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पेंक का भ्वाकृतिक सिद्धांत क्या है पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत किसे कहते है penck geomorphology in hindi

penck geomorphology in hindi landfroms पेंक का भ्वाकृतिक सिद्धांत क्या है पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत किसे कहते है ?

 पेंक का भ्वाकृतिक सिद्धान्त
पेंक का भ्वाकृतिक विश्लेषण का सिद्धान्त इनके मरणोपरान्त प्रकाशित हुआ, जिसमें इन्होंने प्रक्रम की क्रिया-विधि एवं स्थलरूपों की विशेषताओं का विशद् वर्णन प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार – किसी स्थान विशेष का स्थलरूप वहाँ की विवर्तनिक क्रियाओं द्वारा प्रभावित एवं नियन्त्रित होता है। इन्होंने अपनी संकल्पना में समय को महत्व नहीं दिया है, अर्थात् समय रहित संकल्पना का प्रतिपादन किया है। धरातलीय संचलन एवं बाह्म प्रक्रमों द्वारा मलवा के विस्थापन की प्रक्रिया द्वारा स्थलरूपों का सृजन होता है। यदि विस्थापन की दर अधिक होती है तो स्थलरूपों का विकास शीघ्र होता है। इसके विपरीत विकास अल्प होता है। इन्होंने पहाड़ी ढाल के विकास में स्पष्ट किया है कि नदी द्वारा निम्नवर्ती अपरदन एव अनाच्छादन की अनुमानित दर पर पहाड़ी ढाल निर्भर करता है। इनका यह सिद्धान्त तीन तथ्यों पर निर्भर है-
(क) स्थलखण्ड स्थिर रहता है। इसमें किसी प्रकार का विस्थापन नहीं होता है।
(ख) स्थलखण्ड का उथान गुम्बद के आकार में होता है। प्रारम्भ में. इसका क्षेत्र सीमित रहता है , परन्तु बाद में क्षेत्र विस्तृत हो
जाता है।
(ग) अन्तिम अवस्था में विस्तृत रूप से स्थलखण्ड का उत्थान होता है।
अपरदन द्वारा प्राप्त मलवा तथा परिवहन-दर पर ढाल का विकास निर्भर करता है। स्थलखण्ड उत्थान मलवा की दर को प्रभावित करता है। इनका नदी द्वारा निम्नवर्ती अपरदन की दर का सिद्धान्त 3 तथ्यों पर निर्भर करता है – (क) स्थलखण्ड दीर्घकाल तक स्थिर रहे अथवा समान गति से उत्थान के नदी द्वारा जितना अपरदन किया जाएगा, उतना मलवा परिवहित कर लिया जाएगा, (ख) स्थलखण्ड का उत्थान नदी के निम्नवर्ती अपरदन की अपेक्षा अधिक है तो नदी का जलमार्ग ढाल तब तक बढ़ता जब तक कि दोनों बराबर नहीं हो जाते, तथा (ग) स्थलखण्ड का उत्थान नदी के निम्नवती अपर अल्प है तो नदी के जलमार्ग ढाल में इतनी कमी आ जाती है कि यह साम्यावस्था की स्थिति प्रार लेती है। पेंक महोदय अपने ढाल-विकास-सिद्धान्त में निम्न मान्यतायें मानी है –
(क) पहाडी ढाल के निम्न भाग का ढाल इतना होता है कि नदी द्वारा अपरदन से प्राप्त सम्पूर्ण मलवा का अनाच्छादन इस ढाल पर
हो जाता।
(ख) पहाड़ी ढाल के प्रत्येक भाग में अपक्षय दर समान रहती है।
(ग) अपक्षय तथा मलवा निष्कासन दोनों बराबर होते हैं। यदि अपक्षय की दर बढ़ती जाएगी, तो मलवा का निष्कासन भी बढ़ता जाएगा।
(घ) नदी-अपरदन एवं शैल-संरचना ढाल प्रवणता को निर्धारित करती है।
(ङ) ढाल-विकास में जितने निक-प्वाइन्ट बनते हैं, उतने आधार-तल होते हैं, परन्तु इनका विकास सबसे निम्न आधार-तल पर
होता है।
(च) ढाल का निवर्तन होता रहता है, जिस पर अनाच्छादन प्रक्रिया का प्रभाव पड़ता है।
ढाल-विकास नदी के निम्नवर्ती अपरदन एवं स्थलखण्ड के उत्थान द्वारा प्रभावित होता है। यदि दोनों की दर समान है, तो सरलरेखी ढाल का निर्माण होता है। नदी के निम्नवर्ती अपरदन से यदि उत्थान की दर अधिक है तो उत्तल ढाल का विकास होता है। स्थलखण्ड के उत्थान की अपेक्षा नदी का निम्नवर्ती कटाव घटती दर से होता है तो अवतल परिच्छेदिका का विकास होता है। पेंक ने स्पष्ट किया कि अन्त में सरल रेखीय ढाल पर समान दर से अपक्षय की क्रिया घटित होती है। परिणामतः ढाल के कोण में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता है। इस ढाल के निम्न भाग में हाल्डेनहॉग (ढलुवा सतह) का विकास होता है, जिससे मलवा का निष्कासन नदी में होता रहता है। हाल्डेनहॉग के निचले भाग पर अल्प कोणवाली सतह का निर्माण होता है, जिसका विकास उर्ध्वगामी होता है। अन्त में, एक विस्तृत अवतल ढाल वाली परिच्छेदिका का निर्माण होता है।
पेंक महोदय, डेविस के विपरीत अपरदन एवं उत्थान की प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इनके अनुसार– उत्थान एवं अपरदन साथ-साथ घटित होते हैं। उत्थान एवं अपरदन दर में भिन्नता होती है। अपरदन के मध्य यदि प्रतिरोधी शैल आ जाती है, तो आधार तल में निक प्वाइन्ट का निर्माण होता है। इस निक प्वाइन्ट का अस्तित्व तब तक विद्यमान रहता है, जब तक कि कठोर शैल का विनाश नहीं हो जाता है। अधिक प्रतिरोधी शैल पर तीव्र ढाल का विकास होता है। इसके विपरीत अल्प प्रतिरोधी शैल की स्थिति में मन्द ढाल का विकास होता है। इस प्रकार इन्होंने अपरदन के मध्य पड़ने वाले व्यवधानों का विश्लेषित करने का प्रयास किया है। प्रतिरोध के प्रभाव से प्रक्रम की क्रिया-विधि में किस प्रकार अन्तर उत्पन्न होगा, स्थलरूप पर क्या प्रभाव पड़ेगा आदि को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
 किंग का भ्वाकृतिक सिद्धान्त
किंग महोदय ने दक्षिणी-अफ्रीका के मरु स्थलाकृतियों का गहन अध्ययन एवं क्षेत्र पर्यवेक्षण किया तथा इसके आधार पर स्थलाकृतिक-चक्र, अपरदन का भूतलज-चक्र, पैडीप्लेनेशन-चक्र, पहाडी-चक्र आदि धाता का प्रतिपादन किया। इन्होंने डेविस के कई तथ्यों का परित्याग कर पेंक के विचारों के आधार पर अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन करने का प्रयास किया, तथापि इनका सिद्धान्त डेविस के सन्निकट ही रहा। इनके अनुसार – स्थलरूपों के विकास में जलवायु का प्रभाव अंकित नहीं होता है, बल्कि सभी प्रकार जलवायु में समान रूप से इनका विकास होता है। ढाल के कोण में समानान्तर निवर्तन होता है, जिस कार्यरत प्रक्रमों का प्रभाव परिलक्षित होता है। इन्होंने दक्षिणी अफ्रीका की स्थलाकृतियों के विश्लेषण के बाद स्पष्ट किया कि -आदर्श ढाल वाली परिच्छेदिका पर – शिखर, कगार, मलबा, ढाल एवं पेडीमेण्ट चार विद्यमान होते हैं, जिनकी पुष्टि अन्य प्रदेशों में भी की जा सकती है।
किंग के अनुसार – अपरदन-चक्र का प्रारम्भ स्थलखण्ड के त्वरित उत्थान के साथ ही प्रारम्भ हो जाता है। स्थलखण्ड के उत्थान के पश्चात लम्बे समय तक यह स्थिर रहता है। स्थलखण्ड के उत्थान के साथ का अपरदन-शक्ति बढ़ जाती है, जिससे यह निम्नवर्ती अपरदन करना प्रारम्भ कर देती है। नदी-जलमार्ग में अनेक निक प्वाइन्ट विद्यमान हो जाते हैं, जो निरन्तर शीर्ष की ओर खिसकते जाते हैं। धीर-धीर अपरदन मन्द पड़ जाता है तथा पार्श्ववर्ती अपरदन प्रारम्भ हो जाता है। प्रौढ़ावस्था में नदी का निम्नवर्ती अपरदन समाप्त हो जाता है तथा पार्श्ववर्ती अपरदन सक्रिय रहता है। नदी इस समय नग्र शैल वाली अपरदित सतह का निर्माण कर लेती है, जो पेडीमेण्ट कहलाता है। पेडीमेण्ट का निरन्तर विकास होता रहता है। अन्त में, जब कई पेडीमेण्ट मिल जाते हैं, तव विस्तृत सतह का सृजन होता है। बीच-बीच में इस पर कठोर चट्टानों के अवशेष विद्यमान रहते हैं।
किंग महोदय ने ढाल के चारों तत्व – शिखर, कगार, मलवा, ढाल-पेडीमेण्ट के निर्माण की प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। पहाड़ी ढाल का शिखर भाग उत्तल ढाल वाला होता है, जिसका निर्माण मृदासर्पण द्वारा होता है। कगार खुली चट्टानी सतह वाला होता है, जिल पर नियोजन की क्रिया, शैल वियोजन, भू-स्खलन, अवनलिका अपरदन आदि के द्वारा घटित होती है। मलवा ढाल का निर्माण मलवा के निक्षेप द्वारा होता है, जिसका कोण मलवा के जमाव की मात्रा द्वारा निर्धारित किया जाता है। पेडीमेण्ट कठोर चट्टान के अवतल ढाल वाला नग्र शैल होता है, जिसका निर्माण चादरी-बाढ़ के अपरदन की क्रिया के फलस्वरूप होता है।
किंग के सिद्धान्त में कुछ ऐसे प्रश्न उठाये गये हैं, जो इनके सिद्धान्त को सार्वभौमिकता प्रदान करने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। किंग ने स्थलरूपों के विकास की संकल्पना का प्रतिपादन दक्षिणी अफ्रीका की अर्द्ध-शुष्क मरू स्थलाकृतियों के आधार पर किया है। इन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि किसी भी जलवायु-प्रदेश मे यह सिद्धान्त लागू किया जा सकता है। परन्तु यह अन्य जलवायु-प्रदेशों में कुछ समस्याओं का समाधान तो प्रस्तुत करता है, सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान नहीं प्रस्तुत कर पाता है।

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