द्रविड़ शैली के मंदिरों के उदाहरण। राजस्थान में द्रविड़ शैली के मंदिर नागर शैली किसे कहते हैं अंतर

By   April 17, 2021

राजस्थान में द्रविड़ शैली के मंदिर नागर शैली किसे कहते हैं अंतर द्रविड़ शैली के मंदिरों के उदाहरण क्या है ?

प्रश्न: नागर शैली
उत्तर: मंदिर निर्माण की नागर शैली उत्तरी भारत में हिमालय से विंध्यप्रदेश के भू-भाग में फैली थी। नागर शैली के मंदिर चतुष्कोणीय तथा ऊपर की ओर वक्र होते हुए शिखर इनकी विशेषता थी। उड़ीसा का लिंगराज मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, कोकार्क का सूर्य मंदिर व खजुराहों के मंदिर नागर शैली में
प्रश्न: द्रविड़ शैली
उत्तर: यह कृष्णा तथा कुमारी अंतरीप के बीच फैली थी। द्रविड़ शैली के मंदिरों का आकार अष्टभुजाकार तथा शिखर पिरामिड के आकार के होते हैं। तंजौर का वृहदेश्वर मंदिर, कांची का कैलाशनाथ मंदिर, महाबलीपुरम के मंदिर द्रविड़ शैली में बने है।
प्रश्न: बेसर शैली
उत्तर: यह शैली विंध्य और कृष्णा के बीच दक्षिणावर्त में फैली हुई थी। इस शैली में नागर व द्रविड़ शैली के तत्व मिश्रित है। इस शैली के मंदिर अर्द्धगोलाकार होते थे तथा इनमें देवुल गर्भगृह और जगमोहन (सभा मण्डप) होता था। ऐलोरा का कैलाश मंदिर, एलिफेंटा के गुहा मंदिर तथा होयसल राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर इसी शैली में हैं।
प्रश्न: वृहदेश्वर के संबंध में लिखिए।
उत्तर: वृहदेश्वर मंदिर, तंजौर द्रविड़ शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण चोल शासक राजराजा प्रथम ने कराया था। मंदिर की दीवारों पर पत्नी लोकमहादेवी के साथ स्वयं की मूर्तियां स्थापित हैं। यह एक शैव मंदिर है।
प्रश्न: चोल वास्तुकला
उत्तर: 10वीं-11वीं शताब्दी में चोल वास्तुकला का विकास हुआ, जिसके तहत वृहदेश्वर मंदिर (तंजौर) तथा विजयालय चोलेश्वर के मंदिर आते हैं। ये मंदिर द्रविड़ कला से प्रभावित हैं और इनमें सुंदर चित्रकारी की गयी है।
प्रश्न: गोपुरम्
उत्तरः गोपुरम् का अर्थ है- प्रवेश द्वार, जो दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली के मंदिरों के आगे होता था। यह काफी कलात्मक ढंग एवं भव्यता के साथ
बनाया जाता था और कभी-कभी मुख्य मंदिर से भी ऊंचा होता था। चोल, एवं गंग राजाओं द्वारा बनवाये गये गोपुरम् भव्य हैं।
प्रश्न: गांधार कला शैली
उत्तर: गांधार कला शैली बौद्ध मूर्तिकला की एक ऐसी विशिष्ट शैली है, जिसका विकास ईसा की प्रथम-द्वितीय शताब्दी (कनिष्ककाल) में हुआ था।
इसे इंडो-ग्रीक कला के नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न: मास्की के संबंध में लिखिए।
उत्तर: मास्की कर्नाटक में स्थित एक पुरास्थल यहां से अशोक द्वारा स्थापित एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। इस पर अशोक का नाम श्देवनामपियश्
उत्कीर्ण है।
प्रश्न: गंधार कला के संबंध में लिखिए।
उत्तर: गंधार कला शक कुषाण काल में विकसित ग्रीक भारतीय कला जिसके तहत मूर्तियों में शरीर की आकृति को यथार्थ रूप से दिखाने का
प्रयास किया गया है। इसी कला में बुद्ध की मूर्तियां बनाई गई।
प्रश्न: जावा के बोरोबुदूर स्तूप और कम्बोडिया के अंकोरवाट के विष्णमंदिर का निर्माण किन्होंने करवाया?
उत्तर: जावा के बोरोबुदूर स्तूप का निर्माण 750-850 ई. के मध्य शैलेन्द्र शासकों ने तथा कम्बोडिया के अंकोरवाट के विष्णु मंदिर का निर्माण 1125 ई. में कम्बुज के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने करवाया था।
प्रश्न: बुद्धकालीन तत्कालीन भारत की 6 महानगरियाँ कौन-कौनसी थी?
उत्तर: महापरिनिर्वाण सुत्त में चम्पा, राजगृह, साकेत, श्रावस्ती, कौशाम्बी और बनारस को बद्धकालीन 6 महानगरियों में गिना है।
प्रश्न: नगरीकरण से आप क्या समझते है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: नगर मानने के लिए वी.गार्डन चाइल्ड ने दस विशिष्ट गणों का उल्लेख किया है जिनमें घनी आबादी का होना, समाज में उत्पादक वर्ग की प्रधानता, नगर में दैवीय शासक की उपस्थिति, शासक वर्ग, बड़े और सुनियोजित भवन, लिखने की कला और वैज्ञानिक प्रगति, विदेशी व्यापार प्रमुख हैं।
प्रश्न: चमकीले लाल मृद्भाण्ड संस्कृतियां (BPW & Bright Red Were) .
उत्तर: गुजरात के काठियावाड़ कच्छ क्षेत्र में उत्तर हडप्पाकालीन क्रम एवं नवमभाण्ड का क्रमिक सम्बन्ध दिखाई देता है। इस संस्कृति का अनुमानित समय 2000-1500 B.C. के मध्य है।
प्रश्न: गेरूवर्णी मृद्भाण्ड या गैरिक मृद्भाण्ड संस्कृतियां (OCP – Ochere Coloured Pottery)
उत्तर: ऊपरी गंगा घाटी के ग्रामीण जीवन के प्रांरभिक चरण व ताम्र निधियों से सम्बन्धित इस संस्कृति का अनुमानित समय 1300-1200 B.C. है।
प्रश्न: काले लाल मृद्भाण्ड संस्कृतियांध्कृष्ण लोहित मृद्भाण्ड परम्परा (BRG.– Black — Red Were)
उत्तर: गुजरात, सौराष्ट्र, आहड़, गंगाघाटी, पूर्वी भारत, दक्षिणी महापाषाणी काल, इसके प्रमुख केन्द्र थे। इस संस्कृति से आरम्भिक ऐतिहासिक काल प्रारंभ माना जाता है। इस संस्कृति का अनुमानित समय 1100-800 B.C. है।
प्रश्न: चित्रित घूसर मृद्भाण्ड परम्परा (PGW -Painted Grey Were)
उत्तर: पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान, ऊपरी गंगाघाटी इसके प्रमुख केन्द्र थे। ये लौह प्रयुक्तता संस्कृति थी जिनमें विकसित ग्रामीण जीवन पाया जाता था। इस संस्कृति का अनुमानित समय 800-400 B.C. है।
प्रश्न: उत्तरी काली चमकीली मृद्भाण्ड परम्परा (NBPW – Northern Black Polished Were).
उत्तर: उत्तर प्रदेश, बिहार, तक्षशिला इसके प्रमुख केन्द्र थे। विकसित सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था, पूर्णतः स्थायी जीवन, नगरीकरण आदि के अवशेष इस संस्कृति में दिखाई देते हैं। इस संस्कृति का अनुमानित समय 800-100 B.C. है।
प्रश्न: निम्नलिखित का महत्व निरूपित कीजिए। (प) P.G.W. (पप) N.B.P.W. (पपप) ताम्रनिधि
उत्तर: P.G.W. – उत्तर वैदिक कालीन चित्रित मृद्भाण्ड
N.B.P.W. – छठी शताब्दी ई.पू. काली पॉलिश मृद्भाण्ड
ताम्रनिधि – गंगाघाटी में प्राप्त ताम्रोपकरण इनसे लौह युग के आगमन एवं नयी संस्कृति की सूचना मिलती है।
लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न: मोहनजोदड़ो की नगर निर्माण व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: हड़प्पाकालीन मोहनजोदडो नगर पूर्वी और पश्चिमी खण्डों में बंटा है। पश्चिमी खण्ड छोटा एवं ऊँचा है। यहां छोटे हीएक-बहुमंजिले, दरवाजे, खिड़कियों और सीढ़ियों वाले पक्के घर मिले हैं। ऊँचे टीले पर अन्नागार. परोहिला महाविद्यालय जैसे भवन हैं। कुंओ और सुंदर जलनिकास वाले इस नगर में एक वृहद् स्नानागार मिला है जिसमें सी बरामदे एवं अन्य भवन बने हुए हैं।
प्रश्न: मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर: यह मोहनजोदड़ो का उल्लेखनीय स्मारक है, जो 39 फुट लम्बा, 23 फुट चैड़ और 8 फुट गहरा है। इसमें उतरने के लिए उत्तर-दक्षिण की ओर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। फर्श एवं दीवार की जुड़ाई जिप्सम से की गई है। चारों ओर बने बरामदों में पीछे तीन ओर छोटे-छोटे कमरे निर्मित हैं। पानी के भराव व खाली करने की व्यवस्था उत्तम है। सम्भवतः इसका प्रयोग स्वच्छता और धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए किया जाता था।
प्रश्न: द्वितीय नगरीकरण से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: प्राक् मौर्ययुगीन गंगाघाटी के आर्थिक जीवन की प्रमुख विशेषता थी। लौह संस्कृति, उत्तरी काले चमकीले मृद्भाण्ड, शिल्प व उद्योग धन्धों का विकास, व्यापार वाणिज्य की प्रगति, सिक्कों का निर्माण आदि। इस समय हमें 6 महानगरियों का उल्लेख मिलता है (1) चम्पा (2) राजगृह (3) श्रावस्ती (4) साकेत (5) कौशाम्बी (6) बनारस। सैंधव नगरों के बाद यह भारत का दूसरा नगरीकरण था।
प्रश्न: वे कौनसी परिस्थितियां थी, जिनके कारण सिन्धुघाटी सभ्यता का नगरीकरण हुआ ?
उत्तर: भारतीय इतिहास में सिंधु सभ्यता को प्रथम नगरीय क्रांति माना गया है। नगर मानने के लिए वी.गार्डन चाइल्ड ने दस विशिष्ट गुणों का
उल्लेख किया है जिसमें घनी आबादी का होना, समाज में उत्पादक वर्ग की प्रधानता, नगर में दैवीय शासक की उपस्थिति, शासक वर्ग, बड़े और सुनियोजित भवन, लिखने की कला और वैज्ञानिक प्रगति, विदेशी व्यापार प्रमुख हैं। इसके नगरीकरण में भू-पृष्ठ क्षेत्र (हिण्टरलैण्ड) का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
ऽ विस्तृत उपजाऊ मैदान होना
ऽ खाद्यान उत्पादन अधिशेष था
ऽ व्यापार – वाणिज्य संतुलन पक्ष में था
ऽ उत्खनन अच्छी अवस्था में था
ऽ नदियां, सिंचाई, पेजयल, व्यापार तंत्र, यातायात प्रबंध में उपयोगी थी
ऽ विकसित मापन प्रणाली थी
ऽ लेखन कला का ज्ञान
ऽ कला-तकनीकी का विकास ये सभी विशेषताएं सिन्धुघाटी क्षेत्र में एक साथ दिखाई देती हैं।
प्रश्न: भारत में गेरुवर्णी मृदभाण्ड शैली एवं उसके निर्माता?
उत्तर: भारत में ताम्रनिधि उपकरणों के साथ ही श्गैरिकश् अथवा श्गेरुए रंगश् की एक विशेष प्रकार की पॉटरी भी उत्खनन से प्रकाश में आई है। इसे “ओकर कलर्ड पॉटरी” (ओ.सी.पी.) भी कहा जाता है। गैरिकवर्णी पॉटरी व ताम्रनिधि से संबद्ध संस्कृतियां 2000 ई.पू. से 1580 ई.पू. के मध्य अस्तित्व में आ चुकी थी। पॉटरी चित्रित भूरे मृद्भाण्ड की अग्रागामी पॉटरी कही जा सकती है। गेरुए रंग के मृद्भाण्डों की परम्परा के पोषक लोग पंजाब, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और राजस्थान के निवासी थे। इनके प्रमुख मृद्भाण्ड घड़े, अनाज रखने वाले मर्तबान, प्यालियाँ, थालियाँ, कटोरियां आदि थे। सम्भवतः यहा लोग गंगा घाटी के मूल निवासी थे। इन्हें ही ग्रेवाल महोदय ने परवर्ती हड़प्पीय लोग कहा है। गेरुए रंग के मृद्भाण्ड निर्माता एक सुसंस्कृत जीवन व्यतीत करने वाले लोग थे। वे कृषि कर्म करते थे व आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः व्यवस्थित थे।