शब्दकोश किसे कहते है | शब्दकोश के प्रकार | shabdkosh meaning in hindi dictionary शब्दक्रम

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(shabdkosh meaning in hindi dictionary) , शब्दकोश किसे कहते है | शब्दकोश के प्रकार , शब्दक्रम की परिभाषा क्या है ? नियम , वर्ण हिंदी व्याकरण में |

शब्दकोश- शब्दक्रम का ज्ञान

शब्दकोश

उस ग्रंथ को शब्दकोष कहते हैं जिसमें शब्दों को यों ही अथवा अर्थसहित किसी क्रमविशेष में सुनियोजित कर दिया गया हो । वैदिक काल में शब्दकोश के स्थान पर ‘निघण्टु‘ नाम चलता था । उस समय का केवल एक निघण्टु प्राप्त है जिस पर यास्क ने निरुक्त लिखा है । निघण्टु को वैदिक शब्दकोश कहते हैं । वैदिककाल से अब तक भारत में अनेक कोों का निर्माण हुआ । अंग्रेजी में कोश- निर्माण का प्रारम्भ 16वीं शदी के उत्तरार्ध से हुआ। अब तो कोश विज्ञान नाम से भाषाविज्ञान की एक स्वतंत्र शाखा का विकास हो गया है ।

कोशों के प्रकार

वर्ण्य विषय के आधार पर कोश पाँच प्रकार के होते हैं-

(1) व्यक्तिकोश,

(2) पुस्तककोश,

(3) विषय – कोश,

(4) विश्व-कोश,

(5) भाषा-कोश,

(1) व्यक्तिकोश-किसी एक साहित्यकार द्वारा अपने साहित्य में प्रयुक्त सम्पूर्ण शब्दों का कोश व्यक्तिकोश कहलाता है । जैसे-जायसीकोश, केशव-कोश !

(2) पुस्तक कोश-जिस कोश में किसी पुस्तक में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ सहित संग्रह किया गया हो उसे

पुस्तक-कोश कहते हैं । जैसे-कामायनी कोश, मानस कोश आदि ।

(3) विषयकोश-इसमें एक विषय से सम्बन्धित सामग्री अकारादि क्रम से सजायी जाती है । जैसे-भाषा विज्ञानकोश, पुराणकोश आदि ।

(4) विश्वकोश-इस कोश के अन्तर्गत ज्ञान की सभी महत्वपूर्ण शाखाओं पर सारगर्भित जानकारी दी जाती है। विश्वकोश का ही अंग्रेजी रूपान्तर ‘इन्साइक्लोपीडिया‘ है । जैसे- हिन्दी विश्वकोश, इन्साइक्लोपीडिया, ब्रिटेनिका, इन्साइक्लोपीडिया अमेरिकाना आदि ।

(5) भाषाकोश-जिस कोश में किसी एक भाषा के शब्दों, मुहावरों एवं लोकोक्तियों को अकारादि क्रम से रखते हुए विभिन्न अर्थ दिये रहते हैं, उन्हें भाषाकोश कहते हैं । जैसे—हिन्दी शब्द सागर, हिन्दी-अंग्रेजी कोश आदि ।

भाषा-कोश- रचना की पद्धतियाँ

कोश बनाने की तीन पद्धतियाँ हैं—

(1) वर्णनात्मक पद्धति ।

(2) ऐतिहासिक पद्धति ।

(3) तुलनात्मक पद्धति ।

(1) वर्णनात्मक पद्धति– इसमें किसी भाषा के एक काल में प्रयुक्त सम्पूर्ण शब्दों का संकलन कर उन्हें अकारादिक्रम से रखा जाता है । साथ ही प्रत्येक शब्द के सामने उसके कई अर्थ दे दिये जाते हैं । इस पद्धति पर बने हुए कोश इस प्रकार हैं- रामचन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित ‘मानक-हिन्दी-कोश‘ और ‘प्रामाणिक-हिन्दी-कोश‘ आदि। वस्तुतः इस पद्धति के अन्तर्गत प्रचलन के आधार पर शब्दों के अर्थ दिये जाते हैं अर्थात् सबसे पहले अधिक प्रचलित अर्थ, फिर कम प्रचलित अर्थ दिये जाते हैं।

(2) ऐतिहासिक पद्धति-इस पद्धति के अन्तर्गत सभी कालों में प्रचलित शब्दों को अकारादि क्रम से संकलित किया जाता है । शब्दों के अर्थ कालक्रम से किये जाते हैं, प्रचलन के आधार पर नहीं।

(3) तुलनात्मक पद्धति-इसमें भी किसी भाषा के शब्दों को अकारादि क्रम से रखा जाता है। कालक्रमानुसार प्रत्येक शब्द का अर्थ दिया जाता है तथा साथ ही उसी अर्थ में प्रचलित अन्य सगोत्र भाषाओं के शब्दरूप भी दे दिये जाते हैं । गोविन्ददास कृत ‘मराठी व्युत्पत्ति कोश‘ उसी पद्धति पर तैयार किया गया है।

शब्दकोश निर्माण की विधि

इसके लिए महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं-

(1) शब्द संग्रह-किसी भाषा का शब्द कोश बनाने के लिए सबसे पहले उसके सम्पूर्ण शब्दों को एकत्र किया जाता है। किसी जीवित भाषा का कोश बनाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों तथा लोगों से सुनकर शब्द एकत्र किये जाते हैं।

(2) वर्तनी-कोश का निर्माण करते समय शब्दों की मानक वर्तनी का ही प्रयोग होना चाहिए। यदि एक शब्द की अनेक वर्तनियाँ प्रचलित हैं तो उनमें से किसी एक को सर्वशुद्ध मानकर कोश में स्थान देना चाहिए ।

(3) शब्द निर्णय- इसमें कई समस्याएँ खड$ी होती हैं । जैसे-एक मूल शब्द से अनेक शब्द बमे हैं । ऐसे शब्दों को मूल शब्द के साथ रखा जाय अथवा अलग रूप से । ऐसे ही बहुत से श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द हैं जिनके अलग-अलग अथवा एक साथ लिखने की समस्या भी होती है। जैसे-आम के दो अर्थ हैं-(1) एक फल-विशेष अर्थात् रसाल, (2) सामान्य । इसका क्रम इस प्रकार रहेगा-

आम1-(सं० आम्र), रसाल, फल विशेष । (सं०= संस्कृत)

आम2-(अ०), सामान्य । (अ० अरबी)

(4) शब्द क्रम-शब्दकोश में शब्दों को एक क्रम से रखा जाता है । इससे शब्द आसानी से ढूँढे जा सकते हैं । शब्दक्रम के कई प्रकार हैं-

(क) वर्णानुक्रम, (ख) अक्षरक्रम, (ग) विषयक्रम, (घ) व्युत्पत्तिक्रम । वर्णानुक्रम सर्वाधिक प्रचलित है। किसी भाषा की वर्णमाला के क्रम के आधार पर शब्दकोश में शब्दों का स्थान निर्धारित करना वर्णानुक्रम या अकारादिक्रम कहलाता है । अक्षरक्रम में शब्दों का क्रम अक्षर संख्या के आधार पर रखा जाता है । जैसे-पहले एक अक्षर के शब्द, फिर दो अक्षर के शब्द, तीन अक्षर के शब्द और आगे भी इसी क्रम से शब्द रखे जाते हैं । विषयक्रम के अन्तर्गत विषयवार शब्द रखे जाते हैं । जैसेभाषाविज्ञान के पारिभाषिक शब्द एक स्थान पर, तो दर्शनसम्बन्धी शब्द दूसरे स्थान पर और साहित्य शास्त्र-सम्बन्धी शब्द तीसरे स्थान पर आदि । अरबी में शब्दकोश व्युत्पत्ति-क्रम के आधार पर निर्मित होता है अर्थात् शब्दों की व्यत्पुत्ति के आधार पर शब्दों का क्रम निर्धारित किया जाता है।

(5) शब्द-व्युत्पत्ति, शब्दों के भेद (संज्ञा, सर्वनाम आदि), प्रचलन के आधार पर शब्दों के विविध अर्थ तथा स्पष्ट शब्दों एवं मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करने के लिए वाक्य – प्रयोग देना आदि शब्दकोश के लिए लाभदायक होता है।

शब्दकोश में शब्दक्रम का ज्ञान

वर्ण, व्युत्पत्ति, या विषय के आधार पर किसी भी शब्दकोश में शब्दक्रम रखा जाता है । हिन्दी के सभी कोशों में देवनागरी वर्णमाला के अनुसार शब्दक्रम रखा जाता है। अतः स्पष्ट है कि अपेक्षित शब्द ढूँढ़ने के लिए देवनागरी वर्णमाला का क्रम भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए ।

देवनागरी के 49 वर्णों के क्रम इस प्रकार हैं-

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अं अः

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ड़ ढ ढ़ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म

य र ल व

श ष स ह

अंग्रेजी की ‘आँ‘ ध्वनि का हिन्दी में अनेशः प्रयोग होता है । यह भी ध्यान देने की बात है कि अर्धानुस्वार  ( ँ), अनुस्वार ( ं ) से पृथक् ध्वनि है तथा इसी तरह ड, ढ, उत्क्षिप्त व्यंजन हैं जो ड, ढ से भिन्न हैं। ऑ ध्वनि को ‘औ‘ के बाद रखना चाहिए । अर्ध अनुस्वार ( ँ) ध्वनि अनुस्वार ( ं ) का इस्व-रूप है । अतः शब्दकोश में अँगना के बाद अंगना आएगा । ट वर्गीय व्यंजनों में ड के बाद इ तथा ढ के बाद ढ$ को स्थान देना चाहिए ।

हिन्दी में जो कोश सम्पादित किये गये हैं उनमें देवनागरी के 46 वर्णों के क्रम को आधार बनाया गया है-अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः। क ख ग घ ङ; च छ ज झ ञ; ट ठ ड ढ. ण; त थ द ध न; प फ ब भ म; य र ल व श ष स ह। इससे पता चलता है कि ऑ, अ, ड, ढ़, ध्वनियों की पृथक सत्ता स्वीकार नहीं की गयी है।

शब्दक्रम निश्चित करने का सिद्धान्त

हिन्दी में देवनागरी के वर्षों के क्रम अनुसार ही कोश में शब्द भी संकलित किये जाते हैं । देवनागरी वर्णमाला में ‘अ‘ पहला वर्ण है। इससे शुरू होने वाले जितने भी शब्द हैं सबको अकारादि क्रम से रखा. जायगा । जैसे- यदि अमित, अमिय, अमल, आशय, अली, अलीक आदि शब्द हैं तो इनका क्रम इस प्रकार होगा- अमल, अमात्य, अमित, अमिय, अली, अलीक । किसी वर्ण के अ से औ तक मात्रायुक्त शब्दों से प्रारम्भ होनेवाले सभी शब्दों को अकारादि क्रम से दे चुकने के बाद मैं ध्वनियुक्त अंग्रेजी शब्दों को वर्णानुक्रम से रखना चाहिए । अंत में उस वर्ण से संयुक्त हुए व्यंजन सेस होने वाले शब्दों को भी अकारादि क्रम में रखना चाहिए । जैसे- ‘डौल‘ के बाद ‘डॉक्टर‘ लिखा चाहिए और उसके बाद ड्योढ़ा । क्ष, त्र, ज्ञ, संयुक्त व्यंजन हैं, जैसे-क्ष = क $ ष, त्र = त् $ र, ज्ञ = ज् $ ञ । क वर्ण से शुरू होने वाले शब्दों के अन्त में क्व से शुरू होने वाले शब्दों की समाप्ति के बाद क्ष अथवा उससे बने शब्दों के अकारादि क्रम से रखना चाहिए । इसी प्रकार त्य से शुरू होने वाले शब्दों की समाप्ति के बाद त्र, तथा ज से शुरू शब्दों की समाप्ति के बाद ज्ञ से आरंभ होने वाले शब्द होंगे।

हिन्दी शब्दकोशों में शब्दक्रम – सम्बन्धी दोष

हिन्दी कोशकारों द्वारा सरलीकरण की प्रवृत्ति के कारण अनेक गलतियाँ हुई हैं। पंचमाक्षरों- ड़्, ञ्, न, म्,-के स्थान पर अनुस्वार को स्थान दिया गया है । यो सरलता की दृष्टि से तो यह ठीक है, परन्तु इससे संबद्ध शब्द का वर्णविन्यास ही परिवर्तित हो जाता है । जैसे-लिखने के लिए अङ्क के अंक रूप में लिखें, फिर भी इसकी वर्तनी में ‘अ $ ँ $ क् $ अ’ वर्ण न होकर ‘अ $ ड़् $ क् $ अ‘ वर्ण ही होंगे । लेखन में अक के स्थान पर सरलता के लिए अंक लिखा जा सकता है, परन्तु कोश में शब्द का स्थान उसकी वास्तविक वर्तनी के आधार पर निर्धारित होना चाहिए।

ड़्, ञ्, न, म्, नासिक्य व्यंजनों के स्थान पर सर्वत्र अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया जा सकता है । यदि इन व्यंजनों के बाद न, म, य, व, ह में से कोई व्यंजन आये तो इनके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग नहीं कर सकता । जैसे-वाङ्मय, पुण्य, उन्हें, तुम्हें, अन्न, तन्मय, सन्मार्ग, मृण्मय, दिङ्मण्डल आदि शब्दों के क्रमशः वांमय, पुंय, उहे, अंन, तंमय, संमार्ग, मृंमय, दिमंडल रूपों में नहीं लिख सकते।

अनुस्वार का ही एक इस्वरूप है अर्ध-अनुस्वार जिसके लिए चंद्रबिंदु ( ँ) का चिह्न निर्धारित है । संस्कृत में चन्द्रबिन्दु का स्थान नहीं के बराबर है। परन्तु हिन्दी में इसका खूब प्रयोग होता है । कुछ लोग अर्धअनुस्वार ( ँ) के स्थान पर ( ं ) का प्रयोग करते हैं, परन्तु ऐसा करने से उच्चारण, वर्तनी एवं अर्थ को क्षति पहुँचती है । अर्ध अनुस्वार एक स्वतंत्र ध्वनि है । अतः अँगना को अंगना लिखने से अर्थभेद उपस्थित हो जाता है.–अँगना = आँगन, अंगना = स्त्री । ‘हिन्दी-शब्दसागर‘ में अनुस्वार वाले शब्दों के समाप्त होने के बाद अर्थअनुस्वार वाले शब्द शुरू किये गये हैं। ‘मानक- हिन्दी कोश‘ के अनुस्वार और अर्धअनुस्वार वाले शब्द साथ – साथ रखे गये हैं । वस्तुतः जिन शब्दों में केवल अनुस्वार और अर्ध-अनुस्वार का भेद है उनमें अर्धअनुस्वार वाला शब्द पहले और अनुस्वार वाला शब्द बाद में आता है, जैसे-अँगना के बाद अंगना लिखना चाहिए।

हिन्दी कोशों में एक और बड़ी गलती देखने को मिलती है । प्रायः इनमें बव का अंतर नहीं किया गया । बन-वन, बलि-वलि आदि दो-दो रूप अलग-अलग स्थानों पर मिलते हैं । यो संस्कृत की व ध्वनि हिन्दी में व उच्चारित होती है । लेकिन वर्तनी तो वास्तविक ही रखनी चाहिए। इससे शब्दों को ढूँढ़ने में आसानी होगी अर्थात व वर्ण के सभी शब्द एक ही स्थान पर मिल जायेंगे तथा ब वर्ण के दूसरे स्थान पर ।