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संस्कृत काव्य
इस शैली को काव्य या कविता भी कहा जाता है। नाटक खण्ड में जहाँ कहानी ग्रंथ का मुख्य केंद्र बिंदु होती है वहीं इसमें कविता प्रकार, शैली, अलंकारों आदि पर अधिक केंद्रित होती है, सबसे महानतम संस्कृत कवियों में से एक कालिदास हैं। उन्होंने कुमार सम्भव ;कुमार का जन्मद्ध और रघुवंश ;रघुओं का राजवंशद्ध लिखा था। उन्होंने मेघदूत (बादल दूत) और ऋतुसंहार (ऋतुओं का माॅडल) नामक दो छोटी कविताएं भी लिखी थीं।
गुप्त काल के दौरान लिखने वाले हरिषेण जैसे कवियों के योगदान का उल्लेख करना नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने समुद्र गुप्त की वीरता की प्रशंसा में कई कविताएं लिखीं थीं और ये इतनी सराहनीय थी कि इन्हें इलाहाबाद स्तंभ पर भी अंकित किया गया है। एक और अत्यधिक लोकप्रिय संस्कृत कवि 12वीं सदी में गीत-गोविंद लिखने वाले जयदेव थे। यह भगवान कृष्ण के जीवन और शरारतों पर केंद्रित है। इस ग्रंथ में भगवान कृष्ण, राधा के प्रति उनके प्रेम और प्रकृति की सुंदरता के प्रति समर्पण के तत्वों का संयोजन किया गया है।
अन्य प्रमुख कवि हैंः
भारवि (550 ईस्वी) किरातुर्जनीयम् (किरात और अर्जुन)
माघ (65-700 ईस्वी) शिशुपाल वध (शिशुपाल की हत्या)

अन्य प्रमुख संस्कृत ग्रंथ
विद्वानों के लाभ के लिए संस्कृत में विज्ञान और राज्य शासन के विषय में लिखित कई पुस्तकें थी। इतिहासकारों का तर्क है कि 500 और 200 ईसा पूर्व के बीच, कानून पर कई प्रमुख पुस्तकें लिखीं और संकलित की गईं थीं। इन्हें धर्मसूत्रा कहा जाता था। इन्हें धर्मशास्त्रों के रूप में ज्ञात स्मृतियों के साथ संकलित किया गया था। ये अधिकांश हिंदू राज्यों के विषयों का प्रशासन करने वाले कानूनों के आधार थे। इनमें केवल उन नियमों को ही स्पष्ट नहीं किया गया है जिसके अनुसार संपत्ति का धारण, विक्रय या हस्तांतरण किया जा सकता है बल्कि धोखाधड़ी से लेकर हत्या तक के अपराधों के लिए दण्ड पर सविस्तार प्रकाश डाला गया था।
एक अन्य प्रमुख ग्रंथ मनुस्मृति (मनु के कानून) है। यह समाज में स्त्रियों और पुरुषों की भूमिका, सामाजिक स्थलों पर उनकी बातचीत और उस आचार संहिता को परिभाषित करता है जिसका पालन करने की उनसे अपेक्षा की जाती थी। इस ग्रंथ को मानव जाति के पूर्वज मनु द्वारा दिए गए प्रवचन के रूप में लिखा गया है। मनुस्मृति को संभवतः 200 ईसा पूर्व और 200 ईस्वी के दौरान लिखा और संकलित किया गया था।
मौर्य काल के शासन काल के विषय में एक सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। यह मौर्य साम्राज्य की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर केंद्रित है। सैन्य रणनीति को उचित महत्व दिया गया है जिसका राज्य द्वारा उपयोग किया जाना चाहिए। इस ग्रंथ में उल्लेख है कि ‘कौटिल्य’ या ‘विष्णुगुप्त’ ने इसे लिखा था। इतिहासकारों का तर्क है कि ये दोनों नाम सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहने वाले विद्वान चाणक्य के उपनाम थे।
जहां संस्कृत प्राचीन काल में दरबारी भाषा थी, वहीं इसे गुप्त काल में भी प्रोत्साहन मिला जिसने महान कवियों, नाटककारों और विभिन्न विषयों के विद्वानों को नियोजित किया था। इस अवधि में संस्कृत सुसंस्कृत और शिक्षित लोगों की संचार की वरीय भाषा बन गई। आगे चलकर कुषाण काल में, कई प्रमुख संस्कृत विद्वानों को संरक्षण मिला। उदाहरण के लिए, अश्वघोष ने बुद्धचरित लिखा जिसमें बुद्ध के जीवन पर प्रकाश डाला गया है। उन्होंने कई काव्य रचनाओं की भी रचना की और सौंदरानंद उनकी कविताओं के सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक है।
इस अवधि में लिखे गए कुछ वैज्ञानिक ग्रंथ इस प्रकार हैंः
चरक चरक संहिता (चिकित्सा पर पुस्तक)
सुश्रुत सुश्रुत संहिता (शल्यक्रिया पर पुस्तक)
माधव माधव निदान (रोगविज्ञान पर पुस्तक)
वाराहमिहिर पंच-सिद्धांतिका (ज्योतिष पर पुस्तक)
बृहत संहिता (ग्रहीय चाल, भूविज्ञान, वास्तुकला, आदि जैसे व्यापक विषयों पर पुस्तक)
आर्यभट्ट आर्यभट्टीयम् (खगोल विज्ञान और गणित पर पुस्तक)
लगधाचार्य ज्योतिष पर पुस्तक
पिंगल गणित पर पुस्तक
भाष्कर सिद्धांत शिरोमणी

हालांकि, मध्यकाल में संस्कृत में साहित्य का उतना प्राधान्य नहीं था, तो भी राजस्थान और कश्मीर में कुछ उत्कृष्ट रचनाएं की गई थीं। मध्ययुगीन कश्मीर की दो सबसे उल्लेखनीय रचनाएं कश्मीर के राजाओं का विस्तृत विवरण देने वाली कल्हण की राजतरंगिणी और सोमदेव की कथा-सरित्सागर थी, जो कि एक काव्यात्मक कृति है श्रीहर्ष का नैषधीयचरित्रम।

पालि और प्राकृत में साहित्य
वैदिकोत्तर काल के दौरान, संस्कृत के अतिरिक्त, प्राकृत और पालि में भी साहित्य की रचना की गई। प्राकृत वह शब्द है जिसे मानक भाषा यानी संस्कृत से किसी भी भाषा से शिथिल ढंग से जोड़ा जाता है। पालि का सामान्यतः प्राकृत के आदि या पुराने रूप का संकेत करने के लिए प्रयोग किया जाता है और यह कई वर्तमान बोलियों को जोड़ती है। इन भाषाओं ने तब प्रमुखता प्राप्त की जब बौद्धों और जैनियों के धार्मिक साहित्य की इस भाषा में रचना की जाने लगी।
कहा जाता है कि भगवान बुद्ध अपने उपदेश देने के लिए पालि का उपयोग करते थे और यह वही भाषा है जिसमें इन्हें अभिलिखित किया गया है।
बौद्ध साहित्य को कैनोनिकल और नाॅन-कैनोनिकल रचनाओं में विभाजित किया जा सकता है। कैनोनिकल साहित्य ‘त्रिपिटक’ या ज्ञान की टोकरी से मिलकर बना है। तीनों त्रिपिटक हैंः
ऽ विनय पिटक, इसमें वे नियम और विनियम सम्मिलित हैं जिनका बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पालन किया जाना चाहिए।
ऽ सुत्त पिटक में नैतिकता और धर्म से संबंधित बुद्ध के संवाद और भाषण सम्मिलित हैं।
ऽ अंतिम, अभिधम्म पिटक है जो दर्शन और तत्वमीमांसा पर केंद्रित है। इसमें नैतिकता, ज्ञान और मनोविज्ञान के सिद्धांतों जैसे विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श सम्मिलित हैं।

जातक बौद्ध नाॅन-कैनोनिकल साहित्य का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। इनमें बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियों का संकलन हैं। बोधिसत्व या (भविष्य) के बुद्ध की कहानियों की भी इन जातकों में चर्चा की गई। हांलाकि इन कहानियों में बौद्ध धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार है, तथापि ये संस्कृत और पालि में भी उपलब्ध हैं। बुद्ध के जन्म की प्रत्येक कहानी जातक कथा के समतुल्य है। माना जाता था गौतम के रूप में पैदा होने से पहले बुद्ध 550 जन्मों से होकर गुजरे थे। इन कथाओं में लोकप्रिय कहानियों, प्राचीन पौराणिक कथाओं के साथ-साथ 600 ईसा पूर्व और 200 ईसा पूर्व के बीच उत्तर भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का संयोजन है। अश्वघोष (78 ई.) द्वारा रचित महान महाकाव्य बुद्धचरित भी संस्कृत में बौद्ध साहित्य का एक और उदाहरण है।
अन्य प्रमुख धर्म, जैन धर्म में प्राकृत में ग्रंथों की रचना की गई थी। ये जैन केनोनिकल साहित्य के आधार का निर्माण करते हैं। सिद्धार्षि (906 ईस्वी) के उपमतिभव प्रपंच कथा जैसे कुछ जैन ग्रंथ भी संस्कृत में लिखे गए थे। प्राकृत में लिखित सबसे महत्वपूर्ण जैन ग्रंथ अंग, उपांग और परिक्रमा हैं। इनके अतिरिक्त छेदब सूत्र ;ब्ीीमकंइ ैनजतंद्ध और मलसूत्र ;डंसंेनजतंद्ध को भी जैनियों द्वारा पवित्रा माना जाता है।
जैनियों से जुड़े धर्मनिरपेक्ष लेखकों में शब्द कोश और व्याकरण पर ग्रंथ लिखने वाले हेमचंद्र भी थे। आठवीं शताब्दी में लिखने वाले हरिभद्र सूरि का भी उल्लेख किया जा सकता है। इन ग्रंथों से हमें जैन समुदाय, जिसमें अधिकांशतः व्यापारी सम्मिलित थे, द्वारा गहन रूप से आबाद क्षेत्रों का सामाजिक-राजनीतिक इतिहास समझने में सहायता मिलती है।
अन्त में, प्राकृत कविता में 300 ईस्वी में हाल द्वारा लिखित ‘गाथा सप्तशती’ (700 छंद) जैसे ग्रंथों के माध्यम से प्रेम काव्य के भी कुछ तत्व है। जहां हल ने इस खंड में केवल 44 छंदों का योगदान किया था वहीं जो चीज इसे अलग करती है वह है इस रचना में योगदान करने वाली महिला कवयित्रियों की बड़ी संख्या। उन में सबसे प्रमुख पहाई, रोहा, शशिपाहा, महावी और रेवा हैं।

अन्य बौद्ध साहित्यिक ग्रंथ
ऽ दीपवंशः यह संभवतः तीसरी-चैथी शताब्दी ई.पू. में राजा धातुसेन के शासनकाल के दौरान अनुराधापुर (श्रीलंका) में लिखा गया था। इसका शाब्दिक अर्थ ‘द्वीप का इतिवृत्त’ है। इसमें श्रीलंका में बुद्ध की यात्रा और बुद्ध के अवशेषों के संबंध में उल्लेख किया गया है।
ऽ मिलिंद पन्होः इसमें राजा मिनान्दर (या मिलिंद) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच हुआ संवाद सम्मिलित है। इसका शाब्दिक अर्थ ‘मिलिंद के प्रश्न’ है। यह सर्वोच्च दार्शनिक अनुसंधानों में से एक है।
ऽ महावंशः पाली भाषा में लिखा गया महाकाव्य है। तीसरी-चैथी शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विजय के शासनकाल के दौरान इसे लिखा गया था। इसमें दक्षिण एशिया के विभिन्न राज्यों का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है।
ऽ महावस्तुः इसमें जातक और अवदान कहानियां सम्मिलित हैं। इसे मिश्रित संस्कृत, पाली और प्राकृत में लिखा गया है। इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से चैथी शताब्दी ईस्वी के बीच संकलित किया गया बताया जाता है।
ऽ ललितविस्तार सूत्राः इसका अर्थ ‘पूर्ण नाटक’ है। यह महत्वपूर्ण महायान ग्रंथ है। इसमें सारनाथ में पहले प्रवचन तक बुद्ध के जीवन से जुड़ी विभिन्न कहानियां दी गई हैं।
ऽ उदानः यह सबसे प्राचीन थेरावाद ;पुरातन संप्रदायद्ध बौ( ग्रंथों में से एक है। इसमें ‘अंधों और हाथी’ की प्रसिद्ध कहानी दी गई है।
ऽ बोधि वंशः यह श्रीलंका में 10वीं शताब्दी में लिखित गद्य-कविता है। सिंहली संस्करण से इसका अनुवाद किया गया है। इसे उपतिष द्वारा पाली में लिखा गया था।
ऽ उदानवर्गः इस संकलन में बुद्ध और उनके शिष्यों के कथन दिए गए हैं। इसे संस्कृत में लिखा गया है।
ऽ महाविभाषा शास्त्रः इसे 150 ईस्वी के आस-पास लिखा गया बताया जाता है। इसमें अन्य गैर-बौद्ध दर्शनों के संबंध में भी चर्चा सम्मिलित है। यह अनिवार्य रूप से महायान ग्रंथ है।
ऽ अभिधर्ममोक्षः इसे वसुबन्धु ने लिखा था और यह व्यापक रूप से आदरणीय ग्रंथ है। इसे संस्कृत में लिखा गया था। इसमें अभिधर्म पर चर्चा सम्मिलित है।
ऽ विशुद्धिमग्गः 5वीं शताब्दी में बुद्धघोष ने लिखा था। यह थेरवाद सिद्धांत का ग्रंथ है। इसमें बुद्ध की विभिन्न शिक्षाओं पर चर्चाएं सम्मिलित हैं।

जैन साहित्य
प्राकृत और अर्ध मागधी में लिखने के अतिरिक्त, काल, क्षेत्रा और अपना समर्थन करने वाले संरक्षकों के आधार पर जैन भिक्षुओं ने कई अन्य भाषाओं में भी लिखा था। दक्षिण भारत में संगम काल के दौरान उन्होंने तमिल में लिखा।
उन्होंने संस्कृत, शौरसेनी, गुजराती और मराठी में भी लिखा।
इन्हें व्यापक रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है ‘जैन अगम नामक धर्मवैधानिक’ या धार्मिक ग्रंथ और धर्मेत्तर साहित्यिक रचनाएं।

जैन अगम
ये पवित्र ग्रंथ हैं और इन्हें जैन तीर्थंकरों की शिक्षाएं बताया जाता है। इन्हें मूल रूप से गंाधारों द्वारा संकलित किया गया बताया जाता है जो महावीर के करीबी शिष्य थे। श्वेतांबरों के लिए ये ग्रंथ महत्वपूर्ण हैं।
वर्तमान अंगों को मध्य 5वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान वल्लभी (गुजरात) में आयोजित श्वेतांबर पंथ के भिक्षुओं की परिषद में पुर्नसंकलित किया गया बताया जाता है। दिगम्बर संप्रदाय का मानना है कि मूल शिक्षाएं बहुत समय पहले लुप्त गई थीं और वे वल्लभी में संकलित अगम का प्राधिकार स्वीकार नहीं करते हैं।
‘‘अगम’’ में 46 ग्रंथ सम्मिलित हैं, जिनमें से 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्णक, 4 मूलसूत्र, 6 छेदसूत्र, 2 चुलिका सुत्र हैं।
इन्हें अर्ध-मागधी प्राकृत भाषा में लिखा गया है। अंग, जीवन के सभी प्रकार के लिए आदर, शाकाहार, तपश्चरर्या, दया और अहिंसा की कठोर संहिताएं सिक्खाते हैं। 12 अंग हैंः
1. आचारांग सूत्रः सबसे प्राचीन अगम।
2. सूत्राकृतांगः जैन भिक्षुओं के लिए आचार संहिता, तत्वमीमांसा आदि का वर्णन करता है।
3. स्थानानंग सूत्रः
4. समवयंग सूत्रः जैन धर्म के सार, खगोल शास्त्रा, गणित आदि पर चर्चा।
5. व्याख्याप्रजनापति या भगवती सूत्र
6. ज्ञात्रधर्म कथा
7. उपासकदशा
8. अंतक्रदशा
9. अनुत्राउपापातिकदशा
10. प्रश्नव्याशकरणानीः पापों का विवरण
11. विपक्षसूत्रः कहानियां और उदाहरण
12. दृष्टिवदः 14 पूर्व सम्मिलित हैं
दिगंबरों ने दो रचनाओं को पवित्रा का दर्जा दियाः कर्मप्रभृत (कर्म पर चर्चाद्ध या शतखंडगम और कश्यपप्रभृत।
कुछ अन्य महत्वपूर्ण जैन रचनाएं और लेखक हैंः
ऽ भद्रबाहू (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) सबसे बड़े जैन भिक्षुओं में से एक थे और चंद्रगुप्त मौर्य के शिक्षक थे। उन्होंने पवित्रा उवासगधरम स्तोत्रा, कल्प सूत्रा ;जैन तीर्थंकरों की आत्मकथाद्ध लिखी थी। वह दिगंबर संप्रदाय के अगुआ थे।
ऽ आचार्य कुंडकुंड का समयसार और नियमसार जैन दर्शन की चर्चा करता है।
ऽ समंत भद्र द्वारा रत्न करन्द श्रावकचर (जैन गृहस्थ का जीवन) और आप्तमीमांसा को दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास लिखी गई थी।
ऽ इलंगो आदिगल का शिलप्पादिकारम नैतिक संलाप है जिसे दूसरी शताब्दी ईस्वी में लिखा गया था। इसे तमिल साहित्य के सबसे महान महाकाव्यों में से एक माना जाता है। यह ग्रंथ के केन्द्र में कन्नगी है, जिसने पांड्य वंश के न्याय व्यवस्था की गलती से अपना पति खोने पर उसके राज्य पर अपना प्रतिशोध उतारा।
ऽ तिरुतक्कतेवर का जीवक चिंतामणी भी तमिल साहित्य का एक महाकाव्य है।
ऽ प्राचीन तमिल ग्रंथ नलतियर जैन भिक्षुओं द्वारा लिखा गया था।
ऽ उमास्वाति का तत्वार्थ-सूत्रा ;पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वीद्ध तर्क, ज्ञानमीमांसा, आचार और खगोल विज्ञान पर संस्कृत में महत्वपूर्ण जैन रचना है।
ऽ जिनसेन (8वीं-9वीं शताब्दी) सम्मानित दिगम्बर भिक्षु थे। उन्होंने महापुराण और हरिवंशपुराण की रचना की थी। वह एक और प्रसिद्ध जैन भिक्षु वीरसेन के शिष्य थे।
ऽ हरिभद्र सूरी (6वीं शताब्दी ईस्वी) संस्कृत में लिखने वाले जैन लेखक थे।
ऽ प्रसिद्ध विद्वान हेमचंद्र सूरी (12वीं शताब्दी) ने संस्कृत और प्राकृत का व्याकरण लिखा था।
पतन से पहले वल्लभी और कलिंग के विश्वविद्यालय जैनों के लिए विद्या के महत्वपूर्ण केंद्र थे।
9वीं से 12वीं सदी के बीच, जैन भिक्षुओं ने व्यापक रूप से कन्नड़ में लिखा। कन्नड़ साहित्य के तीन रत्न पम्प, पोन्न और रन्न जैन धर्म से संबंधित प्रसिद्ध लेखक थे।
हिंदू धर्म के पुनरुद्धार और कर्नाटक में लिंगायतों के प्रसार के साथ ही जैन धर्म की लोकप्रियता में कमी आई। इस प्रकार 12वीं-13वीं शताब्दियों के बाद साहित्यिक कार्यों में कमी देखी गई।