प्रशासनिक मूल्य निर्धारण तंत्र क्या है | Administrative pricing system in hindi price assessment

By   February 28, 2021

Administrative pricing system in hindi price assessment प्रशासनिक मूल्य निर्धारण तंत्र क्या है ? 

लागतोपरि अथवा कीमत-लागत अंतर मूल्य निर्धारण
कुछ बाजार संरचनाओं जैसे अल्पाधिकार में, बहुधा फर्म वह मूल्य प्रभारित करते हैं जो औसत लागत के ऊपर कुछ प्रतिशत लाभ गुंजाइश (च्तवपिज डंतहपद) पर आधारित होता है। इस मार्जिन को कीमत-लागत अंतर भी कहा जाता है। इसलिए मूल्य निर्धारण की इस प्रणाली को लागतोपरि अथवा कीमत-लागत अंतर मूल्य निर्धारण भी कहा जाता है। यह सामान्यतया विश्वास किया जाता है कि यद्यपि माँग और पूर्ति कृषि मूल्यों को निर्धारित करते हैं, औद्योगिक मूल्य लागतोपरि आधार पर निकाला जाता है। चटर्जी (1989) यू एस ए, यू के और भारत सहित अनेक देशों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जहाँ लागतोपरि मूल्य निर्धारण का अनुसरण किया जाता है। इस खंड में इकाई 23 में लागतोपरि मूल्य निर्धारण प्रणाली के प्रयोग के लाभ और हानि के संबंध में चर्चा की गई है।

इस तरह की बाजार संरचना में, माँग में वृद्धि के परिणामस्वरूप उत्पादन में वृद्धि होती है किंतु मूल्य प्रभावित नहीं होता है। किंतु जब लागत बढ़ती है उदाहरण के लिए, कच्चे मालों के लागत में अथवा श्रमिकों को दिए गए मजदूरी वृद्धि के कारण, इसके परिणामस्वरूप कीमत-लागत अंतर के उतना ही रहने पर भी मूल्य में वृद्धि हो जाती है। यह लाभ में गिरावट नहीं आने देती है। तथापि, यदि उपभोक्ता इस प्रकार की मूल्य वृद्धि का पूरा प्रभाव सहन कर पाने में सक्षम नहीं होता है तो उद्योग लागत में वृद्धि की सीमा तक मूल्य वृद्धि करने में सक्षम नहीं होगा। ऐसी स्थिति में, कीमत-लागत अंतर में कमी आएगी। अल्पाधिकारी बाजार जिसमें कुछ ही फर्म है, यदि फर्म मिल कर संघ बना लेते हैं तब कीमत-लागत अंतर को प्रभावित किए बिना लागत वृद्धि को उपभोक्ता पर थोपने की उनकी क्षमता बढ़ जाएगी।

 प्रशासनिक मूल्य निर्धारण तंत्र
भारत जैसी मिश्रित अर्थव्यवस्था में, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही अनेक औद्योगिक उत्पादों और सेवाओं का मूल्य निर्धारण प्रशासित होता है। प्रशासनिक मूल्य व्यवस्था के अंतर्गत अनेक प्रकार के कार्यकलाप जैसे खनन, विनिर्माण, सार्वजनिक उपयोगिताएँ, व्यापार, परिवहन, बैंकिंग, वित्त और सेवाएँ इत्यादि आती हैं। भारत में न सिर्फ राज्य एकाधिकार जैसे रेलवे अपितु एकाधिकार सदृश उपक्रमों में जैसे विद्युत और डाक सेवाओं के मूल्य भी प्रशासित किए जाते हैं। इसी प्रकार, अनेक उद्योगों में जहाँ सरकार की प्रभुत्वशाली स्थिति है (उदाहरण के लिए इस्पात, भारी मशीनरी, उर्वरक, औषधि और फार्मास्यूटिकल, पेट्रोरसायन) और निजी क्षेत्रों के साथ प्रतिस्पर्धा भी करती है, उत्पादों के मूल्य प्रशासित हैं। इस इकाई में, हम आगे के उपखंडों में पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों के मूल्य निर्धारण पर चर्चा करेंगे।

पेट्रोलियम उत्पाद
हाल तक, पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन से लेकर मूल्य निर्धारण तक प्रशासनिक मूल्य तंत्र (ए पी एम) के अंतर्गत था। समय बीतने के साथ इस प्रणाली में भारी परिवर्तन आया है। यह तंत्र 1970 के दशक के आरम्भ में शुरु हुआ था जब पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य लागतोपरि आधार पर निर्धारित किए गए थे। तेल समन्वय समिति (ओ सी सी), जो पेट्रोलियम मंत्रालय का एक अंग हैं, तेलशोधकों ने (जैसे बी पी सी एल, एच पी सी एल और आई ओ सी) के लिए उत्पादन लागत और अनुमत्य खर्चों को निर्धारित किया। इसमें कच्चे माल का लागत, परिवहन, उधारियों पर वास्तविक ब्याज लागत और शुद्ध संपत्ति पर ब्याज पश्चात् 12 प्रतिशत प्रतिलाभ सम्मिलित है। इस तरह का मूल्य निर्धारण में लागत कम करने तथा दक्षता बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था। कुछ उत्पाद जो मुख्य रूप से निर्धनों द्वारा उपयोग किए जाते हैं जैसे रसोई गैस, मिट्टी का तेल और डीजल पर राजसहायता धनवानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उत्पादों जैसे पेट्रोल और वायुयान के ईंधन (।अपंजपवद ज्नतइपद थ्नमस) पर अधिक-कर लगा दिया गया। इस प्रकार, बजट से सीधे राजसहायता देने के स्थान पर, ए पी एम ने पेट्रोलियम क्षेत्र के अंदर प्रति-राजसहायता (Cross Subsidy) का प्रावधान किया। बजट से पृथक् खातों के अलग सेट जिसे तेल पूल खाता कहा गया, के माध्यम से अन्तर्वाह और बहिर्वाह की गणना की गई।

वर्ष 1997 में एक भारी परिवर्तन आया जब अनेक उत्पादों विशेषकर, डीजल को प्रशासनिक मूल्य निर्धारण तंत्र से बाहर कर दिया गया। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप डीजल का मूल्य इसके अंतर्राष्ट्रीय मूल्य से जुड़ गया जिससे कि डीजल के मूल्य में अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कमी-वृद्धि की साथ घट-बढ़ होगी। तथापि व्यवहार में, ऐसा नहीं हुआ। तेल क्षेत्र में नियंत्रणों को समाप्त करने के पहले चरण तक लगभग प्रत्येक वस्तु पर नियंत्रण था। अब उत्पादों की दो श्रेणियाँ हैं, एक जिसका मूल्य निर्धारण सरकार प्रशासनिक मूल्य तंत्र के अंतर्गत करती है और दूसरा जिसका मूल्य कंपनियाँ निर्धारित करती हैं। डामर (bitumen), नापथा, फर्नेस आयल और ल्यूब आयल आधारित मालों जैसे वाणिज्यिक उत्पादों का मूल्य निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा किया जाता है जबकि पाँच प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों-पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, रसोई गैस और वायुयान का ईंधन (ए टी एफ) का मूल्य निर्धारण अभी भी प्रशासनिक मूल्य तंत्र के अंतर्गत है। पेट्रोल और ए टी एफ जैसे प्रमुख उत्पादों की कीमत अभी भी अधिक है जिससे कि मिट्टी के तेल और रसोई गैस को राजसहायता प्रदान की जा सके।

वायुयान के ईंधन ( ए टी एफ) के मूल्य निर्धारण के संबंध में एक अन्य समस्या यह है कि विदेशी और घरेलू एयरलाइन्स के साथ समान व्यवहार नहीं किया गया है। जहाँ घरेलू एयरलाइन्स को इस ईधन पर बिक्री कर देना पड़ता है जबकि विदेशी एयरलाइन्स को बिक्री कर नहीं देना होता है। सरकार ने घोषणा की है कि ए टी एफ को प्रशासनिक मूल्य तंत्र से 31 मार्च 2001 तक हटा दिया जाएगा। अर्थात् इसकी बिक्री अन्तरराष्ट्रीय मूल्य के अनुसार स्वतंत्र रूप से की जाएगी। अप्रैल, 2002 तक प्रशासनिक मूल्य तंत्र को पूरी तरह से समाप्त करने का लक्ष्य था जिसके पश्चात् पेट्रोल सहित सभी पेट्रोलियम उत्पादों का मूल्य निर्धारण बाजार द्वारा किया जाएगा। मिट्टी तेल और रसोई गैस पर राजसहायता उत्तरोत्तर कम होगा और इसे अन्य पेट्रोलियम उत्पादों से प्रति राजसहायता के स्थान पर सामान्य बजट से राजसहायता दी जाएगी। डीजल, नाफ्था, बिट्युमेन, एल एस एच एस (low sulphur heavy stock), ईंधन आयल इत्यादि जैसे उत्पाद उस मूल्य पर उपलब्ध होंगे जिस पर वे अन्तरराष्ट्रीय बाजारों से आयात किए जाते हैं। इसका अर्थ होगा प्रयोक्ताओं लघु और मध्यम क्षेत्र के उद्योगों जैसे इंजीनियरिंग, वस्त्र , फाउन्ड्री इत्यादि के लिए इनका कम मूल्य जो अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।

उर्वरक
भारत में उर्वरकों का मूल्य निर्धारण मूल्य नियंत्रणों का एक महत्त्वपूर्ण घटक रहा है। घरेलू आत्म निर्भरता सुनिश्चित करने तथा कृषकों को अधिक उर्वरक का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु इस पर राजसहायता दिया गया। यह राजसहायता कृषकों को उर्वरक उपलब्ध कराने के मूल्य और घरेलू उत्पादन तथा आयात के लागतों में अंतर को प्रदर्शित करता है। नाइट्रोजनी उर्वरक (यूरिया) कृषकों को समान मूल्य पर बेची जाती है। यह सरकार के प्रतिधारण कीमत योजना (Retention Price Scheme) के अंतर्गत लागतोपरि मूल्य है। इस समय यूरिया पर औसत राजसहायता 4000 रु. प्रति टन है। फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों को नियंत्रण मुक्त कर दिया गया है। अर्थात् , खुला सामान्य लाइसेन्स (OGL) की प्रणाली के अन्तर्गत कोई भी इनका आयात कर सकता है। तत्पश्चात् आयातक सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट मूल्य पर घरेलू बाजार में इनकी बिक्री कर सकता है यह मूल्य आयातकों को रियायत प्रदान करता है।

समय बीतने के साथ राजसहायता के कारण कृषकों ने उर्वरकों का अधिक प्रयोग करना शुरू किया है। किंतु उर्वरक राजसहायता पर सरकार के खर्च में भी काफी वृद्धि हुई है। इसलिए इन राजसहायता को कम करने की आवश्यकता है। सरकार ने वर्ष 2000 में ऐसा करने के उपाय सुझाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। व्यय सुधार आयोग ने अनेक सुझाव दिए (देखिए भारत सरकार 2001 )।

आयोग के अनुसार, प्रतिधारण मूल्य योजना के परिणामस्वरूप बृहत् घरेलू उद्योगों के विकास में सहायता मिली है। अब देश अपनी उर्वरक माँग को स्वंय पूरी कर सकता है। चूँकि मूल्य लागतोपरि पर मूल्य आधारित है यह उत्पादकों को लागत दक्ष बनने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं देता है। आयोग का उद्देश्य इस मूल्य को कम करके आयात मूल्य के स्तर पर लाना था। इस पर विचार करते हुए यूरिया के उत्पादन का घरेलू लागत आयात मूल्य से अधिक है। यह सुझाव दिया गया था कि कुछ उर्वरक उत्पादन इकाइयों को, यदि यूरिया को पूरी तरह से नियंत्रण मुक्त कर दिया जाता है, बंद करना पड़ेगा। तथापि, इसके साथ ही, आयोग को लघु कृषकों की आय को भी बचाना था और विभिन्न उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना था। इसे यह भी सुनिश्चित करना था कि खाद्यान्न के उत्पादन में गिरावट नहीं आई।

क) लघु कृषकों को संरक्षण प्रदान करना
लघु कृषकों को संरक्षण प्रदान करने के संबंध में भी सुझाव दिए गए थे। यह सुझाव दिया गया था कि लघु कृषकों को अलग-अलग कार्यक्रमों के अंतर्गत अतिरिक्त कार्य प्रदान किया जाए। वे भूमि के विकास, लघु सिंचाई सुविधाओं इत्यादि के विकास के लिए कार्य कर सकते हैं। इन कार्यों से उन्हें अतिरिक्त मजदूरी आय हो सकती है तथा भूमि की उत्पादकता में भी वृद्धि हो सकती है। अतएव, जब भविष्य में उर्वरकों के मूल्यों में वृद्धि की जाती है तब उनके उत्पादन और आय में ह्रास नहीं होगा। दोहरी मूल्य योजना के अनुसरण का भी सुझाव दिया गया था जिसके अन्तर्गत प्रत्येक कृषक परिवार को 120 कि. ग्रा. उर्वरक सस्ते दर पर दिया जाता है।

ख) आत्मनिर्भरता में वृद्धि करना
आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि देश अपने उपभोग के लिए पर्याप्त मात्रा में उत्पादन कर सकता है। यदि यूरिया पर मूल्य राजसहायता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया तो अनेक घरेलू फर्मों को बंद करना होगा क्योंकि आयात मूल्य घरेलू मूल्य से नीचे है। अतएव आयोग ने सुझाव दिया कि मूल्य नियंत्रण को 1 फरवरी, 2001 से शुरू करके विभिन्न चरणों में समाप्त कर दिया जाए। इन चरणों के दौरान अधिक अकुशल इकाईयों को लागत पूरी करने के लिए राजसहायता दी जाएगी जिससे कि माँग को पूरा किया जा सके। किंतु 1 अप्रैल, 2006 तक उन्हें आधुनिकीकरण करना होगा और अधिक कुशल संयंत्र की स्थापना करनी होगी।

अंतरण मूल्य निर्धारण
कंपनियाँ एक दूसरे से उध्र्वमुखी रूप से संबंधित हो सकती है – अर्थात् जब एक कंपनी अगली कंपनी के लिए आदानों का उत्पादन करती है जो पुनः अगली कंपनी के लिए आदान का उत्पादन करती है और इसी तरह का क्रम चलता रहता है। इस प्रकार वे एक ही उत्पादन शृंखला में होते हैं अर्थात् विनिमयिता और वितरक। इसके विपरीत कंपनियाँ समान स्तर पर संबंधित होती हैं जब वे एक समान उत्पाद का उत्पादन करके एक ही बाजार में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करती है। जब एक कंपनी दूसरी संबंधित कंपनी को वस्तुओं अथवा सेवाओं की पूर्ति करती है तो वह जो मूल्य लेता है उसे अंतरण मूल्य कहा जाता है। इस प्रकार प्रभारित मूल्य दोनों कंपनियों द्वारा भुगतान किए गए कर को प्रभावित करता है। किन्तु अलग-अलग क्षेत्रों जो अलग-अलग देश राज्य क्षेत्राधिकार हो सकते हैं में कर की दरें भिन्न-भिन्न हो सकती है। संबंधित कंपनियाँ अंतरण मूल्य निर्धारण का प्रयोग कर के वह जो कर चुकाते हैं उसे बचाने के लिए इसका दुष्प्रयोग कर सकती है। ऐसा करने के लिए वे उच्चतर आय को कम कर वाले क्षेत्राधिकार में अंतरित करते हैं जिससे उन्हें कम आय अथवा कर देना पड़े। और वे अधिक व्यय को उच्च कर क्षेत्राधिकार में अंतरित कर देते हैं जिससे इसके कर योग्य लाभों को कम किया जा सके और इस प्रकार कम कर देगा।

अंतरण मूल्य निर्धारण के कारण सरकार को कर राजस्व में भारी हानि होती है। इसलिए उनके लिए अंतरण मूल्य निर्धारण का पता लगाना महत्त्वपूर्ण है, जो किसी विशेष सौदा से लाभ उचित है अथवा नहीं का पता लगा कर किया जाता है। भारत जैसे देशों में यह कच्चे मालों संयोजन के लिए अर्धनिर्मित वस्तुओं और औद्योगिकी के अंतरण मूल्यों पर आयात के माध्यम से किया जाता है जिससे कि ग्लोबल टैक्स लाभ प्राप्त किया जा सके। भारत सरकार इस समस्या से निपटने के लिए भारतीय कंपनी और विदेशी कंपनी के बीच निकट संबंधों का पता लगाती है। यदि अंतरण मूल्य निर्धारण का पता चलता है तो वे भारतीय कंपनी के कर योग्य आय का समायोजन करती है। दूसरे शब्दों में, यदि भारतीय कंपनी का लाभ कम प्रतीत होता है तो कर योग्य आय बढ़ जाती है।

यू एस ए, यू के, कनाडा , ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे अनेक विकसित देश अत्यन्त ही कठोर अंतरण मूल्य निर्धारण विनियमों का अनुसरण करते हैं। इन देशों में करदाताओं को संबंधित पक्षों के साथ सभी तरह के कारोबारों का विस्तृत रिकार्ड रखना पड़ता है। भारत में, अंतरण मूल्य निर्धारण के लिए यद्यपि कि आय कर उपबंध हैं , वे पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि करदाताओं द्वारा संबंधित पक्षों के साथ कारोबार के बारे में सूचना रखना अथवा प्रकट करना अपेक्षित नहीं है।

बोध प्रश्न 2
1) भारत में पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में प्रशासनिक मूल्य तंत्र की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
2) भारत में व्यय सुधार आयोग द्वारा उर्वरकों के संबंध में क्या सुझाव दिए गए?
3) कंपनी उत्पादों का मूल्य कैसे निर्धारित किया जाता है?