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एड्स की खोज किसने की थी , aids discovered by scientists in hindi एड्स की रोकथाम के 3 उपाय क्या है , इलाज है या नहीं

aids discovered by scientists in hindi एड्स की खोज किसने की थी एड्स की रोकथाम के 3 उपाय क्या है , इलाज है या नहीं ?

एड्स (AIDS)

आधुनिक काल का सबसे भयानक व भीषण रोग जिसे “काल” (death warrant) कहा जा सकता है उसे एड्स कहते हैं। यह विश्व में सभी भागों में तेजी से फैल रहा है चूँकि इस रोग के उपचार की कोई खोज अभी तक नहीं की जा सकी है अतः विश्व स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिये चुनौती बना हुआ है।

एड्स से हमारा आशय “एक्वायर्ड इम्यूनो डैफीशिएन्सी सिन्ड्रोम ” ( acquired immuno deficiency syndrome) से है। लगभग 500 वर्ष पूर्व सिफलिस नामक रोग यूरोप में तेजी से फैला था उसके बाद यह रोग ही एक मात्रा ऐसा रोग है जिसने मानव समाज में भय फैलाया है। 1981 में न्यूयॉर्क व केंलीर्फोनिया से इस रोग के बारे में जानकारी मिली। कपोसी सार्कोमा एवं न्यूमोसिस्टिस केरिनी (Kaposi’s sarcoma and pnemocytic carinii) निमोनिया विरल वयस्कों के रोग हैं अचानक इनमें वृद्धि हुई जो समलिंगी व हैरोइन जैसे मादक पदार्थों के लेने वाले लोगों में देखी गयी। इनमें प्रतिरक्षी तंत्र समाप्त होना मुख्य लक्षण था। जिसके फलस्वरूप देह अनेक रोगाणुओं के लिये सुभेद्य हो गयी और ये व्यक्ति घातक संक्रमण के शिकार हो गये। इनमें लसीका ग्रन्थियों व अन्य अंगों में दुर्दम रोग हो गये जिसके फलस्वरूप उत्पन्न अवस्था को ” अभिग्रहित रोधकक्षमता अभाव संलक्षण (Acquired immuno deficiency syndrome) AIDS नाम दिया गया ।” इसी प्रकार के लक्षण अमेरिका में पूर्वी क्षेत्र से आने वाले अप्रवासियों व हीमोफिलिया के रोगियों में देखे गये जो कारक VIII के इन्जेक्शन लेने के आदि थे। इसी प्रकार के लक्षण रक्त आधान ग्राही व्यक्तियों में पाये गये। रोगी के लैंगिक सहभोगियों व सन्तानों में भी ऐसे ही लक्षण देखे गये। अतः यह निष्कर्ष निकाला गया कि खुले लैंगिक सम्बन्ध रखने वाले लोगों में, दैहिक तरल (रक्त आदि) आधान करने से यह रोग तेजी से फैल रहा है। अमेरिका के अतिरिक्त विश्व के अन्य भागों में भी इस रोग से ग्रसित रोगियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होने के समाचार मिलते रहे हैं। अतः विश्व के सभी चिकित्सकों ने इसके निवारण करने को प्रथम वरीयता देने का निश्चय किया है।

सीरमीय (serological) आँकड़े दर्शाते हैं कि एड्स विषाणु 1979 के पूर्व मनुष्य की देह में नहीं था यह सम्भवतः वानरों से मनुष्य में स्थानान्तरित हुआ है जो पहले अफ्रीका में आया बाद में अमेरिका व यूरोप में फैल गया। करोड़ों अमेरिकी इसके शिकार हैं। यह रोग आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, केन्द्रीय अफ्रीका, यूरोप के अनेक क्षेत्रों, करीबन क्षेत्र व जापान में अधिक व्यापक है। एक समय तक यह रोग केवल पश्चिम तक सीमित था किन्तु अब लगभग विश्वव्यापी हो गया है।

एक अनुमान के अनुसार 5 से 10 करोड़ व्यक्ति इस विषाणु से ग्रसित हैं जो अन्य व्यक्तियों को इससे संक्रमणित कर सकते हैं। इसमें से 80% लोग तो अमेरिका में ही हैं। 1986 तक अमेरिका में लगभग 2000 व्यक्ति इस रोग से मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। एड्स से ग्रसित रोगी की मृत्यु क्रूरता, छल व पश्चाताप कराते हुए होती है। रोग का शिकार होने के लगभग 4 वर्ष में रोगी की मृत्यु हो ही जाती है। अधिकतर रोगियों में 92.5% नर 6.5% मादाएँ व 1% बच्चे पाये गये हैं। अधिकतर रोगी वे व्यक्ति पाये गये है जो समलैंगिक सम्बन्ध रखते हैं।

एड्स की खोज का श्रेय डॉ. गॉटलिब (Dr. Gottlieb) को है। 1981 में लास एन्जेलेस में तीन महीनों के दौरान इनके पास चार ऐसे रोगी आये जो फेफड़ों के न्यूमोसिस्टिस निमोनिया से ग्रसित थे। इस प्रकार का संक्रमण इन्होंने प्रथम बार ही देखा था। यह संक्रमण अवसरवादी (opportunistic) प्रकार का संक्रमण था। जिसने रोगी की देह में उस समय प्रवेश किया था जब रोगी का प्रतिरक्षी तन्त्र निष्क्रिय हो चुका था। ये सभी रोगी समलैंगिक सम्बन्ध रखने वाले थे। इसके बाद विश्व के अन्य क्षेत्रों में भी इस प्रकार के रोगियों की रिपोर्ट आयी जो लैंगिक रूप में अधिक सक्रिय थे अन्तःशिरीय अन्तःक्षेपण मादक द्रव्यों (intravenous injection of drugs) के आदी थे, जो एक ही सुई (needle) तथा सिरिंज (syringe ) का उपयोग इस कार्य हेतु करते थे। रक्त देने वाले व्यक्ति यदि एड्स के पीड़ित थे तो ग्राही व्यक्ति भी इस रोग का शिकार होता देखा गया।

उपरोक्त अध्ययनों से यह बात प्रकाश में आयी कि यह रोग सामान्य संक्रमण न होकर सम्पर्क के फैलने वाला रोग है अर्थात् रोगी को छूने या भोजन द्वारा अथवा पेय पदार्थों के लेने से नहीं होता एवं न ही वायु के साथ इसका रोगाणु देह में प्रवेश करते हैं। अनेक व्यक्तियों से असुरक्षित लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करने वालों में यह रोग हो सकता है। एड्स विषाणु से ग्रसित व्यक्ति में देह का तापक्रम बिना किसी कारण से बढ़ा रहता है अर्थात् बुखार बना रहता है। पेशियाँ दर्द करती हैं। रात्रि को पसीना आना, लसिका ग्रन्थियों का बढ़ना आदि अन्य लक्षण पाये जाते हैं। अनेक लैंगिक रोग सिफलिस, गोनोरिया, लैंगिक हर्पीज, जिआर्डिएजिस एवं यकृत शोथ भी रोगी को घेर लेते हैं। मादक द्रव्यों के अन्तःशिरीय अन्तःक्षेपण एवं अन्य मादक पदार्थों जैसे कोकीन, एन्फीटेमोन, मीथेक्वेलोन एमाइल नाइट्राइट लेने वालों में यह रोग अधिक होता देखा गया है। गुदीय मैथुन भी सम्भवत: इस रोग के फैलने में सहायक होता है। गुदीय श्लेष्मा वीर्य द्वारा अधिक पारगम्य होकर विषाणुओं के प्रवेश को सुगम बना लेती है। नाइट्राइट्स संक्रमण कारकों ये गुदीय श्लेष्मा से भीतर पहुँचना प्रमुख होता है। अतः एड्स रक्त द्वारा फैलने वाला रोग हैं जो निम्नलिखित लोगों को हो सकता है –

  1. समलैंगियों (Homosexals) में।
  2. अन्तः शिरीय अंत:क्षेपण द्वारा मादक पदार्थों का उपयोग करने वालों में।

(Intravenous use of drugs by injections)

  1. लैंगिक सम्बन्ध रखने वाले नर व मादा ।

(Sexual partners male or female)

  1. खुले घाव रखने वालें (Open wound carriers)
  2. रक्त, प्लाज्मा या प्लेटलेट्स आधान कराने वाले ।

(By blood, plasma or platelet transfusion)

  1. रोगाणु युक्त या अनिजर्मित सुई एवं सिरिज का उपयोग करने पर।

(Use of infected or unsterilized needle and syringes)

  1. शिशुओं में, संक्रमणित माता द्वारा (In infants from infected mother)

(i) एड्स का विषाणु (Aids virus) : एड्स का रोगाणु एक प्रकार का रेट्रोवायरस है जिसे संक्रमणित रोगी के रक्त, लसीका ग्रन्थियों, मस्तिष्क ऊत्तक, प्रमस्तिष्क मेरु द्रव, आँसुओं, अस्थि मज्जा कोशिकाओं, प्लाज्मा, लार व वीर्य से प्राप्त किया जा सकता है। इसे अनेक नाम दिये गये हैं। जैसे एड्स एसोशिएटेड वायरस (lymphoadenopathy associated virus) LAV तथा मानव T- कोशिका लिम्फोट्रोपिक वायरस टाइप III (Humman T-cell. Lymphotropic,virus Type-III) HTLV-III, इसे हाल ही में नया नाम मानव प्रतिरक्षी अभाव विषाणु (Human Immuno Deficiency Virus) HIV दिया गया है। HIV कुल रेट्रोविरिडी (Retroviridae) का सदस्य है अतः रेट्रोवायरस के सामान्य नाम से जाना जाता है। यह मानव रक्त में अनेकों प्रभेदों (strains) के रूप में रहता है। अन्य दो विषाणु जो मानव के लसीका तन्त्र को प्रभावित करते हैं मानव T-कोशिका लिम्फोट्रोपिक विषाणु – I (Human T-cell Lymphotropic virus – I) तथा HTLV-EHTLV-II अबुर्दीय है जो वयस्क में T-कोशिका ल्युकेमिआ एवं लिम्फोमा (T-cell leukaemia and Lymphoma) तथा रोमिल T- कोशिका ल्युकेमिआ रोग उत्पन्न करते हैं | HIV मनुष्य में अबुर्द (tumor) रोग उत्पन्न करने, में सहकारक का कार्य करता है।

भारत में हो रही खोज व जाँच के आधार पर यह माना जा रहा है कि HIV का एशिया में फैलने वाला प्रभेद अलग है। HIV के अनेक प्रभेद खोजे गये हैं। HIV-I अमेरिकन प्रभेद है जो विश्वव्यापी है यह यूरोप मध्य व पूर्व एशिया में पाया जाता है। जबकि HIV-II का मुख्य संक्रमण पश्चिमी अफ्रीका में है।

HIV की संरचना (Structure of HIV) : एड्स का कारक कुल रेट्रोविरिडी के उप समूह लेन्टीवायरस (lentrivirus) का सदस्य है। लेन्टस (lentus) से आशय धीमा (slow) से है अर्थात् धीमी गति से प्रभाव उत्पन्न करता है। इस समूह के अन्य सदस्य भेड, बकरी व घोड़े में आर्थराइटिस, एनसिफेलाइटिस व संक्रमणकारी रक्तक्षीणता (arthritis, encephalitis, infectious aneamia) रोग उत्पन्न करते हैं।

यह विषाणु आवरण युक्त होता है। इसका व्यास 90-120 nm होता है। इसमें न्यूक्लिओप्रोटीन से बनी कोर (nucleoprotein core) होती है जिसके भीतर एक लड़ वाला RNA जीनोम व प्र उपस्थित होता है। (चित्र 13.1 ) विषाणु के RNA के साथ ही प्रतीप या उत्क्रमी ट्रान्सक्रिप्टेज किण्वक (reverse transcriptase enzyme) भी उपस्थित होता है जो कि रेट्रोवायरस का प्रमुख लक्षण है।

यह विषाणु जब किसी कोशिका को संक्रमणित करता है तो एक एंजाइम विषाण्विक RNA का अनुलेखन करता है जिससे पहले एक हेलिक्स युक्त DNA बनता है इसके बाद दो लड़ों या हेलिक्स वाला DNA बन जाता है जो परपोषी कोशिकाओ के गुणसूत्र प्रोविषाणु (provirus) कहते हैं। यह यद्यपि पोषी कोशिकाओं के कार्यों को प्रभावित करता है किन्तु लम्बे समय तक गुप्त (latent) बना रहता है। विषाणु को सक्रिय करने वाले कारकों के प्रभाव से यह क्रियाशील हो जाता है तथा विषाण्विक RNA की प्रतिकृति बनने की क्रिया आरम्भ हो जाती है। साथ ही विषाणु के अन्य घटक भी संश्लेषित होने आरम्भ हो जाते हैं। विषाण्विक कोष न्यूक्लिओकेप्सिड खोल प्रोटीन से बनी होती है। RNA की प्रतिकृति बनने के तुरन्त बाद यह नग्न ( naked) अवस्था में होता है उस समय पर लाइपोप्रोटीन का आवरण ही पाया जाता है। लिपिड पोषक की कोशिका झिल्ली से प्रदत्त होते हैं व ग्लाईकोप्रोटीन विषाणु द्वारा कोड किये जाते हैं। इसके ये प्रोटीन सतह पर शूलों या सीकों (spikes) के समान निकल रहते हैं तथा पारझिल्ली (transmembrane) पर वृन्त द्वारा गड़े रहते हैं। शूल या सींक समान संरचनाएँ विषाणु का अधिकतर भाग घेरे रहती है तथा ग्राही पोषक कोशिकाओं पर CD4 नामक ग्राही संवेदी बिन्दुओं पर चिपकने में भूमिका निभाते हैं।

HIV के जीनोम (genome) में तीन संरचनात्मक जीन्स गेग, पोल एवं एन्व (gag, pol and env) एवं अन्य असंरचनात्मक जीन्स उपस्थित होते हैं। इसके उत्पाद प्रतिजन के रूप में कार्य करते हैं। संक्रमणित व्यक्ति के सीरम में इनके प्रति एन्टीबॉडीज पायी जाती है। प्रतिरक्षी – प्रतिजन की पहचान कर ही HIV के रोगी का परीक्षण किया जाता है। HIV में प्रतिजैनिक परिवर्तन कोड एवं आवरण प्रतिजन में बार-बार परिवर्तन होते रहते हैं | HIV के विभिन्न प्रभेदों में कुछ प्रतिजेनिक अन्तर भी पाये जाते हैं।

HIV की सतह पर शूल प्रोटीन पर CD4 प्रतिजन होता है अतः यह उन सभी कोशिकओं को संक्रमण करने में सक्षम होता है जिन पर CD उपस्थित होता है। HNT प्रकार की लिम्फोसाइट कोशिकाओं में लयनकारी संक्रमण करता है। अन्य कुछ और कोशिकाएँ जिन की सतह पर CD4 पाया जाता है संक्रमण के प्रति सुग्राही होती है । कुछ लिम्फोसाइट्स, कुछ मोनोसाइट्स, मेक्रोफेजेज, फेफडे, लैंगरहेन्स एवं तंत्रिका कोशिकाएँ अधिक सुग्राही होती हैं।

(iii) प्रतिरोधकता (Resistance ) : यह कठोर पर दृढ़ प्रकार का विषाणु नहीं है। यह ताप अस्थिर (thermolabile) होता है अर्थात् 50°C पर 30 मिनट में तथा 100°C पर 1 सैकण्ड में निष्क्रिय हो जाता है। सामान्य तापक्रम पर एक सप्ताह तक जीवित रहता है। यह हिम शुष्कीय (lyophilization) प्रकृति का होता है अर्थात् निम्न ताप पर जीवित रहता है।

यह 70% इथेनॉल, 35% आइसोप्रोपाइल एल्कोहॉल, 5% फारमेल्डीहाइड, 3% हाइड्रोजन पराक्साइड, 0.5% लाइसॉल एवं 2.5% ट्वीन 20 द्वारा नष्ट किया जा सकता है। गर्म पानी से एवं • उत्तम डिटरजेन्ट द्वारा संक्रमणित कपड़ों बर्तन आदि को धोकर इन्हें संक्रमण रहित बनाया जा सकता है। सतही संक्रमण में ब्लीचिंग पाउडर से धोकर मुक्ति पायी जा सकती है। चिकित्सा उपकरण आदि 2% ग्लुटारलहीहाइड से धोकर पुनः उपयोग में लाये जाते हैं।

(iv) रोगजनकता (Pathogenesis) : संक्रमणित व्यक्ति की देह से स्रावित पदार्थों या उत्तकों से HIV प्राप्त किया जा सकता है ( सारणी)।

सारणी  : HIV प्राप्त करने हेतु उचित सामग्री

क्र.सं.

 

तरल / ऊत्तक कोशिकाए

 

I रक्त – CD4 कोशिकाएँ, T4 लिम्फोसाइट्स,

कुछ मोनोसाइट्स एवं B – लिम्फोसाइट्स

II प्लाज्मा

वीर्य

 

प्रमस्तिष्क तरल लिम्फोसाइट्स व तरल
लार

 

स्तनधारियों से स्रावित दुग्ध

 

आंसू तरल लिम्फोसाइट्स

 

त्वचा

 

लेगंरहेन्स की कोशिकाएँ

 

फेफड़े

 

एल्वीओलर मेक्रोफेजेज

 

केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र

 

ग्लीयल कोशिकाएँ एवं मेक्रोफेजेज

 

 

संक्रमण रक्त या ऊत्तक में उस समय होता है जब विषाणु इनके सम्पर्क में आता है एवं ये कोशिकाएँ इसके लिये सुग्राही होती हैं। इसमें T4 लिम्फोसाइट्स सर्वाधिक सुग्राही होते हैं संक्रमणित हो जाते हैं। सम्भोग या रक्त आधान (sexual contact or blood transfusion) के दौरान ‘यह सम्भावना अधिक होती है। विषाणु का द्वि-तन्तुकीय DNA से मिलकर या समाकलन करके अनुलेखन कर गुप्त संक्रमण (latent infection) की अवस्था में प्रवेश कर जाता है। धीरे-धीरे लयनकारी पदार्थ स्रावित होते हैं एवं विरिआन्स की नयी पीढ़ियाँ निकलकर देह की अन्य कोशिकाओं को संक्रमणित करती जाती हैं। परिपाक काल या ऊष्मायन अवधि (incubation period) लम्बी होने के कारण रोग के लक्षण एकदम प्रकट नहीं होते। धीरे-धीरे T4 लिम्फोसाइट्स की संख्या नष्ट होने के कारण कम होने लगती है। संक्रमणित लिम्फोसाइट्स, इन्टरल्युकिन-2 (interleukin-2), गामा इन्टरफेरॉन (gama interferon ) एवं लिम्फोकाइन्स (lymphokines) की सामान्य मात्रा के स्रावण में कमी की देते हैं। इस प्रकार कोशिका मध्यवर्ती प्रतिरक्षा (cell mediated mmunity) CMI में कमी होने लगती है। तरल प्रकार की रोधक क्षमता (humoral immunity) में भी कमी होने लगती है। AIDS के रोगी इन कारणों से नये प्रतिजन के प्रति प्रतिक्रिया नहीं दर्शाते, निष्क्रिय बने रहते हैं और रोगी को अनेक नये संक्रमण अपना शिकार बना लेते हैं। गामाग्लोबूलीनेमिया से समाकलन (integration) कर लेता है। इस दो लड़ वाली अवस्था हाइपर ग्लोबुलिएनीमिआ (hyperglobulianemia) अवस्था में रोगी आ जाता है। IgG व IgA प्रकार के इम्यूनोग्लोबुलिन्स (immunoglobulins) की मात्रा बढ़ जाती है। मोनोसाइट मेक्रोफेजेज क्रिया भी प्रभावित होती है चूँकि लिम्फोसाइट्स के स्त्रावण की मात्रा में कमी हो जाती है। रसायन अनुचलन (chemotaxis) प्रतिजन क्रियाएँ अन्तःकोशिकीय संक्रमण को नष्ट करने जैसी क्रियाओं में कमी होने लगती है।

अमेरिका के रोग नियंत्रण संस्थान (Center for disease control) के अनुसार HIV के रोगी में निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर रोग को पहचाना जा सकता है-

  1. लिम्फोनिआ (lymphopenia)
  2. चयनित T4 लिम्फोसाइट्स की संख्या में कमी
  3. त्वचा का अधिक संवेदी हो जाना
  4. IgG IgA व IgM की मात्रा में वृद्धि होना

.5. B कोशिकाओं द्वारा Ig स्रावण में वृद्धि

  1. लिम्फोसाइट्स का प्रतिजन के प्रति कार्यशीलता में कमी होना
  2. कोशिकीय विषाणु पदार्थों के प्रति निष्क्रिय होना
  3. नये प्रतिजन के प्रति प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया में कमी होना 9. मोनोसाइट व मेक्रोफेजेज के कार्यों में परिवर्तन 10. प्रतिरोधी पदार्थों की मात्रा का सीरम में वृद्धि होना है।

प्रारम्भिक संक्रमण की स्थिति में कुछ सप्ताह बाद से ही हल्का बुखर एवं सिरदर्द होने लगता है । रोग के निदान युक्त लक्षण विकसित होने में 9 से 300 माह का समय लग सकता रक्ताधान के माध्यम से होने वाले रोग में यह समय 4- 14 माह का होता है। आरम्भ में HIV प्रतिरक्षी परीक्षण ऋणात्मक ही आते हैं किन्तु समय में वृद्धि होने पर धनात्मक हो जाते हैं। थकान, प्रवाहिका, वजन में कमी एवं अनेकों मोकापरस्त संक्रमण जैसे हार्मोन्स, तपेदिक, सालमोनेलेसिस आदि रोगी को अपना शिकार बना लेते हैं। श्वसन में तकलीफ होना, उदरीय दर्द होना, कोलाइटिस से पीड़ित होना आदि अनेकों संक्रमण रोगी के कमजोर होने के साथ-साथ बढ़ते जाते हैं। रोधक क्षमता के अभाव में वृद्धि के कारण दैहिक नियंत्रण लगभग समाप्त हो जाता है एवं रोगी क्षीण होकर मृत्यु का ग्रास बन जाता है।

AIDS के रोगियों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

  1. स्वस्थ्य वाहक (Healthy carriers ) : यह प्रथम तथा सामान्य अवस्था है जिसमें रोगी की देह पर रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते केवल बुखार आता है जो कुछ महीनों तक चलता है। रोगी सामान्य बने रहते हैं किन्तु ये अन्य व्यक्तियों को संक्रमित कर सकते हैं। इनमें AIDS के लक्षण दिखाई देने में 5-7 वर्ष का समय लग सकता है।

यह एड्स संक्रमण की प्रारम्भिक या एक्यूट (acute) अवस्था कहलाती है।

  1. प्रोड्रोमल प्रावस्था (Prodomal phase) : इस प्रावस्था में AIDS रोग के लक्षण जैसे ज्वर, प्रवाहिका, वजन में कमी एवं लसिका ग्रन्थियों का बढ़ना प्रकट हो जाता हैं । प्रतिरक्षा तन्त्र के कमजोर होने के लक्षण दिखाई नहीं देते। देह पर अन्य कवक रोग संक्रमण, मुख की श्लेष्मा व त्वचा के रोग, मस्से हर्पीज आदि विकसित हो सकते हैं। यह प्रावस्था 1-30 माह या 5 वर्ष तक रह सकती है। यह एड्स की मध्यवर्ती या क्रोनिक ( Chronic) अवस्था होती है।
  2. अन्तिम अवस्था (End stage) : यह AIDS की पूर्ण विकसित प्रावस्था है। व्यक्ति की मृत्यु रोगों के अनियन्त्रण के कारण होती है। ऐसा प्रतिरक्षी तन्त्र के निष्क्रिय होने के कारण होता है जो एक बार विकृत होने के उपरान्त पुनः ठीक नहीं होता । इस अवस्था में रोगी 1-4 वर्ष तक जी सकता है। त्वचा पर कार्पोसी के अबुर्द उत्पन्न हो सकते हैं। इसके मुख्य लक्षणों में (i) फेफड़ों के संक्रमणित होने से श्वसन तन्त्र का कमजोर हो जाना, सूखी खाँसी, श्वांस का न आना, छाती में दर्द एवं ज्वर को बने रहना प्रमुख है। CDT लिम्फोसाइट्स की संख्या में कमी आ जाती है। इसे क्राइसिस (Crisis) अवस्था भी कहते हैं।

(i) पाचन तन्त्र में संक्रमण होने से विष्ठा का आयतन घट जाता है। उदर में दर्द एवं बैचेनी बनी रहती है।

(ii) तंत्रिका तन्त्र : सिरदर्द, याददाश्त में कमी, व्यवहार में परिवर्तन एवं चक्कर आने की शिकायत होने लगती है।

(iii) केन्सर उत्पत्ति: त्वचा का कैंसर उत्पन्न हो सकता है। लसीका ग्रन्थियों में भी कैंसर हो सकता है।

(v) प्रयोगशाला परीक्षण (Laboratory test) : रोधक क्षमता में अभाव के परीक्षण प्रयोगशाला में निम्नलिखित प्रकार से किये जाते हैं-

(1) श्वेत रक्त कणिकाओं व लिम्फोसाइट की गणना की जाती है। रोगी में ल्यूकोपेनिया की स्थिति व लिम्फोसाइट 2000 c/m.m. से कम आते हैं।

(2) T4 कोशिकाओं की गणना 2000c/m.m. से कम होती है T4 व T8 कोशिकाओं का अनुपात विपरीत हो जाता है।

(3) प्लेटलेट्स की गणना किये जाने पर थोम्बोसाइटोपेनिया (thrombocytopenia) की स्थिति होती है।

(4) IgG व IgA स्तर बढ़ जाता है।

(5) त्वरक परीक्षणों के द्वारा CMI परीक्षण कमी दर्शाते हैं।

आजकल ELISA परीक्षण अधिकतर किया जाता है। HIV से एन्टीजन प्राप्त कर (12. Lymphocytes) पर संवर्धन कराते हैं। परीक्षण सीरम डालकर देखते हैं यदि प्रतिरक्षियाँ होती है तो एन्टीजन को बन्धनों में जकड़ लेती है। मुक्त सीरम को धो देते हैं व एक प्रकार का एंजाइम डालते हैं तो पदार्थ में विशिष्ट रंग विकसित होता है जिसे ELISA मानकों द्वारा अध्ययन करते हैं। यह परीक्षण बहुत अधिक महँगा नहीं है, किन्तु ये परीक्षण भी पूर्णतः सत्य या खरे नहीं उतरते । पक्के तौर पर जाँचने हेतु वेस्टर्न बोल्ट परीक्षण (western bolt test) करते हैं।

(vi) बचाव एवं नियंत्रण (Prevention and control) : लोगों को शिक्षित करना, लैंगिक सम्बन्धों में सावधानी बरतना, अनजान लोगों से रक्त आधान न करना आदि। AIDS माताओं को गर्भधारण के प्रति सावधान किया जाना अति आवश्यक है क्योंकि यह रोग माता से शिशु में प्रवेश. करता है। निजर्मित इन्जेक्शन, सुई आदि का ही उपयोग करना तथा मादक औषधियों के प्रयोग से दूर रहना बीमारी से बचाता है। जीवन का तौर तरीका प्राकृतिक व शुद्ध प्रकार का रखना बहुत जरूरी है। समलैंगिक सम्बन्धों के प्रति सचेत करना, उचित कानून बनाकर नियम तोड़ने वालों के प्रति कठोरता बरतना अत्यधिक आवश्यक है । वीर्य एवं रक्त दाताओं, वेश्याओं आदि के परीक्षण नियमित कराना तथा रोगियों को विशेष देख-रेख में रखना भी बहुत आवश्यक है। इसी प्रकार अस्थि-मज्जा, कोर्निया, वृक्क आदि के दान दाताओं के भी परीक्षण आवश्यक हैं। चिकित्सालयों में इस रोग के प्रति प्रशिक्षित स्टॉफ का होना भी परमावश्यक है। बिना दस्तानों के रोगियों को छूना, कपड़े बर्तन आदि का निजर्मीकरण नियमित रूप से किया जाना जरूरी है। देह से बहने वाले तरल आदि का निष्पादन उचित तौर पर करना भी जरूरी है।

सामान्य शिष्टचार के नियमों का प्रयोग किया जाना उचित प्रतीत होता है। होठों से चुम्बन या हाथों का चूमना, हाथों का मिलाना रोगी के साथ घातक हो सकता है। इस बारे में अभी तक कोई प्रमाण नहीं है कि मच्छर, खटमल आदि रोगाणुओं के वाहक होते हैं। अभी तक इसके टीके की खोज की कोई सम्भावना नजर नहीं आती। इस बारे में जनचेतना, मीडिया एवं प्रेस द्वारा करा कर लोगों को जागरूक किया जा सकता है। अतः बचाव ही उपचार दिखाई देता है।

उपचार (Treatment) : एड्स के उपचार की कोई निश्चित रूपरेखा नहीं है। संक्रमण जो बढ़ते हैं या हो गये हैं, का उपचार सम्भव है। सामान्य प्रबन्ध, जाँच व विशिष्ट एन्टी HIV एजेन्ट का उपयोग किया जाता है। मौकापरस्त संक्रमणों व अबुर्दों का उपचार प्राथमिक अवस्था में लाभदायक होता है एवं रोगी सामान्य जीवन लम्बे समय तक व्यतीत करने योग्य बना रहता विषाणुओं को नष्ट करने योग्य औषधियाँ जैसे इन्टरफेरॉन, रोबाविरीन, सूरामिन, फॉसकारनेट आदि उपयोग में लायी जा रही है। जीडोव्यूडीन AZT विशेष तौर पर उपयोगी पायी गयी है। दो न्यूक्लिओक्साइड एनालोग AZT अर्थात् जीडोव्यूडीन (3-azido-3′ deoxy thymidine) तथा लेमीव्यूडीन (3TC) एवं एक प्रभावी प्रोटीएज अवरोधक ( inhibitor) इन्डिनेविर (indinavir) द्वारा रक्त में विषाणु की मात्रा 20000 से 10 lac RNA की प्रतियाँ प्रति 1 मि.लि. प्लाज्मा में घटने के प्रमाण मिले हैं। यह कमी 90% रोगियों में लगभग एक वर्ष तक बनी रहती है।

एड्स के टीके विकसित किये जाने के अनेक प्रयोग किये गये हैं। बीस में से दो टीकों को प्रभावी मान कर और प्रयोग किये जा रहे हैं। इसके टीके बनाना एक जटिल कार्य है, क्योंकि यह प्रतिरक्षी तन्त्र की कोशिकाओं CD4 लिम्फोसाइट्स को ही अपना शिकार बनाता है अत: इस विषाणु की पहचान नहीं हो पाती। विषाणु जो प्रोटीन बनाता है उनके खण्डो को बदल देता है अतः ये प्रतिरक्षी तन्त्र द्वारा पहचाने ही नहीं जाते जिनके विरुद्ध कोई रक्षात्मक कार्यवाही की जा सके। उपचार में पूर्ण सफलता अभी तक किसी को भी नहीं मिल पायी है। इस दिशा में असंख्य वैज्ञानिक अनुसंधान में लगे हुए हैं विश्व की आँखें इस दिशा में टिकी हुई है।

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