भावार्थ किसे कहते है | भावार्थ की परिभाषा क्या होता है | भाव अर्थ को अंग्रेजी में क्या कहते है , meaning in english

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भावार्थ

भावार्थ संक्षिप्त एवं स्पष्ट होना चाहिए । उसका स्वरूप व्याख्या की तरह भी नहीं होना चाहिए। पर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि मूल अवतरण का अन्वयार्थ भी भावार्थ नहीं है । तात्पर्य यह है कि भावार्थ मूल अवतरण से छोटा होता है एवं उसकी शैली सामाजिक होती है। मूल अवतरण के मुख्य विचारों को सारगर्भित रूप में लिखना चाहिए । वस्तुतः भावार्थ संक्षिप्त होता है, मूल अवतरण का लगभग आधा । परन्तु यह संक्षेपण से भित्र है । भावार्थ लिखने के लिए निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए-

1. मूल अवतरण को कई बार पढ़ना चाहिए । उसके बाद मूल एवं गौण भावों और विचारों को रेखांकित करना चाहिए।

2. जो व्यर्थ के शब्द हैं उन्हें हटा देना चाहिए । साथ ही व्यर्थ के वर्णनों को भी हटा देना चाहिए।

3. अब रेखांकित वाक्यों एवं शब्दों को मिलाकर सार्थक वाक्य बना लेना चाहिए । रिक्तस्थानों को पूरा करने के लिए दूसरे शब्द भी लिये जा सकते हैं । इस बात पर ध्यान रहना चाहिए कि मूल विचार और भाव छूटने न पायें।

4. प्रत्येक वाक्य की लम्बी-चैड़ी व्याख्या अथवा टीका-टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है।

5. मूल अवतरण का कोई भी भाव या विचार छूटना नहीं चाहिए ।

6. भावार्थ की भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए । शब्दावली आलंकारिक नहीं होनी चाहिए।

7. भावार्थ को मूल अवतरण से बड़ा नहीं होना चाहिए । वस्तुतः व्याख्या में विस्तार से लिखा जाता है । व्याख्या में भावों एवं विचारों का विश्लेषण होता है, जबकि भावार्थ में उनका संकोच होता है।

उदाहरण के लिए नीचे एक अवतरण और उसका भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है-

कुछ लोगों में संपूर्णता तो दुनिया के किसी देश में किसी भी सभ्यता के अन्दर नहीं आयी, लेकिन यह तथ्य है कि भारतीय सभ्यता की प्रवृत्ति नैतिकता के विकास की ओर है, जबकि पश्चिमी सभ्यता अनैतिकता को प्रोत्साहन देती है और इसलिए मैंने उसे असभ्यता कहा है । पश्चिमी सभ्यता नास्तिक है, भारतीय सभ्यता आस्तिक । हिन्दुस्तान के हितैषियों को चाहिए कि इस बात को समझ कर उसी श्रद्धा के साथ भारतीय सभ्यता से चिपटे रहें जिस तरह बच्चा अपनी माँ की छाती से चिपका रहता है।

भावार्थ-भारतीय सभ्यता में आस्तिक प्रवृत्तियाँ हैं और पश्चिमी सभ्यता में नास्तिक प्रवृत्तियाँ। इसलिए भारतीय सभ्यता का रुख नैतिकता के विकास की ओर है, जबकि पश्चिमी सभ्यता अनैतिक आचरण को प्रश्रय देती है। अतः हम भारतीय लोगों को इस तथ्य को समझकर भारतीय सभ्यता से चिपका रहना चाहिए, क्योंकि इसी से भारत का हित संभव है ।