नहीं होती। आचरण प्राप्ति की इच्छा रखने वाले को तर्क-वितर्क से कुछ भी सहायता नहीं मिलती। शब्द और वेद तो साधारण जीवन के चोचले हैं। यह आचरण की गुप्त गुहा मंे प्रवेश नहीं कर सकते। वहाँ इनका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है। वेद इस देश के रहने वालों के विश्वासानुसार ब्रह्म-वाणी है, परन्तु काल व्यतीत हो जाने पर भी आज तक वे समस्त जगत् की भिन्न-भिन्न जातियों को संस्कृत भाषा न बुला सके-न समझा सके-न सिखा सके। यह बात हो कैसे? ईश्वर तो सदा मौन है। ईश्वर मौन शब्द और भाषा का विषय नहीं।
वह केवल आचरण के कान में गुरू-मंत्र फूंक सकता है। वह केवल ऋषि के दिल में वेद का ज्ञानोदय कर सकता है। किसी का आचरण वायु के झोंके से हिल जाय, तो हिल जाय, परन्तु साहित्य और शब्द की गोलन्दाजी और आंधी से उसके सिर के एक बाल तक का बांका न होना एक साधारण बात है। पुष्प की कोमल पुखुड़ी के स्पर्श से किसी को रोमा´्च हो जाएय जल की शीतलता से क्रोध और विषय-वासना शांत हो जाएय सूर्य की ज्योति से नेत्र खुल जाए-परन्तु अंग्रेजी भाषा का व्याख्यान-चाहे वह कार्यालय ही का ंिलखा हुआ क्यों न हो-बनारस के पण्डितों के लिए रामरोला ही है। इसी तरह न्याय और व्याकरण की बारीकियों के विषय में पण्डितों के द्वारा की गई चर्चाएं और शास्त्रार्थ संस्कृत-ज्ञान-हीन पुरूर्षों के लिए स्टीम इंजन के फप्-फप् शब्द से अधिक अर्थ नहीं रखते। यदि आप कहें व्याख्यानों द्वारा, उपदेशों द्वारा, धर्मचर्चा द्वारा कितने ही पुरूषों और नारियों के हृदय पर जीवन-व्यापी प्रभावी पड़ा है, तो उत्तर यह है कि प्रभाव शब्द का नहीं पड़ता-प्रभाव तो सदा सदाचरण का पड़ता है। साधारण उपदेश तो हर गिरजे, हर मंदिर और मस्जिद में होते हैं, परन्तु उनका प्रभाव तभी हम पर पड़ता है जब गिरजे का पादरी स्वयं ईसा होता है- मंदिर का पुजारी स्वयं ब्रह्मर्षि होता है-मस्जिद का मुल्ला स्वयं पैगम्बर और रसूल होता है।
प्रश्न-
1. उक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।
2. किसकी भाषा शब्द रहित है?
3. ‘प्रेम की भाषा रहित है‘ का आशय स्पष्ट कीजिए।
4. आचरण की तुलना किससे की गई है?
5. आदर्श आचरण की प्राप्ति किससे नहीं होती ?
6. अस अवतरण में प्रयुक्त शैली हैः
(अ) विवरणात्मक, (ब) विवेचनात्मक,
(स) गवेषणात्मक, (द)भावनात्मक।
7. लेखक की भाषा किस प्रकार की है:
(अ) लाक्षणिक, (ब) व्यंगयात्मक, (स) साधारण,
(द) संस्कृतनिष्ठ।
8. निम्न शब्दों के अर्थ बताइएः
कपोल, व्याख्यान, गौरवन्वित, सदाचरण।
9. निम्न शब्दों के विलोम बताइएः
सदाचरण, सुन्दर, ऊँचा, शीतलता।
10. ‘बाल जक बांका न होना‘ का कया अर्थ है?
11. ज्ीवन पर किसका प्रभाव पड़ता है?
12. ‘साहित्य और शब्द ही गोलंदाजी‘ का क्या तात्पर्य है?

उत्तर-
1. उक्त अवतरण का शीर्ष है- ‘आचरण की सभ्यता‘।
2. लेखक के अनुसार प्रेम की भाषा शब्द रहित है। इसके साथ-साथ नेत्रों की, कपोली की और मस्तक की भाषा भी शब्द रहित है।
3. ‘‘प्रेम की भाषा शब्द रहित है‘‘ का अभिप्राय यह है कि प्रेम को शब्दोंसे व्यक्त न करके अन्य प्रकारों से व्यक्ति किया जाता है।
4. आचरण की तुलना एक ऊँचे कलश वाले मंदिर से की गई है जो हिमालय की भांति दूर से ही चमकता है।
5. वेदशास्त्रों को घोलकर पी लेने (कण्ठस्थ कर लेने) से आदर्श आचरण की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
6. इस अवतरण में प्रयुक्त शैली है-(द) भावात्मक।
7. लेखक की भाषा है- (अ) लाक्षणिक।
8. शब्दों के अर्थ इस प्रकार हैः
कपोल त्र गाल, व्याख्यान त्र भाषण, गौरवान्वित त्र गौरव से युक्त, सदाचरण त्र अच्छा आचरण।
9. विलोम शब्द इस प्रकार है:
सदाचरण त्र दुराचरण, सुन्दर त्र असुन्दर (कुरूप),
ऊँचा त्र नीचा, शीतलता त्र उष्णता।
10. ‘बाल तक बांका न होना‘ का अर्थ है- कुछ भी हानि न होना।
11. ज्ीवन पर सदाचरण का प्रभाव पड़ता है, शब्द का नहीं।
12. साहित्य ओर शब्द की गोलंबदी का तात्पर्य है किसी व्यक्ति के आचरण को बदलने के लिए साहित्य एवं नीति के शब्दों द्वारा बार-बार प्रहार करना।
निर्देश- निम्न अवतरणों को ध्यान से पढ़कर उन पर पूछे गए कहुविकल्पीय प्रश्नों के सही उत्तर का चयन कीजिए।
गद्यांश 3
प्रेम और श्रद्धा मे अन्तर यह है कि प्रेम स्वाधीन कार्यों पर उतना निर्भर नहीं, कभी-कभी किसी का रूप मात्र, जिसमें उसका कुछ भी हाथ नहीं, उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होने का कारण होता है पर श्रद्धा ऐसी नहीं है। किसी की सुन्दर आँख या नाक देखकर उसके प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होगी, प्रीति उत्पन्न हो सकती हैं। प्रेम के लिए इतना ही बास है कि कोई मनुष्य हमें अच्छा लगे, पर श्रद्धा के लिए आवश्यक यह है कि कोई मनुष्य किसी बात में बढ़ा हुआ होने कारण हमारे सम्मान का पात्र हो। श्रद्धा का व्यापार-स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकान्त। पे्रम में सपत्व अधिक है और श्रद्धा में विस्तार। किसी मनुष्य से प्रेम रचाने वाले दो ही एक मिलेंगे पर उस पर श्रद्धा रखने वाले सैकड़ों-हजारों लाखों क्या करोड़ों मिल सकते हैं। सच पूछिए तो इसी श्रद्धा के आश्रय से उन कर्मों के महŸव का भाव दृढ़ होता रहता है जिसे धर्म कहते हैं और जिनमें मनुष्य समाज की स्थिति है। कर्ता से बढ़कर कर्म स्मारक दूसरा नहीं। कर्म की क्षमता प्राप्त करने के लिए बार-बार कर्ता ही की ओर आँख उठती है। कर्मों से कर्ता की स्थिति को जो मनोहरता प्राप्त हो जाती है उस पर मुग्ध होकर बहुत से प्राणी उन कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं। कर्ता अपने सत्कर्म द्वारा एक विस्तृत क्षेत्र में मनुष्य की सद्वृŸिायों के आकर्षण का एक शक्ति केन्द्र हो जाता है, जिस समाज में किसी ज्योतिष्मान शक्ति केन्द्र का उदय होता है, उस समाज में भिन्न-भिन्न एक साथ अग्रसर होने के कारण परस्पर मिलकर इतनी घनी हो जाती हैं कि उनकी घटा-सी उमड़ पड़ती है और मंगल की ऐसी वर्षा होती है कि सारे दुःख और क्लेश बह जाते है।

  1. इस अवतरण का उपयुक्त शीर्षक हैः
    (A) श्रद्धा और प्रेम (B) श्रद्धा और भक्ति
    (C) प्रेम और भक्ति (D) इनमें से कोई नहीं
    उत्तर- (B) श्रद्धा और भक्ति
    2. श्रद्धा के कारण किन कर्मों का महत्व बढ़ जाता है?
    (A) जिन्हें अधर्म कहा जाता है (B) जिन्हें धर्म कहा जाता है
    (C) जिन्हें सत्पुरूष करते है (D) जिन्हें दुर्जन करते है
    उत्तर- (B) जिन्हें धर्म कहा जाता है
    3. कर्म का सबसे बड़ा स्मारक लेखक किसे मानता है?
    (A) श्रद्धा को (B) धर्म को
    (C) कर्ता को (D) इन सबको
    उत्तर- (C) कर्ता को
    4. ज्योतिष्मान शक्ति केन्द्र का अभिप्राय हैः
    (A) ज्ञानमार्गी (B) प्रेममार्गी
    (C) कृष्णामार्गी (D) राममार्गी
    उत्तर- (C) कर्ता को
    5. अपने सत्कर्म द्वारा मनुष्य की सदवृŸिायों के आकर्षण का केन्द्र कौन बन जाता है।
    (A) कर्ता (B) भक्त
    (C) श्रद्धालु (D) प्रेमी
    उत्तर- (C) श्रद्धालु
    गद्यांश 4
    हमारे विशाल देश में हिमालय की अनन्त हिमराशि वाले ग्लेशियरों ने जिन नदियों को जन्म दिया है, उनमें गंगा और यमुना नाम की नदियाँ हमारे जीवन की धमनियाँ की तरह रही हैं, उनकी गोद में हमारे पूर्वजों ने सभ्यता के प्रांगण में अनेक नये खेल खेले। उनके तटों पर जीवन का जो प्रवाह प्रचलित हुआ, वह आज तक हमारे भूत और भावी जीवन को सींच रहा है। भारत हमारा देश है और हम उसके नागरिक है यह एक सच्चाई हमारे रोम-राम में बिंधी हुई है। नदियों की अन्तर्वेंदी मंे पनपने वाले आदि युग के जीवन पर हम अब जितना अधिक विचार करते है हमको अपने विकास और जलाशयों के तटों पर एकत्र होते हैं पृथ्वी के साथ सम्बन्ध उतना ही अधिक घनिष्ठ जान पड़ता है। हमारे धार्मिक पर्वांे पर लाखों लोग नदी और जलाशयों के तटों पर एकत्र होते हैं। पृथ्वी के एक-एक जलाशय और सरोवर को भारतीय भावना ने ठीक किया जो हर एक पीढ़ी के साथ नये रूप में बँधा रहा, किन्तु आज स्थिति बड़ी विचित्र और एक सीमा तक चिन्ताजनक हो गई है। जीवनदायिनी नदियाँ आज प्राणघातिनी होती जा रही है। मिल-बैठकर सोचने की आवश्यकता है कि क्या करें कि ये पुनः जीवनदायिनी हों और उन सोची हुई योजनाओं को अमल में लाने की भी आवश्यकता है।
  2. गंगा-यमुना को जल कहाँ से मिलता है?
    (A) अन्नत जलराशि से (B) मानसरोवर
    (C) ग्लेशियरों से (D) हिमालय से
    उत्तर- (C) ग्लेशियरों से
    2. लेखक के अनुसार हमाारी सभ्यता का जन्म हुआ है।
    (A) नदियोँ की गोद में (B) गंगा-यमुना में
    (C) प्रकृति के पं्रागण में (D) हिमालय में
    उत्तर- (A) नदियोँ की गोद में
    3. स्थिति चिन्ताजनक क्यों हो गई है?

(A) नदियोँ कम हो गई है (B) नदियाँ वेग से बहने लगी है
(C) नदियाँ बाढ़ लाने लगी है (D) नदियाँ प्रदुषित हो गई है
उत्तर- (D) नदियाँ प्रदुषित हो गई है
4. ‘जीवनदायिनी‘ क्यों हो गई है?
(A) प्राणघातिनी (B) अजीवनदायिनी
(C) प्राणान्तक वाहिनी (D) जीवप्रदायिनी
उत्तर- (A) प्राणघातिनी
5. ‘औद्योगिक‘ शब्द का मूल शब्द है
(A) उदयोग (B) औद्योग
(C) उद्योग (D) योगिक
उत्तर- (C) उद्योग
6. जिसका कोई अन्त न हो उसे क्या कहते है
(A) आनन्द (B) अनन्त
(C) अखण्ड (D) असीम
उत्तर- (B) अनन्त