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दीर्घकालीन ऋण क्या है | अल्पकालीन ऋण से आप क्या समझते है short time debt fund in hindi

long term and short time debt fund in hindi meaning definition दीर्घकालीन ऋण क्या है | अल्पकालीन ऋण से आप क्या समझते है ?

शब्दावली
दीर्घकालिक ऋण ः भूमि और भवन, संयंत्र और मशीनों इत्यादि जैसी अचल संपत्तियों की खरीद के लिए जुटाया गया ऋण दीर्घकालिक पूँजी ऋण अथवा पूँजी परिसंपत्ति ऋण कहा जाता है
संशोधित पूँजी ः इक्विटी शेयर पूँजी का एक अन्य नामय जो सभी प्रकार के ऋणों और अन्य प्रभारों का भुगतान करने अथवा उसका प्रावधान करने के पश्चात् परिसम्पत्तियों का मूल्य है।

अल्पकालिक ऋण ः दिन-प्रति-दिन के व्यापारिक प्रचालन के लिए स्वीकृत बैंक ऋण को कार्यशील पूँजी ऋण अथवा अल्पकालिक ऋण कहा जाता है।

उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बादः
ऽ आप समझ सकेंगे कि पूँजी क्या है और पूँजी जुटाने के विभिन्न स्रोत क्या है;
ऽ तुलन पत्र और निधियों के प्रवाह की अवधारणा समझ सकेंगे;
ऽ निधियों के विभिन्न प्रवाहों के बीच भेद कर सकेंगे; और
ऽ पूँजी जुटाने के विभिन्न इक्विटी स्रोतों से परिचित हो सकेंगे।

प्रस्तावना
आपको कच्चे माल की पुनःपूर्ति करने के लिए तथा अपने कर्मचारियों को प्रतिदिन की मजदूरी का भुगतान करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार की अनेक आवश्यकताओं को वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों से पूरा करने के लिए सुनियोजित और सुविचारित रणनीति की आवश्यकता होती है। यह इसलिए भी आवश्यक है कि इस क्षेत्र में किसी भी गलत निर्णय से पूँजी के लागत में वृद्धि होती है और फलतः लाभ में कमी आती है।

किसी भी कंपनी में, निधियों के प्रबन्धन में निधियों को जुटाना और निधियों का निवेश करना सम्मिलित है। फर्म की निधियों का प्रबन्ध करते समय एक तीसरे क्षेत्र अर्थात् लाभांश का भुगतान अथवा लाभांश निर्णय भी प्रासंगिक है। लाभांश निर्णय महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उनका भुगतान फर्म की आय से किया जाता है। कॉरपोरेट जगत में यह आम प्रचलन है कि जब कंपनियों के पास लाभप्रद परियोजना प्रस्ताव होता है और जब वे अपने शेयरधारकों की सम्पदा को अधिकतम कर सकते हैं तब आय का एक भाग पुनः परिसम्पत्तियों में निवेश कर दिया जाता है। इसलिए, अवितरित लाभ भी निधियों का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

उद्यम पूँजी
उद्यम पूँजी नए औद्योगिक उपक्रमों जो नवोन्मेषी है और अत्याधुनिक औद्योगिकी अथवा नई प्रौद्योगिकियों से संबंधित हैं के लिए दीर्घकालिन वित्तपोषण हेतु एक अन्य इक्विटी स्रोत है। दूसरे शब्दों में, उद्यम पूँजीपति इक्विटी भागीदारी के माध्यम से उच्च जोखिम वाले फर्मों का वित्तपोषण करते हैं। उद्यम पूँजी फर्म शुरू होने से पहले के चरण में भी नवोत्पाद के वित्तपोषण के लिए आरंभिक पूँजी निधियाँ उपलब्ध कराती हैं। उद्यम पूँजी को प्राइवेट इक्विटी भी कहा जाता है। उद्यम पूँजी की कुछ मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
क) यह इक्विटी अथवा अर्द्ध-इक्विटी निवेश है।
ख) यह निवेश का सक्रिय स्वरूप है, क्योंकि उद्यम पूँजीपति कंपनी के कार्यकलापों के वित्तपोषण और प्रबन्धन में सक्रिय रूप से भाग लेता है।
उद्यम पूँजी का उद्गम यू एस ए में 19वीं शताब्दी में हुआ था। उद्यम पूँजी का यू के, जापान और अनेक यूरोपियन देशों जैसे अनेक विकसित देशों के विकास में बहुत बड़ा योगदान रहा है। भारत में उद्यम पूँजी निधियाँ (वी सी एफ) प्राथमिक बाजार में है। भारत में लगभग 20-25 उद्यम पूँजी निधियाँ हैं। भारत में उद्यम पूँजी तीन रूपों में उपलब्ध है। वे हैंः इक्विटी, सशर्त ऋण और आय नोट्स । ये उद्यम पूँजी निधियाँ फर्म की कुल इक्विटी पूँजी का अधिकतम 49 प्रतिशत इक्विटी उपलब्ध कराती है। वी सी एफ कंपनी के विकास में तीन चरणों में निवेश करती हैं। वे हैं:
क) आरम्भिक पूँजी;
ख) कंपनी शुरू करने के लिए वित्तपोषण हेतु धन; और
ग) व्यापक विस्तार के लिए कंपनी के विकास हेतु पूँजी।

बोध प्रश्न 2
1) अधिकार निर्गम, बोनस निर्गम और सार्वजनिक निर्गम में भेद कीजिए।
2) इक्विटी शेयर क्या है? यह अधिमान शेयर से किस प्रकार भिन्न है? इक्विटी शेयरों के लाभ और हानियों का वर्णन कीजिए।
3) उद्यम पूँजी निधियों पर संक्षिप्त नोट लिखिए ।

सारांश
उपरोक्त चर्चा से, आपको इक्विटी के माध्यम से वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों से परिचित कराया गया है। इस इकाई में, आपने तुलन पत्र और निधियों के प्रवाह, पूँजी संरचना, विभिन्न प्रकार के शेयरों और उद्यम पूँजी के बारे में पढ़ा। इकाई 26 में आप ऋण के माध्यम से वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे।

कंपनी की परिसम्पत्तियों के वित्तपोषण का अपेक्षाकृत एक नया स्रोत भी है जो न तो ऋण स्रोत है और न ही इक्विटी वित्तपोषण स्रोत है। इसे पट्टा (लीज) वित्तपोषण कहा जाता है। यह दो पक्षों, एक जो विशेष परिसम्पत्तियों का स्वामी है और दूसरा जो धन के बदले इसका प्रयोग करने का इच्छुक है, के बीच समझौता है। वह व्यक्ति जो परिसम्पत्ति का स्वामि है उसे ‘लीजर‘ (पट्टा पर देने वाला) और जो व्यक्ति इन परिसम्पत्तियों का प्रयोग करना चाहता है उसे ‘लीजी‘ (पट्टा पर लेने वाला) कहा जाता है। परिसम्पत्तियों के प्रयोग के लिए जिस किराया पर सहमति होती है उसे ‘पट्टा किराया‘ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कंपनी को अपने कार्यालय के लिए भवन की आवश्यकता है और वह इस उद्देश्य से भवन खरीदना नहीं चाहती है तो यह पट्टा पर उपयुक्त भवन ले सकती है तथा इसके लिए पट्टा किराया देती है। यह कंपनी के लिए एक सुविधाजनक व्यवस्था है क्योंकि इसे भवन खरीदने के लिए अपेक्षित निधियाँ जुटाने हेतु संघर्ष नहीं करना पड़ता है। परिसम्पत्तियां अधिग्रहित करने की इस पद्धति से कंपनी पर निधियाँ जुटाने का दबाव घटता है।
 कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
भल्ला, वी.के. (2001) वर्किंग कैपिटल मैनेजमेण्ट: टेक्सट एण्ड केस, अनमोल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली।
मचिराजु, एच.आर.,(2002) इण्ट्रोडक्शन टू प्रोजेक्ट फाइनेन्स: ऐन अनालिटिकल पर्सपेक्ट्वि, विकास पब्लिशिंग हाउस प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।
पाण्डेय, आई.एम.,(1999). फाइनेन्सियल मैनेजमेण्ट, विकास पब्लिशिंग हाउस प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।
श्रीनिवासन, एस.,(1999). कैश एण्ड वर्किग कैपिटल, विकास पब्लिशिंग हाउस प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।