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वर्णनात्मक नीतिशास्त्र Descriptive ethics in hindi , आदर्शवादी नीतिशास्त्र क्या है अधिनीतिशास्त्र Meta-ethics in hindi
Meta-ethics in hindi वर्णनात्मक नीतिशास्त्र Descriptive ethics in hindi , आदर्शवादी नीतिशास्त्र क्या है अधिनीतिशास्त्र ?
नीतिशास्त्र की शाखाएं
नीतिशास्त्र की चार शाखाएं हैं। ये हैं-
ऽ वर्णनात्मक नीतिशास्त्र
ऽ आदर्शवादी नीतिशास्त्र
ऽ अधि नीतिषास्त्र
ऽ अनुप्रयुक्त अथवा व्यावहारिक नीतिषास्त्र
वर्णनात्मक नीतिशास्त्र
नीतिशास्त्र की वह शाखा जो नैतिकता के संबंध में प्रचलित विश्वासों का अध्ययन करता है, वर्णनात्मक नीतिशास्त्र कहलाता है। इसकी पद्धति आनुभविक है, अर्थात् यह आगमनात्मक (परीक्षात्मक) पद्धति पर आधारित होता है। यह विभिन्न समुदायों में रहने वाले लोगों के जीवन का एक सामान्य प्रतिदर्श/प्रतिमान प्रस्तुत करता है। वर्णनात्मक नीतिशास्त्र के अंतर्गत नीतिशास्त्र के उद्भव और विकास का अध्ययन किया जाता है जिसके फलस्वरूप हमें कुछ परम्पराओं, रूढ़ियों तथा निषेधों का विवरण प्राप्त होता है। उदाहरणस्वरूप, परिवार या विवाह जैसी संस्थाओं के उद्भव और विकास की जानकारी वर्णनात्मक नीतिशास्त्र के अध्ययन से ही मिलती है। वर्णनात्मक नीतिशास्त्र का एक प्रमुख उदाहरण है लॉरेंस कोलबर्ग का नैतिक चेतना संबंधी सिद्धान्त।।
वर्णनात्मक नीतिशास्त्र के अन्तर्गत इस बात की भी खोज एवं पहचान की जाती है कि किसी समाज में कौन से नैतिक नियम व आदर्श प्रचलित हैं अर्थात् वो कौन-कौन से ऐच्छिक कर्म हैं जो इस समाज में नैतिक आधार पर निन्दनीय माने जाते हैं। इसके अलावा समाज में मूल्य जनित विश्वासों, उचित और अनुचित माने जाने वाले कर्मों तथा व्यक्ति विशेष के सदगुणों की पहचान करना भी वर्णनात्मक नीतिशास्त्र के कार्य हैं। यही नहीं बल्कि वर्णनात्मक नीतिशास्त्र नैतिक निर्णयों का विश्लेषण भी करता है। साथ ही, इस बात की परीक्षा भी करता है कि विभिन्न मानव समूहों द्वारा तय किए गए नैतिक प्रतिमान कौन-कौन से हैं? वस्तुतः वर्णनात्मक नीतिशास्त्र नैतिक प्रतिमानों के अध्ययन का एक स्वतंत्र उपागम है जो पर्यवेक्षण पर आधारित है न कि मूल्यों पर।
आदर्शात्मक नीतिशास्त्र
आदर्शात्मक नीतिशास्त्र का संबंध उस आदर्श या मापदंड से है जिसके आधार पर उचित और अनुचित आचरण का निर्णय किया जा सके। दूसरे शब्दों में, नीतिशास्त्र की इस शाखा के अंतर्गत आचरण का आदर्श बतलाया जाता है, अर्थात् मानव-आचरण कैसा होना चाहिए, इस तथ्य की विवेचना की जाती है। वास्तव में यह उस कसौटी की खोज है जो किसी व्यवहार के औचित्य का परीक्षण करता है।
आदर्शात्मक नीतिशास्त्र को निर्देशात्मक नीतिशास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह वह शास्त्र है जो मनुष्य का आचरण कैसा होना चाहिए, इसकी मीमांसा करता है। यह उन प्रतिमानों की परीक्षा करता है जिन से उचित-अनुचित, शुभ-अशुभ की पहचान होती है। यह आदर्शात्मक नीतिशास्त्र ही है जो नैतिक आदर्शों से विचलित आचरण के लिए दंड का विधान करता है साथ ही दंड के औचित्य को प्रमाणित करता है क्योंकि नैतिक विचलन सामाजिक एवं नैतिक व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न करता है। इतना ही नहीं, आदर्शात्मक नीतिशास्त्र कुछ मानकों पर आधारित नैतिक सिद्धान्तों की भी रचना करता है अर्थात् कुछ ऐसे नैतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है जो कठिन परिस्थितियों में भी नैतिक निर्णय लेने में सहायक होते हैं।
अरस्तु का सदगुण सिद्धान्त, कांट का निरपेक्ष आदेश संबंधी सिद्धान्त, मिल का उपयोगितावादी सिद्धान्त तथा गीता का निष्काम कर्म आदि आदर्शात्मक नीतिशास्त्र के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।
आदर्शात्मक नैतिक सिद्धान्त का एक क्लासिक उदाहरण है गोल्डन रूल। इस नियम के अनुसार- ‘‘हमें दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए जिसकी हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं।‘‘ इसी तर्क के आधार पर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि किया गया कार्य उचित है या अनुचित। अतः गोल्डन रूल के आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि झूठ बोलना, दूसरों को परेशान करना, उन पर हमला करना या फिर उनकी हत्या करना उचित नहीं है। वस्तुतः गोल्डन रूल आदर्शात्मक सिद्धान्त का एक सशक्त उदाहरण है जो प्रत्येक आचरण के औचित्य की परीक्षा के लिए एकमात्र कारगर सिद्धान्त साबित हो सकता है। कुछ अन्य आदर्शात्मक मानक ऐसे भी हैं जो मौलिक सिद्धान्तों अथवा शुभ चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं।
अधि नीतिशास्त्र
अधि नीतिशास्त्र के अन्तर्गत नैतिक भाषा के स्वरूप और अर्थ पर विचार किया जाता है। ‘अधि नीतिशास्त्र‘ डमजं-मजीपबे का हिन्दी रूपान्तरण है। यहां श्डमजंश् का अर्थ है ‘के बाद‘ या ‘से पर‘। अतः अधि नीतिशास्त्र से अभिप्राय उस शास्त्र से है जो नीतिशास्त्र से जुड़ी सभी संकल्पनाओं का एकबारगी अवलोकन करता है।
अधि नीतिशास्त्र मुख्य रूप से दो प्रश्नों पर विचार करता है-
1. तत्वमीमांसीय अर्थों में अधि नीतिशास्त्र यह जानने का प्रयास करता है कि क्या मानव से स्वतंत्र नैतिकता का कोई अस्तित्व है?
2. मनोवैज्ञानिक अर्थों में अधि नीतिशास्त्र यह जानने का प्रयास करता है कि क्या नैतिक आचरण एवं नैतिक निर्णयों का कोई ‘मानसिक‘ आधार है?
दूसरे शब्दों में, अधि नीतिशास्त्र के अन्तर्गत इस बात का अन्वेषण किया जाता है कि नीतिशास्त्र से जुड़े पारिभाषिक शब्दों एवं मान्यताओं के वास्तविक अभिप्राय क्या हैं, अर्थात् ये क्या इंगित करते हैं? जहां आदर्शात्मक नीतिशास्त्र के अन्तर्गत आचरण के आदर्श व नियम बताए जाते हैं। वहीं अधि नीतिशास्त्र के अन्तर्गत इन आदर्शों व नियमों की वैधता सुनिश्चित की जाती है।
मानव-आचरण के मूल्यांकन के लिए हम सब उचित-अनुचित, शुभ-अशुभ, अच्छा-बुरा आदि नैतिक शब्दों का प्रयोग करते हैं। नीतिशास्त्र के अन्तर्गत ये पारिभाषिक शब्द है जो नैतिक निर्णयों में उपकरण के रूप में प्रयुक्त होते हैं। अधि नीतिशास्त्र इन्हीं नैतिक पदों के अर्थ एव परिभाषा पर विचार करता है तथा इस बात की परीक्षा भी करता है कि तत्वमीमांसीय अर्थों में इन पदों का वास्तविक अस्तित्व है या नहीं। इसके अलावा यह नैतिक विशेषताओं व मूल्यांकनों की प्रकृति एवं स्वरूप निर्धारित करने का भी प्रयास करता है।
निष्कर्षतः अधि नीतिशास्त्र के अन्तर्गत निम्न प्रकार के प्रश्नों की मीमांसा की जाती है, जैसे – नैतिक पदों एवं नैतिक निर्णयों के वास्तविक अर्थ क्या हैं? नैतिक निर्णयों के स्वरूप क्या है? नैतिक निर्णयों का अनुमोदन किस प्रकार किया जा सकता है, आदि।
व्यावहारिक नीतिशास्त्र
नीतिशास्त्र की वह शाखा जिसके अंतर्गत कुछ विशिष्ट किन्तु नैतिक रूप से विवादास्पद मुद्दों यथा गर्भपात, जानवरों के अधिकार या इच्छा मृत्यु आदि का विश्लेषण किया जाता है, व्यावहारिक नीतिशास्त्र कहलाता है। दुविधा और मानसिक द्वन्द्व की स्थिति में व्यावहारिक नीतिशास्त्र हमें नैतिक सिद्धांतों का प्रयोग करना सिखलाता है ताकि हम अपनी स्थिति स्पष्ट कर सके। दूसरे शब्दों में, नैतिक निर्णय की प्रक्रिया में यह हमारी मदद करता है। वर्तमान में प्रचलित आधुनिक जीवन शैली ने नये-नये मुद्दों को जन्म दिया है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं- क्या गर्भपात कराना अनैतिक है? क्या इच्छा मृत्यु की अनुमति देना अनैतिक है? मानवाधिकार क्या है और इसके अंतर्गत मानव के कौन- कौन से अधिकार सम्मिलित किए जाते हैं? क्या जानवरों के भी अधिकार होते हैं? क्या व्यक्ति को आत्म निर्णय का अधिकार है? व्यावहारिक नीतिशास्त्र के अंतर्गत ऐसे ही प्रश्नों पर विचार किया जाता है।
कोई प्रश्न व्यावहारिक नीतिशास्त्र की विषय वस्तु है अथवा नहीं यह दो बातों पर निर्भर करता है। प्रथम, प्रश्न विवादास्पद हो, साथ ही इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क देने वाले मानव समूहों की तादाद भी बड़ी हो। द्वितीयतः, प्रश्न सिर्फ सामाजिक विवाद का ही विषय न हो बल्कि नैतिक विवादास्पद हो।
नैतिक आचरण के निर्धारक तत्व
नैतिक आचरण तथा नैतिक निर्णय मुख्य रूप से तीन कारकों द्वारा निर्धारित होता है-
ऽ व्यक्ति की चारित्रिक विशेषताएं: इसके अंतर्गत मानवीय मूल्यों में व्यक्ति की आस्था, जीवन
के अनुभव, उसकी शिक्षा व भरण-पोषण तथा उसक धार्मिक विश्वास आदि आते हैं।
ऽ देश/संस्कृति जिसमें व्यक्ति अपना जीवनयापन कर रहा है।
ऽ संगठन/उद्योग: संगठन/उद्योग द्वारा तय किए गए नैतिक मानक जहां व्यक्ति कार्यरत है।
अभिशासन में नैतिकता के निर्धारक तत्व
किसी देश के अन्तर्गत अभिशासन में नैतिकता के विभिन्न स्तर/आयाम उस देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीति, सांस्कृतिक, न्यायिक, कानूनी तथा ऐतिहासिक विकास पर निर्भर करते हैं। वस्तुतः यही वे कारक है जो लोक प्रशासन में नैतिकता को प्रभावित करते हैं। नैतिकता का विकास एक लम्बी प्रक्रिया है, संदर्भ चाहे संपूर्ण समाज हो या फिर समाज से जुड़ी एक छोटी संस्था या इकाई। अपने पल्लवन एवं क्रमिक विकास के क्रम में यह ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, कानूनी व न्यायिक तथा आर्थिक व राजनीतिक आदि कई पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होता है। अर्थात् किसी समाज या संस्था में नैतिकता के उद्भव एवं विकास में इन कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
नैतिक मूल्य अथवा मान्यताएं
नैतिक मूल्य अथवा मान्यताएं किसी व्यक्ति या व्यक्ति-समूह के अपने सिद्धान्त अथवा गुण हैं जो उनके निर्णय तथा व्यवहार को संचालित करते हैं। नैतिक मूल्य अथवा मान्यताएं काफी कुछ जहाज के लंगर के समान होते हैं। जिस प्रकार एक जहाज तेज बहाव के आने पर भी लंगर के सहारे किनारे से लगा रहता है, उसी प्रकार उत्तम चरित्र अथवा उच्चतर नैतिक मूल्यों वाला एक व्यक्ति विकट परिस्थिति अथवा दबाव में भी अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहता है।
स्वयं हमारे चरित्र के उच्चतम स्तर हो नैतिक मूल्यों के स्रोत हैं, अर्थात् बाध्य रूप से इनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। हममें से प्रत्येक में नैतिक मूल्य अंतस्थ है जो हमारे कर्मों तथा निर्णयों में परिलक्षित होते हैं। नैतिक मूल्य वस्तुतः स्वनिर्मित व स्वचालित प्रक्रिया के समान होते हैं जो न सिर्फ सही और गलत की पहचान करते हैं बल्कि यह भी सुनिश्चित करते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, भले ही कोई प्रत्यक्षदर्शी हो या न हो। नैतिक मूल्यों का संबंध व्यक्ति के चरित्र व आचरण से होता है। ये मानव की ऐच्छिक क्रियाओं व अभ्यासजन्य आचरण का उनके औचित्य-अनौचित्य के आधार पर मूल्यांकन करते हैं।
नैतिक मूल्यों पर एक अन्य तरीके से भी विचार किया जा सकता है और वह यह है कि ये अन्तज्र्ञात नहीं होते अर्थात् नैतिक मूल्यों की सहज अनुभूति नहीं होती बल्कि हम अपने आस-पास के वातावरण से , इसे ग्रहण करते हैं। मूल्यों का ज्ञान हमें उन लोगों से होता है जो उम्र एवं अनुभव में हमसे बड़े होते हैं। कुछ तो हम उनके व्यवहार से सीखते हैं और कुछ लम्बे समय तक उनसे शिक्षा ग्रहण करके। वस्तुतः यह एक लम्बी व क्रमिक प्रक्रिया है। देखा जाए तो हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते कि किसी व्यक्ति द्वारा नैतिक मूल्यों के अपना जाने में उसके परिवार, समाज तथा आस-पास के माहौल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्ति ही नैतिक मूल्यों का स्रोत है जिसके निर्देशन में हम यह चुनाव कर पाते हैं कि अपने आस-पास के माहौल से हमें क्या सीखना चाहिए। अतः हम कह सकते हैं कि नैतिक मूल्य हम सब में समान रूप से अंतस्थ है। ये व्यक्ति की अंतर्निहित शक्तियां है जो सामान्य होती हैं और कर्मों के माध्यम से व्यवहार रूप ले लेती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए नैतिक मूल्यों की महत्ता अलग-अलग होती है और इस बात पर निर्भर करता है कि वह स्वयं के प्रति कितना जागरूक व सचेत है, साथ ही अपने सांस्कृतिक परिवेश व अन्य प्रकार की विवशताओं से किस हद तक समझौता करने को तैयार है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि नैतिक मूल्यों के आत्मसातीकरण में अन्तर्मन और बाह्य वातावरण दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
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