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adenohypophysis in hindi , एडीनोहाइपोफाइसिस क्या है , किसे कहते है , भाग , कौन कौनसे है

एडीनोहाइपोफाइसिस क्या है , किसे कहते है , भाग , कौन कौनसे है adenohypophysis in hindi ?

एडीनोहाइपोफाइसिस (Adenohypophysis ) — इस भाग को पश्च पालि या पश्च पिण्ड भी कहते हैं। तो यह अपेक्षाकृत छोटा, ठोस, श्वेत रंग का भाग है जो इन्फण्डीबुलर वृन्त द्वारा मस्तिष्क के अधर तल से संलग्न रहता है। इसके हाइपोथेलेमस स्थित सिरे पर तंत्रिका स्रावी dield k & (neuro secretory cells) एवं इस भाग में एक्सॉन व इनके अन्तिम छोर पर फूली हुई घुण्डियाँ स्थित रहती है जिन्हें हैरिंग काय (Harring-bodies) कहते हैं। हैरिंग काय के बीच-बीच में बड़ी शाखान्वित वर्ण कित न्यूरोग्लीयल कोशिकाएँ (neuroglial cells) वे पिट्यूसाइट्स (pituicytes) स्थित होती है। यह भाग तंत्रिकीय बाह्य चर्म (neural cetoderm) से विकसित होता है।

वैज्ञानिकों की मान्यता है कि यह भाग अन्तःस्रावी नहीं है क्योंकि इस भाग के द्वारा हारमोनों का संश्लेषण नहीं किया जाता है वरन् यह हाइपोथैलमस द्वारा स्रावित न्यूरोहारमोन्स (Neurohormones) का संच (store) एवं इन्हें पुनः मुक्त ( release) करने का कार्य करता है। अतः इसे न्यूरोहीमल (neuroheamal) अंग माना जाता है।

यह भाग भी तीन भागों का बना होता है –

  1. मीडियन एमीनेन्स (Median eminence ) — यह भाग ट्यूबर साइनेरम (tuber cinereum) के नाम से भी जाना जाता है।
  2. इन्फण्डीबुलम या वृन्त (Infundibulum of Stalk) पीयूषिका को मस्तिष्क सं संलग्न रखता है।
  3. पार्स नर्वोसा (Pars nervosa ) – यह पश्च पालि का मुख्य भाग बनाता है।

न्यूरोहाइपोफाइसिस में इन्फाडिबुलर सिसे (infundibular-recess) नामक गुहा पायी जाती है जो डायनसिफेलान में स्थित गुहा से जुड़ी रहती है ।

पीयूष ग्रन्थि का हाइपोथैलमस से संबंध ( Pituitary-hpothalamus relationship) “पीयूषिका का पश्च पिण्ड मस्तिष्क से विकसित एवं इन्फण्डीबुलम द्वारा संलग्न भाग होता है। यह भाग तंत्रिका तंतुओं, तंत्रिका कोशिकाओं के एक्सॉन आदि से बना रहता है, किन्तु इनका कोशिकीय भाग हाइपोथैलेमस के प्रीऑप्टिक या सुप्राऑप्टिक (pre optic or supraoptic) एवं पेरावेन्ट्रीकुलर नाभिकाओं (paraventricular nuclei) में स्थित (located) होता है। हाइपोथैलेमस से उद्गमित ये तंतु हाइपोथैलेमिक – हाइपोफाइसियल प्रदेश (hypothalamic-hypophyseal tract) बनाते हैं और पश्च पिण्ड की रक्त केशिकाओं तक व्यवस्थित होते हैं।

सभी चतुष्पादीय जंतुओं (tetrapods) में यह पाया जाता है कि पीयूष ग्रन्थि का एडीनोहाइपोफाइसिस भाग भी हाइपोफाइसियल निर्वाहिका तंत्र (hypophyseal portal system) द्वारा हाइपोथैलेमिक नाभिकों (hypothalamic nuclei) से लायी गई रसायनिक सूचनाओं से प्राप्त करता है। पश्च पिण्ड (nrurohypohysis) में तो हाइपोथैलमस मे स्थित तंत्रिका स्रावी कोशिकाओं (neurosevretory cells) द्वारा स्रावित पदार्थ ही एक्सॉन द्वारा लाये एवं संग्रहित किये जाते हैं। अतः वैज्ञानिकों की धारणा है कि हाइपोथैलेमस द्वारा पीयूष ग्रन्थि को कुछ जैव-रासायनिक (bio chemical) सूचनाऐं अवश्य प्राप्त होती है जो इस ग्रन्थि के कार्य एवं स्रावित किये जाने वाले हारमोन्स पर अपना नियंत्रण रखती है। इन्हें हाइपोथैलेमिक नियंत्रणकारी कारक है।

पीयूषिका के अग्रपिण्ड अथवा एडीनोहाइपोफाइसिस द्वारा स्रावित हारमोन (Hormones secreted by anterior lobe or adenohypophysis of pituitary)

  1. सोमेटोट्रोपिन अथवा वृद्धि हारमोन (Somototropin or Growth hormone) STH or GH एसिडोफिल (acidophils) कोशिकाओं द्वारा स्रावित यह हारमोन ग्लोब्यूलिन प्रकार का प्रोटीन है, इसका अणु भार विभिन्न जंतुओं में 21000 से 48000 तक होता है। एक जाति का हॉरमोन अन्य जाति के जंतुओं पर भी प्रभाव रखता है। यह हारमोन हाइपोथैलेमस द्वारा स्रावित वृद्धि/हॉरमोन कार (Growth Hormone releasing factor) द्वारा उत्तेजित एवं संदमनकारी कारक (Growth Hormone inhibitory factor) द्वारा संदमित होता है। एस्ट्रोजन के प्रभाव से भी वृद्धि हॉरमोन का स्रवण बढ़ जाता है। यह हॉरमोन देह को निम्न प्रकार से प्रभावित करता है –

(i) उपस्थित व अस्थि ऊत्तकों में वृद्धि कर कंकाल तंत्र को प्रभावित करता है।

(i) कार्बोहाइड्रेट्सा, वसा एवं प्रोटीन उपापचय, डी.एन.ए., आर. एन. ए. तथ प्रोटीन संश्लेषण के उत्तेजित करता है। अत: समस्त दैहिक कोशिकाओं में वृद्धि होती है। सर्वाधिक वृद्धि शिशुवस्था के प्रथम वर्ष में होती है। पश्चात् युवास्था तक धीमी गति वे निरन्तर बनी रहती है वृद्धि अस्थियों में वृद्धि कैल्शियम व फॉस्फोरस के निक्षेपण (deposition) के कारण होती है।

(i) वृद्धि हॉरमोन अग्नाशय के इन्सुलिन एवं ग्लूकागोन स्रवण को उत्तेजित करता है।

(iv) इस हॉरमोन से वृक्कों के परिणाम एवं क्रिया में वृद्धि हो है अतः नाइट्रोजन उत्सर्जन व मूत्र के निष्कासन में वृद्धि होती है।

(v) यह हॉरमोन रक्ताणुओं की उत्पति को भी प्रभावित करता है।

(vi) वृद्धि हारमोन जंतुओं के दुग्ध स्रावण में वृद्धि करता है। शिशु अवस्था में इस हॉरमोन की अधिक मात्रा स्रावित होने से अतिकायता (gigantism) अवस्था उत्पन्न हो जाती है, अर्थात् 7-8 फुट लम्बा चौड़ा हष्ट-पुष्ट भीमकाय देह वाला बन जाता है। इस हॉरमोन की कमी होने पर वामनता ( dwarfism) अवस्था उत्पन्न होती है अर्थात् व्यक्ति 3-4 | फुट लम्बा लैंगिक दृष्टि से अवपरिपक्व एवं बौना रह जाता है। युवावस्था प्राप्त होने पर हारमोन की अधिकमा से एक्रोमेगेली (acromegaly) अवस्था के अन्तर्गत लम्बे हाथ पाँव वाला व्यक्ति जिसके जबड़े गालों व चेहरे की अस्थियों व पेशियों में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है, बन जाती है। यह हॉरमोन अन्य ग्रन्थियों पर विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न नहीं करता, | किन्तु अन्य हारमोन के साहचर्य में कार्य पर प्रभावशाली | साहचर्य (synergist) के रूप में क्रियाशील बना रहता है।

पीयूष ग्रन्थि का हाइपोफाइसिस (Pituitary gland or hypohysis)

पीयूष ग्रन्थि, पीयूषिका, हाइपोफासिस एवं हापोफइसिस सेरब्राई (hypohysis cerebri) सभी नामों से यह ग्रन्थि जानी जाती है। सभी उच्च कशेरुकी जंतुओं से यह आवश्यक रूप से पायी जाने वाली मुख्य ग्रन्थि है। एक ओर यह मस्तिष्क से परोक्ष रूप से जुड़ी रहती हैं तथा दूसरी ओर यह अनेकों अन्तःस्रावी ग्रन्थियों एवं अंग तंत्रों पर नियंत्रण या प्रभाव रखती हैं। अतः यह मस्तिष्क एवं अन्तःस्रावी तंत्र के मध्य मुख्य कड़ी (link) होती है जो देह में क्रियात्मक फलकलन (functional integration) की स्थिति को यथावत् बनाने रखती है। इसकी स्थिति एवं क्रियात्मक अवस्थ को देखकर ही विसेल्यिस (Vesalius) ने इसे मास्टर ग्लेण्ड (Master gland) व ” आकेस्ट्रा का लीडर” (Leader of Orchestra) आदि उपनाम दिये गये थे। पिछले कुछ वर्षों में किये गये अनुसंधान कार्यों के परिणामों से ज्ञात हुआ है कि यह पीयूष ग्रन्थि व देह की अन्य ग्रन्थियाँ मस्तिष्क के हापोथैलेमस (hypothalamus) भाग द्वारा नियंत्रित की जाती है, अतः अब इन उपनामों का प्रयोग नहीं किया जाता। गेलन (Gelen) ने इस ग्रन्थि को नासा स्रवण (nasal secretion) करने वाला एक अंग मानकर इसे पिट्यूटरी नाम दिया जिसका आय फेलगम (phlegm = एक अर्धतरल, श्वसन नाल में उपस्थित पदार्थ) से था।

पीयूष ग्रन्थि का परिवर्धन (Development of pituitary gland)

पीयूष ग्रन्थि का विकास एक्टोडर्म से होता है किन्तु इसका परिवर्धन दो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से होता है। पीयूषिका के न्यूरोहाइपोफॉइसिस (neurohypophysis) नामक उद्वर्ध (outgrowth) के नीचे की ओर वृद्धि करने से होता है। पीयूषिका के एडीनोहाइपोफाइसिस (adenohypophysis) भाग का निर्माण भ्रूण की ग्रसनी (pharynx) के पृष्ठ भाग से विकसित रेथ्थक की धानि (Rathke’s pouch) के ऊपर को बढ़ने से होता है। मध्यपिण्ड या पार्स इन्टरमिडिया (pars intermedia) भाग का विकास को रेथ्थक की धानि के इन्फन्डीबुलम के सम्पर्क में आने से भिन्नित होने के कारण होता है। इस धानि को शेष भाग पार्स डिस्टेलिस (pars distalis) में बदल जाता है। भ्रूणीय पार्स डिस्टेलिस के संयोजन से पार्स ट्यूबेरेलिस (pars tuberalis) बनता है, धानि की गुहा हाइपोफाइसिस की अवशिष्ट अवकाशिका (residual lumen) बन जाती है।

रक्त सम्भरण (Blood supply) — आन्तरिक ग्रीवा धमनी (internal carotid artery) से पश्च पीयूषिका धमनी एवं अग्र पीयूषिका धमनी निकलकर पीयूष ग्रन्थि को रक्त सम्भण करती है। पश्च पीयूषिका धमनी पार्स नर्वोसा ( pars nervosa) भाग को रक्त का सम्भरण करती है। कुछ अग्र पीयूषिका धमनियाँ पार्स डिस्टोलिस (pars distalis) भाग को एवं कुछ धमनियाँ हाइपोथैलेमस भाग को रक्त का सम्भरण करती है। हाइपोथैलेमस की शिराकाओं (venules) में से रक्त पार्स डिस्टेलिस के रक्त पात्रों (sinusoids) में आकर हाइपोफाइसिलय निर्वाहिका तंत्र (hypophyseal portal system) बनाता है।

स्थिति (Position) –— यह ग्रन्थि मस्तिष्क की निचली सतह पर उपस्थित रहती है। मस्तिष्क के डायनसिफेलॉन भाग की अधर से एक छोटे वृन्त द्वारा करोटि (skull) की स्फीनॉइड (sphenoid) अस्थि की सेला अर्सिला (sella turcica) नामक खाँच में लटकी रहती है। इस ग्रन्थि पर ड्यूरोमटर का आवरण रहता है तथा इसी झिल्ली से निर्मित पट या शैफ (shell) समान वलन डायफ्रेमा सैल्ली (diaphragma sellae) बनता है।

संरचना (Structure) — सभी कशेरुकी जंतुओं में पीयूषिका विभिनन स्वरूपों में पायी जाती हैं। प्रोटोकॉर्डेट्स के अनुसार किशोर एम्फिऑक्सवस में उपस्थित पूर्वमुखीय खाँच (pre oral pit) पीयूषिका का समजात अंग हैं, वयस्क जन्तु में यह “मूलर के अंग” (Muller’s organ) के रूप में उपस्थित होती साइक्लोस्टोमेटा जन्तुओं में यह सरल अंग के रूप में पायी जाती है। इनमें रेथ्थक थैले की गुहा बड़ी होती है, तथा यह मुख गुहा से जुड़ी रहती है। इसकी इन्फडीबुलर गुहा चौड़ी रहती है। उच्च कशेरूकी जंतुओं में हाइपोफोइसियल खाँच सकरी या अनुपिस्थत होती है। इलेक्मोब्रेक मछलियों में अग्र पिण्ड अन्य भागों के पीछे स्थित होता है, इसी प्रकार की संरचना एन्यूरा एम्फीबिया जंतुओं में पायी जाती है। पक्षियों एवं कुछ स्तनि समुद्री गायों एव व्हेल मछलियों में मध्य पिण्ड (intermediate lobe) अनुपस्थित होता है। मनुष्य में इसका विस्तृत अध्ययन किया गया है, इनमें यह मक्का या मटर के दाने की आकृति की सर्वाधिक सुरक्षित ग्रन्थि के रूप में उपस्थित रहती है। इसका भर पुरुषों 0.5-0.6 ग्राम तथा महिलाओं में 0.6-0.7 ग्राम के लगभग होता है। यह 10mm (आगे से पीछे ) x 6mm (पश्च अधर) x 13mm (पार्श्वतः) आमाप की ग्रन्थि होती है। आकारित तौर परयह कए संयुक्त ग्रन्थि (compound gland) है जो 3 भागों से मिलकर बनी होती है जो दो भ्रूणीय आद्य ( embryonic primordia) से प्राप्त होते हैं।

पीयूष ग्रन्थि 3 पिण्ड (lobes) होते हैं। अग्रपिण्ड ( anterior lobe), मध्य पिण्ड (intermediate lobe) पार्स इन्टर मीडिया (pars intermedia ) तथा पश्च पिण्ड ( posterior lobe ) । अग्र पिण्ड एवं मध्य पिण्ड को संयुक्त रूप से एडोनोहाइपोफाइसिस (adelohypophysis) कहते हैं। इस प्रकार पश्य पिण्ड को न्यूरोहाइपोफाइससि (neurohypophysis) के नाम से जाना जाता है।

चित्र 8.8 – पीयूष ग्रन्थि की संरचना

हॉरमोन एवं एन्जाइम (Hormone and enzyme)

  • हॉरमोन एवं एंजाइम ने निम्न समानताएं होती है-
  1. दोनों ही ग्रन्थियों (glands) द्वारा स्रावित होते हैं।
  2. दोनों ही शरीर की उपापचयी (metabolic) क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।
  3. दोनों विशिष्ट (specific) कार्यों का नियंत्रण करते हैं।
  4. दोनों की उत्प्ररेक (catalyst) की तरह कार्य करते हैं। • हॉरमोन एवं एंजाइम में निम्नलिखित विभिन्नताएं है –

हॉरमोन्स की रसायनिक प्रकृति (Chemical nature of hormones)हॉरमोन्स की रसायनिक प्रकृति निम्न होती है-

  1. ग्लाइकोप्रोटीन (Glycoprotein)

उदाहरण- FSH, LH एवं TSH

  1. पोलीपेप्टाइड्स या प्रोटीन्स (Polypeptides of Proteins)

उदाहरण – ऑक्सीओसीन, वेसोप्रसीन, रिलेक्सिन (relaxin) एवं सीक्रेटिन (secreti आदि

  1. स्टीरॉइड्स (Steroids)

उदाहरण- एल्डोस्टीरॉन कोर्टीसोन एवं लिंगी हॉर्मोन्स

  1. अमीनों अम्ल व्यूप्तन्न (Amines or catecholamines)

उदाहरण – थायरोक्सिन

  1. एमाइन्स या कॅटकालेमीन्स (Amines or catecholamines )

उदाहरण- ऐड्रीनेलीन (Adrenaline) एवं नॉरएड्रीनेलीन (Noradrenaline)

हॉरमोन्स की क्रिया विधिइनके अनुसार हॉरमोन प्रथम दूत (primary messenger) के रूप में लक्ष्य कोशिकाओं की कला पर उपस्थित ग्राही प्रोटीन्स से जुड़ते हैं तथा दो प्रकार से कार्य करते हैं। (i) इससे कोशिका कला की चयनात्मक पारगम्यता (selective permeability) बदल जाती है।

(ii) कोशिका कला में उपस्थित ऐडिनिल साइक्लेज (adenyl cyclase) नामक एंजाइम प्रेरित होकर कोशिकाद्रव्य के ATP के अणुओं का चक्रिय AMP में विघटन कर देता है।

चक्रिक AMP की मात्रा में परिवर्तन कोशिकाओं के उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

इसी कारण हॉरमोन को “द्वितीय” (secondary) या अन्तः कोशीय दूत (inter-celluar messenger) कहा जाता है।

(2) जीन स्तर पर (At gene level)

कुछ हॉरमोन्स (स्टीरॉइड एवं थाइरॉइड) अपनी लक्ष्य कोशिकाओं में प्रवेश करके ग्राही प्रोटीन्स (receptor proteins) से जुड़ जाते हैं।

ये प्रोटीन्स इन हॉमोन्स को केन्द्रक (nucleus) में पहुँचा कर DNA की प्रोटीन्स से जोड़ देती है।

चित्र 8.5 जीन स्तर पर हॉरमोन की क्रियाविधि (Mechanism of normonal action )

(1) हॉरमोन्स की क्रियाविधि निम्नलिखित होती है-

कोशिका कला स्तर पर ( Action at cell membrane level)

  • हॉरमोन की क्रियाविधि की खोज के लिये सुन्दरलैण्ड (Sutheriana, 1971) को नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ था ।

चित्र 8.4 – कोशिका कला स्तर पर हॉरमोन की क्रियाविधि

ये हॉरमोन्स सक्रिय (active) जीन्स को निष्क्रिय (inactive) करके अथवा निष्क्रिय जीन्स को सक्रिय बनाकर mRNA के संश्लेषण को प्रभावित करते हैं।

इस क्रिया से प्रभावित होकर कोशिका में इंजाइमों एवं प्रोटीन्स का संश्लेषण परिवर्तित होकर समस्त कोशिकीय उपापचयी तथा वृद्धि को प्रभावित करता है।

हॉरमोन का महत्त्व (Significance of hormones)

ये वृद्धि एवं विकास, सुरक्षा एवं आचरण, जनन एवं लैगिंक लक्षणों आदि का नियंत्रण करते हैं। हॉरमोन्स शरीर की कोशिकाओं के उपापचय का नियंत्रण करके शरीर की कार्यात्मक लक्षता (functinal tempo ) बनाये रखते हैं

ये शरीर के अन्तः वातावरण (internal environment of milieu interieor) को समान बनाये रखे का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

हॉरमोन्स विभिन्न भागों की कोशिकाओं की क्रियाओं में तालमेल बनाये रखते हैं।

हॉरमोन्स की मात्रा ममें गड़बी होने पर कार्यात्मक रोग (functinal disease) हो जाते हैं।

ये रोग हॉरमोन की आवश्यक मात्रा से कम स्रावण (hypsecretion) एवं अतिस्रावण (hypersecretion) के कारण होते हैं। मुख्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एवं हार्मोन्स (Chief endocrine glandsand horones)

उच्च हकशेरूकी जंतुओं की देह में पीयूष (pituitary), पीनियल ( pineal), थायरॉइड (thymus), एवं अधिवृक्क ( adrenal) पूर्णरूपेण अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ है । कुछ अन्य उत्तक या अंग जैसे लैगरहेन्स द्वीप समूह, वृषण (testes), अण्डाशय, आमाशय एवं आंत्र भित्ति, प्लेसेन्टा (placenta), त्वचा, हृदय, वृक्क आदि अपने मूख्य कार्य के अतिरिक्त हॉरमोन्स का स्रावण भी करते हैं।