1919 के अधिनियम के अधीन विधानमंडल क्या है ? Legislature under the Act of 1919 in hindi

By   September 27, 2021

Legislature under the Act of 1919 in hindi 1919 के अधिनियम के अधीन विधानमंडल क्या है ?
1919 के अधिनियम के अधीन विधानमंडल : 1919 के अधिनियम के संवैधानिक सुधार 1921 में लागू हुए । देश के सबसे बड़े और सबसे अधिक प्रभावशाली राजनीतिक दल, इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 1920-21 के निर्वाचनों का बहिष्कार किया और इस प्रकार जो विधानमंडल 1921 में बने उनमें उसका प्रतिनिधित्व नहीं था। केवल नरमपंथियों द्वारा, जो 1918 में कांग्रेस को छोड़ गए थे, बनाई गई नेशनल लिबरेशन फेडरेशन ने ही निर्वाचनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और इस दल के अनेक प्रसिद्ध सदस्य विधानमंडल के लिए निर्वाचित हुए। जैसाकि उनसे आशा की जाती थी और जैसाकि उन्होंने अपने निर्वाचकों को वचन दिया था, उन्होंने विधायकों एवं मंत्रियों के रूप में अपने कृत्यों का निर्वहन किया। उन्होंने परिषदों में अपने कार्यक्रम को “समरूपी, निरंतर एवं संगत रुकावट डालने की नीति’’ बताया।
1923 में, देशबन्धु सी.आर. दास और पंडित मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी बनाई जिसकी नीति यह थी कि चुनाव लड़े जाएं और व्यवस्था को बदलने या “शत्रु के कैंप’’ में प्रवेश करके व्यवस्था को तोड़ने की दृष्टि से परिषदों में स्थान प्राप्त किया जाए। मौलाना आजाद की अध्यक्षता में सितंबर 1923 में हुए कांग्रेस के विशेष दिल्ली अधिवेशन में परिषदों में स्थान प्राप्त करने की स्वराज पार्टी की योजना को स्वीकृति दी गई और तत्पश्चात स्वराज पार्टी कांग्रेस का विधायी पक्ष बन गई । स्वराज पार्टी के नेताओं ने यह कह कर विधानमंडलों में प्रवेश को उचित ठहराया कि विद्यमान परिस्थितियों में प्रशासन व्यवस्था को निरर्थक एवं अप्रभावी बनाने का यही सबसे अच्छा तरीका है।
स्वराज पार्टी को 1923 के निर्वाचनों में आश्चर्यजनक सफलता मिली । कुल 145 स्थानों में से 25 स्थान जीत कर स्वराज पार्टी केंद्रीय विधानमंडल में सबसे बड़ी पार्टी बन गई । मौलाना आजाद के अनुसार पार्टी की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि वह उन स्थानों पर भी जीत गई जो मुसलमानों के लिए आरक्षित थे। कुछ निर्दलीय सदस्यों तथा पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व वाली नेशनलिस्ट पार्टी के सदस्यों के समर्थन से इसे पूर्ण बहुमत प्राप्त हो गया। मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वराजवादियों ने राष्ट्रीय महत्व के अनेक प्रस्तावों पर सरकार को पराजित किया और बजट तथा अनेक विधायी उपायों के पास होने में बार बार रुकावट डाली । अनेक बार सदन से बहिर्गमन अथवा वाक् आउट किये । स्वराजवादियों के प्रयासों के परिणामस्वरूप 1924 और 1925 में राष्ट्रीय मांग अथवा ष्नेशनल डिमांड” संबंधी संकल्प भारी बहुमत से पास हुए।
1926 के निर्वाचनों के परिणाम स्वराज पार्टी के लिए निराशाजनक रहे । 7 मार्च, 1926 को अखिल भारत कांग्रेस समिति ने, सरकार से सहयोग के कोई चिन्ह दिखाई न देने के कारण, स्वराजवादियों से कहा कि वे विरोध स्वरूप विधानमंडलों से उठकर चले आएं । इस प्रकार स्वराजवादी प्रयोग समाप्त हुआ।
इस अवधि के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना अध्यक्ष पद का विकास था। केंद्रीय विधान सभी का प्रथम प्रेजीडेंट (अध्यक्ष), सर फ्रेडरिक व्हाईट को मनोनीत किया गया था परंतु अगस्त, 1925 में श्री विठ्ठलभाई पटेल को चुना गया और वे सभा के प्रथम गैर-सरकारी प्रेजीडेंट (अध्यक्ष) बने । उन्होंने तथा सदन के अनेक सदस्यों ने महसूस किया कि सभा का सचिव भारत सरकार के अधीन विधायी विभाग का सचिव होने से निर्वाचित अध्यक्ष की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 22 सितंबर, 1928 को पंडित मोतीलाल नेहरू ने सदन में एक संकल्प पेश किया कि एक पृथक सभा विभाग (एसेंबली डिपार्टमेंट) बनाया जाए । यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार हुआ । सेक्रेटरी आफ स्टेट फार इंडिया ने कुछ रूपभेदों के साथ उसे स्वीकृति प्रदान की और 10 जनवरी, 1929 से विधान सभा विभाग नामक एक पृथक पूर्ण विभाग बनाया गया। अध्यक्ष को नये विभाग का वास्तविक प्रमुख अधिकारी बनाया गया और उसके लिए कर्मचारी अध्यक्ष की अनुमति से नियुक्ति किए गए।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अनुसार किए गए सीमित सुधार प्रतिनिधि उत्तरदायी सरकार की जनता की मांग को पूरा करने में पूर्णतया अपर्याप्त सिद्ध हुए। सीमित शक्तियों वाले विधानमंडल के विरुद्ध राष्ट्रीय मत बढ़ता गया और वर्ष प्रतिवर्ष पूर्ण प्रभुसत्ता संपन्न संसद और उत्तरदायी सरकार के लिए मांग जोर पकड़ती गई।

साईमन कमीशन की नियुक्ति : 1920 से 1935 तक के वर्ष बहुत महत्वपूर्ण थे। इन वर्षों में देश में बहुत राजनीतिक चेतना पैदा हुई । महात्मा गांधी के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने एक जन-संगठन का रूप ले लिया। 1919 के अधिनियम में व्यवस्था थी कि दस वर्षों की अवधि व्यतीत हो जाने पर एक रायल कमीशन नियुक्त किया जाए जो “ब्रिटिश इंडिया में शासन प्रणाली के कार्यकरण की तथा प्रतिनिधि संस्थाओं के विकास की जांच करे…‘‘ और यह बताया कि “क्या उत्तरदायी सरकार के सिद्धांत को कार्यरूप देना, या उत्तरदायी सरकार का विस्तार करना, उसमें रूपभेद करना, या सीमित करना वांछनीय है और, यदि हां तो कहां तक वांछनीय है, तथा क्या स्थानीय विधानमंडलों में दूसरा सदन स्थापित करना वांछनीय है या नहीं‘‘ । नवंबर, 1927 में, निर्धारित समय से दो वर्ष पूर्व ही, उक्त कमीशन की नियुक्ति की घोषणा कर दी गई। परंतु कमीशन के सभापति, सर जॉन साईमन, और उसके सभी सदस्य ब्रिटिश संसद में से ही चुने गए। सभी श्वेत सदस्यों के उस साईमन कमीशन का अधिकांश भारतीय दलों ने बहिष्कार किया। कमीशन के मई, 1930 में प्रकाशित प्रतिवेदन को सब राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। इस बीच जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में इंडियन नेशनल कांग्रेस 1929 में अपने लाहौर अधिवेशन में घोषणा कर चुकी थी कि “पूर्ण स्वराज‘‘ ही हमारा उद्देश्य है।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 : 1935 के अधिनियम का उद्देश्य संघीय ढांचे की व्यवस्था करना था। उसमें उपबंध था कि गवर्नर-जनरल के “कृत्यों के निर्वहन में” उसकी “सहायता तथा मंत्रणा‘‘ के लिए, सिवाय उस स्थिति के जहां उसके लिए अपने कृत्यों का निर्वहन “अपने विवेकाधिकार‘‘ अथवा ‘‘अपने व्यक्तिगत विचार‘‘ के अनुसार करना अपेक्षित हो, दस से अनधिक सदस्यों की मंत्रिपरिषद होगी। संघीय विधानमंडल के प्रति मंत्रियों के व्यक्तिगत या सामूहिक उत्तरदायित्व का अधिनियम में कोई उल्लेख नहीं था यद्यपि यह अपेक्षित था कि प्रत्येक मंत्री विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य अवश्य हो । इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री के पद का भी कोई उल्लेख नहीं था। मंत्रियों को नियुक्त करने और बर्खास्त करने के बारे में अपने कृत्यों का प्रयोग गवर्नर-जनरल को अपने ‘‘विवेकाधिकार‘‘ से करना था। वह अपने ‘‘विवेकाधिकार‘‘ से मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता कर सकता था।
अधिनियम में व्यवस्था थी कि संघीय विधानमंडल में (सम्राट), जिसका प्रतिनिधित्व गवर्नर-जनरल करता था, तथा दो सदन होंगे जिन्हें क्रमशः कौंसिल आफ स्टेट (उपरि सदन) तथा हाउस आफ एसेंबली (निम्न सदन) कहा जाएगा। कौंसिल में ब्रिटिश इंडिया के 156 प्रतिनिधि और भारतीय रियासतों के 104 से अनधिक प्रतिनिधि होंगे तथा हाउस आफ एसेंबली में ब्रिटिश इंडिया के 250 प्रतिनिधि तथा भारतीय रियासतों के 125 से अनधिक प्रतिनिधि होंगे। कौंसिल आफ स्टेट एक स्थायी निकाय होगा जिसे भंग नहीं किया जा सकेगा परंतु उसके एक-तिहाई सदस्य हर तीसरे वर्ष सेवानिवृत्त हो जाएंगे। प्रत्येक संघीय एसेंबली, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा अपने ष्विवेकाधिकारष् से समय-पूर्व भंग नहीं कर दिया जाता तो, पांच वर्षों तक कार्य करेगी।अधिनियम में उपरि सदन के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन की और निम्न सदन के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति अपनाई गई थी।
यह व्यवस्था थी कि प्रत्येक सदन अपना सभापति तथा उपसभापति चुनेगा और उसे, अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपनी प्रक्रिया एवं कार्य को स्वयं विनियमित करने की शक्ति प्राप्त होगी। गवर्नर-जनरल को अपने ‘‘विवेकाधिकार‘‘ से विधानमंडल को बैठक के लिय आमंत्रित करने और उसका सत्रावसान करने तथा निम्न सदन को भंग करने की शक्ति प्राप्त होगी।कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बनेगा जब तक कि दोनों सदन उस पर सहमत न हो जाएं और गवर्नर-जनरल उस पर अपनी अनुमति न दे दे अथवा जो विधेयक महामहिम की इच्छा जानने के लिए रक्षित रखा गया हो, उस पर महामहिम की इच्छा की सूचना न मिल जाए। गवर्नर-जनरल की अनुमति प्राप्त अधिनियम भी महामहिम द्वारा नामंजूर किया जा सकता था । गवर्नर-जनरल कोई विधेयक पुनर्विचार के लिए सदनों के पास भेज सकता था। सदनों में असहमति होने की स्थिति में गवर्नर-जनरल संयुक्त बैठक बुला सकता था जिसमें बहुमत द्वारा निर्णय हो सकता था।
दोनों सदनों को लगभग समान शक्तियां दी गई थीं, परंतु वित्तीय क्षेत्र में कुछ अंतर था। धन विधेयक केवल निम्न सदन में ही पेश किए जा सकते थे, परंतु उपरि सदन को निम्न सदन के समान ही उनमें संशोधन करने या उन्हें अस्वीकार करने की शक्ति प्राप्त थी, और गवर्नर-जनरल को संयुक्त बैठक बुलाकर मतभेद दूर करने की शक्ति प्राप्त थी।
कांग्रेस के लखनऊ में (अप्रैल, 1936) और फैजपुर में (1937) हुए क्रमशः  49वें और 50वें अधिवेशनों में इस अधिनियम में उपबंधित नये संविधान को इस आधार पर पूर्णतया अस्वीकार कर दिया गया कि इससे “राष्ट्र की इच्छा किसी भी प्रकार पूरी नहीं होती‘‘। कांग्रेस ने महसूस किया कि अधिनियम भारत की जनता की घोषित इच्छा के प्रतिकूल उस पर लाद दिया गया है। कांग्रेस ने घोषणा की कि भारत की जनता केवल ऐसे सवैधानिक ढांचे को मान्यता दे सकती है जो स्वयं उनके द्वारा बनाया गया हो।
1935 के अधिनियम का संघीय व्यवस्था वाला भाग कभी लागूनहीं हुआ क्योंकि रियासतों को संघ में शामिल होने के लिए तैयार नहीं किया जा सका । इसके परिणामस्वरूप, भारत में केंद्रीय सरकार का संविधान, प्रांतों को स्वायत्तता दिये जाने से पैदा हुए रूपभेदों के साथ, वैसा ही रहा जैसाकि वह 1919 के अधिनियम के अनुसार था । इस प्रकार, केंद्र में ऐसी कोई मंत्रिपरिषद नियुक्त नहीं हुई जो विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी हो और केंद्रीय विधानमंडल की शक्तियां एवं कृत्य तब तक वही रहें जैसी कि 1919 के अधिनियम में व्यवस्था थी। उनमें भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के लागू हो जाने तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। 1934 में गठित विधान सभा में कांग्रेस दल के 44 सदस्य और 11 वे राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने भोलाभाई देसाई और अणे के नेतृत्व में सामान्यतया उन्हीं के साथ मतदान किया। राष्ट्रीय दलों और सरकारी पक्ष के बीच संतुलन रखने वाले निर्दलीय सदस्यों के नेता जिन्ना थे। राष्ट्रवादियों का मुख्य उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि भारत सरकार गैर-जिम्मेदार है, भारत की जनता का उसमें कोई विश्वास नहीं है और वे उसे समर्थन देने को तैयार नहीं हैं। सरकार के प्रति विरोध प्रकट करने के अवसर तब आते थे जब रेलवे एवं सामान्य बजट पर मतदान होता था। इस उद्देश्य से अनेक मदों की अनुदानों की मांगें अस्वीकार कर दी जाती थीं। भारत की जनता की शिकायतों को व्यक्त करने और जनता के हितों की उपेक्षा किए जाने के लिए सरकार की निंदा करने हेतु कटौती प्रस्ताव पेश किए जाते थे। गवर्नर-जनरल में निहित प्रमाणिकरण की विशेष शक्तियों के अनुसार सरकार उनमें से अधिकांश कटौतियों को बहाल कर दिया करती थी। इससे स्वभावतया यह साफ हो जाता था कि भारत का शासन जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों की सम्मति से नहीं बल्कि गर्वनर-जनरल के तानाशाही आदेश से चल रहा है।

केंद्रीय विधान सभा के नये चुनाव, जो बहुत पहले हो जाने चाहिए थे, 1945 की अंतिम तिमाही में हुए । कांग्रेस ने वह चुनाव 1942 के अपने “भारत छोड़ो‘‘ प्रस्ताव को लेकर लड़े। चुनावों में कांग्रेस को निर्वाचित स्थानों में अधिकांश स्थान (102 में से 56)प्राप्त हुए । कांग्रेस विधायक दल के नेता शरत चन्द्र बोस थे । भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अधीन कुछ परिवर्तन हुए। 1935 के अधिनियम के वे उपबंध निष्प्रभावी हो गए जिनके अंतर्गत गवर्नर-जनरल या गवर्नर अपने विवेकाधिकार के अनुसार अथवा अपने व्यक्तिगत विचार के अनुसार कार्य कर सकता था। डौमीनियन विधानमंडल को ‘‘विधान बनाने की पूर्ण शक्ति, उन विधानों सहित जिसका राज्यक्षेत्रातीत प्रभाव हो,” प्राप्त हो गई।