तंत्रिका आवेग के संवहन की क्रियाविधि क्या है ? तंत्रिका आवेग की उत्पत्ति एवं प्रसारण की क्रियाविधि

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तंत्रिका आवेग की उत्पत्ति एवं प्रसारण की क्रियाविधि ?

तंत्रिका आवेग के संवहन की क्रियाविधि :

  • तंत्रिका आवेग की उत्पत्ति : जब एक तंत्रिका तन्तु को पर्याप्त क्षमता वाले यांत्रिक रासायनिक तापीय और विद्युतीय उद्दीपन से उत्तेजित किया जाता है तो तंत्रिका तंतु उद्दीपन बिंदु पर स्थानीय उत्तेजन अवस्था में आ जाता है | इस क्षेत्र में trans membrane potential कम होता है और झिल्ली Na+ और K+ के लिए कई गुना पारगम्य हो जाती है | विद्युतरासायनिक प्रवणता के कारण सोडियम आयन बाहर से अंत: कोशिकीय द्रव्य में विसरित होते हैं अत: अन्दर की सतह बाहर की तुलना में धनात्मक हो जाती है जो बाद में Na+ के लिए झिल्ली की पारगम्यता बढ़ाती है | झिल्ली के दोनों तरफ यह विपरीत ध्रुवता विध्रुवण (depolarization) कहलाता है और विपरीत ध्रुवता से युक्त झिल्ली विध्रुवित तंत्रिका तंतु कहलाती है | यह अन्दर की तरफ विद्युतधनात्मक होती है जबकि बाहर की तरफ विद्युतऋणात्मक होती है | यह इस अवस्था में 1/1000 सेकंड से भी कम समय तक रहती है |

Na+ के तीव्र अंत: प्रवाह के कारण विभव पहले तो शून्य तक कम होता है और तत्पश्चात +50 से +70 mV तक बढ़ता है और यह पुनः विकसित विभव प्रवणता , action potential कहलाती है | यह action potential विध्रुवण के रूप में तंत्रिका तन्तु के अनुदिश सम्पूर्ण लम्बाई में अग्रसर होता है जो आवेग (nerve impulse) कहलाता है |

  • तंत्रिका तंतु का पुनः ध्रुवण : action potential के उच्च स्तर (स्पाइक पोटेंशियल) के बाद Na+ के लिए झिल्ली की पारगम्यता कम हो जाता है जबकि यह K+ के लिए अधिक पारगम्य हो जाती है जो विद्युतरासायनिक प्रवणता के कारण कोशिका द्रव्य से बाहर की बाह्य कोशिकीय द्रव्य में तीव्रता से विसरित होते हैं | शीघ्र ही झिल्ली का यह भाग अपनी वास्तविक ध्रुवता को प्राप्त करता है और बाहर की तरफ विद्युतधनात्मक और अन्दर की ओर विद्युत ऋणात्मक हो जाता है | यह पुनः ध्रुवण (depolarization) कहलाता है और तंत्रिका तन्तु पुनः ध्रुवित तंत्रिका तंतु कहलाता है | विश्राम अवस्था के दौरान resting potential को बनाये रखने के लिए 3Na+ आयन बाहर की तरफ और 2K+ आयन अन्दर की तरफ आदान प्रदान होते हैं |

एक पुनः ध्रुवित तंत्रिका तन्तु पर ध्रुवित तंत्रिका तन्तु के समान ही ध्रुवता होती है परन्तु भिन्न आयनिक वितरण होता है | इसमें बाहर की ओर अधिक K+ आयन और अन्दर की तरफ अधिक Na+ आयन होते हैं | पुनः ध्रुवित तंत्रिका तन्तु कुछ मिली सेकंड के रिफ्रैक्टरी पीरियड से गुजरती है जिसके दौरान Na+ – K+ आदान प्रदान पम्प द्वारा वास्तविक आयनिक वितरण संरक्षित किया जाता है इस तरह झिल्ली अपने रेस्टिंग पोटेंशियल I.e. +50 mV को प्राप्त करती है और न्यूरोन अन्य उद्दीपन को ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है |

(iv) नॉन मेड्युललेटेड तंत्रिका तंतु के साथ तंत्रिका आवेग का गमन : तंत्रिका आवेग local circuits द्वारा प्रवाहित होता है जिसमें विध्रुवित क्षेत्र अगले क्षेत्र का विध्रुवण करता है और ऐसा लगातार होता रहता है | तंत्रिका आवेग के संवहन के दौरान विध्रुवित क्षेत्र पर उपस्थित (बाहरी सतह पर) ऋणात्मक आवेग बाहरी सतह पर उपस्थित अगले धनात्मक आवेग को आकर्षित करता है जबकि अन्दर की सतह पर विध्रुवित क्षेत्र का धनात्मक आवेग अन्दर की सतह के अगले ध्रुवित क्षेत्र के ऋणात्मक आवेश द्वारा आकर्षित होता है | अत: विध्रुवित क्षेत्र ध्रुवित हो जाता है और अगला ध्रुवित क्षेत्र विध्रुवित हो जाता है | यह प्रक्रम बार बार होता है और एक्शन पोटेंशियल विध्रुवित तरंग की तरह प्रवाहित होता है |

तंत्रिका तन्तु का उच्छलन संवहन (salutatory conduction) : माइलिन रहित तंत्रिका तन्तु की झिल्ली पर आयनिक परिवर्तन तंत्रिका तन्तु की पूरी लम्बाई पर बार बार होते है अत: एक्शन पोटेंशियल एक तरंग की तरह प्रवाहित होता है परन्तु माईलिन युक्त तंत्रिका तन्तुओं में medullar आच्छद आयन के लिए अपारगम्य होती है अत: आयन के आदान प्रदान और तंत्रिका तन्तु की पूर्ण लम्बाई में विध्रुवण को रोकती है | आयनिक आदान प्रदान और विध्रुवणता कुछ निश्चित बिन्दुओं पर होता है जिन्हें nodes of raniver कहते हैं अत: एक्शन पोटेंशियल , node से node तक jumping manner में संवहित होता है | यह कारण है कि माइलिन युक्त तंत्रिका तंतुओं में तंत्रिका आवेग का संवहन माइलिन रहित तंत्रिका तंतुओं की तुलना में 20 गुना तीव्र होता है |

तंत्रिका आवेग का पर्व से पर्व (नोड) तक जंपिंग manner में स्थानान्तरण उच्छलन संचरण (salutatory transmission) कहलाता है |

सिनेप्स के द्वारा आवेग का संचरण : सिनेप्स , दो कोशिकाओं द्वारा निर्मित दो झिल्लियों के मध्य fluid – filled space के मध्य की संधि होती है क्योंकि तंत्रिका सन्देश केवल एक दिशा में गमन करता है | इसमें भेजने वाले कोशिका (sending cell) की झिल्ली presynaptic membrane और जो ग्रहण करती है , post synaptic membrane कहलाती है | द्रव भरा हुआ अंतराल synaptic cleft कहलाता है |

एक्सोडेन्ड्रोनिक सिनेप्स में तंत्रिकाक्ष का अंतिम बड़ा भाग presynaptic knob (synaptic bag) कहलाता है | डेन्ड्रोइड का तंत्रिकाक्ष प्राप्ति क्षेत्र postsynaptic process कहलाता है | दोनों synaptic cleft के द्वारा पृथक होते हैं | presynaptic कोशिका द्रव्य अनेक छोटे छोटे अंशों में टूट जाता है परन्तु postsynaptic तरफ ये नियमित और तंतुओं के जाल के साथ सम्बन्धित होते है जो synaptic web कहलाता है | तंत्रिकाक्ष सीमांत के कोशिका द्रव्य में अनेक झिल्ली युक्त रिक्तिकाएँ होती है और ये रिक्तिकाएँ synaptic vesicles कहलाती है | इन रिक्तिकाओं में रासायनिक पदार्थ जैसे एड्रिनेलिन और एसिटाइलकोलीन संग्रहित होता है | जब तंत्रिका आवेग तंत्रिकाक्ष सीमांत से गुजरता है तो इसकी synaptic vesicles उनके संगृहीत रासायनिक पदार्थ को synaptic cleft में exocytosis के द्वारा Ca++ के अंत प्रवाह के प्रतिक्रिया स्वरूप डाल देती है |

ये रसायन दरार में विसरित होते हैं और अगले न्यूरोन की झिल्ली तक पहुँचते है | इस तरह Na+ के अंत: प्रवाह को उत्तेजित करते है | यह तंत्रिका आवेग के अगले न्यूरोन तक संचरण का कारण बनती है |

Neurosecretion – जब तंत्रिका आवेग तंत्रिकाक्ष की सिरे की गाँठ तक पहुँचता है तो end knob की रिक्तिका न्यूरोट्रांसमीटर रसायन synaptic cleft में स्त्रावित करती है |

Cholinergic nerve fibre में न्यूरोट्रांसमीटर एसिटाइलकोलीन जबकि एड्रिनर्जिक प्रकार के तंत्रिका तन्तु में एपिनेफ्रिन या एड्रिनेलिन होता है | न्यूरोट्रांसमीटर रसायन के द्वारा अगले न्यूरोन के लगातार उत्तेजन को रोकने के लिए यह एंजाइम द्वारा निष्क्रिय किया जाता है | उदाहरण एसिटाइलकोलीन , एसिटाइलकोलीनएस्टेरेज जो posterior – synaptic membrane में उपस्थित होता है के द्वारा निष्क्रिय होता है , यह एंजाइम एसिटाइल कोलीन को अक्रिय एसिटिक अम्ल और कॉलिन में जल अपघटित कर देता है जो end knob में विसरित होता है और एसिटाइलकोलीन बनाने के लिए पुनः जुड़ जाता है | एड्रिनर्जिक तंत्रिका तंतुओं में एड्रीनेलिन monaamine oxidase एंजाइम द्वारा निष्क्रिय होता है |

सिनेप्स पर तंत्रिका आवेग हमेशा एक्सान से डेन्ड्रान तक संचरित होता है , डेन्ड्रान से एक्सोन तक नहीं क्योंकि डेन्ड्राइटस न्यूरोट्रांसमीटर रसायन स्त्रावित नहीं कर सकते और एक्सान में रसायन ग्राही नहीं होते हैं | यह तंत्रिका आवेग का एक दिशीय संचरण समझाता है |

तंत्रिका आवेग की तीव्रता : तंत्रिका आवेग की तीव्रता भिन्न भिन्न तंत्रिका तन्तुओं में भिन्न होती है और निम्न कारकों पर निर्भर करती है –

  • तंत्रिका तन्तु की प्रकृति : दो कारणों से माइलिन युक्त तंत्रिका तन्तु में तंत्रिका आवेग की तीव्रता माइलिन रहित तंत्रिका तंतु की तुलना में 20 गुना अधिक होती है |
  • उच्छलन संचरण (salutatory conduction)
  • Medullary sheath अवरोधक आच्छद की तरह कार्य करती है और ऊर्जा की हानि को रोकती है अत: माइलीन युक्त तंत्रिका तंतुओं को ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है |
  • तंत्रिका तन्तुओं का व्यास : मोटे तंत्रिका तन्तुओं में तंत्रिका आवेग की तीव्रता पतले तंत्रिका तन्तुओं की तुलना में तीव्र होती है क्योंकि तंत्रिका तंतु की मोटाई के बढ़ने पर तंत्रिका आवेगों के लिए प्रतिरोध कम होता है |