मूल मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय परिभाषा, international definition of fundamental units in hindi

मूल मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय परिभाषाएँ (international definitions of fundamental units) : भौतिक राशियाँ मापने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय सभा आयोजित की गई जिसमे यह तय हुआ की किस प्रकार की राशि को मापने के लिए कौनसा मात्रक काम में लिया जायेगा , साथ ही इस सभा में मूल , व्युत्पन्न , और पूरक मात्रकों को वर्गीकृत किया गया।
अब आप सोच रहे होंगे की इस सभा में यह तो तय कर लिया गया की दूरी को मापने के लिए मीटर मात्रक काम में लिया जायेगा लेकिन 1 मीटर का मान कितना होगा ? 1 मीटर की ऐसी कोई परिभाषा होनी चाहिए जो सभी जगह समान हो तथा इसकी अनुपालना करके ही 1 मीटर लम्बा स्केल बनाया जाए , इसी प्रकार 1 किलोग्राम , सैकंड आदि की भी परिभाषा होनी चाहिए और इसी को पूरे विश्व में माना जाना चाहिए तथा इनका प्रयोग करके उपकरण बनाए जाने चाहिए ताकि सभी देशो में मात्रक समान रहे।
इसलिए इस सभा में मूल मात्रकों की परिभाषा निम्न प्रकार दी गई –
1. मीटर – लम्बाई का मात्रक
परिभाषा : प्रकाश द्वारा निर्वात में 1/299,792,458 सेकंड में तय की गई दूरी को 1 मीटर दूरी कहते है।
2. किलोग्राम – द्रव्यमान का मात्रक
परिभाषा : पेरिस में स्थित अन्तर्राष्ट्रीय भार तथा माप संस्था में एक विशेष प्रकार का प्लेटिनम – इरीडियम का बेलन रखा हुआ है , इस विशेष प्रकार के बेलन का भार 1 किलोग्राम के बराबर माना जाता है।
3. सैकण्ड – समय का मात्रक
परिभाषा :  सीजियम 133 द्वारा एक विशेष तरंग दैर्ध्य के विकरण उत्सर्जित होते है , इस उत्सर्जित विकरण द्वारा जितने समय में 9 192 631 770 कम्पन्न होते है , उस समय को 1 सैकण्ड कहते है।
4. एम्पियर : विद्युत धारा का मात्रक
परिभाषा : वह विद्युत धारा जो निर्वात में रखे दो अंनत लम्बाई और नगण्य परिच्छेद वाले वाले तारों को 1 मीटर की दूरी पर रखने पर पर उनके मध्य प्रति मीटर लम्बाई पर 2 x 10-7  N/m बल उत्पन्न कर देती है , उस प्रवाहित धारा के मान को 1 एम्पियर की धारा कहते है।
5. केल्विन : ताप का मात्रक
परिभाषा : पानी के त्रिक बिंदु पर के उष्मागतिकी ताप का 1/273.16 वां भाग का ताप 1 केल्विन के बराबर होता है।
6. केन्डेला : प्रदीपन तीव्रता का मात्रक
परिभाषा : एक केंडेला उस प्रदीपन तीव्रता के बराबर होती है जब एक निश्चित दिशा में कोई स्रोत 540 x 1012 हर्ट्स और उसी दिशा में 1/683 वाट प्रति स्टेरियन मान की दीप्तिमान हो।
7. मोल : पदार्थ का मात्रक
परिभाषा : पदार्थ की वह मात्रा जिसमे मूल अवयवो की संख्या 6C12 के 0.012 किलोग्राम के बराबर हो अर्थात 6C12 के 0.012 kg में जितने अवयव उपस्थित होते है उतने ही अवयवो की मात्रा को 1 मोल कहते है।

पूरक मात्रकों की परिभाषाएँ (definition of supplementary units)

1. रेडियन – समतल कोण का मात्रक
परिभाषा : जब वृत्त की त्रिज्या के बराबर किसी वृत्त पर चाप काटा जाए तो वृत्त के केन्द्र पर जो तलीय कोण बनता है उसे 1 रेडियन कोण कहते है।
2. स्टेरेडियन : जब किसी ठोस गोले के केन्द्र से इसी गोले की पृष्ठ पर इसकी त्रिज्या के क्षेत्रफल का छोटा गोला बनाया जाए तो तो छोटे गोले द्वारा बड़े गोले के केन्द्र पर बने ठोस कोण को 1 स्टेरेडियन कहते है।

S.I. पद्धति की विशेषताएँ (merits of s.i system)

1. SI पद्धति में किसी भी एक भौतिक राशि के लिए एक ही मात्रक होता है।
2. SI पद्धति में 7 मूल मात्रक व 2 पूरक मात्रको का समावेश है।
3. इस पद्धति में व्युत्पन्न मात्रक मूल मात्रको को गुणा या भाग करके बनाए जाते है।
4. यह सुसंगत पद्धति है अर्थात इसे सभी शाखाओ में आसानी से काम में लिया जा सकता है।
5. इस पद्धति के सभी मात्रको का आसानी व सुपरिभाषित किया जा सकता है।
6. SI पद्धति में सभी मात्रको के लिए प्रतिक चिन्ह fix होते है जिससे इसे प्रतिक चिन्ह से भी आसानी से पहचाना जा सकता है।

 

मात्रकों की पद्धतियाँ , मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति , अंतर्राष्ट्रीय पद्धति के मूल मात्रक , व्युत्पन्न

(systems of unit in hindi ) मात्रकों की पद्धतियाँ : भौतिक राशियों के मापन के लिए जो मात्रक काम में लेते है उनके निर्धारण के लिए जिन पद्धतियों को काम में लिया जाता है उन्हें मात्रक की पद्धति कहते हैं।

मात्रकों की तीन पद्धतियाँ काम में ली जाती है –

1. सेन्टीमीटर – ग्राम – सेकण्ड (CGS) पद्धति।

2. मीटर – किलोग्राम –  सेकण्ड (MKS) पद्धति।

3. फुट – पाउण्ड – सैकण्ड (FPS) पद्धति।

मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति (S.I. system of units)

भौतिक राशियों को मापने के लिए मात्रको का प्रयोग किया जाता है , जैसे दूरी को नापने के लिए मीटर , सेन्टीमीटर या फुट का इस्तेमाल किया जाता है तथा द्रव्यमान तौलने के लिए किलोग्राम , ग्राम आदि का उपयोग किया जाता है।  और इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की राशियों के लिए अलग अलग मात्रकों का इस्तेमाल किया जाता है।  अब आप सोच रहे होंगे की हमें कैसे पता चलेगा की किस राशि के लिए कोनसा मात्रक काम में लिया जाए ? और एक राशि को यदि किसी एक मात्रक में मापने के बाद उसे दूसरे मात्रक के रूप में कैसे दर्शा सकते है ?

इसके लिए standard मात्रक का इस्तेमाल किया जाता है तथा एक निश्चित राशि के लिए एक निश्चित मात्रक बनाया गया है , जैसे दूरी को किलोग्राम या ग्राम में नही माप सकते सिर्फ किलोमीटर , मीटर , सेन्टीमीटर आदि में माप सकते है।

एक राशि को दूसरी राशि में बदलने के लिए एक निश्चित मान तय किया गया , जैसे किलोमीटर को मीटर में दर्शाने के लिए बताया गया की 1 किलोमीटर में 1000 मीटर होते है।

इन सभी बातों पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सभा का आयोजन 1960 में हुई और ये सभी बाते , नियम , मात्रक , राशि या मात्रक रूपांतरण आदि पर चर्चा हुई और एक पद्धति का निर्माण किया गया जो सभी देशो में एक होगी और मान्य होगी।  इस निर्मित पद्धति को मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय पद्धति कहते है।

इस सभा में कुछ मूल राशियों की , व्युत्पन्न राशियों की तथा पूरक मात्रकों की लिस्ट बनाकर उनको वर्गीकृत किया गया और इनकी परिभाषा दी गयी।

1. अंतर्राष्ट्रीय पद्धति के मूल मात्रक (SI Base Units)

जैसा की हमने ऊपर पढ़ा की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई मात्रक पद्धति सभा में मात्रको को मूल मात्रक तथा व्युत्पन्न मात्रक तथा पूरक मात्रक के आधार पर वर्गीकृत किया गया।

यहाँ हम कुछ मूल मात्रकों को पढेंगे जो ज्यादातर काम में आते है।

मीटर – लम्बाई का मात्रक (unit for length)

किलोग्राम – द्रव्यमान का मात्रक (unit for weight)

सेकंड – समय का मात्रक (unit for time)

एम्पियर – विद्युत धारा का मात्रक (unit for electric current)

केल्विन – ताप का मात्रक (unit for temperature)

केंडेला – प्रदीपन तीव्रता मात्रक

मोल – पदार्थ की मात्रा का मात्रक

2. व्युत्पन्न पद्धति के व्युत्पन्न मात्रक (SI derived units)

यहाँ कुछ व्युत्पन्न मात्रको की लिस्ट दी जा रही है जो प्राय: हम काम में लेते है।
ओम – विद्युत प्रतिरोध का मात्रक (unit for electric resistance)
न्यूटन – बल का मात्रक (unit for force)
वाट – शक्ति का मात्रक
वोल्ट – विभवान्तर का मात्रक
3. पूरक मात्रक
समतल कोण का मात्रक – रेडियन
ठोस कोण अथवा घन कोण का मात्रक – स्टेरेडियन

मात्रक क्या है , परिभाषा व मानक मात्रक unit and standard unit in hindi

मात्रक (unit) : हमने पिछले टॉपिक में पढ़ा की हमारे दैनिक जीवन में मापन की आवश्यकता बहुत अधिक है और हमें भौतिक राशियाँ मापने के लिए विभिन्न प्रकार के पैमाने की आवश्यकता होती है।

मात्रक की परिभाषा : किसी भी भौतिक राशि को मापने के लिए एक मान नियत किया गया है , राशियों के मापन के लिए किये गए इस नियत मान को ही मात्रक कहते है।

मानक मात्रक (standard unit) : ऐसा मात्रक जिसको देखकर उसके अन्य प्रतिरूप बनाये जाए , जैसे विश्व में सभी जगह 1 kg के बाट का वजन समान है , क्योंकि बाट को बनाने के लिए इसका तौल मानक मात्रक के बराबर रखा जाता है जो सभी जगह निश्चित है |

जैसे एक किलो चीनी तौलने के लिए एक किलो का जो बाट इस्तेमाल किया गया है उसका वजन सभी जगह नियत होता है , अत: इस 1 किलोग्राम का मान नियत किया हुआ है इस एक किलो को मात्रक कहते है।

किसी भी भौतक राशि को लिखने के लिए पहले उसका संख्यात्मक मान लिखा जाता है और उसके पीछे उसका मात्रक लिखा जाता है।

जैसे 1 किलोग्राम चीनी को लिखने के लिए हम निम्न प्रकार लिखते है = 1 Kg

यहाँ Kg मात्रक है।

माना भौतिक राशि को हम x से दर्शाते है तथा इसका संख्यात्मक मान n और मात्रक u है तो जैसा हमने पढ़ा है की भौतिक राशि (x) का मान संख्यात्मक मान और उसके पीछे मात्रक द्वारा लिखा जाता है अत:

x = nu

यहाँ से u का मान निकालने पर

u = x/n

u ∝ 1/n

अत: हम कह सकते है की किसी भी भौतिक राशि का मात्रक राशि के संख्यात्मक मान के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

किसी भी भौतिक राशि का मात्रक चुनते समय हमें कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है , ये बातें निम्न प्रकार है –

1. भौतिक राशि के लिए जो मात्रक हम चुन रहे है वह सभी जगह मान्य होना आवश्यक है। क्योंकि मात्रक विश्व में सभी जगह समान होते है। उनका आकार व परिमाण उतना ही होना चाहिए जितना अन्य देशो या जगहों पर है।

2. जो मात्रक हम चयन कर रहे है उसका मान ताप , दाब आदि से प्रभावित नहीं होना चाहिए , अर्थात मात्रक का मान ताप व दाब की सभी स्थितियों पर नियत रहना चाहिए , विचलन नहीं होना चाहिए।  यहाँ विचलन से तात्पर्य है की अलग अलग ताप व दाब पर इसका मान अलग लग नही होना चाहिए , एक समान रहना चाहिए।

3. जब मात्रक बनाया जाता है तो यह ऐसा होना चाहिए की आसानी से समझ में आ जाए और इसके जैसे अन्य प्रतिरूप आसानी से बना सके।  जैसे लोगो को आसानी से समझ आता है की 1 kg में 1 किलो का बाट रख दीजिये और इसके बराबर चीज तौल दीजिये।  तथा इसके वजन के अन्य प्रतिरूप (इसके समान अन्य 1 kg का बाट) भी बना सकते है।

 

मापन की आवश्यकता requirement of measurement in hindi

(requirement of measurement in hindi ) मापन की आवश्यकता : हमने देखा है की जब बच्चे छोटे होते है तो उनको गणित ठीक से नहीं आती फिर भी वे चीजो को दूसरी चीजो से तुलना करके यह पता लगाते है की उस दूसरी चीज की तुलना में उसके पास वो चीज अधिक है या नहीं।

जैसे कोई बच्चा कहता है की मेरे पास रोहन की तुलना में कम खिलोने है , मैं रोहन से छोटा हूँ , मेरा वजन रोहन से कम है , इसका तात्पर्य यह हुआ की रोहन के पास खिलोनों की संख्या ज्यादा है , रोहन की लम्बाई भी ज्यादा है , तथा रोहन में तुलनात्मक अधिक वजन है।  यहाँ आकडे साफ़ नहीं है की दोनों में कितना अंतर है।

आंकड़ों को साफ़ करने का काम ही भौतिक विज्ञान करता है , भौतिकी की सहायता से ही वजन तौलने की मशीन बनी है जिसमें हम दोनों बच्चो को तोलकर यह बता सकते है की दोनों के वजन में कितना अंतर है जिससे हमें साफ़ आँकड़े प्राप्त होते है।

मापन का हमारे दैनिक जीवन में बहुत अधिक महत्व है , बिना मापन के कुछ भी करना नामुमकिन है।

कार्य होगा लेकिन कितना हुआ ये पता नही होगा , चीनी हमने ले ली , लेकिन कितनी चीनी ली ये पता नही।

हमारा वाहन चल रहा है पर किस गति से चल रहा है पता नहीं।

हम कुछ दूरी चल चुके है लेकिन बिना मापन के ये बता पाना मुश्किल है की हम कितनी दूरी तय कर चुके है और कितनी करनी बाकी है।

अत: मापन की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता है।

हमने मापन पद्धति में काफी विकास किया है , बहुत हद तक हम वस्तुओं का मापन शुद्धता से कर पाते है और यह भौतिकी की सहायता से मुमकिन हो पाया है।  लेकिन अभी भी हमे और शुद्धता की आवश्यकता है।

क्योंकि जब हमें वाहन से दूरी मापनी होती है तो हम किलोमीटर में तथा समय सेकंड में मापते है जो आसन है और शुद्धता से प्राप्त हो जाता है और त्रुटि बहुत कम होती है।

लेकिन जब परमाणु की त्रिज्या आदि का मापन किया जाता है तो यहाँ मापन 10-15 मीटर तथा समय 10-6 सेकंड में मापा जाता है , इस मापन में छोटी सी त्रुटि भी बहुत अधिक नुकसान देती है क्योंकि राशियाँ बहुत छोटी स्केल की है।

अतः दिन प्रतिदिन मापन की पद्धतियों में सुधार की कोशिश की जा रही है जिससे छोटी राशियाँ भी आसानी से और बिना त्रुटि के मापी जा सके।

उदाहरण – जैसा की हम जानते है की भौतिकी में प्रकृति में हो रही परिघटनाओं का अध्ययन किया जाता है , मापन की सहायता से ही हर परिघटना का अनुमान लगाया जाता है इसके लिए विभिन्न प्रकार की राशियाँ , सूत्र , समीकरण तथा अन्य के साथ सम्बन्ध आदि का उपयोग किया जाता है।  जैसे बारिश के आने का पता लगाना होता है तो विभिन्न प्रकार की तकनिकी में इन सभी सूत्रों के आधार पर उपकरण लगाये गए है जो हमें अब बारिश की जानकरी दे सकते है अर्थात बरसात आने में लगभग कितना समय लग सकता है इसका अनुमान लगा सकते है।

प्रकृति में घटित हो रही विभिन्न घटनाओं की व्याख्या तथा उनके लिए सूत्र या समीकरण की स्थापना भी मापन की सहायता से दी जाती है , जैसे लिफ्ट के ऊपर नीचे जाने से मनुष्य के भार में कमी या अधिकता के लिए सूत्र स्थापित करने के लिए पहले अध्ययन करना पड़ता है की कब , कितना वजन होता है और उसके आधार पर सूत्र या समीकरण दिया जाता है इसमें भी मापन का प्रयोग किया जाता है।

अत: हम कह सकते है की मापन की हमें और भौतिकी में बहुत अधिक आवश्यकता है।

भौतिक राशियाँ , मूल और व्युत्पन्न राशि क्या है , परिभाषा , प्रकार physical quantities in hindi

(physical quantities in hindi) भौतिक राशियाँ : वे राशियाँ जिनका मापन और तौलन संभव हो अर्थात जिन राशियों को मापना या तौलना संभव हो उन्हें भौतिक राशियाँ कहलाती है।
भौतिक राशि को दो भागों में लिखा जाता है , पहले राशि का संख्यात्मक मान लिखा जाता है और फिर राशि का मात्रक लिखा जाता है।
राशि का संख्यात्मक मान उसकी मात्रा को बताता है तथा मात्रक उसका प्रकार बताती है की राशि किस प्रकार की है अर्थात राशि किस चीज को व्यक्त कर रही है।
उदाहरण – जैसे एक पैकेट में लिखा है 1 Kg , इसका अभिप्राय यह है की इस पैकेट में 1 किलो भार है तथा Kg मात्रक दर्शाता है की इसको भार या द्रव्यमान के रूप में व्यक्त किया जाता है।
भौतिक राशियाँ विभिन्न प्रकार की हो सकती है , जैसे द्रव्यमान , समय , बल , वेग तथा लम्बाई आदि।
भौतिक राशियाँ दो प्रकार की होती है –
1. मूल राशियाँ (fundamental quantities)
2. व्युत्पन्न राशियाँ (derived quantities)

1. मूल राशियाँ (fundamental quantities)

वे भौतिक राशियाँ जो स्वतंत्र होती है तथा अन्य किसी राशि पर निर्भर नहीं होती है मूल राशियाँ कहलाती है।
उदाहरण – द्रव्यमान , लम्बाई तथा समय आदि।

2. व्युत्पन्न राशियाँ (derived quantities)

वे भौतिक राशियाँ जो स्वतंत्र नहीं होती है अर्थात ये आत्म निर्भर नही होती है।  व्युत्पन्न राशियाँ मूल राशियों पर निर्भर करती है। अर्थात इनकी रचना मूल राशियों की सहायता से किया जाता है।
जैसे – बल को व्यक्त करने के लिए निम्न प्रकार लिखा जाता है
बल = द्रव्यमान x त्वरण
हम यहाँ देख सकते है की सभी राशियाँ मूल राशि के रूप है , अत: हमने व्युत्पन्न राशि बल को मूल राशि के रूप में व्यक्त कर दिया या दूसरे शब्दों में कहे तो मूल राशि से ही व्युत्पन्न राशि का निर्माण हुआ है।

प्रौद्योगिकी एवं समाज में भौतिकी का योगदान contribution of physics in technology and society

(contribution of physics in technology and society) प्रौद्योगिकी एवं समाज में भौतिकी का योगदान : भौतिक विज्ञान , विज्ञान की सभी शाखाओं में से एक महत्वपूर्ण शाखा मानी जाती है क्योंकि भौतिकी ने मानव का जीवन बहुत अधिक सुविधाजनक बना दिया है।  हमारे पूर्वजों की तुलना में हमने प्रोद्योगिकी में बहुत अधिक विकास किया है जिससे हमारा जीवन अधिक सुविधाजनक बन गया है जैसे एक जगह से दूसरी जगह पर जाने के लिए वाहन की व्यवस्था , सूचना आदान प्रदान के लिए इन्टरनेट , विश्व के किसी भी कोने की सूचना के लिए टीवी आदि।  इस प्रकार की सुविधाओं से आज मानव समाज हमारे पूर्वजों की तुलना में अधिक सुविधा के साथ अपना जीवन यापन करता है।  और ये सभी सुविधाएँ भौतिक विज्ञान की देन है अत: हम कह सकते है की समाज में भौतिक विज्ञान का बहुत अधिक योगदान है।

विभिन्न प्रकार के नए नए आविष्कारों से नई नई प्रोद्योगिकी का निजात होता है , विज्ञान में किसी भी नए आविष्कार को समाज तथा मानव के जीवन में उपयोग लाने का कार्य भौतिकी करती है , भौतिकी का कार्य यह होता है की किसी भी नई खोज को मानव जीवन के दैनिक कार्य में कैसे उपयोग में लाया जाए जिससे हमारा जीवन और अधिक सुविधाजनक हो सके , इसके लिए भौतिक विज्ञान नए तकनिकी के माध्यम से उस आविष्कार को मार्केट में लाता है और हम उनका उपयोग कर हमारा जीवन और अधिक सुविधा के साथ बिता सकते है।

नई नई तकनिकी (प्रोद्योगिकी) के जरिये मानव समाज अपना समय , धन और मेहनत दोनों बचाता है , किसी भी तकनिकी में सुधार और नई तकनिकी निजात करने के लिए सबसे पहले मानव समाज की जरूरतों को समझना पड़ता है।

भौतिकी (भौतिक विज्ञान) पर आधारित तकनिकी के कुछ उदाहरण निम्न प्रकार दिए जाते है –

  • जब एक तरफ ऊष्मागतिकी का अध्ययन किया गया तो दूसरी तरफ मानव समाज में प्रचलन में चल रहे इंजन में सुधार की आवश्यकता थी तो उष्मागतिकी का प्रयोग कर नए डीजल , पेट्रोल तथा भाप इंजन का आविष्कार हुआ।
  • अर्धचालक के अधिक प्रचलन से इलेक्ट्रॉनिक्स चीजो का आकार काफी छोटा हो गया है और चीजे बहुत सस्ती हो गयी , कंप्यूटर ने लैपटॉप व मोबाइल का आकार धारण कर लिया है तथा टीवी ने LED का आकार ले लिया है जिससे विद्युत का भी काफी बचाव हुआ है।
  • बरनूली सिद्धांत के बाद जब इसे दैनिक जीवन में लाने का प्रयास किया तो मानव का आसमान में उड़ने का सपना पूर्ण हो पाया अर्थात बरनूली सिद्धांत के आधार पर ही वायुयान हवा में उड़ पाते है।
  • चुम्बकीय तरंगो के द्वारा सूचनाओं का स्थानान्तरण किया जा सकता है , जब इस बात की खोज हुई उसके बाद टीवी का , रेडियो , फैक्स आदि का आविष्कार हुआ। इन सभी उपकरणों में चुम्बकीय तरंगो द्वारा सूचनाओं का संचरण किया जाता है।
  • विज्ञान में परमाणु विखंडन के आविष्कार के बाद इससे विभिन्न प्रकार के बम्ब बनाए गए जैसे परमाणु बम आदि।

भौतिक विज्ञान तथा समाज में संबंध

जब विज्ञान में नई खोज होती है तो इसे मानव समाज के दैनिक जीवन में लाने का कार्य भौतिक विज्ञान करती है जैसे जब विज्ञान में कोई नया नियम या अवधारणा आता है तो उस नियम का प्रयोग कर भौतिक विज्ञान में विभिन्न उपकरण बनाए जाते है जिससे समाज उनका उपयोग करता है और अपना समय , पैसा और मेहनत बचाता है।
जैसे पहले सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए कागज पर लिखकर भेजा जाता है लेकिन जब विज्ञान में इस बात की खोज हुई की सूचनाओं का संचरण चुम्बकीय तरंगो के माध्यम से हो सकता है तो भौतिक विज्ञान ने इसका प्रयोग कर टीवी , रेडियो , फैक्स आदि को बनाया जिससे मानव समाज सूचनाओं का स्थानान्तरण आसानी से कर सकता है।  अब पुराने समय की तुलना में हम हमारा बहुत अधिक समय बचाते है और मेहनत भी।
अत: हम कह सकते है की भौतिक विज्ञान से मानव समाज में बहुत अधिक सुविधाएँ हो गयी है।

 

भौतिकी का कार्यक्षेत्र एवं विस्तार scope and expansion of physics in hindi

(scope and expansion of physics) भौतिकी का कार्यक्षेत्र एवं विस्तार : यहाँ हम अध्ययन करेंगे की भौतिक विज्ञान क्या है और इसका विस्तार हमारे दैनिक जीवन में कितना फैला हुआ है तथा इसके विस्तार में हम इसकी विभिन्न शाखाओं के बारे में जानेंगे।

तो सबसे पहले हम बात करते है की भौतिक विज्ञान (भौतिकी) क्या है तथा इसको कैसे परिभाषित करेंगे ?
भौतिकी की परिभाषा : भौतिकी (physics) शब्द ग्रीक भाषा के fusis शब्द से लिया गया है जिसका अभिप्राय होता है प्रकृति या प्राकृतिक।
अत: भौतिक विज्ञान , विज्ञान की ही एक शाखा है जिसमें हम प्रकृति में घटित हो रही विभिन्न प्रकार की घटनाओं का अध्ययन तथा व्याख्या करते है।
हमारे चारों तरफ विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ घटित हो रही होती है जैसे बारिश होना , बादलो का बनना , तारों का चमकना इत्यादि।  इन जैसी सभी घटनाओं का अध्ययन हम भौतिक विज्ञान में करते है।
दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते है की भौतिकी , विज्ञान की एक शाखा है जिसमे कणों तथा विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं का अध्ययन व व्याख्या की जाती है तथा इसमें आपस में क्या सम्बन्ध है इसका भी गणितीय अध्ययन किया जाता है।
भौतिक विज्ञान की विभिन्न शाखाओ को प्रमुख रूप से दो भागों में बाँटा गया है –
1. चिरसम्मत भौतिकी (classical physics)
2. आधुनिक भौतिकी (modern physics)

1. चिरसम्मत भौतिकी (classical physics)

भौतिक विज्ञान की वे शाखाएँ जो 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अधिक विकसित हुई तथा यह भौतिकी विज्ञान की वह शाखाओं का संग्रह है जो प्राचीन समय से चली आ रही है तथा समय के साथ विकसित होती जा रही है।
चिरसम्मत भौतिकी में मुख्य रूप से निम्न शाखाओं को रखा गया है –
(i) यांत्रिकी (mechanics) : इसमें वस्तुओं पर आरोपित बल तथा इनकी गति का अध्ययन किया जाता है अर्थात वस्तुओं की गतिशील अवस्था तथा साम्यावस्था का अध्ययन इस शाखा में किया जाता है।
(ii) उष्मागतिकी (thermodynamics) : इस शाखा में हम ऊष्मा तथा विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं में आपस में सम्बन्ध आदि का अध्ययन करते है , जैसे ताप देने से वस्तुओं में गतिज ऊर्जा में वृद्धि होना जिससे कुछ वस्तुएं गति करने लगती है।
(iii) विद्युत चुम्बकत्व (electromagnetics) : आवेशित कणों तथा वस्तुओं के मध्य कुछ क्रियाएँ होती है जिससे विभिन्न प्रकार के प्रभाव उत्पन्न होते है जैसे विद्युत , चुम्बकत्व , चुम्बकीय तरंगे आदि।  अत: विद्युत , चुम्बकत्व , चुम्बकीय तरंगे इत्यादि का अध्ययन इस शाखा में किया जाता है।
(iv) ध्वनि विज्ञान (acoustics) : इसमें ध्वनि से सम्बन्धित सभी अध्ययन किया जाता है जैसे ध्वनि कैसे स्थानांतरित होती है , ध्वनी केस्थानान्तरण में जो  तरंगे काम में आती है उनमें क्या क्या गुण होते है अर्थात इसमें ध्वनि के गुणों का भी अध्ययन किया जाता है।
(v) प्रकाशिकी (optics) : भौतिक विज्ञान की इस शाखा में प्रकाश की प्रकृति , इसके गुण और प्रकाश के स्थानान्तरण का अध्ययन किया जाता है।  साथ ही प्रकाश से सम्बन्धित सभी घटनाओं जैसे परावर्तन , अपवर्तन आदि का अध्ययन किया जाता है।  इसके साथ ही प्रकाश से संबंधित उपकरणों का भी अध्ययन इसमें करते है जैसे लेंस , दर्पण आदि।

2. आधुनिक भौतिकी (modern physics)

इस शाखा में कणों तथा ऊर्जा के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है , इसमें बहुत ही छोटे स्केल पर भी इनका अध्ययन आसानी से व स्वच्छता से किया जा सकता है।
इसकी शाखाएँ निम्न है –
(i) आपेक्षिकता (relativity) : जब वस्तुएं बहुत अधिक गति से गतिमान होती है तो इनका अध्ययन इस शाखा के अंतर्गत किया जाता है अर्थात इस शाखा में उन वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है जो प्रकाश के वेग के लगभग बराबर गति से गतिमान होते है।
(ii) क्वांटम यांत्रिकी (quantum mechanics) : इसमें बहुत कम ऊर्जा स्तरों का , कण की द्वेत प्रकृति , नए नए सिद्धांत आदि का अध्ययन किया जाता है। अर्थात इसमें उन कणों का अध्ययन किया जाता है जिनमें ऊर्जा बहुत छोटे स्केल पर होती है , इस प्रकार की गणना व अध्ययन इस शाखा के अन्दर ही कर सकते है।
(iii) परमाणु भौतिकी (atomic physics) : इस शाखा में परमाणु के बारे में अध्ययन किया जाता है जैसे परमाणु में इलेक्ट्रान की व्यवस्था , परमाणु की संरचना कैसी होती है तथा परमाणु के क्या क्या गुण होते है , इस प्रकार की जानकारी हमें भौतिकी की इस शाखा में प्राप्त होती है।
(iv) नाभिकीय भौतिकी (nuclear physics) : इस शाखा में परमाणु की नाभिक की व्यवस्था , स्थिति , गुण आदि का अध्ययन किया जाता है।

दृष्टि दोष , नेत्र या आँख के रोग , कर्ण – श्रवणों – संतुलन संवेदांग के कार्य , क्रियाविधि , संरचना defects of vision

defects of vision in hindi  दृष्टि दोष

1. दूर दृष्टि दोष : इस दोष के दौरान निकट की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है क्योंकि प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना के पीछे बनता है।  यह लैंस का चपटा हो जाने के कारण होता है , उत्तल लेंस के चश्मे का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

2. निकट दृष्टि दोष : इस दोष के दौरान दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है क्योंकि प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना से पहले बन जाता है।  यह नेत्र गोलक के व्यास का अधिक होने या लैंस का अधिक ऊत्तल होने के कारण होता है।  अवतल लेंस के चश्में का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

3. वृद्दावस्था दृष्टि दोष : इस दोष में निकट व दूर की वस्तुएं स्पष्ट दिखाई नहीं देती है क्योंकि लेंस या सिलियरी पेशियों की लूचक कम हो जाती है।  बाईफोकल लैंस का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

4. दृष्टि वैषम्य : इस दोष में धुंधला व अस्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि प्रकाश का केन्द्रीयकरण नहीं होता है , बेलनाकार लैंस के चश्में का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

5. रंग अन्धता : इस विकार के दौरान लाल व हरे रंग के भेद करने की क्षमता नहीं होती है , यह एक आनुवांशिक विकार है।

आँख के रोग

1. मोतिया बिन्द : इस रोग में शुरू में धुंधला व बाद में बिल्कुल दिखाई नहीं देता है क्योंकि लैंस चपटा व अपारदर्शी हो जाता है।  शल्य क्रिया द्वारा इसका उपचार किया जा सकता है। उपचार हेतु इंट्रा ओक्युलर लेंस इस्तेमाल होते है।

2. ग्लोइकॉमा : इस विकार के दौरान व्यक्ति अंधा हो जाता है क्योंकि श्लेष्मा नाल में अवरोधन से नेत्र गोलक पर दबाव बढ़ जाता है जिससे रेटिना क्षतिग्रस्त हो जाता है।

3. फन्जीक्टिन बाइटिस : इस विकार के दौरान आँखे लाल हो जाती है क्योंकि वायरस या जीवाणु संक्रमण के कारण कंजक्टिवा में सूजन आ जाती है।

4. रतौंधी : इस विकार के दौरान मंद प्रकाश या रात्री में दिखाई नहीं देता है क्योंकि विटामिन ‘A’ की कमी के कारण रोडोक्सिन का संश्लेषण नहीं होता है।

कर्ण – श्रवणों – संतुलन संवेदांग (ear) :

मनुष्य में एक जोड़ी कर्ण पाये जाते है , प्रत्येक कर्ण उभागो से मिलकर बना होता है।

1. बाह्य कर्ण : यह कर्ण का बाहरी भाग होता है , यह स्तनधारियों में पाया जाता है , बाह्य कर्ण 2 भागों से निर्मित होता है।

(a) कर्ण पल्लव : स्तनधारियों में कर्ण पल्लव स्पष्ट रूप से पाये जाते है , मनुष्य को छोड़कर अधिकांश स्तनधारियों में कर्ण पल्लव गतिशील होते है।

(b) कर्णकुहर : यह एक छिद्र समान संरचना होती है , कर्ण कुहर 2.5 – 3cm लम्बा होता है।  इसकी दिवार में मिरूमीनास ग्रन्थि पाई जाती है।  यह ध्वनि को कर्ण पट्ट तक पहुंचाता है।

2. मध्य कर्ण : यह एक गुहा रुपी रचना होती है , यह कर्णपट्ट के बाहर व भीतर वायुदाब बनाएँ रखती है , जिससे कर्णपट्ट के फटने का डर नहीं रहता है।  मध्यकर्ण 2 छिद्रों द्वारा अन्त: कर्ण से जुड़ा रहता है।  ऊपर के छिद्र को फेनेस्ट्रा ओवेलिस व नीचे के छिद्र को कोनेस्ट्रा रोटणडम कहते है।  मध्य कर्ण 3 अस्थियों से बना होता है।

(a) मैलियास : यह नीचले जबड़े की आर्टिकुलर अस्थि का रूपांतरण है।  यह मध्य कर्ण की सबसे बड़ी होती है , यह हथौड़ा के आकार की होती है।  इसका एक सिरा कर्णपट्ट से व दूसरा सिरा इनकस से जुड़ा रहता है।  मैलिथस व इनकस के मध्य हिंज संधि पायी जाती है।

(b) इनकस : यह कवाड्रेट अस्थि का रूपांतरण होती है , यह निहाई के आकार की होती है , इसका एक सिरा मैलियास से व दूसरा सिरा स्टेपिज से जुड़ा रहता है।

(c) स्टेपीज : यह हायोमेंडीबुलर अस्थि का रूपांतरण होती है , यह शरीर की सबसे छोटी अस्थि होती है।  यह घोड़े की रकाव की आकृति की होती है।  एक सिरा इनकस व दूसरा सिरा फेनेस्ट्रा ओवेसिस के सम्पर्क में रहता है।

(3) अन्त: कर्ण : यह कर्ण का सबसे भीतरी भाग होता है , यह दो भागों से मिलकर बना होता है।

  • अस्थिल गहन : टेम्पोरल अस्थि से निर्मित अस्थिल घेरा अस्थिल गहन कहलाता है , अस्थिल गहन की परिलसिका गुहा में परि लसिका भरा होता है।  अस्थिल गहन बाहर की ओर मध्य कर्ण से सम्बन्धित होता है।
  • कला गहन : यह कोमल , अर्धपारदर्शी झिल्लीनुमा संरचना होती है इसमें दो वेश्म (कक्ष) यूट्रीक्यूलस व सैक्यूलास होते है।  यूट्रीक्यूलस से तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएं निकलती है जिन्हें अग्र अर्द्धवृत्ताकार पश्च अर्द्धवृत्ताकार , बाह्य अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएं कहते है। प्रत्येक अर्द्धवृत्ताकार नलिका का दूरस्थ फूला हुआ भाग तुम्बिका कहलाता है।  सैक्युलस से एक लम्बी व स्प्रिंग के समान कुंडलित नलिका निकलती है जिसे कॉक्लियर नलिका या कणवित कहते है।
कॉक्लियर नलिका के उपरी भाग को स्केला वेस्टीबुलाई मध्य भाग को स्केला मिडिया व नीचले भाग को स्केला टिम्पेनाई कहते है।  स्केला मिडिया व स्केला टिम्पेनाई के मध्य बेसिलर कला पाई जाती है।  जिसकी मध्य रेखा पर संवेदी आयाम पाये जाते है जिसे कोर्टी के अंग कहते है।

कॉर्टि के अंग पर संवेदी रोम युक्त पट्टी पायी जाती है जिसे टेक्टोरियल कला कहते है।

कर्ण की क्रियाविधि

(a) संतुलन क्रिया : एम्पुला व यूट्रीक्यूलस में एण्डो लिम्फ भरा होता है जिसमे कैल्सियम आयन युक्त ऑटोकॉनिया कण पाये जाते है।  ये ऑटोकॉनियाँ कण श्रवणकुटो के संवेदी रोमों से टकराते है जिससे उत्पन्न उत्तेजनाओं को श्रवण तंत्रिकाओ द्वारा मस्तिष्क तक पहुचाते है।  जहाँ शरीर की पेशियों को संतुलित बनाएँ रखने के लिए प्रेरणा मिलती है।

नेत्र की कार्य विधि , संरचना चित्र , लेंस , आँख की क्रियाविधि / देखने की प्रतिक्रिया eye working in hindi

नेत्र (eye) :
बाह्य संरचना : मानव में एक जोड़ी नेत्र होते है , मानव में नेत्र कोठर स्थित होते है , नेत्र गोलक को कोठर में घूमने के लिए 6 प्रकार की पेशियाँ होती है।  नेत्र 2.5 व्यास के नेत्र गोलक के रूप में होते है।  नेत्र से संभावित सहायक संरचनाएँ पलकों बोरोनिया असरव ग्रंथियाँ आदि होते है , नवजात शिशु के चार महीने बाद असरु ग्रंथियों का संक्रियण होता है।  असरु में लवण , श्लेष्मा व जीवाणुओं को नष्ट करने में लाइसोजाइम पाये जाते है।
नेत्र गोलक खोखला व तीन स्तरीय होता है।

1. दृढ पटल (sclerotic coat) : यह सबसे बाहरी स्तर होता है।
यह दो भागों में बंटा होता है –
(A) बाहरी उभरा हुआ पारदर्शी भाग कोर्निया कहलाता है , यह नेत्र गोलक का 1/5 वा भाग होता है।
(B) शेष 4/5 वा भाग नेत्र कोटर के अन्दर रहता है , यह तन्तुमय संयोजी उत्तक का बना होता है।
कार्य

  • यह परत गोलक को सुरक्षा प्रदान करती है।
  • नेत्र गोलक को आकृति प्रदान करती है।
  • यह नेत्र पेशियों को संधि के लिए संधि स्थल प्रदान करती है।
2. रक्तक पटल (chriod coat) : यह मध्य स्तर होता है , यह कोमल संयोजी उत्तक द्वारा निर्मित होता है।  इस परत में रक्त कोशिकाओ का जाल पाया जाता है।  इस परत में रंगा कोशिकाएँ पायी जाती है , रंगा कोशिकाएं काली , भूरी या नीली हो सकती है।  कोर्निया को छोड़कर यह परत दृढपटल से चिपकी रहती है।
रक्तक पटल जो दृढ पटल से अलग होता है , कोर्निया के पीछे एक रंगीन पर्दे का निर्माण करता है , जिसे आइरिस कहते है।  आइरिस के मध्य में एक छिद्र पाया जाता है , जिसे पुतली या तारा कहते है।  आइरिस के व्यास को कम या अधिक करने के लिए दो प्रकार की पेशियाँ होती है।
3. दृष्टि पटल (ratina) : यह नेत्र गोलक का सबसे भीतरी पतला , कोमल व संवेदी स्तर होता है।  बाहरी की ओर दांतेदार होता है जिसे ओरा सिरेटा कहते है।
रेटिना प्रमुख दो स्तरों का बना होता है –
(A) संवेदी स्तर
(B) रंगा स्तर
(A) संवेदी स्तर : संवेदी स्तर तीन परतो में बंटा होता है –
(i) श्लाका एवं शंकु परत : इस परत में दो प्रकार की कोशिकाएँ होती है।
(क) श्लाका : ये नेत्र में 115 मिलियन तक होती है , इनकी संख्या अधिक होती है , इनमे रोडोक्सिन वर्णक पाया जाता है।  ये कोशिकाएँ प्रकाश व अंधकार में देखने के लिए सक्षम बनाती है।
(ख) शंकु : ये नेत्र में 6.5 मिलियन तक होती है , इनमे आयोडोक्सिन नामक वर्णन पाये जाते है।  ये रंग भेदने में सहायक होती है।
(ii) द्विध्रुवीय न्यूरोन स्तर : इस स्तर में द्विध्रुवीय तंत्रिका कोशिकाएँ सिनैप्स बनाती है।
(iii) गुच्छ्कीय स्तर : इस स्तर में एक्सोन भाग दृक तंत्रिकाओ के तन्तुओ में रूपांतरित हो जाते है। इस परत के आधार भाग को अंग बिंदु कहते है।

लेंस (lens)

आइरिस के ठीक पीछे एक पारदर्शी उभ उत्तल व लचीला लैंस होता है , जिस पर संयोजी ऊत्तक का लचीला लेन्स सम्पुट पाया जाता है।  लेंस व कोर्निया के मध्य अक्ष दृक अक्ष कहलाती है।  दृक अक्ष के सम्मुख स्थित दृष्टि पटल का मध्य भाग पीला दिखाई देता है इसे पीत बिंदु या मैकुला लुटिया कहते है।  लैंस सिलियरी काय के अन्दर लचीले निलम्बन रुनायु द्वारा गोलक की गुहा में fix रहता है।  लैंस व कोर्निया के बीच की गुहा में पारदर्शी द्रव भरा होता है जिसे तेजो जल कहते है।
लेंस व रेटिना के बीच पारदर्शक लसदार गाढ़ा द्रव भरा होता है जिसे काचाभ द्रव कहते है।

नेत्र की क्रियाविधि / देखने की प्रतिक्रिया (eye working in hindi )

वस्तु से निकलने वाली प्रकाश किरणें जब नेत्र में प्रवेश करती है तो तेजो जल प्रकाश किरणों को अपवर्तित कर देता है , आइरिस से गुजरती हुई ये किरणें लेंस में से होकर गुजरती है तो लेन्स इन्हें अपनी ओर फोकस दुरी के अनुसार झुका देता है और अब ये किरणें दृष्टिपटल पर पड़कर वस्तु का उल्टा व वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाती है।  दृष्टिपटल की संवेदी कोशिकाएँ उत्तेजित होकर दृक तंत्रिका तंत्र द्वारा मस्तिष्क में पहुंचती है।  मस्तिष्क में इनकी व्याख्या की जाती है जिससे जन्तु को वस्तु का दृष्टि ज्ञान हो जाता है।

प्रतिवर्त एवं प्रतिवर्ती क्रिया क्या है , परिभाषा , कार्य , प्रकार , क्रियाविधि , Reflexes and reflex action

(Reflexes and reflex action in hindi )प्रतिवर्त एवं प्रतिवर्ती क्रिया  : किसी उद्दीपन या बाहरी वातावरण में अचानक परिवर्तन के प्रति जन्मजात या बिना सोचे समझे होने वाली अनुक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते है।

प्रतिवर्त क्रिया की क्रियाविधि

अंगो से प्राप्त संवेदनाओ को संवेदी न्यूरोन मेरुरज्जु तक पहुँचाते है , ये संवेदनाएँ मेरुरज्जु के धूसर द्रव में पहुंचती है , जहाँ उचित निर्णय लेकर उचित आदेश धूसर द्रव में उपस्थित संयोजी न्यूरॉन को दिए जाते है , संवेदी न्यूरॉन मेरुरज्जु से प्राप्त प्रेरणाओं को प्रेरक न्यूरॉन को देते है जो कार्यकारी अंग या पेशी तक पहुंचाते है जिससे उचित अनुक्रिया हो जाती है।

 तंत्रिका कोशिका या न्यूरॉन

परिचय : न्यूरॉन तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई होती है , न्यूरॉन की कोशिकाएँ आवेगों का संचरण करने के लिए विशिष्ट होती है , इनका उद्भव भ्रूणीय एक्टोडर्म द्वारा होता है , प्रत्येक न्यूरॉन के निम्न भाग होते है –
1. कोशिका काय (cyton) : यह न्यूरॉन का गोल फैला हुआ भाग है , इसमें सभी कोशिकांग पाये जाते है , इसमें विशिष्ट कण निस्सल के कण उपस्थित होते है , कोशिका काय में उपस्थित द्रव को न्यूरोप्लाज्मा कहते है।  न्यूरोप्लाज्मा में आवेगों के संचरण के लिए महीन तंत्रिका तंतुक पाये जाते है।
2. डेन्ड्रोंस (dendrons) : कोशिका काय से कई शाखाएँ निकलती है , इन महीन धागे समान संरचनाओ को डेन्ड्रोंस कहते है।  ये तंत्रिका आवेगों को कोशिकाकाय की ओर लाती है।
3. एक्सोन (axon) तंत्रिकाक्ष : कोशिका काय से लगभग 20 माइक्रोन मोटाई का प्रवर्ध निकलता है , जिसे एक्सोन कहते है।  इसका प्रारंभिक भाग मोटा , लम्बा व बेलनाकार होता है , एक्सोन के अन्तिम सिरे गुन्दी के समान होता है जिन्हें साइनोप्टिक बटन या अक्ष तन्तु कहते है।  एक्सोन पर श्वान कोशिकाओ युक्त माइलीन आच्छाद पाया जाता है।  दो माइलिन आच्छादो के मध्य भाग को रेनवियर की पर्वसंधि कहते है।  कार्य की दृष्टि से न्यूरॉन दो प्रकार के होते है –
1. संवेदी न्यूरॉन : ये संवेदनाओं को संवेदी अंगो से मस्तिष्क व मेरुरज्जु तक लाती है।
2. प्रेरक न्यूरॉन : इन्हें चालक न्यूरॉन भी कहते है , ये प्रेरणा को मस्तिष्क व मेरुरज्जु से कार्यकारी अंग पेशी तक पहुंचाते है।

तंत्रिका आवेगों का संचरण

बाहरी उद्दीपनो से तंत्रिका कोशिकाओ का उत्तेजन तंत्रिका आवेग कहलाता है , इनका संचरण विद्युत रासायनिक तरंगो के रूप में होता है।  तंत्रिका तन्तु को उत्तेजित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम शक्ति को दैहलीज उद्दीपन कहते है।  विश्रांति काल में तंत्रिका कला के बाहर सोडियम आयनों की अधिकता के कारण धनावेश होता है जबकि भीतर कार्बोनेट आयनों की अधिकता के कारण ऋणावेश होता है।  पोटेशियम आयन वाहक का कार्य करते है , विश्रांति काल में विश्रान्ति कला विभव -70mv होता है।  उद्दीपन की अवस्था में सोडियम आयन भीतर व पोटेशियम आयन बाहर निकलते है।  साम्यावस्था में लाने के लिए तीन सोडियम आयन अन्दर व दो पोटेशियम आयन बाहर पम्प किये जाते है। जिससे बाहर ऋणावेश व भीतर धनावेश हो जाता है इसे विध्रुवित अवस्था कहते है तथा उत्पन्न सक्रीय विभव +30mv हो जाता है।  यह क्रिया आगे की ओर संचरित होती रहती है तथा पुन: सामान्य ध्रुवित अवस्था होती रहती है , यह संचरण दर 45 मीटर / सेकंड से होती है।  मायलिन आच्छाद में संचरण तीव्र होती है , इसे साल्टेटोरियल आवेग संचरण कहते है।

अंतग्रथनी संचरण (synaptic transmission)

एक तंत्रिका कोशिका का एक्सोन दूसरे तंत्रिका कोशिका डेन्ड्रोन के मध्य संयोजन को सिनैप्स कहते है।  सिनैप्स के आवेग के संचरण को अन्तर: ग्रन्थि संचरण कहते है।  एक्सोन का अन्तिम सिरा घुण्डी के समान होता है जिसमे वेसिकल व माइटोकॉन्ड्रिया होते है , जब आवेग विभव सिनैप्स पर पहुंचते है तो सिनौप्टिक वेसिकल विदर में कटकर एसिटोकोलीन का स्त्राव करते है जो आवेगों में डेन्ड्रोन में डेन्ड्रोन संचरित करता है , जब आवेग गुजर जाते है तो एसिटोकोलीन एस्टरेन एंजाइम का स्त्राव करते है जो एसिटोकोलीन का विघटन कर देता है।  एसीटोकोलीन व स्पिथीन व ब्यूरोटाएनमिटसि कहते है।

संवेदिक अभिग्राहण एवं संसाधन

प्रकृति से प्राप्त उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए मानव में संवेदी अंग पाये जाते है।
मानव में संवेदी अंग तीन प्रकार के होते है –
1. बाह्य संवेदी अंग : नाक , आँख , जीभ , कान व त्वचा
2. आन्तरिक संवेदी अंग : कार्बन डाई ऑक्साइड व रक्त की सांद्रता में परिवर्तन भूख , प्यास आदि।