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Categories: BiologyBiology

एक जिव्हा कृमि (balanoglossus : a tongue worm in hindi) बैलैनोग्लोसस (balanoglossus)

बैलैनोग्लोसस (balanoglossus in hindi)

बैलैनोग्लोसस : एक जिव्हा कृमि (balanoglossus : a tongue worm in hindi) :

हेमीकॉर्डेटा (hemi = half अर्ध + chorde = cord रज्जू) को अभी हाल तक संघ कॉर्डेटा (अथवा प्रोटोकॉर्डेटा) के एक उपसंघ के रूप में जाना जाता था। लेकिन अब इसे एकाइनोडर्मेटा का निकट सम्बन्धी एक स्वतंत्र अकशेरुकी संघ माना जाता है। लेकिन प्रोटोकॉर्डेट्स के तुलनात्मक अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इस आर्टिकल में हेमीकॉर्डेटा को एक कॉर्डेट उपसंघ के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत कोमल , कृमिरूप , समुद्री और आद्य कॉर्डेट्स का एक छोटा सा समूह सम्मिलित है जिन्हें साधारणतया ऐकॉर्न कृमि या जिव्हा कृमि कहते है।

सर्वाधिक सुपरिचित हेमीकॉर्डेट वंश बैलैनोग्लोसस है जिसे एन्टेरोप्न्यूस्टा वर्ग में रखा जाता है। सैकोग्लोसस अथवा डॉलिकोग्लोसस , ग्लोसोबैलैनस , स्पेंजिलिया आदि इसके अन्य निकट सम्बन्धित वंश है।

वर्गीकरण (classification)

संघ – कॉर्डेटा
उपसंघ – हेमीकॉर्डेटा
वर्ग – एन्टेरोप्न्युस्टा
कुल – टाईकोडेरिडी
प्ररूप – बैलैनोग्लोसस , एक जिहा कृमि
बैलैनोग्लोसस क्लैविजेरम का 1829 में डेली क्याजा द्वारा इटली के नेपल्स प्रदेश से वर्णन और नामकरण किया गया। इसके वंश के नाम की व्युत्पत्ति यूनानी भाषा के दो शब्दों बैलैनोस एवं ग्लोसस से की गयी थी। बैलैनोस शब्द का अर्थ ऐकॉर्न अर्थात ओक का फल होता है। यह कोलर से निकले शुण्ड को इंगित करता है जो एकॉर्न फल जैसा लगता है। अत: सामान्य नाम ऐकॉर्न कृमि है। ग्लोसस शब्द का अर्थ है जिव्हा। यह इसके शुण्ड , कॉलर और जननिक पंखो की ओर संकेत करता है जिनका आकार बैल की जिव्हा से बहुत मिलता जुलता है। इस प्रकार सामान्य नाम जिव्हा कृमि भी कहलाता है। स्थानीय मछुए बैलैनोग्लोसस को इसी नाम से पुकारते है।

भौगोलिक वितरण (geographical distribution)

अन्य सभी हेमीकॉर्डेट्स की तरह बैलैनोग्लोसस भी एक समुद्री जन्तु है जिसका वितरण विश्वव्यापी है। संसार भर में विशेषतया उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण सागरों में इसकी लगभग 20 जातियां मिलती है। इनमे से कुछ है ऑस्ट्रेलिया की बैलैनोग्लोसस ऑस्ट्रेलिएन्सिस , इंडो पैसिफिक बै. कारनोसस , जापान की बै. मिसाकिएन्सिस , वेस्ट इंडीज की बै. जेमाइसेन्सिस , ब्राजील की बै. जाइगस , दक्षिण अफ्रीका की बै. केपेन्सिस और भूमध्यसागरीय और ब्रिटिश द्वीपों की बै. कलैविजेरस।

स्वभाव और आवास (habit and habitat)

1. आवास : बैलैनोग्लोसस एक समुद्री , नालवासी अथवा बिलकारी हेमीकॉर्डेट है जो अंतराज्वारीय क्षेत्र के उथले तटीय जल में निवास करता है परन्तु कुछ गहरे जल में भी पाए जाते है।
2. बिल : यह कृमि पत्थरों या समुद्री शैवाल के निचे छिपकर रहता है अथवा तली की रेत या कीचड़ में स्वयं अपना बिल खोदकर रहता है। बै. क्लैविजेरस एक U आकार की नली अथवा बिल में रहता है जिसकी दोनों उर्ध्वाधर भुजाएं 50 से 70 सेंटीमीटर गहरी एवं दोनों छिद्र 10 से 30 सेंटीमीटर दूरी पर स्थित होते है।
3. रक्षी उपाय : जन्तु की त्वचा की श्लेष्मल ग्रंथियों से स्त्रावित चिपचिपे श्लेष्मा द्वारा रेत के कण चिपककर भंजुर बिल अथवा नली की भीतरी भित्ति पर एक चिकने , पतले और दृढ अस्तर का ढांचा निर्मित करते है। यह बिल के ढह जाने को रोकता है और कोमल जन्तु को ढीली रेत में दफ़न हो जाने से बचाता है। एक अन्य रक्षी युक्ति आयोडोफार्म के समान एक दुर्गन्धयुक्त पदार्थ का स्त्रवण है। एक जाति स्फुरदीप्ती दर्शाती है।
4. गतियाँ : कृमि सुस्त एवं बाह्य उद्दीपनों से बहुत कम प्रभावित होता है। यह अपने बिल में इसके शरीरतल पर पाए जाने वाले सिलिया द्वारा गति करता है। शरीर का सर्वाधिक सक्रीय भाग इसका शुण्ड है।
5. अशन एवं प्रजनन : कृमि डायटम्स , प्रोटोजोअन्स और अन्य सूक्ष्मजीवों और कार्बनिक अपरद का आहार करता है जिन्हें प्राप्त करने के लिए यह रेत अथवा कीचड़ को निगल जाता है। लिंग पृथक होते है। अलग अलग नलियों में रहने वाले नर एवं मादा , दोनों अपने अपने युग्मकों को समुद्र के जल में त्यागने है जहाँ निषेचन होता है। जीवन वृत्त में एक मुक्तप्लावी प्लवकी , पक्ष्माभी लारवा , टोर्नेरिया , पाया जाता है। जिव्हा कृमि अलैंगिक जनन नहीं करता लेकिन इसके भंगुर शरीर में पुनरुद्भवन की पर्याप्त क्षमता पायी जाती है।

बाह्य आकारिकी (external morphology)

[I] आकृति , परिमाण और रंजन : बैलैनोग्लोसस का शरीर कोमल , लम्बा , कृमि जैसा , बेलनाकार एवं द्विपाशर्व सममित होता है। यह जाति विशेष के अनुसार 10 से 50 सेंटीमीटर तक लम्बा होता है। बैलैनोग्लोसस जाइगस की लम्बाई 1.8 मीटर अथवा 2.5 मीटर तक हो जाती है। रंग चमकदार अथवा हल्के भूरे रंग का होता है जिस पर लालाभ अथवा नारंगी आभा होती है। सम्पूर्ण शरीर पर एक समान पक्ष्माभ होते है , तथा किसी प्रकार के बाह्यकंकाल और उपांगो का अभाव होता है।
[II] शरीर का विभाजन : शरीर अखण्डित है लेकिन 3 स्पष्ट प्रदेशों अथवा भागो में विभाजित होता है –
(1) शुण्ड
(2) कॉलर और
(3) धड़
(1) शुण्ड : शुण्ड अथवा अग्रकाय शरीर का अग्रतम भाग है। यह छोटा मुद्गराकर अथवा शंकुरूप एवं अनुप्रस्थ सेक्शन में वृत्ताकार दिखाई देता है। इसकी भित्ति मोटी और पेशीय होती है एवं यह अन्दर से खोखला होता है। इसकी गुहिका अथवा शुण्ड प्रगुहा मध्य पृष्ठ तल पर इसके आधार के समीप स्थित एक क्षुद्र शुण्ड रंध्र द्वारा बाहर खुलती है। पीछे की तरफ शुण्ड एक दुबली पतली ग्रीवा अथवा शुण्ड वृन्त में संकरा हो जाता है जो कॉलर के अग्र छोर से जुड़ा होता है। वृंत के नीचे शुण्ड के आधार पर एक U आकार का पक्ष्माभी अधिचर्मी गर्त , मुख पूर्व पक्ष्माभी अंग , पाया जाता है जो मुख में प्रवेश करने वाले भोजन और जल का परिक्षण करता है।
(2) कॉलर : कॉलर अथवा मध्यकाय बीच का छोटा बेलनाकार भाग है। इसका परदे अथवा कीप सदृश अगला किनारा कोलैरेट कहलाता है , जो शुण्ड वृंत और शुण्ड के पिछले हिस्से को पूर्णतया घेर कर ढकता है। अधरतल पर , शुण्ड वृंत के ठीक नीचे , कोलैरेट अर्थात कॉलर का किनारा एक चौड़े छिद्र को घेरता है जिसे मुख कहते है। मुख स्थायी रूप से खुला रहता है। एवं कॉलर के भीतर अवस्थित मुखगुहा में खुलता है। कॉलर का पिछला सिरा एक वृत्ताकार संकिर्णन द्वारा धड से स्पष्ट रूप से पृथक रहता है। कॉलर की सतह पर कुछ उभार , गर्त और स्पष्ट वृत्ताकार खांचे पाई जाती है। कॉलर की भित्ति मोटी और अत्यधिक मांसल है एवं एक गुहा को घेरती है जिसे कॉलर प्रगुहा कहते है। यह एक जोड़ी कॉलर रन्ध्रो द्वारा पीछे स्थित प्रथम जोड़ी गिल कोषों में खुलती है।
(3) धड़ : धड अथवा पश्चकाय शरीर का पिछला और सर्वाधिक बड़ा भाग बनाता है। यह कुछ चपटा और सतह पर वृत्ताकार संकीर्णनों के कारण वलयित जाना पड़ता है। धड की सम्पूर्ण लम्बाई में एक मध्य पृष्ठ एवं एक मध्य अधर कटक होती है। प्रत्येक कटक में उसकी संगत तंत्रिका और रुधिर वाहिका पाई जाती है।
धड को फिर 3 प्रदेशों में विभेदित किया जा सकता है।
(अ) अग्र क्लोम जननिक
(ब) मध्य यकृतीय और
(स) पश्च यकृतीय
(अ) अग्र क्लोम जननिक (branchio genital region) : धड के अगले अर्थात क्लोम अथवा क्लोम जननिक प्रदेश में एक जोड़ी पाशर्वीय , पतले , चपटे तथा अनुदैधर्य परदे होते है। ये जननिक पंख कहलाते है क्योंकि इनके अन्दर जनन ग्रंथियां स्थित है। जनन रन्ध्र अत्यंत सूक्ष्म होने से बिना सहायता के नेत्रों से दिखाई नहीं पड़ते है। क्लोम जननिक क्षेत्र के अगले आधे भाग में छोटे छोटे क्लोम रंध्रो अथवा गिल रंध्रो की दो अनुदैधर्य पंक्तियाँ उपस्थित है। गिल रन्ध्रों की एक पंक्ति मध्य पृष्ठ कटक की प्रत्येक ओर स्थित एक सुस्पष्ट अनुदैधर्य उभार पर पाई जाती है। जन्तु की आयु में वृद्धि होने के साथ ही साथ गिल रन्ध्रों की संख्या में भी वृद्धि होती जाती है।
दोनों जननिक पंख वक्रित होकर मध्य पृष्ठ तल पर परस्पर मिलकर गिल रंध्रो को ढक सकते है। कुछ जातियों में कॉलर का एक पश्च प्रवर्धन अथवा उभार , जो ओपरकुलम कहलाता है। अग्रतम गिल रन्ध्रों को ढक लेता है।
(ब) यकृतीय प्रदेश (hepatic region) : धड का मध्यवर्ती अथवा यकृतीय प्रदेश जननिक क्षेत्र से थोडा छोटा एवं हरिताभ रंग का होता है। इसके पृष्ठ तल पर असंख्य , अनियमित , आंत्र लघुकोश अथवा यकृतीय अंधनाल पाए जाते है।
(स) पश्च यकृतीय (post hepatic region) : यह धड का पश्चतम एवं सर्वाधिक लम्बा भाग है। जिसे उदर या पुच्छीय प्रदेश भी कहते है। इसका व्यास न्यूनाधिक एक समान रहता है। लेकिन इसका पिछला छोर थोडा शुंडाकार होता है जिस पर अन्तस्थ गुदा खुलती है।
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