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protoplast in hindi in plant , प्रोटोप्लास्ट क्या होता है , परिभाषा किसे कहते हैं , Isolation of protoplast from prokaryotic cells

By   December 28, 2022

पढ़े protoplast in hindi in plant , प्रोटोप्लास्ट क्या होता है , परिभाषा किसे कहते हैं , Isolation of protoplast from prokaryotic cells ?

प्रोटोप्लास्ट (Protoplast )

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प्रोटोप्लास्ट शब्द (pro-toe-plast) से हमारा आशय वनस्पति जगत की उन कोशिकाओं से है जिनमें कोशिका कला (cell membrane) युक्त कोशिका पायी जाती है किन्तु सेल्यूलोज से बनी कोशिका भित्ति (cell-well) अनुपस्थित रहती है। (cell minus cell wall)। ये कोशिकाएं एक प्रकार से नग्न होती है जो वृद्धि, विभाजन तथा कोशिका भित्ति के पुनरुदभवन की क्रियाऐं करने में सक्षम होती है। इस प्रकार कोशिका भित्ति रहित होने के कारण ये प्राणी कोशिकाओं क समान होती है। वैज्ञानिकों ने प्रोटोप्लास्ट या कोशिका भित्ति रहित कोशिकाओं पर अनेक प्रयोग किये हैं एवं इन्हें संकरण (hybridization) कर नयी पादप जातियों के निर्माण, वांछित प्रकार के जीनी संरचना वाले पादप तथा कोशिका द्रव्यी अनुक्रियाएँ करा कर विशिष्ट लक्षणों वाली पादप प्रजातियों को विकसित किये जाने हेतु उपयोगी पाया है। संवर्धित प्रोटोप्लास्ट का उपयोग कायिक कोशिका संलयन, बाह्य डी. एन. ए. के निवेशन, कोशिकांगों जीवाणुओं एवं विषाणुओं के संलयन हेतु किया गया है। इससे अनुसंधान के नये क्षेत्र खुले हैं।

युनाइटेड किंगडम की नॉटिघंम विश्वविद्यालय के इ.सी. कोकिंग (E. C. Cocking) 1960 में प्रयोगों द्वारा प्रदर्शित किया कि कवक से प्राप्त सेल्यूलेज एन्जाइम (cellulase enzyme) की 0.6m सुक्रोज की सान्द्रता वाले विलयन में पादप मूल की कोशिकाओं से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त किया जा सकता है।

इसी दिशा में कार्य करते हुए काओ तथा मिचायलक ( Kao and Michayluk) 1974 ने बताया कि दो भिन्न कोशिकाओं के प्रोटोप्लास्ट को पॉली इथाईलीन ग्लाइकॉल (ploy ethylene glycol) अर्थात् PE6 में रखने पर इन कोशिकाओं में संलयन (fusion) की क्रिया संभव है जिसके दौरान दोनों भिन्न प्रकृति की कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में अनुक्रियाएं होती हैं। दोनों कोशिकाओं के डी.एन.ए. के मध्य अनुक्रिया होती है एवं दोनों के लक्षणों युक्त संलयित कोशिकाएं प्राप्त की जाती है। इनके संवर्धन से ऊत्तक एवं पूर्ण पादप प्राप्त किये जाते हैं। इस तकनीक से आलू व टमाटर के जीवद्रव्यों (protoplast) को संलयन करा कर पोमेटो (Pomato) पादप विकसित किया गया है जो जमीन के ऊपर टमाटर तथा जमीन के नीचे आलू उत्पन्न करता है। इसी प्रकार सूरजमूखी व सोयाबीन के प्रोटोप्लास्ट में संलयन करा कर सनबीम (sunbeam) नामक पादप प्राप्त किया गया है, यह दोनों पादपों के गुण रखता है ।

प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं से प्रोटोप्लास्ट का पृथक्करण (Isolation of protoplast from prokaryotic cells)

ग्रैम स्वीकारात्मक जीवाणुओं से प्रोटोप्लास्ट लाइसोजाइम एन्जाइम से उपचारित कर प्राप्त करते हैं जो चयनात्मक तौर पर कोशिका भित्ति को घोल देता है। एक अन्य विधि में जीवाणुओं को प्रतिजैविक, जैसे पेनेसिलीन युक्त माध्यम में संवर्धित किया जाता है जो जीवाणुओं की देह पर कोशिका भित्ति के निर्माण को रोकता है। इसके लिये संवर्धन माध्यम की सान्द्रता जीवाणुओं के जीवद्रव्य के समान ही रखी जाती है अन्यथा इनकी कोशिका झिल्ली फट सकती है। इस प्रकार प्राप्त प्रोटोप्लास्क कोमल, गोलाकार एवं शीघ्र ही बिखरने वाला पदार्थ होता है।

यूकैरियोटिक कोशिकाओं से प्रोटोप्लास्ट का पृथक्करण (Isolation of protoplast from eukaryotic cells)

पादपों के विभिन्न ऊत्तकों तना, जड़ व पत्तों के मीजोफिल ऊत्तकों से यांत्रिक अथवा किण्वकीय विधि से प्रोटोप्लास्ट का पृथक्करण किया जाता है। अधिकतर इसके लिये द्विबीज पत्री पादपों के मीजोफिल का चुनाव करते हैं। कभी-कभी तने की अक्षीय रचनाओं को निजर्मित माध्यम में संवर्धित कर भी प्राप्त किया जाता है। इसके लिये निलम्बित माध्यम में संवर्धित कोशिका संवर्धन विधि का उपयोग भी किया जाता है। किसी भी विधि से प्रोटोप्लास्ट का पृथक्करण किये जाने हेतु यह आवश्यक है कि प्राप्त प्रोटोप्लास्ट हानि रहित अवस्था में प्राप्त हो एवं इसे इसके उपरान्त उचित परासरणी दाब युक्त वातावरण में रखा जाता है जिससे यह स्थिर अवस्था में बना रहता है।

  • यांत्रिक विधि से प्रोटोप्लास्ट का पृथक्करण (Isolation of protoplast by mechanical method) :

इस विधि में जिस ऊत्तक से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त करना होता है उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर कोशिकाद्रव्य कुंचन अर्थात् प्लाज्मोलाइसिस हेतु उपचारित किया जाता है। इस क्रिया से कोशिकाओं का जीवद्रव्य कोशिका भित्ति तथा कोशिका कला से अलग होकर सिकुड़ जाता है। यह प्रोटोप्लास्ट कोशिका के केन्द्रीय भाग में उपस्थित रहता है। प्लास्मोलाइज्ड कोशिका के अन्तिम सिरों से भित्ति को हटा कर प्रोटोप्लास्ट प्राप्त किया जाता है। एक अन्य विधि में प्लाजमोलाइज्ड कोशिकाओं के निचले सिरे को काट उच्च परासरणी विलयन में रख देते हैं अत: प्रोटोप्लास्ट फूल कर बाहर निकल जाता है। यह विधि रिक्तिकाओं युक्त कोशिकाओं से (प्याज कन्द कलिकाओं, मूली की जड़ आदि) प्रोटोप्लास्ट पृथक किये जाने हेतु बेहतर है किन्तु विभज्योतक ऊत्तक (meristmatic tissue) एवं कम रिक्तिकाओं वाली कोशिकाओं से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त करने हेतु सुविधाजनक नहीं है। यह विधि पहले काम में लायी जाती थी। अब इसका प्रयोग सामान्यतः नहीं किया जाता । इस विधि की निम्नलिखित कमियाँ हैं-

  1. यह विधि कठिन एवं अधिक समय लेने वाली है।
  2. इस विधि से परिपक्व तथा विभज्योतक ऊत्तकों से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  3. इस विधि से कम मात्रा में प्रोटोप्लास्ट प्राप्त होता है।

(vii) एन्ज़ाइमेटिक विधि से प्रोटोप्लास्ट का पृथक्करण (Isolation of protoplast by enzymatic method): इस विधि से पादप की देह के किसी भी भाग से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त किया जा सकता है। यह विधि सरल है अतः प्रोटोप्लास्ट हानि रहित अवस्था में प्राप्त होता है। वैसे तो प्रोटोप्लास्ट पादप के किसी भी ऊत्तक से प्राप्त किया जा सकता है किन्तु सामान्यतः मीजोफिल कोशिकाओं को इस कार्य हेतु चुना जाता है। नव विकसित कोशिकाओं के निलम्बित भाग से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त करना अधिक सुगम रहता है।

  1. सर्वप्रथम स्वस्थ पौधों से परिपक्व पत्ते ( 7-8 सप्ताह पुराने) लेकर इन्हें डिटरजेन्ट युक्त शुद्ध जल से धोया जाता है। इस प्रकार इनसे चिपके मिट्टी के कण अलग हो जाते हैं। इन पत्तों को अब .4–0.5 सोडियम हाइपोक्लोराइट या 10 प्रतिशत कैल्शियम हाइपोक्लोराइट अथवा HgCh के विलयन में 15-20 मिनट तक रखते हैं। इस प्रकार इनका निजर्मीकरण (sterilization) किया जाता है। इसके बाद इन्हें पुनः आसुत जल से धोया जाता है। यह क्रिया अनेकों बार दोहरायी जाती है। इस प्रकार डिटर्जेन्ट व निजर्मीकरण कारक घुल जाते हैं व इनका परासरणी दाब पूर्व के समान ही बना रहता है।
  2. इन पत्तियाँ का तनुत्वक (cuticle) चिमटी की सहायता से पत्ती की निचली सतह (lower epidermis) से हटाया जाता है। इसके 4 cm के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये जाते हैं।
  3. इन टुकडों को 5.4 pH पर सेल्यूलोज व मेसेरोजाइम (cellulose and macerozyme) के 0.5% घोल 0.8 MD मेनीटोल तथा 0.3% पोटेशियम डेक्स्ट्रान युक्त विलयन में रखते हैं। प्रत्येक 30 मिनट के उपरान्त विलयन को बदला जाता है। इस प्रकार लगभग 3 घन्टे में इन टुकड़ों में स्थित कोशिकाओं की कोशिका भित्ति के लिपिड प्रोटीन, सेल्यूलोज, हेमीसेल्यूलोज व पेक्टिन टूट जाते हैं व कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य कुंचन (plasmolysis) हो जाता है।
  4. इसके पश्चात् इन पत्तों का 5.4 pH पर 0.5% पेक्टीनैज, 2% सेल्यूलेज एन्जाइम युक्त माध्यम में 12 घन्टे तक रखा जाता है ताकि कोशिका से कोशिका भित्ति के अंश घुल कर अलग हो जाये।
  5. इन पत्तों को दबा कर 45.4um के छिद्रयुक्त नायलान छलनी से छाना जाता है। इस प्रकार मुक्त हुये जीवद्रव्यक प्रोटोप्लास्ट, गोलाकार आकृति के प्राप्त हो जाते हैं।
  6. इस प्रकार छनित को 5 मिनट हेतु अपकेन्द्रित किया जाता है। पैदें में से प्रोटोप्लास्ट प्राप्त कर इसे 0.7m सारबिटाल (sorbitol) से धोया जाता है एवं इसे 20% सुक्रोज विलयन में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। प्रकाशित प्रोटोप्लास्ट का शुद्धिकरण दो विधियों से किया जाता है-

(i) इसका कम गति 50-100g 15m पर अपकेन्द्रण (centrifagation) कर के इसके ऊपर आयी कोशिका मृत अपशिष्ट को पिपेट से पृथक करते हैं। इसे पुनः मेनीटाल से धोया जाता है। यह क्रिया 2-3 बार दोहरायी जाती है।

(ii) प्रोटोप्लास्ट कम घनत्व के होते हैं अतः कोशिका मृत अपशिष्ट से इसे उतराने (floating) की विधि से पृथक करते हैं। कोशिका मृत अपशिष्ट नीचे तल पर बैठ जाता है एवं प्रोटोप्लास्ट कम घनत्व का होता है अत: इसे मेनीटल सोरबिटाल एवं सक्रोज ( 0.3-0.6M) के जेडिएन्ट बना कर अपकेन्द्रण द्वारा प्राप्त कर पिपेट से निस्पंद से पृथक कर लेते हैं। एक बार पुन: इस मिश्रण का अपकेन्द्रण किया जाता है एवं पिपेट द्वारा प्रोटोप्लास्ट को संवर्धन माध्यम में स्थानान्तरित कर जाता है। प्रोटोप्लास्ट की जीवन क्षमता (viability) का परीक्षण अनेक विधियों से किया जाता है। आजकल फ्लूओरेसिन डाइएसिटेट (fluorescein diacetate) FDA डाई का उपयोग कर किया जाता है। FDA डाई कोशिका कला में एकत्रित हो जाती है यह हरे श्वेत रंग का फ्लूरोसेन्स उत्पन्न करती है। FDA उपचार के 5-15 मिनट के अन्तराल पर यह परीक्षण किया जाता है ।

(iv) प्रोटोप्लास्ट संवर्धन (Culture of protoplasts) : प्रोटोप्लास्ट का संवर्धन एक आवश् क्रिया है जिसके द्वारा पृथक्कित प्रोटोप्लास्ट पुनः कोशिका भित्ति निर्माण अथवा विभाजन एवं वृद्धि की क्रियाएं करते हैं। इसके लिए पोषक माध्यम (nutrient medium) ठीक उसी प्रकार प्रयोग में लाया जाता है जैसा कि कोशिका संवर्धन में किन्तु यह माध्यम अनेक विशिष्टताओं युक्त होता है काओ एवं मिचिओलक (Kao and Michayluk) ने 1975 तथा काओ ने 1977 में विसिया बाजास्ताना (Vieia bajastana) के प्रोटोप्लास्ट संवर्धन हेतु जटिल माध्यम का उपयोग किया जिसमें सामान अकार्बनिक पदार्थों के अतिरिक्त 14 विटामिन ऑक्सिन तथा साइटोकाइनिन एवं अनेक कार्बनिक अम्ल 10 प्रकार की शर्करा एवं शर्कराएं एल्कोहल, 21 अमीनों अम्ल, 6 न्यूक्लिक अम्ल क्षारक,केसिन हाइड्रोसेट व नारियल जल उपस्थित था।

संवर्धन माध्यम हेतु परासरणी स्थिरिक ( osmotic statbilizers) एवं पादप वृद्धि पदार्थ उचित मात्रा में होने आवश्यक है। उचित परासरणी दाब हेतु मेनीटॉल, ग्लूकोज, सारबिटाल, सुक्रोज या ‘जाइलोज की उपस्थिति आवश्यक होती है वृद्धिकारी पदार्थों में संश्लेषणी आक्सिन 2,4-DNAA TAA व साइटोकाइनिन जैसे BA व काइनेटिन प्रमुख है।

प्रोटोप्लास्ट संवर्धन के पश्चात् कोशिका भित्ति का निर्माण होने लगता है। यह सूक्ष्मतन्तुओं द्वारा बनती है और वास्तविक कोशिका भित्ति में रूपान्तरित हो जाती है। इस दौरान प्रोटोप्लास्ट के आमाप में वृद्धि होती है। कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है। श्वसन की दर बढ़ जाती है। इससे सम्पूर्ण पादप का विकास ब्लास्टोजेनेसिस या एम्ब्रोजेनेसिस द्वारा होता है।

संवर्धन विधियाँ (Methods of culture)

(i) निलम्बन या बुन्दक संवर्धन (Suspension or droplet cultures) : प्रोटोप्लास्ट को एक तरल माध्यम (105 ml के घनत्व) वाले पेट्रीडिश या कोनिकल फ्लास्क में रखते हैं। बुन्दक तकनीक के अन्तर्गत 50ml बुन्दकों को प्लास्टिक की पेट्रीडिशेज में रखते हैं। इनमें प्रोटोप्लास्ट स्थानान्तरित कर दिया जाता है। पेट्रीडिशेज को पेराफिन से सील कर दिया जाता है जिससे जल का वाष्पन न हो एवं इन्हें 25°-30°C पर अंधेरे में ऊष्मायन (incubation) हेतु रख दिया जाता है।

(ii) प्लेटिंग विधि (Plating method) : तरल माध्यम में प्रोटाप्लास्ट का निलम्बन किया जाता है यह क्रिया पेट्रीडिश में तरल माध्यम व कोशिका संवर्धन हेतु एगार माध्यम में की जाती है। पेट्रीडिशेज को पेराफिन द्वारा सील कर 23°-25°C तापक्रम पर 1000-2000 lux प्रकाश में ऊष्मायित किया जाता है।

(iii) सूक्ष्म संवर्धन कक्ष (Micro culture chambers) : इस विधि में प्रोटोप्लास्ट को संवर्धन माध्यम में 30-50ml में प्लास्टिक के सूक्ष्म कक्ष या वलय युक्त स्लाइड पर रखा जाता है। इस वलय या कक्ष को कवर स्लिप द्वारा ढक दिया जाता है। इसके सबसे सरल प्रतिरूप में दो कवर स्लिप के बीच संवर्धन माध्यम एवं प्रोटोप्लास्ट को तेल की वलय के मध्य रखा जाता है। तेल की वलय या पेराफिन की पर्त वाष्पन को रोकने हेतु बनायी जाती है। इन कक्षों को 23°25°C पर ऊष्मायित किया जाता है।

(iv) हैगिंग ड्राप ऐरोतकनीक या बहुबुन्दक ऐरे तकनीक (Hanging drop array technique or multidrop or micro drop assay techinique MPA technique): प्रोटोप्लास्ट के प्रेक्षण के समय माध्यम का वाष्पीकरण न हो इसलिये हेगिंग ड्राप तकनीक काम में लायी जाती है। बुन्दक को स्लाइड में बने एक गर्त में रखा जाता है इसे कवर स्लिप व तेल की पर्त द्वारा ढ़क दिया जाता है।

बहुबुन्दक ऐरेतकनीक हैगिंग ड्राप तकनीक का परिष्कृत रूप है। इस क्रिया हेतु संवर्धन माध्यम की दो सान्द्रताएं A व B तैयार की जाती है। A व B माध्यमों की 10 तनु श्रृंखलाएं बनायी जाती है।

इस प्रकार 100 भिन्न सान्द्रताओं वाली श्रृंखलाएं प्राप्त होती है। इन सभी माध्यमों वाली पेट्रीडिश में प्रोटोप्लास्ट की 0.1 cm मात्रा डाली जाती है। प्रत्येक संयोजन हेतु 49 बूंद +4 बूँद नियन्त्रित बूँदे पेट्रीडिश के ढ़क्कन पर डाला जाता है। पेट्रीडिश पर सान्द्रता का लेबल लगा दिया जाता है। प्रत्येक पेट्रीडिश में 20ml संवर्धन माध्यम डाला जाता है। मैनीटाल की 20 cm 2 मात्रा पेट्रीडिश के आधार भाग में डालते हैं। ढक्कन उल्टी अवस्था में बूँद की स्थिति में पेट्रीडिश पर रखते हैं। प्लेट को रोधक बना दिया जाता है। इसे कुछ समय के लिये उष्मायित किया जाता है। प्रत्येक पेट्रीडि में माध्यम का सूक्ष्मदर्शी द्वारा अध्ययन किया जाता है तथा जिस माध्यम में वृद्धि सर्वाधिक होती . है, संवर्धन हेतु उसी का चयन किया जाता है।