चल कुंडली धारामापी का सिद्धांत एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए चल कुंडली धारामापी की धारा सुग्राहिता को परिभाषित कीजिए

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चल कुंडली धारामापी की धारा सुग्राहिता को परिभाषित कीजिए चल कुंडली धारामापी का सिद्धांत एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए ?

अध्याय धारामापी (Galvanometer)
धारामापी, परिपथ में प्रवाहित धारा का संसूचक यंत्र है जिसकी सहायता से परिपथ में धारा की उपस्थिति तथा प्रवाहित धारा की दिशा का ज्ञान किया जा सकता है। चुम्बकीय सिद्धान्त पर आधारित धारामापी दो प्रकार के होते हैं-
(1) चल कुण्डली धारामापी
(2) स्पर्शज्या धारामापी . .
यहां हम चल कुण्डली धारामापी एवं उसके रूपान्तरण पर ध्यान केन्द्रित करेंगे।
चल कुण्डली धारामापी (Moving Coil Galvanometer)
संरचना- इसमें एक आयताकार चालक फ्रेम पर मोटे तांबे के तार की अनेकों फेरों में लपेटी हई कुण्डली होती है जिसे कीलकों की सहायता से दो – कीलक शक्तिशाली घुड़नाल चुम्बकीय धु्रवों के मध्य व्यवस्थित किया जाता है। कुण्डली के दोनों सिरों पर परस्पर विपरीत क्रम में लपेटी हुई स्प्रिंग होती है तथा फ्रेम के मध्य एक नर्म लोहे का क्रोड व्यवस्थित होता है। फ्रेम के साथ एक हल्का, लम्बा एल्यूमिनियम का संकेतक सम्बद्ध होता है जो कि कुण्डली के विक्षेपित होने पर, एक वृत्ताकार चाप पर विक्षेपित होता है। इस चाप पर शून्य विक्षेप स्थिति ठीक मध्य में अंशांकित होती है।
सिद्धांत – जब टर्मिनल T1 व T2 को बाह्य परिपथ से संयोजत कर कुण्डली में धारा प्रवाहित की जाती है तो कुण्डली पर विक्षेपक बलाघूर्ण
π = NI AB sin α ……….;1)
कार्य करता है। जहां N = कुण्डली में फेरों की संख्या, I = कुण्डली में प्रवाहित धारा A = कुण्डली का क्षेत्रफल, B  = चुम्बकीय ध्रुवों द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र तथा = कुण्डली के क्षेत्रफल सदिश एवं चुम्बकीय क्षेत्र के मध्य कोण।
यदि चुम्बकीय क्षेत्र त्रिज्यीय है तो ं α = 90°
अतः π विक्षेपक = NIAB ……….;2)
इस विक्षेपक बलाघूर्ण के कारण कुण्डली विक्षेपित होती है परिणामतः स्प्रिंगों में ऐंठन उत्पन्न होती है तथा सत्यानयन बलाघूर्ण उत्पन्न होता है जो कि कुण्डली के विक्षेप का विरोध करता है। यह प्रत्यानयन बल विक्षेप कोण के के होता है ।
अर्थात् π प्रत्यानयन ∝. θ
या π प्रत्यानयन = Cθ ……….;3)
जहां θ=  विक्षेप कोण, C = ऐंठन नियतांक
जब प्रत्यानयन विक्षपक बलाघूर्ण के समान हो जाता है तो कुण्डली उसी विक्षेपित व्यवस्था में आकर जाती है। अतः कुण्डली की इस साम्यावस्था में समीकरण (2) व (3) से
π विक्षेपक = πप्रत्यानयन
NIAB = Cθ
⇒ धारा I = C/NAB×e
या I = Kθ ⇒ I ∝ विक्षेप कोण θ
जहां K=  C/NAB धारामापी नियतांक या धारामापी का परिवर्तन गुणांक कहलाता है। स्पष्टतः यदि ज्ञ ज्ञात है तो 0 का मापन कर धारा मापित की जा सकती है।
धारामापी का दक्षतांक: धारामापी कुण्डली में इकाई विक्षेप उत्पन्न करने के लिए आवश्यक धारा का मान मारामापी का दक्षतांक कहलाता है इसे X से व्यक्त करते हैं।
अतः दक्षतांक X = 1/θ = K= C/NAB
धारामापी की धारा सुग्राहिता- इकाई धारा द्वारा उत्पन्न विक्षेप की मात्रा, धारामापी की धारा सुग्राहिता कहलाती है। इसे S1, द्वारा व्यक्त करते हैं।
अतः धारा सुग्राहिता S1 = θ/1 = 1/K= NAB/ C
धारामापी की वोल्टता सुग्राहिता- धारामापी की कुण्डली के सिरों के मध्य इकाई विभवान्तर आरोपित करने पर कुण्डली में प्रवाहित धारा के कारण उत्पन्न विक्षेप, धारामापी की वोल्टता सुग्राहिता कहलाती है। इसे SV से व्यक्त करते है।
यदि कुण्डली का प्रतिरोध R है तथा कुण्डली के सिरों पर आरोपित विभवान्तर V है तो कुण्डली में प्रवाहित
धारा
I = V/R
⇒ V= IR
अतः वोल्टता सुग्राहिता SV = θ/V = θ/IR = 1/R, NAB/C
या SV = S1/R

धारामापी के प्रतिरोध तथा दक्षतांक का निर्धारण
माना धारामापी का प्रतिरोध G है तथा इसे श्रेणीक्रम में उच्च प्रतिरोध RH के साथ संयोजित कर इसमें E विद्यत वाहक बल के सेल द्वारा धारा प्रवाहित करने पर धारामापी का संकेतक n अंशों पर विक्षेप प्रदर्शित करता है।
अतः विक्षेप θ = n …(1)
तथा धारामापी में n अंश विक्षेप के लिए प्रवाहित धारा
1= E/ RH़G …(2)

अब यदि धारामापी के समान्तर क्रम में शंट प्रतिरोध त् इस प्रकार प्रयुक्त किया जाए कि कुजी K2 की. लगाने पर धारामापी में विक्षेपित अंश n/2 रह जायें तब परिपथ में प्रयुक्त कुल प्रतिरोध
R1 = RH ़ GR/R़G …(3)

सेल से प्राप्त धारा I1 = E/Rt = E/ RHk~ ़ GR/ R़G = E;R़G)/ RH;R़G)़GR . …(4)
इस स्थिति में धारामापी से प्रवाहित धारा, I1 का R/(R़G) भाग होगी तथा यह अर्द्ध विक्षेप के लिए प्रारम्भिक धारा I की आधी होगी,
अर्थात् = I/2= I1 R/;R़G)
समीकरण (2) व (4) से मान रखने पर
E/2;RH़G)= E;R़G)/[RH ;R़G)़GR]. R/;R़G)
⇒ RHk~ ;R़G)़GR = 2R;RH़G)
⇒ RHR ़ RHG़GÙj 2 RHR ़ 2RG
⇒ RHG – GÙj RHR
या धारामापी का प्रतिरोध = G= RH × R/ RH – R
जहां . RH = उच्च प्रतिरोध बॉक्स. में प्रयुक्त प्रतिरोध
तथा R  = अर्द्धविक्षेप के लिए धारामापी के समान्तर क्रम में प्रयुक्तःशंट प्रतिरोध
पुनः समीकरण (1) से धारामापी का दक्षतांक X  = I/ θ = I/n = 1/n ;E/Rμ ़G)

तथा यदि धारामापी के कुल अंशों की संख्या छ है तो धारमापी की पूर्ण स्केल पर विक्षेप के लिए आवश्यक धारा या पूर्ण स्केल विक्षेप धारा
Ig = NX= ;E/Rμ ़G).N/n
 धारामापी का अमीटर में रूपान्तरण
अमीटर (एम्पियर-मीटर) परिपथ में एक बड़े मान की धारा का एम्पियर में मापन करने का उपकरण है। इसे परिपथ के श्रेणीक्रम में संयोजित किया जाता है तथा अमीटर का प्रतिरोध अल्प होना चाहिए ताकि यह परिपथ में प्रवाहित धारा के मान को परिवर्तित न कर सके। आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होना चाहिए परंतु यह संभव नहीं है। अतः धारामापी को अमीटर में रूपान्तरित करने के लिए धारामापी कुण्डली के समान्तर क्रम में एक उचित मान का अल्प प्रतिरोध जोड़ते हैं जिसे शंट कहते है। इस प्रकार बने अमीटर का कुल प्रतिरोध जोड़े गए शंट प्रतिरोध से भी कम होता है। .
आवश्यक शंट प्रतिरोध का मान, बनाये जाने वाले अमीटर की परास, धारामापी के प्रतिरोध एवं पूर्ण स्केल विक्षेप धारा के मान पर निर्भर करता है।
आवश्यक शंट प्रतिरोध की गणना –
माना I परास का अमीटर बनाना है तब शंटयुक्त धारामापी को, इस धारा प् के मापन के लिए प्रयुक्त करने पर धारामापी में पूर्ण स्केल विक्षेप धारा Ig के समान धारा प्रवाहित होनी चाहिए तथा शेष धारा IS = I-Ig शंट प्रतिरोध से होकर प्रवाहित होनी चाहिए।
चूंकि धारामापी एवं शंट प्रतिरोध परस्पर समान्तर क्रम में है। अतः
या IgG = ISS
अतः आवश्यक शंट प्रतिरोध का मान S= IgG/;I-Ig)
 धारामापी का वोल्टमीटर में रूपान्तरण
वोल्टमीटर को दो बिन्दुओं के मध्य विभवान्तर मापन के लिए प्रयुक्त किया जाता है। वोल्टमीटर को इन दो बिन्दुओं के समान्तर क्रम में संयोजित किया जाता है अतः इसका प्रतिरोध उच्च होना चाहिए ताकि यह मापे जाने वाले विभवान्तर से धारा अल्प मात्रा में ही ग्रहण करे अन्यथा मापे जाने वाले विभवान्तर में बड़ा परिवर्तन उत्पन्न हो जायेगा तथा मापन त्रुटिपूर्ण होगा।
धारामापी को वोल्टमीटर में रूपान्तरित करने के लिए धारामापी की कुण्डली के श्रेणी क्रम में उच्च प्रतिरोध त्ष्भ् संयोजित किया जाता है। R”H ‘ का मान वोल्टमीटर की परास टए धारामापी के प्रतिरोध G एवं पूर्ण स्केल विक्षेप धारा Ig के मान पर निर्भर करता है।
माना V परास का वोल्टमीटर बनाना है जिसके लिए धारामापी के श्रेणीक्रम में उच्च प्रतिरोध R”H जोड़ा जाता है। जब इसे विभवान्तर V के मापन के लिए प्रयुक्त किया जाता है तो धारामापी में पूर्ण स्केल विक्षेप धारा प्ह प्रवाहित होनी चाहिए अतः
V  = Ig (G़R”H)

अतः आवश्यक उच्च प्रतिरोध R”H = V/ Ig = G