नैतिकता और नीतिशास्त्र में क्या अंतर है ? नैतिकता, नैतिक मूल्य और नीतिशास्त्र किसे कहते है परिभाषा

By   September 6, 2021

नैतिकता, नैतिक मूल्य और नीतिशास्त्र किसे कहते है परिभाषा नैतिकता और नीतिशास्त्र में क्या अंतर है ?
नैतिकता बनाम नीतिशास्त्र
नैतिकता और नीतिशास्त्र आमतौर पर एक जैसे ही प्रतीत होते हैं अर्थात् हम इनमें कोई अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते। परन्तु इन दोनों पदों के गहन विश्लेषण से इनके बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है। यद्यपि कि यह अंतर सूक्ष्म है परन्तु इसे समझ पाना कठिन नहीं। अगर कोई व्यक्ति ‘नैतिक‘ है तो इससे यह जान पड़ता है कि वह सही है या गलत। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति का व्यवहार कैसा होना चाहिए- इस बात में विश्वास करने वाला व्यक्ति श्नैतिकश् कहलाने का हकदार है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि नैतिकता आचरण का मापदण्ड है। यह ऐसा मापदण्ड है जिसे सही और उचित मानकर स्वीकार किया जाता है। इसका संबंध व्यक्ति की अंतरू अनुभूति से है। यह किसी नियम या सिद्धान्त का मोहताज नहीं। जहां तक नीतिशास्त्र का प्रश्न है, तो यह कुछ आदर्श नियम या सिद्धान्त प्रस्तुत करता है तथा व्यक्ति और समाज से यह उम्मीद की जाती है कि वे इनका पालन करें। इसका अर्थ यह है कि नीतिशास्त्र समाज विजयक है जो कुछ आदी व सिद्धान्तों के सहारे समाज का नियमन व निर्देशन करता है। नैतिकता का संबंध मानव के व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक पक्ष से है जहाँ उचित-अनुचित पर विचार किया जाता है। नैतिकता जहाँ व्यक्ति के चारित्रिक पक्ष को दर्शाता है वहीं नीतिशास्त्र का केन्द्रबिन्दु सामाजिक व्यवस्था है जहाँ नैतिकता का वास्तविक परीक्षण होता है।

नैतिकता, नैतिक मूल्य और नीतिशास्त्र
नीतिशास्त्र को नैतिकता के पूर्व आदेश या मानक के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। यह किसी व्यवसाय या समूह के लोगों का परिस्थिति विशेष में उचित मार्गदर्शन करता है। निर्णयन (निर्णय लेने की प्रक्रिया) एक ज्ञानात्मक प्रक्रिया है और इसी प्रक्रिया में नीतिशास्त्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसके अंतर्गत प्रतिपादित किए गए नैतिक आदर्श तार्किक व बौद्धिक मानकों पर आधारित होते हैं।
नैतिक मूल्यों का संबंध उन विचारों से हैं जिनका हम सम्मान करते हैं अर्थात् जो वांछनीय हैं क्योंकि मानव जीवन में उनकी महत्ता है। किसी वस्तु या विचार को मूल्यवान कहने का अर्थ यह है कि वह वांछनीय है और वह वांछनीय इसलिए है क्योंकि उसकी महत्ता है और उसकी महत्ता इस तथ्य में है कि वह हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास में सहायक है अर्थात् उसके द्वारा हमें आत्मसिद्धि की प्राप्ति होती है।
नैतिकता आचरण के मापदंड हैं जिन्हें व्यक्ति पर आरोपित किया जाता है। इसकी सहायता से दूसरों के साथ तालमेल बिठाने में हमें मदद मिलती है अर्थात् परस्पर संबंधों को प्रोत्साहन मिलता है जिनसे ये संबंध और मजबूत बनते है।