द्वैध शासन प्रणाली क्या है ? 1919 के अधिनियम के तहत स्थापित द्वैध प्रशासन से आप क्या समझते हैं ?

By   September 10, 2021

1919 के अधिनियम के तहत स्थापित द्वैध प्रशासन से आप क्या समझते हैं ? द्वैध शासन प्रणाली क्या है ?

द्वैघशासन : 1919 के एक्ट द्वारा आठ प्रमुख प्रांतों में, जिन्हें “गवर्नर के प्रांत कहा जाता था, द्वैधशासन की एक नयी पद्धति शुरू की गई। प्रांतों में आंशिक रूप से जिम्मेदार सरकार की स्थापना से पहले प्रारंभिक व्यवस्था के रूप में प्रांतीय सरकारों के कार्य-क्षेत्र का सीमांकन करना जरूरी था। तदनुसार एक्ट में उपबंध किया गया था कि प्रशासनिक विषयों का केंद्रीय तथा प्रांतीय के रूप में वर्गीकरण करने, प्रांतीय विषयों के संबंध में प्राधिकार स्थानीय शासनों को सौंपने, और राजस्व तथा अन्य धनराशियां उन सरकारों को आवंटित करने के लिए नियम बनाए जाए। विषयों का ‘केंद्रीय तथा ‘प्रांतीय‘ के रूप में हस्तांतरण नियमों द्वारा विस्तृत वर्गीकरण किया गया।
1919 के एक्ट की खामियां : 1919 के एक्ट में अनेक खामियां थीं। इसने जिम्मेदार सरकार की मांग को पूरा नहीं किया। इसके अलावा, प्रांतीय विधानमंडल गवर्नर जनरल की स्वीकृति के बगैर अनेक विषय-क्षेत्रों में विधेयकों पर बहस नही कर सकते थे। सिद्धात के रूप में, केंद्रीय विधानमडल संपूर्ण क्षेत्र के लिए कानून बनाने के वास्ते सर्वोच्च तथा सक्षम बना रहा। केंद्र तथा प्रांतों के बीच शक्तियो के बटवारे के बावजूद “पहले के अत्यधिक केंद्रीयकृत शासन” को सघीय शासन मे बदलने का सरकार का कोई इरादा मालूम नहीं पड़ा। ब्रिटिश भारत का संविधान एकात्मक राज्य का संविधान ही बना रहा।
प्रांतों में वैधशासन पूरी तरह से विफल रहा। गवर्नर का पूर्ण वर्चस्व कायम रहा। वित्तीय शक्ति के अभाव मे, मत्री अपनी नीति को प्रभावी रूप से कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। इसके अलावा, मत्री विधानमडल के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं थे। वे केवल गवर्नर के व्यक्तिगत रूप से नियुक्त सलाहकार थे।
काग्रेस तथा भारतीय जनमत असतुष्ट रहा और उन्होंने दबाव डाला कि प्रशासन को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधिक और उत्तरदायी बनाने के लिए सुधार किए जाए। प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था और आम लोगों के मन में अनेक आशाएं थी। कितु, उनके हाथ लगे दमनकारी विशेष विधायी प्रस्ताव जिन्हें रौलट बिल कहा गया। भारतीय जनमत का व्यापक और जबरदस्त विरोध होने पर भी उन्हे पास कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, गाधी जी के नेतृत्व मे स्वराज के लिए सत्याग्रह, अहसयोग और खिलाफत आदोलन शुरू किए गए।
साइमन आयोग: 1919 के एक्ट के अधीन, एक्ट के कार्यकरण की जाच करने तथा उसके सबंध में रिपोर्ट देने और सुधार के लिए आगे और सिफारिशे करने के लिए, दस वर्ष बाद 1929 मे एक आयोग नियुक्त करने का उपबंध था। व्याप्त असंतोष को देखते हुए भारतीय संवैधानिक आयोग (साइमन कमीशन) 1927 मे अर्थात निर्धारित समय से दो वर्ष पहले ही नियुक्त कर दिया गया लेकिन क्योंकि इसमे सारे के सारे सदस्य अंग्रेज थे, इसलिए इससे भारतीय जनता की भावनाओं को और भी ठेस पहुची।
पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव: कांग्रेस धीरे धीरे पूर्ण स्वराज के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ चुकी थी किंतु कलकत्ता अधिवेशन में यह निर्णय किया गया कि अंग्रेजों को एक वर्ष के अंदर-अंदर डोमिनियन दर्जे की मांग को स्वीकार करने के लिए एक आखरी मौका दिया जाए। डोमिनियन दर्जे की मांग ठुकरा दिए जाने के बाद कांग्रेस के 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के संबंध में एक प्रस्ताव पास किया गया। नमक-कर संबंधी कानून को तोड़ने के आह्वान तथा समुद्र तक पहुंचने के लिए गांधी जी की डांडी यात्रा के साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन आरभ हो गया।
गोलमेज सम्मेलन तया श्वेतपत्र : अततः सरकार ने संवैधानिक सुधारों पर विचार करने के लिए नवंबर, 1930 मे लदन में एक गोलमेज सम्मेलन बुलाने का निर्णय किया। इसके बाद ऐसे ही दो सम्मेलन और हुए
तीन गोलमेज सम्मेलनों के बाद, ब्रिटिश सरकार ने मार्च, 1933 मे एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया। उसमें एक नये संविधान की रूपरेखा दी गई थी। इस योजना में संघीय ढाचे तथा प्रांतीय स्वायत्तता के लिए उपबंध सम्मिलित थे। इसमें केंद्र में द्वैधशासन तथा प्रांतों मे जिम्मेदार सरकारो का प्रस्ताव किया गया था।
ब्रिटिश संसद ने श्वेतपत्र में सम्मिलित सरकार की योजना पर आगे विचार करने के लिए दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति का गठन किया। लार्ड लिनलिथगो सयुक्त समिति के अध्यक्ष थे और इसमें कंजर्वेटिव सदस्यो का बहुमत था। ब्रिटिश भारत तथा देसी रियासतों के प्रतिनिधियों को इस समिति के सामने गवाह के रूप में साक्ष्य देने के लिए आमत्रित किया गया था। सयुक्त समिति ने नवंबर, 1934 में अपनी रिपोर्ट दी। इसमें इस बात को दोहराया गया था कि फेडरेशन की स्थापना तभी की जाएगी यदि कम-से-कम 50 प्रतिशत देसी रियासतें इसमे शामिल होने के लिए तैयार हो जाए।
इस रिपोर्ट के आधार पर एक विधेयक तैयार किया गया और वह 19 दिसंबर, 1934 को ब्रिटिश ससद में पेश किया गया। जब दोनों सदनों ने उसे पास कर दिया तथा 4 अगस्त, 1935 को उसे सम्राट ने अपनी अनुमति दे दी तो वह भारत शासन एक्ट, 1935 बन गया।
भारत शासन एक्ट, 1935: भारत शासन एक्ट, 1935 की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि इसमें ब्रिटिश प्रांतों तथा संघ में शामिल होने के लिए तैयार भारतीय रियासतों की एक “अखिल भारतीय फेडरेशन‘‘ की परिकल्पना की गई थी। 1930 के गोलमेज सम्मेलन तक भारत पूर्णतया एक एकात्मक राज्य था और प्रांतों के पास जो भी शक्तियां थीं, वे उन्हें केंद्र ने दी थीं। अर्थात, प्रांत केवल केंद्र के एजेंट थे। 1935 के एक्ट में पहली बार ऐसी संघीय प्रगाली का उपबंध किया गया जिसमें न केवल ब्रिटिश भारत के गवर्नरों के प्रांत बल्कि चीफ कमिश्नरो के प्रांत तथा देसी रियासतें भी शामिल हों। इसने उस एकात्मक प्रणाली की संकल्पना को अंततः भंग कर दिया जिसके अधीन अब तक ब्रिटिश भारत का प्रशासन होता था। 1919 के संविधान का सिद्धांत विकेंद्रीकरण का था, न कि फेडरेशन का। नये एक्ट के अधीन, प्रांतों को पहली बार विधि में अपने ढंग से कार्यपालक तथा विधायी शक्तियों का प्रयोग करने वाली पृथक इकाइयों के रूप में मान्यता दी गई। प्रांत, सामान्य परिस्थितियों में, उस क्षेत्र में केंद्र के नियंत्रण से मुक्त हो गए थे।
इस एक्ट के अधीन बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया और उड़ीसा तथा सिध के दो नये प्रांत बना दिए गए। केंद्र में प्रस्तावित योजना को ध्यान में रखते हुए, गवर्नरों के ग्यारह प्रांतों को, कतिपय विशिष्ट प्रयोजनों को छोड़कर, केंद्रीय सरकार तथा सेक्रेटरी आफ स्टेट की ‘निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण’ से पूरी तरह ‘मुक्त‘ कर दिया गया। दूसरे शब्दों में, प्रांतों को एक पृथक कानूनी व्यक्तित्व प्रदान कर दिया गया। एक्ट द्वारा परिकल्पित प्रातीय स्वायत्तता की योजना में प्रत्येक प्रांत में एक कार्यपालिका तथा एक विधानमंडल का उपबंध रखा गया था। प्रांतीय विधानमंडलों को अनेक नयी शक्तियां दी गई। मंत्रिपरिषद को विधानमंडल के प्रति जिम्मेदार बना दिया गया और वह एक अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसे पदच्युत कर सकता था। विधानमंडल प्रश्नों तथा अनुपूरक प्रश्नों के माध्यम से प्रशासन पर कुछ नियंत्रण रख सकता था। किंतु, विधानमंडल लगभग 80 प्रतिशत अनुदान-मांगों को स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकता था। विधायी क्षेत्र में, विधानमंडल समवर्ती सूची में सम्मिलित विषयों पर भी कानून पास कर सकता था, किंतु टकराव होने की स्थिति मे संघीय कानून ही प्रभावी रहता।
भारत शासन एक्ट, 1935 के अधीन संवैधानिक योजना का संघीय भाग अत्यधिक अव्यावहारिक था। प्रांतों ने फेडरेशन की योजना को स्वीकार नहीं किया और क्योंकि आधी रियासतों के फेडरेशन में सम्मिलित होने की शर्त को पूरा नहीं किया जा सका, इसलिए 1935 के एक्ट में परिकल्पित “भारत संघष् (फेडरेशन आफ इंडिया) अस्तित्व में नहीं आ पाया और एक्ट के सघीय भाग को कार्यान्वित नहीं किया जा सका।
भारत शासन एक्ट, 1935 के अधीन प्रातीय विधानमंडलों के चुनाव फरवरी, 1937 में कराए गए। चुनावों में कांग्रेस की एक बार फिर जबरदस्त जीत हुई। कुल मिलाकर, कांग्रेस को 836 सामान्य स्थानों में से 715 स्थान प्राप्त हुए। मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए आरक्षित स्थानों पर तथा मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांतों में भी बुरी तरह से पराजित हो गई। वस्तुतया यह 482 मुस्लिम स्थानों में से केवल 51 स्थान ही प्राप्त कर सकी
कांग्रेस को मद्रास, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत और उड़ीसा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया और यह बंबई में कुल स्थानों में से लगभग आधे स्थानों पर विजयी रही। असम तथा उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में, यह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई। पंजाब में, यूनियनिस्ट पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। बंगाल तथा सिंध में अनेक छोटे छोटे ग्रुप बन गए।
भारत के संवैधानिक इतिहास में भारत शासन एक्ट, 1935 का एक बहुत महत्वपूर्ण तथा स्थायी स्थान है। इस एक्ट के द्वारा देश को एक लिखित संविधान देने का प्रयास किया गया था। हालाकि भारत की जनता या उसके प्रतिनिधियो का इस दस्तावेज के निर्माण मे कोई हाथ नहीं था, और इसमे अनेक गभीर खामिया थी, फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुल मिलाकर तथा कई दृष्टियो से यह एक प्रगतिशील कदम था। सदियों के बाद, भारतीयो को अपने देश के प्रशासन को चलाने मे कुछ जिम्मेदारी सभालने का अवसर मिला था। प्रांतो मे निर्वाचित प्रतिनिधियो द्वारा लोकप्रिय मंत्रिमंडल बनाए गए। वे विधानमडलो के प्रति उत्तरदायी थे। प्रधानमत्री (प्रीमियर) तथा मत्री (मिनिस्टर) जैसे शब्दो का पहली बार प्रयोग किया गया और प्रधानमत्री की प्राथमिकता को मान्यता दी गई। ऐसे अवसर भी आए, जब गवर्नरों तथा मंत्रियो के बीच मतभेद उत्पन्न हुए, कितु कांग्रेस शासित प्रातो मे गवर्नर मोटे तौर पर मंत्रियों की शक्तियो तथा उनके उत्तरदायित्वों का सम्मान करते थे और दिन-प्रतिदिन के प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करते थे। मंत्रिगण भी अपने कर्तव्यो को बड़ी योग्यता, निष्पक्षता और निष्ठा की भावना के साथ निभाते थे। उसके लिए उन्हें प्रशंसा तथा सम्मान मिला। यहा तक कि अग्रेज प्रशासक भी भारतीय मंत्रियों द्वारा प्रदर्शित प्रशासनिक योग्यता तथा विलक्षणता से आश्चर्यचकित तथा प्रभावित हुए बिना न रह सके।