तुंगतामिति किसे कहते हैं ? Altimetry in hindi definition स्थनिक-ऊंचाई की बारम्बारता (Frequency of Spot-heights)

By   June 18, 2021

Altimetry in hindi तुंगतामिति किसे कहते हैं ? स्थनिक-ऊंचाई की बारम्बारता (Frequency of Spot-heights) ?

तुंगतामिति (Altimetry)
ऐसा विश्वास किया जाता है कि धरातल पर विद्यमान अधिकांश ऊँचे क्षेत्र प्रारम्भिक अपरदन के अवशेष हैं। इनका विनाश तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि अपरदन की सक्रियता इतनी तीव्र न हो जाय कि इनको समाप्त कर दे। यही कारण है कि विद्वानों ने इसे प्रारम्भिक अपरदनसतह का नाम दिया है। विद्वानों का मत है कि इन प्रारम्भिक सतहों का अस्तित्व तब तक विद्यमान रहेगा, जब तक कि उच्च भाग विधमान हैं। इस लिये अपरदन-सतह के अध्ययन के लिये किसी क्षेत्र विशेष के उच्चस्थ भागों का गणितीय अध्ययन किया जाता है। तुंगतामिति का विश्लेषण स्थानिक ऊँचाई की बारम्बारता, ग्रिड के उच्चतम बिन्दुओं की बारम्वारता, शिखर-तल की बारम्बारता, शिखर-तल का क्षेत्रफल, शिखर-स्कन्ध तथा काल आदि आँकड़ों को एकत्रित करके आयत चित्र (histogram) तथा रेखाचित्र (graph) खींच कर, किया जाता है।
1. स्थनिक-ऊंचाई की बारम्बारता (Frequency of Spot-heights) – इसका प्रयोग सर्वप्रथम बालिग महोदय ने किया था, परन्तु इनकी बड़ी कटु आलोचना की गई। डी स्मेट (1954) ने इनकी आलोचना करते हुए बताया कि – इनकी यह विधि ‘क्षेत्रफल ऊँचाई आरेख‘ का मात्र संशोधित रूप है। यह अपरदन-सतह के अध्ययन के लिये पूर्णरूपेण उपयुक्त नहीं है। इसके अध्ययन के लिये सर्वप्रथम भूपत्रक (toposheets) से सभी स्थानिक ऊँचाई को नोटकर एक आँकड़ा प्राप्त कर लेते हैं। तत्पश्चात् इन आँकड़ों का 5, 10. 15. 20, 50.75 मीटर वर्ग अन्तराल पर सारणीकरण कर लेते हैं, परन्तु सारणीकरण अथवा वर्ग-अन्तराल वनाते समय इस बात का ध्यान चाहिए कि उस क्षेत्र के आँकड़ों का स्वभाव तथा उसकी मात्रा कैसी है? यदि क्षेत्र में विषमता विद्यमान है, तथा क्षेत्र काफी विस्तृत है तो आँकड़े भिन्न-भिन्न तथा अधिक मात्रा में होंगे। तव वर्ग-अन्तराल को 50. 75, 100, 150, 200 … मीटर रखना चाहिए। यदि सारणीकरण हो जाता है, तब लम्बवत् अक्ष के सहारे ऊँचाई तथा क्षैतिज अक्ष के सहारे स्थानिक ऊँचाई को अंकित करके आयत-चित्र तथा रेखाचित्र तैयार कर लिया जाता है।
भू-पत्रक मानचित्र का अध्ययन किया जाय, तो ज्ञात होता है कि स्थानिक ऊँचाइयाँ रेलवे तथा सड़कों के किनारे अंकित की गई हैं। इस तरह इनके द्वारा अध्ययनों से अपरदन-सतहों का ज्ञान पूर्णरूपेण नहीं हो सकता है।
2. ग्रिड विधि (Grid Method) – जब वालिग के स्थानिक ऊँचाई बारम्बारता आयत-चित्र की आलोचना की गई, तब उन्होंने इसकी कमियों को दूर करने के लिये 1935 ई० तथा 1939 ई० में इसका संशोधन प्रस्तुत किया। इन्होंने क्षेत्र को कई ग्रिड में विभक्त कर प्रत्येक ग्रिड के उच्चतम् बिन्दुओं की बारम्बारता ज्ञात करके इसका आयत-चित्र तथा रेखाचित्र बनाया। इस विधि का प्रयोग करते समय इस बात का ध्यान देना चाहिए कि क्षेत्र काफी बड़ा हो, जिससे अधिक-से-अधिक बारम्बारता मिल सके । लेखक ने इसी विधि का अनुकरण करके छिन्दवाड़ा पठार को 2317 ग्रिड (प्रत्येक ग्रिड, 4 वर्ग किलोमीटर) में विभक्त कर प्रत्येक ग्रिड के उच्चतम बिन्दुओं को लेकर 25,50, 75 तथा 100 मीटर के वर्ग अन्तराल सारणीकरण तथा आयत-चित्र बनाया है। बालिग ने बताया कि – इस विधि का प्रयोग केवल उसी क्षेत्र
1. Baulig, H., 1926: ‘Surnue method altimetriqued’ analyse morphologique applique at Bretagne Peninsulair’. Bull. Assoc. Geog. Francais- 10, pp. 7-9.
2. Smet, R. de, 1964: Courbe hypsographique et profile moyen de l’ Ardenno’ Bull. Soc. Belge”d Etudes Geog, 23 pp. 143-67.
के लिए करना चाहिए, जहाँ पर एक से अधिक अपरदन चक्र पूरे हो चुके हैं। इसका प्रयोग, वलन, भ्रंशन, उत्थान आदि जहाँ पर हुए हैं, उचित नहीं होता है। फोरमेरियर तथा मकार (1948) ने इस कथन की आलोचना की तथा उच्चतम् बिन्दुओं के स्थान पर निम्नतम् बिन्दुओं को लेकर बारम्बारता आयत-चित्र बनाने के लिये सलाह दी।
3. शिखर तल की बारम्बारता (Frequency of Summit Levels) – इस विधि का प्रयोग सर्वप्रथम टॉमसन (1936 ई०)! हडसन गार्ज के अध्ययन के दौरान किया तथा होलिगवर्थ!21938) ने इसके बाद अपना अध्ययन प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् क्लार्क महोदय ने इसका अध्ययन बड़े पैमाने पर किया। क्लार्क इसका प्रयोग अरान, एन्जेल्सी तथा मानद्वीपों के आकारमितिक अध्ययन करने के लिए किया। वास्तव में, इन सभी विद्वानों की विचारधारा है कि संगत शिखर प्रारम्भिक अपरदन सतह के अवशेष हैं। इसके अध्ययन के लिये सर्वप्रथम भू-पत्रक मानचित्र पर अन्तिम समोच्च रेखा के आधार पर संगत शिखर की संख्या ज्ञात कर ली जाती है। तत्पश्चात् सारणीकरण करके इसका आयत-चित्र तथा रेखाचित्र तैयार कर लिया जाता है।
(iv) स्कन्ध, शिखर तथा कॉल की बारम्बारता (Frequency of Shoulders, Summit and Cols) – इस विधि का प्रयोग गेल ने 1961 में किया। इन्होंने इसके प्रयोग के लिये 1रू50ए 000 तथा 1रू63ए 360 दोनों मापक उपयुक्त बताया। ये अपने आकारमितिक विश्लेषण के लिये शिखर के क्षेत्रफल तथा स्कन्ध के क्षेत्रफल तथा स्कन्ध कॉल की लम्बाई ज्ञात की है। आँकड़ा प्राप्त करने के बाद इन तीनों को अङ्क प्रदान किया है। इनके अङ्क देने की विधि इस प्रकार है -25 वर्ग किलोमीटर वाले शिखर को 1 अङ्क तथा इसके बाद प्रत्येक 25 वर्ग मिलीमीटर अथवा इसके भाग को एक अतिरिक्त अङ्क दिया है। स्कन्ध तथा कॉल को लम्बाई के आधार पर अङ्क प्रदान किया है। मिलीमीटर वाले स्कन्ध तथा कॉल को 1 अङ्क प्रदान किया है। जब सम्पूर्ण क्षेत्र का आँकड़ा प्राप्त हो जाता है, तो इसका सारणीकरण किया जाता है। इस आधार पर ‘मिश्रित आयत-चित्र‘ तथा ‘रेखाचित्र‘ तैयार कर लिया जाता है।
1. Thompson, H. D.,1936: Hudson Gorge in the Highlands, Bull, Geol, Soc, Amer, 47. Pp. 1831- 48.
2. Hollingworth, S. E, 1938: The recognition and correlation of highlevel erosion surfaces in Britain: a statistical study, Qurat. Journ. Soc-lond 94. Pp. 55-84.
3. Clark, J. I., 1966: Morphometry from maps’, in Essays in Geomorphology, ed. G. H. Dury. Heinemann, Lonndon.

तुंगतामिति विश्लेषण द्वारा प्राचीन अपरदन-सतहों, स्थलरूप के स्वभाव, अपरदन की मात्रा आदि का अध्ययन किया जाता है। इसके अध्ययन में सावधानी तथा अन्त में इसका सत्यापन क्षेत्र-पर्यवेक्षण व करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है, क्योंकि यदि किसी क्षेत्र विशेष का उत्थान अथवा अवतलन हुआ रहता है तो ऐसी दशा में असत्य अपरदन-सतहों का ज्ञान प्राप्त होता है। साथ-ही-साथ इसका सत्यापन प्रत्येक स्थान की चट्टानों के भूगर्भिक विश्लेषण द्वारा ज्ञात काल के आधार पर किया जा सकता है। छिन्दवाड़ा पठार की ऊपरी अपरदन सतह तथा उमरेड अपरदन सतह अलग-अलग ऊँचाई इंगित करती हैं, परन्तु भूगर्भिक विश्लेषण जो एक ही काल की चट्टानों को इंगित करता है, एक ही अपरदन सतह का सत्यापन करता है। इसका कारण क्षेत्र पर्यवेक्षण के द्वारा स्पष्ट होता है कि कान्हन नदी तीव्र अपरदन द्वारा
1.k~ Prasad, G, 1984: A Geomorphological Study of Chhiudwara Plateau.

ऊपरी भाग को निम्न कर दिया है, जबकि कोलार तथा जाम नदी उमरेड को पूर्णरूपेण अपरदित नहीं कर सकी। इसी प्रकार राँची पठार का उत्थान अपरदन-सतहों में भ्रम उत्पन्न करता है।