अमरावती स्तूप कहां स्थित है ? अमरावती स्तूप किसने बनवाया विशेषता क्या है amaravati stupa in hindi

By   May 6, 2021

amaravati stupa in hindi अमरावती स्तूप कहां स्थित है ? अमरावती स्तूप किसने बनवाया विशेषता क्या है ?

सातवाहन कालीन बौद्ध स्थापत्य कला के एक स्थल के रूप में “अमरावती स्तूप” का वर्णन कीजिए।
उत्तररू स्तूपों में अमरावती (आंध्र प्रदेश के गुन्टुर जिले में) का स्तूप सर्वाधिक प्रसिद्ध था। आंध्र प्रदेश में “अमराराम” का प्रसिद्ध शैव तीर्थ ही अमरावतीनाम से प्रसिद्ध है। इसी को अमरेश्वर भी कहा जाता है। इसकी स्थिति गुण्टूर जिले के कृष्णा नदी तट पर है। बस्ती से लगभग 18 मील दक्षिण दिशा में महान् बौद्ध स्तूप था। लेखों में अमरावती का प्राचीन नाम “धान्यकटक” मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मौर्य शासक अशोक ने अन्य स्थानों के समान यहां भी एक स्तूप का निर्माण करवाया था क्योंकि यहां से अशोक स्तम्भो का एक खण्ड मिलता है। सातवाहन काल में यहां महास्तूप का निर्माण करवाया गया। इसे महाचेतिय अर्थात श्महाचैत्यश् कहा गया है। पुलुमावी के समय में स्तूप का जीर्णोद्धार हुआ तथा इसे कलाकृतियों से सजाया गया है।
संभवतः चारों ओर पाषाण वेदिका भी इसी समय बनाई गयी। दुर्भाग्यवश अब यह स्तूप अपने मूल स्थान से नष्ट हो गया है तथा इसके अवशेष कलकत्ता, मद्रास एवं लन्दन के संग्रहालयों में सरक्षित हैं। सर्वप्रथम 1797 ई. में कर्नल मैकजी को र स्तप का पता चला था। उन्होनें यहां से प्राप्त शिलापट्टों तथा मूर्तियों के सन्दर रेखाचित्र तैयार किये था 1840 ई. में इलिग द्वारा स्तूप के एक भाग की खुदाई करवायी गयी जिसमें कई मूर्तियाँ प्राप्त हुई।
अमरावती स्तुप के शिलापट्टों पर उत्कीर्ण लेखों के आधार पर इसके वास्तु के विषय में कुछ अन्दाजा लगाया जा सकता है। स्तप के चारों ओर की वेदिका या वेष्टिनी काफी लम्बी थी जिसमें उष्णीश (ब्वचपदह ैजवदमे), फुल्ला से उत्कीर्ण सूचियाँ (ब्तवेे ठंते) तथा चार तोरण द्वार एवं स्तम्भ लगे थे। प्रत्येक तोरण द्वार के पीछे स्तूप के आधार से निकलता हआ एक चबूतरा था जिसे श्आयकश् (आर्यक = पूज्य) कहा जाता है। इस पर पांच आयक स्तम्भ लगाय जात था आयकों को उद्देश्य स्तम्भ को आधार प्रदान करना था। आयक स्तप के आधार से लगभग 20 फीट की ऊंचाई पर बनाये गये प्रत्येक आयक के अलग-बगल सीढियाँ बनाई जाती थी जिनसे होकर प्रदक्षिणापथ तक पहुचा जाता थाा स्तम्भा से स्ना अलंकारिक लगता था तथा ये सम्पर्ण संरचना को सदढ आधार प्रदान करते थे। आयक मचा का निमाण आध्र स्तूपा की अपनी विशिष्टता थी। श्स्तुप की न केवल वेदिका तथा प्रदक्षिणापथ अपितु गुम्बद (अण्ड) भी संगमरमर की पटियाओं से जडा गया था। गम्बद के शीर्ष पर एक मंजषा थी जिसके ऊपर लौह-छत्र लगा था। अनुमान किया जाता है कि स्तूप का आधार काफी बड़े आकार का रहा होगा। संभवतः उसका व्यास 162 फीट था तथा वेदिका का घरा 800 फीट था। इसमें नौ फीट ऊँचे 136 स्तम्भ तथा पौने तीन फीट ऊंची 348 सचियाँ लगी थी। सभी के ऊपर कलापूर्ण नक्काशी की गयी थी सबसे ऊपरी भाग पर छत्र यक्त हर्मिका थी। द्वार की वेदिका पर चार सिंहों की मूर्तियाँ हैं। दो सिंह भीतरी भाग में आमने-सामने मुँह किये हुए तथा बाहर की ओर स्तम्भों के दो सिंह सामने मुंह किये हुए उकेरे गये हैं। निश्चयतः अपनी पूर्णता में यह स्तूप उच्च धार्मिक आदर्शों तथा अत्यन्त विकसित कलात्मक भावना पर आधारित स्थापत्य कला की ओजपूर्ण शैली का प्रतिनिधित्व करता होगा।
अमरावती स्तूप के प्रत्येक अंग पर व्यापक कलात्मक अलंकरण मिलता है। कलाविदों ने उत्कीर्ण शिल्प को चार भिन्न-भिन्न कालों से संबद्ध किया है।
प्रथम काल (ई.पू. 200-ई.पू. 100) रू इस समय अर्धस्तम्भ, स्तम्भ शीर्ष पर विभिन्न प्राणियों एवं बुद्ध के प्रतीकों आदि का अंकन किया गया। अभी तक बुद्ध की मूर्ति गढ़ने की प्रथा प्रारम्भ नहीं हुई थी।
द्वितीय काल (ई.पू. 100 – ई.पू. 100) रू इस अवधि की शिल्पकारी पहले की अपेक्षा भव्य एवं सुन्दर है। बुद्ध का अंकन प्रतीक तथा मूर्ति दोनों में मिलता है। महाभिनिष्क्रमण, मार-विजय जैसे कुछ दृश्य अत्युत्कृष्ट हैं।
तीन काल (ई.पू. 150 दृ ई.पू. 250) रू यह सातवाहन नरेश पुलुमावी का काल है जिसमें वास्तु तथा शिल्प दोनों दृष्टियों से स्तूप का अधिकतम संवर्द्धन किया गया। स्तम्भों, सूचियों तथा उष्णीशों पर सुन्दर शिल्प उत्कीर्ण हुए। स्तम्भों के बाहरी बाजुओं पर बीच में बड़ा कमल, ऊपर अर्धकमल उत्कीर्ण है तथा मध्य भाग में बुद्ध के जीवन की विविध घटनायें दिखाई गयी हैं। छज्जे के भीतरी बाजू के स्तम्भ, सूची आदि पर जातक ग्रंथों से ली गयी विविध कथायें हैं। एक सूची पर उत्कीर्ण नलगिरि हाथी के दमन का दृश्य काफी प्रभावोत्पादक है। धर्मचक्र, पूजा आदि के दृश्य भी सुन्दर हैं। ये सातवाहनकालीन कला के चर्मोत्कर्ष को व्यक्त करते हैं।
चतुर्थ काल (200-250 ई.) रू इस समय अमरावती ईक्ष्वाकुवंशी राजाओं के शासन में आ गया। इसी समय नागार्जुनीकोण्ड के स्तूप का भी निर्माण हुआ। अतः अमरावती शिल्प पर उसका प्रभाव पड़ा। पूर्ण स्तूप की आकृति वाले शिलापट्ट चारों और लगा दिये गये तथा पहले के कुछ पुराने शिलापट्ट निकाल कर उनके पीछे की ओर स्तूप आदि की आकृतियां खोदकर उन्हें पुनः स्तूप के चारों ओर लगा दिया गया। शिल्पकारी का स्तर पहले जैसा रमणीय नहीं रह गया। मानव आकृतिया अधिक लम्बी और छरहरे बदन की बनाई गयी। इन्हें मोती मालाओं से लादा गया है। गोल घेरों में फूल पत्तियों की छोटा बेल बनाई गयी है। झरोखों से झांकती हुई स्त्री-पुरुषों के मुखड़े बनाये गये हैं। अलंकरण में पहले जैसी सुन्दरता एव सजीवता नहीं मिलती।
अमरावती शिलापट्टों की नक्काशी में तत्कालीन जनजीवन की सर्वांगीण झांकी प्रदर्शित हुई है। निर्धन व्यक्ति की कुटिया से लेकर भिक्षुओं के दुमंजिले विहार तथा राजमहल – सभी अत्यधिक निपुणता के साथ उत्कीर्ण किये गये हैं। बुद्धचारत तथा जातक कथाओं का इतना विशद एवं सटीक उत्कीर्णन भारत के किसी अन्य स्तूप एवं चैत्य गृह में अप्राप्य है।
इस प्रकार श्अमरावती का महास्तूप भारतीय वास्तु की एक उज्जवलतम कृति है। चारुत्व के विविध तत्वों का मनाहार समन्वय इस महान् कृति में दर्शनीय है। कुमारस्वामी यहां की शिल्पकला को भारतीय कला का अत्यन्त श्विलासी एवं अतिसुकुमार पुष्पश्मानते हैं।

शुंग कला पर एक लेख लिखिए –
उत्तर: भव्यता और जीवन्तता की प्रतीक शुंग कला के मुख्य विकास केन्द्र भरहुत, सांची और गया थे। इस कला की मुख्य देन स्तप. चैत्यघर,
विहार, स्तम्भ, वेदिका सहित तोरण और देव स्थल हैं। शंग काल में भरहत स्तप के चारों ओर एक चारदीवारी की रचना की गई साथ ही इसमें तोरण द्वारों का निर्माण किया गया। इन तोरण द्वारों को यक्ष-यक्षिणियों, जातक कथा चित्रों, बौद्ध प्रतीकों, नाग, अप्सरा आदि मूर्तियों से अलंकृत किया गया है। पूर्वी तोरण द्वार पर शुंग शासक धनमूर्ति का अभिलेख उत्कीर्ण है।
शुंग कला का उत्कृष्ट विकास सांची के स्तूप में देखा जा सकता है। इस स्तूप के ऊपर एक वर्गाकार वेदिका का निर्माण किया गया है। अपनी विशालता और गम्भीरता के कारण यह वेदिका अत्यन्त प्रभावी है। इसके तोरण द्वार पर विभिन्न पशु-पक्षियों, फूल-पत्तियों एवं बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित घटनाओं का अंकन किया गया है। इनमें जातक कथाओं के साथ नगरीय और ग्राम्य जीवन का प्रभावोत्वादी अंकन किया गया है।
बोध गया में महाबोधि संघाराम के चारों ओर पत्थर की वेदिका का निर्माण कराया गया। उत्कीर्ण अभिलेख के अनुसार इसका निर्माण दान स्वरूप इन्द्राग्निमित्र की रानी कुरंगी और ब्रह्म मित्र की रानी नागदेवा ने कराया था। इस वेदिका पर भी फल-पत्ती. बद्ध के जीवन दृश्य, जातक कथाएँ, यक्ष-यक्षिणियाँ, मिथुन मूर्तियाँ, जेतवन दान का दृश्य अंकित हैं परन्तु पशुओं का अंकन बोध गया की विशिष्टता है। पंख युक्त सिंह, अश्व, हाथी, मगरमच्छ और वृषभ का सजीव अंकन प्राप्त होता है।
शुंग काल में ही उदयगिरि और खण्डगिरि की कुछ गुफाओं का भी निर्माण हुआ। शुंग काल में मथुरा में भी कुछ अलंकत स्तम्भ प्राप्त होते हैं। इन स्तम्भों पर स्त्रियाँ, जातक कथाएँ और कमल पुष्प के चित्रण मिलते हैं।
निश्चित रूप से शुंगकालीन कला में रसत्व और आनन्द को भी विशेष स्थान दिया गया। इस काल की सर्वोत्कृष्ट कृतियाँ वेदिका एवं तोरण मानी जा सकती है।