पंथ किसे कहते हैं ? पंथ और संप्रदाय में अंतर क्या है अर्थ मतलब बताइए ? कितने है नाम लिखिए परिभाषा

By   September 30, 2021

पंथ और संप्रदाय में अंतर क्या है अर्थ मतलब बताइए ? पंथ किसे कहते हैं ? कितने है नाम लिखिए परिभाषा ?

पंथ
पंथ से तात्पर्य ऐसे संगठन हैं जिसका चुनाव व्यक्ति अपनी मर्जी से करता है और इसमें विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होते हैं। पंथ का जीवन काल अस्थिर और अस्थायी होता है। इसके सदस्यों में भी काफी विभिन्नता होती है। अलग-अलग धर्मों के लोग भी इसके अनुयायी हो सकते हैं। आमतौर पर पंथ एक स्वैच्छिक संगठन होता है जिसमें अनुशासन का कठोर बंधन नहीं होता है। इसके बावजूद इसका अपना एक मत और सुपरिभाषित अनुष्ठान होते हैं।
आधुनिक युग के दो प्रमुख पंथों का उल्लेख करने जा रहे हैं।
सत्यसाईं बाबा
सत्यसाईं बाबा पंथ का केंद्र व्यक्तित्व है, उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था और वे अपने को (उनके अनुयायी भी यह मानते हैं) महाराष्ट्र के शिरड़ी के साईं बाबा का अवतार मानते हैं। वे एक ऐसे अवतार के रूप में माने जाते हैं जिनमें शिव और शक्ति एक आत्मा में समाहित हो गई है। वे स्पष्ट शब्दों में बार-बार ईश्वरीय सत्ता का दावा करते हैं। सम्पूर्ण भारत में सत्यसाईं बाबा के अनुयायियों एवं भक्तों का काफी संख्या है। उनके अनुयायियों में शहरी, ग्रामीण हिंदू और मुसलमान सभी शामिल हैं।
उनके पंथ द्वारा कई प्रकार की सामाजिक सेवाएं की जाती हैं जैसे गरीबों को खाना खिलाना, बचाव कार्यों में अधिकारियों की मदद करनाए शिक्षा का विकास, बच्चों का विकास आदि।
इंटरनेशनल सोसाइटी फाॅर कृष्णा काॅन्शियसनेस (इस्कॅन)
हरे कृष्णा पंथ के नाम से लोकप्रिय यह आंदोलन ख्याति प्राप्त है। अंग्रेजी भाषी देशों जैसे इंग्लैण्ड, कनाडा, अमेरिका में इसका खूब प्रचार है। इस सोसाइटी की स्थापना ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने की थी। 1965 में आध्यात्मिक संदेश देने के लिए वे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका गए थे। न्यूयार्क, लाॅस एंजिल्स, बर्कले और माॅन्ट्रियल में लोग उनके अनुयायी बने। इस्काॅन का मुख्यालय लाॅस एंजिल्स में बना और इसके कई केंद्र स्थापित किए गए।
यह लोग केसरिया वस्त्र पहनते हैं और पुरुष अपना सिर मुडा कर रखते हैं। भगवान श्री कृष्ण का नाम लेना एक अनिवार्य अनुष्ठान है और इस पंथ के अनुयायी हरे रामा हरे कृष्णा का भजन गाते हैं। वे मूलतः पूजा की भक्ति पद्धति में विश्वास रखते हैं और इससे मोक्ष की कामना करते हैं।

सम्प्रदाय

समाजशास्त्र में सम्प्रदाय शब्द का प्रयोग एक विशेष प्रकार के धार्मिक समूह के लिए किया जाता है। यह इस अर्थ में धर्म से अलग है कि धर्म के भीतर रहकर भी यह उसका विरोधी है।
सम्प्रदाय से तात्पर्य स्वैच्छिक संघ है। जिसके अनुयायी सांसारिक जीवन से अलग-थलग रहते हैं। धर्म की सदस्यता जहां धर्म आधारित है वहीं सम्प्रदाय में शामिल होना एक स्वैच्छिक कार्य है। सम्प्रदायों का निर्माण किसी विशेष धार्मिक परम्परा के भीतर होता है। जीवन को देखने का इसका दृष्टिकोण पारिवारिक, आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक दृष्टि से अलग-अलग होता है।
इनमें से किसी भी या इनमें से सभी मुद्दों पर अलग दृष्टिकोण या मत रखने से अक्सर एक सम्प्रदाय का निर्माण होता है। लगभग सभी संप्रदाय कम से कम अपने आरंभिक चरण में प्रचलित धार्मिक परम्पराओं का विरोध करते हैं।
सम्प्रदायों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह होती है कि धीरे-धीरे वे औपचारिक धर्म का रूप लेने लगते हैं। आरंभ में हालांकि इसकी स्थापना सांसारिकता विरोध के लिए होती है परंतु कई सम्प्रदाय समाज से तालमेल स्थापित कर लेते हैं और उससे अलग-थलग नहीं रह पाते।
मूलतः सम्प्रदायों का निर्माण एक बंधे हुए समूह के रूप में हुआ था और कई तरीकों और अनुष्ठान से वे अपनी पहचान बना, रखने का प्रयत्न करते रहे हैं। वे अपने सम्प्रदाय के भीतर ही विवाह करते हैं। सामाजिक अवसरों पर भागीदारी को भी नियंत्रित करते हैं और कहीं-कहीं तो सैनिक सेवा करने का भी प्रावधान है। इसके अतिरिक्त खान-पान के तौर-तरीकों से भी एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से अपनी अलग पहचान बना, रखने का प्रयत्न करता है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि सम्प्रदायों का निर्माण अपनी धार्मिक परम्पराओं का विरोध करने के लिए हुआ था। उन्होंने संसार के प्रति अपना आक्रोश प्रकट किया। यह आक्रोश कहीं उग्र रहा तो कहीं शांत। समान विचार के लोगों ने अपनी इच्छानुसार सम्प्रदाय बना, और उसमें शामिल हुए। समय के साथ-साथ कई सम्प्रदाय धर्मों में परिवर्तित होने लगे परंतु सभी सम्प्रदायों के साथ ऐसा नहीं हुआ।
हिन्दू सम्प्रद्रदाय
हिन्दू धर्म में सबसे अधिक सम्प्रदाय और उपसम्प्रदाय हैं हिंदुओं में शिव, विष्णु और मातृदेवी जिसकी पूजा दुग्र, काली और अन्य रूपों में की जाती है, महत्वपूर्ण देवी देवता हैं। अधिकतर पंथों संप्रदायों, उपसम्प्रदायों का उद्गम इन्हीं तीनों से हुआ है। इन पंथों में शिव और पार्वती के सम्प्रदाय सबसे प्राचीन है जबकि कृष्ण पंथ अपेक्षाकृत नया है।
वैष्णव सम्प्रदायः इस सम्प्रदाय के लोग विष्णु को कृष्ण या राम के रूप् में पूजते हैं। इसके प्रमुख सम्प्रदाय और उपसम्प्रदाय इस प्रकार हैं।
श्री सम्प्रदायः इस सम्प्रदाय की स्थापना दक्षिण भारत के भारतीय दर्शन के महान विद्वान रामानुज ने किया था। यह सम्प्रदाय दक्षिण भारत में काफी लोकप्रिय है। वे अपने ललाट पर खास प्रकार का टीका लगाते हैं।
बल्लभाचार्य और चैतन्य के सम्प्रदायः ये दोनों सम्प्रदाय काफी लोकप्रिय थे। बल्लभाचार्य सम्प्रदाय की स्थापना एक तेलुगु ब्राह्मण बल्लभ ने की थी। उन्होंने अपने शिष्यों को सांसारिक सुखों को त्यागने से मना किया। उन्होंने उपवासों और आत्म दमन का विरोध किया। उनके गुरु भी सुख का जीवन व्यतीत करते थे। चैतन्य के अनुयायी साधारण और विगीत जीवन व्यतीत करते थे। ईश्वर की अराधाना के लिए भक्ति संगीत गाते थे और नृत्य करते थे।
रामानंदीः रामानंद इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। रामानंदी मुख्य रूप से उत्तर भारत के गांगेय क्षेत्र में फैले हुए हैं। इस सम्प्रदाय के लोग मुख्य रूप से विष्णु के अवतार राम की अराधाना करते हैं। सभी जातियों के लोग इस सम्प्रदाय में शामिल हैं। इस सम्प्रदाय के शिष्यों में से कई निम्न जाति के थे। रामानंद के शिष्यों ने कई उपसम्प्रदाय विकसित किए। उनके प्रमुख शिष्य, कबीर और दादू के नाम पर क्रमशः कबीर पंथ, और दादू पंथ नामक सम्प्रदाय चलाए।
इसके अतिरिक्त वैष्णव सम्प्रदाय के प्रमुख सम्प्रदाय और उपसम्प्रदाय निम्नलिखित है
मलूक दासी, राय दासी, मीरा बाई सम्प्रदाय, माधवा चारी, चैतन्य सम्प्रदाय, चरन दासी साधना पंथी, राधा बल्लभी इत्यादि।
शैव सम्प्रदाय
दशनामी सम्प्रदायः आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने शैव धर्म को नया रूप प्रदान किया। उन्होंने दशनामी सम्प्रदाय के नाम से एक महत्वपूर्ण सम्प्रदाय की स्थापना की। दशनामियों को वैदिक शैव भी कहा जाता है। दशनामी सम्प्रदाय की स्थापना के पहले शैव सम्प्रदाय में कनफटा, अघोरी, कालमुखी और कापालिकों जैसे तांत्रिक शैवों का वर्चस्व था।
इस संगठन में निम्नलिखित दस कोटियों के सन्यासी शामिल थे। (प) गिरि (पप) पुरी (पपप) भारती (पअ) वन (अ) पार्वती (अप) अरण्य (अपप) सागर (अपपप) तीर्थ (पग) आक्षम (ग) सरस्वती। शंकराचार्य ने उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम में क्रमशः ज्योति पीठ, शृंगेरी पीठ, गोवर्धन पीठ और द्वारका या शारदा पीठ की स्थापना की। दशनामी सन्यासी मुख्य रूप से दंडधारियों (जिसमें कर्मचारी शामिल होते थे) और परमहंसों (जिनमें कर्मचारी नहीं शामिल होते थे) में विभक्त है। दशनामी सम्प्रदाय के 10 उपसम्प्रदायों में से तीर्थ, आश्रम और सरस्वती के सन्यासियों को ही कर्मचारी रखने का अधिकार था और परमहंस कहे जागे वाले सन्यासियों को यह अनुमति प्राप्त नहीं थी।
दशनामी संन्यासी भी दो प्रमुख भागों अस्त्रधारी (हथियार रखने वाले) और शास्त्रधारी (धर्म ग्रंथ रखने वाले) में विभक्त हैं। अस्त्रधारी लड़ाकू संन्यासी और शास्त्रधारी विद्वान संन्यासी होते हैं। पहले प्रकार के संन्यासियों को नागर संन्यासी भी कहा जाता है जिन्हें अखाड़ों के माध्यम से संगठित किया जाता है। दशनामी अखाड़े के सात प्रकार हैं महानिर्वाणी अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, जन या भैरव अखाड़ा, आवाहन अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, निर्वाणी अखाड़ा।
कनफटा या नाथ पंथीः यह सम्प्रदाय तांत्रिक शैव धर्म का ही हिस्सा है। कनफटे अपने कान में छेद करके उसमें बाली पहनते थे। इस सम्प्रदाय के पुनः संगठनकर्ता के रूप में गोरखनाथ का नाम आता है। ऐसा माना जाता है कि इस सम्प्रदाय की स्थापना सतीनाथ ने की थी। कनफटे शिव को सर्वोच्च यथार्थ के रूप में स्वीकार करते थे। शिव में समाहित होकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। नाथ सम्प्रदाय में नाथ योग और तंत्र को मोक्ष का सर्वथा उपयुक्त साधन माना गया है।
अघोरी पंथः इस सम्प्रदाय को अघोर पंथ या अवघड़ पंथ के रूप में जागा जाता है और इसके अनुयायियों को अघोरी या अवघड़ कहा जाता है। इस सम्प्रदाय की स्थापना गोरखनाथ के एक शिष्य ब्रह्मगिरि ने की थी। इस सम्प्रदाय का नाम अघोर शब्द से बना है जो विशेष तौर पर कभी न डरने वाले शिव के लिए प्रयुक्त होता है। इससे स्पष्ट है कि अघोर पंथी का अर्थ शिव की अराधना करने वाले संन्यासियों से है। अघोरी अपने सारे शरीर पर शमशान की राख मले रहते हैं। वे विशिष्ट चिन्ह धारण करते हैं जो हिंदू त्रिपदी की एकता का प्रतीक है।
वीर शैव या लिंगायत सम्प्रदायः लिंगायत मुख्य रूप से दक्षिण भारत में पाए जाते हैं। इस सम्प्रदाय का नाम लिंग शब्द से बना है। एक पक्का लिंगायत अपने शरीर पर चांदी की छोटी सी मंजूषा पहनता है जिसमें पत्थर का लिंग रखा होता है। यह उसकी आस्था का प्रतीक होता है। जिसके खोने का अर्थ होता है आध्यात्मिक मृत्यु।
इस सम्प्रदायों में लिंगायत या वीर शैव शिव को अपना आराध्य मानते हैं और उनका प्रतीक लिंग धारण करते हैं। लिंगायत सम्प्रदाय की शुरुआत 12वीं शताब्दी में हुई थी। लिंगायतों का सबसे महत्वपूर्ण आयोजन अष्ट वर्ण है जिसमें आठ अनुष्ठान शामिल हैंः गुरु, लिंग, विभूति, रुद्राक्ष, मंत्र, जंगम, तीर्थ और प्रसाद। लिंगायतों को मांस या मदिरा छूने की अनुमति नहीं है।
कापालिक पंथः हालांकि यह सम्प्रदाय लगभग समाप्त हो चुका है लेकिन प्राचीन भारत में यह व्यापक तौर पर फैला हुआ था। कापालिक तांत्रिक होते हैं। वह नदियों के किनारे निर्वस्त्र रहते हैं। वे मनुष्य के मृत शरीर को खाते हैं। वे बिना किसी संकोच या हिचक के मांस या मदिरा का सेवन करते हैं। इनके आराध्य देव काल भैरव हैं।
शाक्त सम्प्रदायः शाक्त योग दर्शन में शक्ति (नारी शक्ति) को सर्वोच्च सत्ता माना गया है। शिव चित है और शक्ति छिद्रपनी (शुद्ध चेतना) है। शक्ति के आदेश का पालन करते हुए ब्रह्म, विष्णु और शिव सर्जन, संरक्षण और संहार का कार्य करते हैं। वह ईश्वर की लीला में हिस्सा लेती है, वह सार्वभौम माता है। दुग्र, काली, भगवती चामुंडी त्रिपुरा सुंदरी, राज राजेश्वरी पार्वती, सीता, राधा आदि उन्हीं के रूप हैं। शक्ति एक शुद्ध चेतना है। शक्ति में तीन गुण होते हैंः सत्य, रजक और तमस। शक्ति या देवी माता की पूजा करने वाला भक्त शाक्त कहलाता है। शाक्त निम्नलिखित तीन समूहों में विभक्त हैं।
(i) दक्षिणचारीः ये सांसारिकता से बिल्कुल मुक्त होते हैं और देवी.देवताओं को रक्त की बलि नहीं चढ़ाते।
(ii) बामचारीः ये तांत्रिकों के उपदेशों का पालन करते हैं और अपने देवी.देवताओं को खून की बलि चढ़ाते हैं।
(iii) कवलिकः ये कौल उपनिषद का पालन करते हैं। ये मां जगदम्बा जो सर्वोच्च प्राकृतिक शक्ति हैं की पूजा करते हैं।
सिक्ख सम्प्रद्रदाय
सिक्ख धर्म में सम्प्रदायों का उदय ज्यादातर धार्मिक सुधारों और आंदोलनों के रूप में हुआ है। इनमें से कई सम्प्रदायों में हिंदू और सिक्ख दोनों इसके अनुयायी हैं। निरंकारी व्यास के राधास्वामी और नामधारी कुछ प्रमुख सम्प्रदाय हैं।
राधास्वामी सम्प्रदाय की स्थापना आगरा के एक हिंदू शिवदयाल ने की थी। उन्होंने हिंदू और सिक्ख दोनों धर्मों के सिद्धांतों का समावेश किया। यह सिक्ख धर्म से भिन्न है कि ये जीवित गुरुओं की परंपरा में विश्वास रखते हैं। यह सम्प्रदाय कई उपसम्प्रदायों में विभक्त हो गया जैसे दयालबाग (आगरा) और व्यास (पंजाब के राधास्वामी) इनके अपने अलग-अलग धार्मिक स्थल हैं। इन्होंने सिक्खों के आदि ग्रंथों से काफी कुछ ग्रहण किया है।
नामधारी सम्प्रदाय की स्थापना उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश के हजारो गांव के बालक सिंह ने की थी। उन्होंने अलग प्रकार की पूजा पद्धति और परिधान अपनाया। इस सम्प्रदाय के अनुयायी मंत्रोचार करते हैं और धार्मिक सभाओं में उत्तेजना की स्थिति से गुजरते हुए उन्माद की स्थिति तक पहुंच जाते हैं और जोर-जोर से चिल्लाते हैं। इसलिए इन्हें कूका के नाम से जागा जाता है।