धर्मसुधार आंदोलन क्या है | धर्म सुधार आंदोलन से आप क्या समझते हैं इसके कारणों का उल्लेख कीजिए

By   December 14, 2021

Religious Reform Movements in hindi धर्मसुधार आंदोलन क्या है | धर्म सुधार आंदोलन से आप क्या समझते हैं इसके कारणों का उल्लेख कीजिए ?
धर्मसुधार आंदोलन (Religious Reform Movements)
धर्मसुधार आंदोलन से अभिप्राय कैथोलिक ईसाई धर्म में व्याप्त अंधविश्वासी एवं रूढ़िवादिता के विरुद्ध उस आंदोलन से है जो पुनर्जागरण के उत्तरवर्ती काल में ईसाई जगत में हुआ था। यह आंदोलन धर्म के साथ-साथ तत्कालीन राजनीति एवं सामाजिक व्यवस्था से भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था। इस आदोलन के फलस्वरूप ईसाई धर्म में विभाजन हो गया-प्रोटेस्टेंट धर्म एवं कैथोलिक धर्म। विभिन्न यूरोपीय देशों ने रोमन कैथोलिक चर्च से संबंध तोड़ लिए एवं वहाँ पृथक चर्च की स्थापना हुई, जिसे आमतौर पर प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन के नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, कैथोलिक धर्म में सुधार की आवश्यकता को महसूस कर विभिन्न कारगर कदम भी उठाए गए और इस रूप में यह आंदोलन कैथोलिक धर्म सुधार आंदोलन या प्रति धर्म सुधार आंदोलन के नाम से भी लोकप्रिय हुआ।

आंदोलन की पृष्ठभूमि (Background of Movement)
मध्य काल में सामंतवाद एवं चर्च नामक दो समानांतर एवं संबद्ध सत्ता का प्राधान्य था। ईसाई कैथोलिक चर्च रोम के पोप को अगुवाई में एक व्यवस्थित श्रेणीबद्ध संगठन के रूप में परिवर्तित हो गई थी, जिसे आमतौर पर ‘पोप के राजतंत्र‘ के नाम से जाना जाता था। यह एक ऐसी प्रभुसत्ता संपन्न स्थिति का द्योतक था. जो संपूर्ण ईसाई जगत में सामाजिक एवं धार्मिक सर्वेसर्वा का दावा करता था। चर्च में पोप का स्थान सबसे ऊँचा था जिसे पृथ्वी पर ईसा मसीह का प्रतिनिधि माना जाता था। रोम स्थित पोप संपूर्ण ईसाई जगत का प्रमुख होता था। पोप के अधीन ईसाई जगत के चर्च एवं धार्मिक सत्ता से जुड़े सभी पक्ष एक ऐसी बोझिल एवं उबाऊ परिस्थिति को बढ़ावा दे रहे थे. जिससे जनमानस में विद्रोह की अग्नि प्रज्जवलित होने लगी थी। व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक की अवधि को विभिन्न धार्मिक रीति-रिवाजों से आबद्ध कर दिया गया था। ऐसी व्यवस्था जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष में कम से कम एक बार मौखिक रूप से अपने पाप को स्वीकार करना पड़ता था तथा तदनुसार दंड का भागी बनना बाध्यकारी था। इस व्यवस्था की अवहेलना करना धर्म एवं समाज से बहिष्कृत होना था। यह एक ऐसी युक्ति थी जिससे जनमानस धार्मिक आडंबर की आड़ में दबे जा रहे थे। इस संदर्भ में एक घृणित बात और भी थी जो आमतौर पर ‘संस्कार‘ के नाम से जानी जाती थी, जिसके अंतर्गत मुख्यतः तीन संस्कार की व्यवस्था थी-नाम-संस्कार, पाप स्वीकार-संस्कार एवं परम प्रसाद-संस्कार। धार्मिक आडंबर का एक और भी महत्वपूर्ण पहलू था- जादू-टोने और अलौकिक सत्ता में आस्था वाली सड़न व्यवस्था का प्रचलन।
चर्च जैसी धार्मिक संस्था में विभिन्न पदों पर आसीन पारियों अथवा धर्माधिकारियों में अनैतिकता का बोलबाला था। विभिन्न धार्मिक पदों को विक्री होती थी तथा नव पदासीन व्यक्ति अच्छी आमदनी के विभिन्न तरीके अपनाते थे। विभिन्न संस्कारों जैसे पाप स्वीकार संस्कार एवं मृत्यु प्रमाणपत्र बेचे जाने के एवज में अच्छी कमाई होती थी। इसके अतिरिक्त चर्च द्वारा नियत धर्मानुसार आचरण न करने पर व्यक्ति की संपत्ति जब्त कर लो जाती थी तथा धार्मिक मान्यताओं का विरोध किए जाने पर धर्म विरोधियों को खूँटों से बांधकर जिंदा जला दिया जाता था। वास्तव में मृत्यु प्रमाणपत्र का मुद्दा एक ऐसे संवेदीशील मुद्दे के रूप में मुखरित हुआ कि यह प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार आंदोलन के रूप में भड़क उठा।

प्रोटेस्टेंट आंदोलन (Protestant Movement)
1517 ई. में मार्टिन लूथर जो जर्मनी के विटेनबर्ग स्थित सेंट अगस्तीन के साधु थे, ने प्रचलित दंडामोचन पत्रों के विरुद्ध खुले आम विद्रोह कर दिया और विटेनवर्ग के चर्च के गेट पर 95 कथनों से युक्त लेख को टांग दिया। यह एक ऐसा संवेदनशील धार्मिक मामला था जिसने संपूर्ण ईसाई जगत में तहलका मचा दिया।
लूथर को धर्म से बहिष्कृत कर दिया गया परन्तुं जर्मनी के कई शासकों द्वारा लूथर के इस कदम का समर्थन किया गया। लूथर द्वारा कैथोलिक चर्च के तत्कालोक सभी मापदंड को अस्वीकार कर जर्मनी में एक स्वतंत्र जर्मन चर्च को स्थापना की गई। इस नवीन चर्च में जर्मन भाषा का प्रयोग किया गया, मठों की व्यवस्था समाप्त हुई एवं पादरियों को दैवी अधिकारों से वंचित होना पड़ा।
वस्तुतः धर्म को लेकर धर्मसुधार आंदोलन का सूत्रपात तो हुआ परन्तु इसके पीछे राजनीतिक एवं आर्थिक तत्त्वों को भी महती भूमिका रही। पुनर्जागरण के क्रम में यूरोप में राष्ट्रीय चेतना पर आधारित राष्ट्रीय राज्यों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार हुई। फलतः मध्यकालीन सामंती व्यवस्था एवं चर्च के विरुद्ध तत्कालीन राष्ट्रीय राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का संघर्ष हुआ। शासकों द्वारा अपनी राज्य सीमाओं के अंतर्गत पूर्ण शक्ति संपन्न प्रभुसत्ता का दावा किया गया तथा इस राजनीतिक सीमाओं के अंतर्गत राज्यों के चर्च तथा पुरोहित वर्गाे पर मजबूत नियंत्रण स्थापित करने प्रयास किया गया। चर्च तथा उससे जुड़े व्यक्तियों के पास अकूत संपत्ति का संचय था, जिसे हड़पकर राजाओं द्वारा राजनीतिक शक्ति को और बेहतर तरीके से संचालित किया जा सकता था और इसमें सबसे बड़ी बात थी कि इसकी आवश्यकता अनिवार्य रूप से महसूस की जा रही थी। इतना ही नहीं, चर्च को यह असीमित संपत्ति कर मुक्त थी तथा कर का मुख्य भार व्यापारिक वर्ग एवं नवपूंजीपति वर्ग पर ही था। अतः स्वाभाविक रूप से राजी एवं व्यापारी वर्ग, सामंत एवं चर्च के प्रबल विरोधी के रूप में उभरे। अतः धर्मसुधार आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू उसका तत्कालीन राजनीतिक एवं आर्थिक पक्ष भी था, जिसने इस आंदोलन में उत्प्रेरक का काम किया।
जर्मनी में लूथर के नेतृत्व में सफल प्रोटेस्टेंट आंदोलन से प्रेरित होकर विपिन देशों में चर्च को तत्कालीन संता के विरुद्ध तीव्र विद्रोह प्रारंभ हो गए, जिसको समय एवं स्थान के अनुरूप अपनी खास विशिष्टताएं भी थी। इस दृष्टि से स्विट्जरलैंड में ज्विंगली एवं काल्विन के नेतृत्व में प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आंदोलन हुआ जिसे वहाँ व्यापक समर्थन मिला। इसके अतिरिक्त इंग्लैंड एवं अमेरिका में प्यूरिटन, फ्रांस में ह्यूगेनॉट प्रोटेस्टेंट आंदोलन संपन्न हुए। इस समय डेनमार्क, स्वीडन एवं नावे जैसे स्केंडेनेवियन देशों में लूथर के विचारों को जबर्दस्त समर्थन मिला तथा राजकीय चर्च के रूप में प्रोटेस्टेंट लूथरीय चर्च की स्थापना हुई। वस्तुतः विभिन्न देशों ने कुछ विशिष्ट कारणों से तत्कालीन प्रोटेस्टेंट आंदोलन को तीव्र किया। उदाहरण के रूप में इंगलैंड में तलाक, विषयों पर तत्कालीन राजा हेनरी अष्टम एवं पोप में विवाद हो गया और हेनरी द्वारा खुद को चर्च का प्रमुख घोषित किया गया। अंततः कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट के मध्य यह विवाद इंगलैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के प्रयासों से समाप्त हुआ जब वहाँ राजकीय चर्च के रूप में इंगलैंड के चर्च की स्थापना की गई।

कैथोलिक धर्मसुधार (Catholic Religious Reform)
बदलते परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यकता महसूस की गई कि कैथोलिक चर्च में भी आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए। इसी आवश्यकता के अनुरूप स्पेन में जहाँ प्रोटेस्टेंट की स्थिति काफी कमजोर थी, वहाँ ‘जेसुइट‘ नामक पुजारियों का एक संगठन कैथोलिक संघ के रूप में अस्तित्व में आया। जेसुइट संघ द्वारा कैथोलिक चर्च में सुधार के हर संभव प्रयास किए, गए तथा इस चर्च को मजबूत करने हेतु विभिन्न देशों में जेसुइट विद्यालय की स्थापना की गई।
धर्म सुधार आंदोलन के कुछरूसह उत्पादक तत्त्व भी प्रकाश में आए, जैसे धर्म के नाम पर प्रोटेस्टेंट-कैथोलिक संघर्ष जे आंतरिक कलह एवं युद्धों को बढ़ावा दिया। इस रूप में 1560-1630 ई. में डाइनों का सफाया किया गया जिसकी आड़ में कई बेकसूर स्त्रियों पर डाइन होने का आरोप लगाकर उसे जिंदा जला दिया गया। फ्रांस में सोलहवीं शताब्दी में आठ धार्मिक युद्ध हुए। धार्मिक उत्पीड़न से तंग आकर इंग्लैंड के प्यूरिटन उत्तरी अमेरिका में जा बसे तथा वहाँ एक विकसित सभ्यता के विकास में योगदान दिए। इतना ही नहीं इंग्लैंड में राजसत्ता तथा चर्च के विरुद्ध 1642 में होने वाले गृहयुद्ध में प्यूरिटन (नव मध्यम वर्ग) के समर्थन से संसद की सर्वाेच्चता स्थापित हुई और राजा चाल्र्स प्रथम की हत्या कर दी गई।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि धर्मसुधार आंदोलन इसाई धर्म में व्याप्त विभिन्न कुरितियों के विरुद्ध सुधार के मुद्दे पर शुरू हुए परन्तु शीघ्र ही इसका स्वरूप राजनीतिक एवं आर्थिक तत्त्वों द्वारा निर्धारित होने लगा। अतः धर्मसुधार आंदोलन का दायरा काफी विस्तृत था। इसने पुनर्जागरण के उत्तरवतः काल अर्थात् सोलहवीं शताब्दी के अंतिम समय में तत्कालीन नवोदित निरंकुश राजतंत्र को मजबूत आधार प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रबोधन (Enlightenment)
17वीं-18वीं शताब्दी में होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तनों के फलस्वरूप यूरोप में वैज्ञानिक चेतना तक, विवेक, मानवतावादी दृष्टिकोण एवं अन्वेषण को नवीन प्रवृत्ति न परिपक्व अवस्था को प्राप्त किया और यही परिपक्व अवस्था प्रबोधन के नाम से जानी जाती है। यह एक बौद्धिक क्रांति थी. जिसका आधार पुनर्जागरण, धर्मसुधार आंदोलन एवं वाणिज्यिक क्रांति ने तैयार किया था। प्रबोधन रूपी ज्ञानोदय को इस स्थिति ने अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पश्चिमी दुनिया में हुए विभिन्न क्रांतिकारी घटनाओं जैसे- अमेरिकी क्रांति. फ्रांसीसी क्रांति एवं नेपोलियन बोनापार्ट के सैनिक अभियान, जिसका दुनिया पर व्यापक असर पड़ा, को प्रेरित किया। प्रबोधनकालीन चिंतकों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भौतिक दुनिया एवं प्रकृति में होने वाली घटनाओं के पीछे किसी न किसी व्यवस्थित अपरिवर्तनशील, शाश्वत एवं प्राकृतिक नियम का हाथ है। अगर हम ये कहें कि प्रबोधन अथवा ज्ञानोदय केपलर, गैलिलियो एवं न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों के आविष्कारों के कारण संभव हो सका तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
प्रबोधन की प्रमुख विशेषताएँ (Major Characteristics of the Enlightenment)
(प) अनुभूतिमूलक ज्ञान- इसके अंतर्गत. ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव होने वाले ज्ञान ही हमारे ज्ञान का वास्तविक स्रोत है। इस संबंध में
जन्मजात विचार एवं ईश्वरीय सत्य नाप की कोई चीज नहीं हैै।
(पप) ज्ञान-विज्ञान में अंर्तवैयक्तिक संबंध- प्रबोधन युग में मुख्यतः ज्ञान का प्राकृतिक विज्ञान के साथ अंतःसंबंध स्थापित हुआ। प्रबोधन
चिंतकों द्वारा सत्य तक पहुँचने का सक्षम आधार पर्यवेक्षण, प्रयोग एवं आलोचनात्मक छानबीन को व्यवस्थित पद्धति को स्वीकार किया गया। यह स्वीकार किया गया कि ज्ञान, प्रयोग एवं परीक्षण योग्य होनी चाहिए। इसी धारणा पर प्रबोधन युग में पराभौतिक अनुमान एवं ज्ञान में अंतर किया गया। वस्तुतः मध्यकाल में ईसाईमत का प्रभाव इसलिए स्वीकार किया जाता था क्योंकि यह माना जाता था कि ईश्वरकृत इस दुनिया को जान पाना मनुष्य के वश की बात नहीं है। परन्तु, प्रबोधन काल में विकसित जान ने इस दृष्टिकोण को अस्वीकार कर दिया एवं यह दावा किया कि जिन चीजों को बुद्धि के प्रयोग एवं व्यवस्थित पर्यवेक्षण से नहीं जाना जा सकता है वे मायावी हैं। मानव बह्माण्ड के रहस्यों को पूर्णरूपेण समझने में सामथ्र्यवान है। प्रकृति के बारे में रूढ़िवादी एवं धार्मिक पवित्र पुस्तकों के माध्यम से नहीं बल्कि प्रयोगों एवं परीक्षणों के माध्यम से ही समझा जा सकता है।
(पपप) कार्य-कारण संबंध का अध्ययन- प्रबोधनकालीन चिन्तन का केन्द्रीय तत्त्व था- कार्य-कारण संबंध का अवलोकन। समकालीन चिंतकों ने मुख्यतः पूर्ववर्ती घटना को रेखांकित करने की कोशिश की जो किसी परिघटना के उत्पन्न होने के लिए अनिवार्य था। अर्थात् पूर्ववर्ती घटना के न होने से परवर्ती घटना उत्पन्न नहीं होती है।
(पअ) मानवतावादी दृष्टिकोण- मनुष्य को स्वभाव से एक विवेकशील एवं विनम्र प्राणी स्वीकार किया गया। प्रबोधनयुगीन चिंतकों ने मानव
की खुशी एवं भलाई पर जोर दिया। मनुष्य को स्वार्थी धर्माधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त कर एक आदर्शवादी समाज के निर्माण हेतु प्रयास करने को प्रोत्साहन दिया गया। प्रबोधनकालीन चिंतकों ने इस बात को जोरदार रूप में सामने रखा कि यह संसार मशीन की तरह है जिसका..नियंत्रण एवं संचालन कुछ खास नियमों के अनुसार ही होता है। इसका उद्देश्य व्यक्तियों को अपने पर्यावरण पर नियंत्रण स्थापित करने में सामथ्र्यवान बनाना था ताकि वे प्राकृतिक शक्तियों की विेंध्वसात्मक शक्तियों से अपनी रक्षा कर सकें।
(अ) देववाद- सृष्टि या विश्व कहा जाने वाला यह आश्चर्यजनक तंत्र किसी संयोग का परिणाम न होकर किसी अनंत दैवीय शक्ति
ने इसे बनमा एवं अग्रसर-किया रोगा। फिर भी मनुष्य का सीमित मस्तिष्क इस अनंत को नहीं जान-सकता। अपने आदर्श यांत्रिक
नियमों को संचालित करने के पश्चात् ईश्वर न तो इन नियमों एवं न ही मनुष्य के मामले में कभी हस्तक्षेप करेगा।
(अप) प्रकृति की अच्छाई- प्रकृति अपने सरल रूप में उत्तम एवं सुन्दर है। मनुष्य ने इसे अपने जटिल सामाजिक एवं आर्थिक प्रतिबंधोके
द्वारा भ्रष्ट बना दिया है। प्रकृति की ओर लौटना हितकर, उत्साह एवं स्वतंत्रता की ओर लौटना है।