खुशहाली के विचार की फगर्कल्पना Re imagining the Idea of Happiness खुशहाली सूचकांक का इतिहास क्या है ?

By   December 4, 2021

खुशहाली सूचकांक का इतिहास क्या है ? Re imagining the Idea of Happiness in hindi खुशहाली के विचार की फगर्कल्पना 
पृष्ठभूमि (Background)
जुई 2011 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने एक संकल्प पारित किया। इसने सदस्य देशों से अपनी जनता की खुशहाली अथवा सुखानुभूति मापने के लिए आमंत्रित किया और इसका उपयोग जन-नीतियों को निर्देशित करने के लिए कहा। इसके पश्चात अप्रैल 2013 मंे संयुक्त राष्ट्र में खुशहाली एवं कुशलता पर एक उच्च-स्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता भूटान के प्रधानमंत्री ने की। उसी समय प्रथम विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2013 प्रकाशित हुआ14। इसके कुछमहीनों बाद कुशलता मापने के अंतर्राष्ट्रीय मानद.ड के रूप में ओ.ई.सी.डी. मार्गदर्शक (OECD  Guidance) आएं।
खुशहाली के विचार की फगर्कल्पना
(Re imagining the Idea of Happiness)
मानवता के लिए सुखमय जीवन न केवल संतों, फकीरों और दार्शगिकों बल्कि अर्थशास्त्रियों का भी लक्ष्य रहा है। अर्थशास्त्र संबंधी जितना भी साहित्य है उन्नति, वृद्धि तथा विकास पर, वह अंततः मानव जीवन में अधिक
सुख और आनंद ने के लिए लक्षित रहा है। समय के साथ-साथ अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। इस अत्यंत आत्मपरक शब्दावली ‘खुशहाली’ अथवा आनंद की व्याख्या करने के लिए और अंततः मानवता आज यहाँ तक पहुँची है।
एक समय ऐसा भी आया जबकि विद्वानों और विश्व नेताओं ने यह चरम प्रश्न उठाया – क्या आज हम अधिक खुशहाल हैं? और पूरी दुनिया में इसकी जाँच/परीक्षा के पश्चात संयुक्त राष्ट्र संकल्प 2011 आया जिसमें सदस्य देशों का आह्नान किया गया कि वे अपनेलोगों की खुशहाली के स्तर को मापें और इसी आधार पर जन-नीतियों का निर्माण करें। डब्ल्यू.एच.आर. 2012 के ही एक रोचक और आँख खोलगे वाली जिज्ञासा रखी गई है कि दुनिया मंे मानव-कुशलता अथवा खुशहाली की स्थिति क्या है? आगे वाले समय मंे नीति-निर्माताओं के बीच जो बदलाव अपेक्षित हैं, उसे समझने के लिए प्रथम डब्ल्यू.एच.आर. से कुछ विचारों को उठा लेना श्रेयस्कर होग।
i. यह चरम विरोधाभासों का युग है। एक ओर जहाँ दुनिया मंे अकल्पनीय परिष्कार वाली तकनीक कालोग आनंद उठा रहे हैं, वहीं एक बिलियनलोगों के पास पर्याप्त भोजन भी नहीं है। विश्व अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक और सांगठगिक प्रगति के बूते पर उत्पादकता के नये शिखर छू रही है, लेकिन साथ ही उसी अनुपातमंे इससे प्राकृतिक पर्यावरण का क्षय हो रहा है। पारम्परिक पैमाने पर देखें तो अनेक देशों में भारी आर्थिक प्रगति हुई है, लेकिन इस के साथ आधुनिक जीवन में मोटापा, धूम्रपान, मधुमेह, अवसाद आदि व्याध्यिाँ बढ़ रही हैं। बुद्ध और सुकरात जैसे संतों-महात्माओं ने मानवता को बार-बार आगह किया था कि केवल भौतिक उपलब्धिा हमारी आंतरिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकती। मानवीय आवश्यकताओं विशेष कर कष्टों को दूर करने, सामाजिक न्याय तथा आनंद की प्राप्ति के लिए भौतिक जीवन का उपयोग होना चाहिए।
ii. डब्ल्यू.एच.आर. 2012 अमेरिका-विश्व की आर्थिक महाशक्ति-के बारे में एक उदाहरण प्रमुखता से प्रस्तुत करता है, जिसने पिछली आधी सदी के दौरान महान आर्थिक और तकनीकी प्रगति की है, लेकिन नागरिकों की आत्म प्रतिवेदित (ैमसत्मिचवतजमक) प्रसन्नता में बिना कोई वृद्धि किए, जो कि आज की निम्नलिखित गंभीर चिंताओं से प्रकट होता हैः
(अ) अनिश्चितता एवं चिंता चरम पर।
(ब) सामाजिक और आर्थिक असमानता में भारी वृद्धि।
(स) सामाजिक विश्वास अथवा भरोसे में कमी।
(द) सरकार में भरोसा सर्वकालिक न्यूनता।
शायद इन्हीं कारणों से, अमेरिका में दशकों की सकल घरेलू उत्पाद (जीएनपी) में बढ़त के बावजूद जीवन-संतुष्टि स्तर स्थिर रहा है।
;iii) निर्धनता, चिंताए पर्यावरण क्षय तथा अप्रसन्नता अगर किेल प्रचुरता की वास्तविकता,ँ हैं तो यह अनायास नहीं हैं और मात्र जिज्ञासा का विषय नहीं है। इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत हैय मानव इतिहास के इस मुकाम पर, ज्ञातव्य हो कि हम आज एक नये युग में प्रवेश कर रहे हंै ‘ऐन्थ्रोपोसिन’(Anthropocene) नाम दिया है इसे हमारे भू-प्रणाली वैज्ञागिकों ने। ‘ऐन्थ्रोपोसिन’ हमारे समाज को अनिवार्य रूप से बदलेग। यदि हम वर्तमान आर्थिक प्रक्षेप-पथ को विचारहीन होकर जारी रखते हैं तो इसका अर्थ होग कि हम धरती के जीवन रक्षक प्रणालियों य आहार आपूर्ति, स्वच्छ जल, तथा स्थिर जलवायुय जो कि मानव स्वास्थ्य बल्कि कहीं-कहीं तो मानवीय अस्तित्व के लिए अनिवार्य है, को जोखिम मंे डाल रहे हैं। आगे वाले वर्षों या दशकों में धरती के कुछ भंगुर भागें में जीवन वास्तव में कठिन हो जागे वा है। हम जीवन रक्षक प्रणालियों में आई गिरावट को अभी ही ‘हाॅर्न आॅफ अफ्रीका’ तथा मध्य ,शिया के कुछ शुष्क इकों में महसूस कर रहे हैं।
दूसरी ओर, यदि हम बुद्धिमत्तापूर्वक आगे बढ़े तो हम पूरी दुनिया में जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाते हुए भी धरती की सुरक्षा कर सकते हंै। ऐसा हम उन जीवनशैलियों एवं तकनीकों का इस्तेमाल करके कर सकते हैं जो खुशहाली (अथवा जीवन संतुष्टि) की अभिवृद्धि करते हैं और दूसरी ओर पर्यावरण को मानव समाज से हुई क्षति को भी कम कर सकते हैं। कुशलता (Well Being), सामाजिक समावेशिता तथा पर्यावरणीय धारणीयता को मिकर एक शब्दावली बनी है –
धरणीय विकास (Sustainable Development)। निष्कर्ष रूप में इसके संदेह नहीं कि ‘खुशहाली की खोज’ ही ‘धरणीय विकास की खोज’ से अत्यंत सघन रूप मंे जुड़ी है।
;iv) एक निर्धन समाज में भौतिक उपलब्धिा की चाह का विशेष आधार जरूर बनता है। उच्चतर घरेलू आय (अथवा उच्च प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद) निर्धनों के जीवन स्तर में सुधार को रेखांकित करता है। निर्धनलोग अनेक प्रकार की वंचनाओं का संकट झेलते हैं-अपर्याप्त आहारापूर्ति, आयप्रद रोजगर, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच, सुरक्षित आवास, सुरक्षित जल तथा स्वच्छता तथा शैक्षिक अवसर। एकदम निचले स्तर पर आय वृद्धि से निश्चित रूप से मानवीय कुशलता की स्थिति सुधारती है। इसमें आश्चर्य नहीं कि अपनी अल्प आय में वृद्धि से निर्धनलोग बढ़ती संतुष्टिको प्रतिवेदित या अभिव्यक्त करते हैं।
आय-वर्णक्रम (Income Spectrum) के विपरीत छोर पर उच्च आय वर्ग के अधिकतरलोगों के लिए मूलभूत वंचनाओं को पराजित कर लिया गया है। उगके पास दैगिक जरूरतों के लिए पर्याप्त भोजन है, आवास तथा मूलभूत सुविधाएं (जैसे-स्वच्छ जल तथा स्वच्छता) तथा वस्त्र आदि हैं। वास्तव मंे, मूलभूत जरूरतों के ऊपर उगके पास सुविधाओं का आधिकय है। समृद्धि की दशाओं ने स्वयं अपने लिए फंदे तैयार कर लिए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि समृद्धलोगों की जीवन शैली से निर्धनलोगों के अस्तित्व के लिए जोखिम पैदा होता है। मानव-प्रयासों से जलवायु परिवर्तन पहले ही निर्धन क्षेत्रों के लिए त्रासदी रहा है, इससे जीवन भी खतरे में पड़ रहा हैं। आजीविका भी छिन रही है। यह स्थिति बता रही है कि सम्पन्नलोग उनलोगों (निर्धनों) से इतने अलग होते हैं जिगके अस्तित्व को वे जोखिम में डाल रहे हैं, कि उनमें व्यावहारिक अथवा नैतिक रूप से अपने व्यवहार के प्रति कोई दायित्व-बोध नहीं होता कि उसका प्रतिकूल प्रभाव कितना गहरा है।
;v) समृद्धि के साथ विपत्तियाँ और समस्याएँ भी आई हैं, जैसे-मोटापा, वयस्क मधुमेह, तम्बाकू जनित रोग, खान-पान की गड़बड़ियाँ, मनोवैज्ञागिक गड़बडियाँ, शाॅपिंगए टीवी तथा जुए की आदतें -ये सब विकास की अव्यवस्था और गड़बड़ियों के उदाहरण हैं। उसी प्रकार समुदाय की क्षति, सामाजिक भरोसे में कमी तथा आध्ुगिक भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था की लहर से उपजी चिंताएँ, बेरोजगरी का खतरा अथवा स्वास्थ्य बीमा से अनवरित बीमारियाँ (अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों में) आदि भी जीवन को दूभर बना रहे हैं।
;अपद्ध उच्च औसत आय से हमेशा औसत कुशलता का स्तर ऊँचा नहीं किया जा सकता, इसका सटीक उदाहरण अमेरिका है, जैसा कि प्रोफेसर रिचर्ड ईस्टरलीन ने गैर किया है, जहाँ सकल प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय उत्पाद 1960 से तीन के कारक में बढ़ी है जबकि औसत प्रसन्नता की माप पिछली आध्ी सदी से अपरिवर्तित रही है। अमेरिका के बढ़ते उत्पादन से पर्यावरण की व्यापक क्षति हुई है, खासकर ग्रीन हाउस गैसों तथा मानव प्रेरित जलवायु परिवर्तन के माध्यम से और तब भी अमेरिकीलोगों की कुशलता का स्तर बढ़ा नहीं। इस प्रकार हमारे पास कुशलता का अल्पकालिक भ बनाम दीर्घकालिक पर्यावरणीय गत का कोई ‘टेªड-आॅफ’ नहीं, हमें अल्पकालीन लाभों को आॅफसैअिंग (off setting) के बिना भी पर्यावरण की क्षति सहनी है। ईस्टरलीन ने अमेरिका में यह विरोधाभास उजागर किया कि किसी भी समय धनी निर्धनों से अधिक खुश (प्रसन्न) हैं, लेकिन कुल मिकर समाज में सम्पन्नता आगे के बाद भी प्रसन्नता नहीं बढ़ी। ऐसा चार कारणों से हुआ:
(अ) व्यक्ति अपनी तुलना दूसरों से करते हैं। वे उस सम खुशहाल रहते हैं जब सामाजिक (अथवा आय के) सोपान पर वे ऊँचे स्थान पर रहते हैं। तब भी जब सभी साथ-साथ ऊँचाई पर आते हैं तो उगकी सापेक्षिक स्थिति अपरिवर्तित रहती है।
(ब) लाभों में समान हिस्सेदारी नहीं की गई, बल्कि वे अधिक भ में रहे जो आय तथा शैक्षिक वितरण में शीर्ष पर थे।
(स) अन्य सामाजिक कारकों-असुरक्षा, सामाजिक भरोसे में कमी, सरकार के प्रति भरोसे में कमी-ने उच्च आय के लाभों को महसूस नहीं होने दिया।
(द) जब व्यक्तियों की आय बढ़ती है तो उगकी खुशहाली मंे एक आरंभिक उछाल आता है, लेकिन बढ़ी हुई आय के साथ अनुकूलगी के साथ ही वे खुशहाली के फराने स्तर पर लौट आते हैं।
;vii) यह (फिनोमेना परिघटना) धनी देषांे के आर्थिक वृद्धि प्राप्त करने के बाद उगकी खुशहाली को बढ़ाने में रुकावट बन जाती है। वास्तव में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सतत् वृद्धि ही खुशहाली का रास्ता है। इस सूत्र (फार्मू) पर संदेह करने के अन्य सामान्य कारण भी हैं, जबकि उच्च आय कुछ हद तक खुशहाली की वृद्धि कर सकती है, उच्चतर आय की आकांक्षा वास्तव में व्यक्ति की खुशहाली को कम कर देती है। दूसरे शब्दों मंे, अधिक पैसा होना अच्छा हो सकता है, लेकिन इसके लिए यित रहना उचित नहीं हो सकता। मनोवैज्ञागिकों ने बार-बार यह दिखाया है कि उच्च आय के लिए उच्च प्रीमियम चुकाने वालेलोग सामान्यतया कम सुखी होते हैं, जबकि उगके मुकाबले वे व्यक्ति अधिक सुखी होते हैं जो उच्चतर आय की लसा नहीं रखते। अरस्तू और बुद्ध ने मानवता को उपदेश दिया था कि वह एक ओर तपश्चर्या और दूसरी ओर भौतिक समृद्धि की लसा के बीच मध्य मार्ग का अनुसरण करे।
;viii) एक और समस्या है नई भौतिक आवश्यकताओं की अनवरत विज्ञापनों के माध्यम से, जिसमें शक्तिशाली रूपकों के साथ ही प्रेभन के अन्यान्य साधनों का उपयोग किया जाता है। चूँकि ये रूपक और बिंबविधन हमारे उपयोग के समस्त डिजिटल उपस्करों पर उपलब्ध हैं, विज्ञापन का अभूतपूर्व प्रवाह हमारे बीच बन रहा है। आज विज्ञापन 500 बिलियन डाॅलर प्रतिवर्ष का व्यवसाय बन गया है। इसका लक्ष्य तृप्ति अथवा संतुष्टि पर विजय पाना हैय आवश्यकताओं और लसाओं का सतत सृजन करके विज्ञापगकर्ता एवं विपणगकर्ता इसके लिएलोगों की मनोवैज्ञागिक कमजोरियों एवं अचेतन में पल रही इच्छाओं का भ उठाते हैं। सिगरेट, कैफीन, चीनी तथा ट्रांस-फैट्स -सभी लसा पैदा करने वाली चीजें हैं अगर इन्हें सीधो-सीधे व्यसन न भी मानें तो। भौतिक बिंबविधन को लगतार साफ-साफ दिखाकर फैशन को बेचा जाता है। उसी प्रकार विभिन्न उत्पादों को उच्च सामाजिक स्थिति से न कि वास्तविक जरूरतों से जोड़कर दिखाया और बेचा जाता है।
;पगद्ध धनी बगकर सुखी बनने के चिंतन को ‘आज की सीमांत उपयोगिता के हृास’ के नियम से भी चुनौती मिलती है, जिसके अनुसार एक निश्चित बिन्दु पर उपलब्धिायाँ/भ बहुतकम/ छोटे होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि निर्धनलोग आय में कुछ डाॅलर का इजाफा होने पर ही धनीलोगों से अधिक खुशहालया सुखी होते हैं। यह एक बेहतर कारण है जिसके चलते ओ.ई.सी.डी. देशों में कर एवं स्थानांतरण प्रणाली (Cash and Transfer Systems) इस प्रकार बन गई है जिसके उच्च आय वाले परिवारों से राजस्व वसू जाता है और निम्न आय वाले परिवारों में उसका स्थानांतरण कर दिया जाता है। दूसरे तरीके से देखें तो घरेलू आय में असमानता कुल कर एवं स्थानांतरण (Net of Taxes and Transfers) प्रणालीगत रूप में पहले के करों एवं स्थानांतरणों (Before Taxes and Transfers) से निम्न या कम होता है।
;x) पश्चिमी अर्थशास्त्रियों का सतत् जी.एन.पी. वृद्धि का तर्क मानवता के ऐसे विजन से निर्मित है, जो संतों-उपदेशकों के विवेक, मनोवैज्ञागिकों के शोधें तथा विज्ञापगकर्ताओं के अभ्यास के विरुद्ध खड़ा है। अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि व्यक्ति ‘तर्कसंगत निर्णयकर्ता’ होते हैं जो जागते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और उसे कैसे प्राप्त करना है अपने निर्धारित बजट में। व्यक्ति अपना ही ध्यान रखते हैं और अपने द्वारा किए गए उपभोग से आनंद प्राप्त करते हैं। एक उपभोक्ता के रूप में अपनी प्राथमिकताओं के बदलगे का अंदाजा उन्हें पहले ही हो जाता है। कुछ अर्थशास्त्री तो यहाँ तक कहते हैं कि दवा-व्यसनी (äugAddicted) तर्कसंगत व्यवहार करते हैं-दवा उपयोग के शुरुआती लाभों के बाद के भारी व्यसन के नुकसान को ‘टेªड आॅफ’ करके।
;xi) हम यह समझते हैं कि हमें एक भिन्न प्रकार की मानवता का माॅडल चाहिए, जिसमें हममें आवेगें, भावनाओं और तर्कसंगत सोच, अचेतन या चेतन निर्णय निर्धरण, तीव्र अथवा मंद चिंतन प्रक्रिया की एक जटिल प्रक्रिया चलती रहे। हम अनेक निर्णय भावनाओं अथवा प्रवृत्तिगत आवेगें में लेते हैं, जिगहें बाद में सचेत विचार से तर्कसंगत बनाया जाता है। हमारे निर्णय संगतों बिम्बविधनों, सामाजिक संवर्गें तथा विज्ञापनों से प्रभावित होते हैं। हम अपने अनुक्रमिक पसंदों या विकल्पों (Sequential Choices) के प्रति असंगत या असमरूप हो सकते हैं, जिससे कि सुसंगत स्थिरता के मूल मागकों को हासिल करने में हम किेल रहते हैं और हम अपनी मानसिक तंत्र के प्रति भी अनजाग रहते हैं जिससे कि हम गलतियाँ कर बैठते हैं। व्यसनी अपने आगे वाले दिनों की वेदना का अंदाजा नहीं लग सकता। हम अभी खर्च करते जाते हैं, दिवालिएपन का परिणाम बाद में भुगतते हैं। हम पुनः यह समझते हैं कि हम सामाजिक पशु हैं। हम गकल करके सीखते हैं, सामाजिक परम्पराओं को निभाकर खुशी हासिल करते हैं, साथ ही समुदाय के प्रति जुड़ाव और लगव महसूस करते हैं।
;गपपद्ध मनुष्य दूसरों के दर्द को महसूस करता है। हमारे अंदर ‘मिरर न्यूराॅन्स’ होते हैं जिससे हम दूसरों के दृष्टिकोण से भी चीजों को देख-समझ सकते हैं। इन क्षमताओं के कारण हम अजनबियों से भी सहयोग कर सकते हैं, और उन कार्यों में भी खुद को लग सकते हैं जिनमें किसी प्राप्ति या फरस्कार की संभावना न हो। साथ ही असहयोग करने वों को दंडित करने की भी क्षमता हममें होती है और अपने ऊपर खतरा मोल लेकर भी हम द.ड को कार्यान्वित करते हैं।
तब भी इस प्रकार के सहयोग एवं साझेपन की एक सीमा है। हम धेखा भी करते हैं, वचन भंग भी करते हैं, यहाँ तक कि बाह्य समूह के सदस्यों को मार भी देते हैं। हम अस्मिता की राजनीति में संलग्न रहते हैं, बाहरियों के प्रति क्रूरता बरतते हैं, क्योंकि अपने समूह के प्रति अपनापन रखते हैं। मानव स्वभाव हमेशा से ऐसा रहा है, उस समय भी जब बुद्ध ने मानवता को सांसारिक सुखों की मरीचिकाओं के बारे में शिक्षा दी थी, तब भी जबकि ग्रीकांे ने हमें बहकाने वाले उन ‘सायरन साँग्स’ के प्रति सावधन किया था जो हमें हमारी जीवन धरा से विलगी कर सकते थे। आज हमारे पास पहले की तुलना में बहुत अधिक विकल्प हैं। प्राचीन संसार में विकल्प अत्यल्प थेय खूब मेहनत करना ताकि पर्याप्त भोजन मिल सके.और तब भी अकाल और महामारी के जोखिम का सामना करना।
;xiii) आज, हमारे पास विकल्प वास्तव में मौजूद हैं। क्या दुनिया को सकल राष्ट्र उत्पाद (जी.एन.पी.) को पर्यावरण विनाश की सीमा तक आगे बढ़ाना चाहिए, तब भी जबकि स.रा.उ. (जी.एन.पी.) के संवृद्धि भ (Incremental Gains) में बढ़त नहीं हो रही है और समृद्ध वर्गें में खुशहाली की वृद्धि नहीं हो रही है? क्या हमें समुदाय और सामाजिक भरोसे की कीमत पर उच्चतर निजी आय के पीछे भागना चाहिए? क्या सरकारों को विज्ञापनों पर प्रतिवर्ष खर्च होने वाले 500 बिलियन डाॅलर के एक छोटे-से अंश को इस काम के लिए नहीं खर्च करना चाहिए किलोगों को और परिवारों को अपनी प्रेरणाओं, आवश्यकताओं तथा उपभोक्ता के रूप में अपनी जरूरतों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिले? क्या हमें समाज के कुछ हिस्सों को मुनाफै की प्रेरणा से बाहर गिकालकर समाज में सहयोग, भरोसा तथा सामुदायिकता को बढ़ाने के लिए काम नहीं करना चाहिए? हाल के एक विश्लेषण में फिनलैंड की स्कूली व्यवस्था की उत्कृष्टता के बारे में कहा गया है कि इसे स्कूें में सामुदायिकता तथा समानता की भावना जागृत करके हासिल किया गया है। यह अमेरिका के शिक्षा सुधार से बिल्कुल अलगहै जहाँ कि जोर परीक्षा, माप तथा विद्यार्थियों के जाँच प्रदर्शन पर आधरित शिक्षकों के वेतन पर है।
और अंत में (At the End)
डब्ल्यू एच आर 2012 के आत्मपरीक्षक अध्ययनों से यह निष्कर्ष गिकलता है कि ऐसा मानने के पर्याप्त कारण हैं कि हमें खुशहाली, कुशलता के आर्थिक ड्डोतों पर पुर्नविचार करने की जरूरत है, समृद्ध देशों में और भी अधिक। उच्च आय वाले देशों ने गरीबी, भूख और बीमारी के संकट पर बहुत हद तक पार पा लिया है। गरीब देशों को इनसे मुक्ति पानी है, लेकिन निर्धनता की समाप्ति के पश्चात् आगे क्या? आखिर मूलभूत आर्थिक जरूरतें सामाजिक परिवर्तन की चालक नहीं रह जातीं, तब खुषहाली-कुषलता प्राप्त करने का रास्ता क्या हो? ऐन्थ्रोपोसिन काल में मानवता का पथ-प्रदर्शन कौन करेग-विज्ञापनए धरणीयता, समुदाय, अथवा कुछ और? खुशहाली अथवा सुख का रास्ता कौन-सा है?
अधिकतरलोग मानते हैं कि समाजों को अपने नागरिकों के लिए खुशहाली की प्राप्ति करनी चाहिए। अमेरिका के संस्थापक पूर्वजों ने सुख अथवा प्रसन्नता प्राप्त करने के अनहरणीय अधिकार को मान्यता दी थी। ब्रिटिश दार्शगिकों ने ‘गेटेस्ट गुडफाॅर दि ग्रेटेस्ट नम्बर’ की चर्चा की थी। भूटान ने अपने लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के स्थान पर प्रसिद्ध सकल घरेलू खुशहाली (Gross National Happiness) के लक्ष्य को अपनाया। चीन भी समरस समाज के रास्ते चलेगी चाहता है। तब भी अधिकतरलोग शायद अब भी मानते हैं कि सुख या खुशहाली देखने वों की आँखों में है, यह एक वैयक्तिक पसंद है, वह ऐसी कोई चीज है जिसे निजी तौर पर देखने और बरतने की जरूरत है, एक राष्ट्रीय नीति के तौर पर चने की नहीं। खुशहाली बहुत हद तकभावनिष्ठ अथवा आत्मपरक, जटिल अवधरणा है जिसे राष्ट्रीय लक्ष्यों की कसौटी नहीं बनाया जा सकता, लेकिन यह पारम्परिक विचार है, अनुभव और सा{य इस विचार को तेजी से बदल रहे हैं।
मनोवैज्ञागिकों, अर्थशास्त्रियों, चुनाव विशेषज्ञों, समाजशास्त्रियों तथा अन्य विशेषज्ञों के अध्ययनों ने यह दर्शाया है कि खुशहाली यद्यपि एक आत्मपरक अनुभव है, इसकी वस्तुनिष्ठ माप, आकलगी, प्रेक्षणीय मस्तिष्क प्रकार्यता के साथ उसकी सह-संबद्धता स्थापित करना संभव है तथा व्यक्ति एवं समाज की विशेषताओं के साथ उसकी संबद्धता का पता लगया जा सकता है।लोगों से यह पूछना कि क्या वे खुश हैं, अपने जीवन से संतुष्ट हैं, समाज के बारे में भी कई महत्वपूर्ण सूचना,ँ देता है। यह समाज के आंतरिक संकटों तथा मजबूती का संकेत भी कर सकता है। यह परिवर्तन की जरूरतों के बारे में भी बता सकता है। खुशहाली के उभरते हुए वैज्ञागिक अध्ययन का विचार चाहे वे व्यक्ति और उगकी पसंद एवं विकल्प हों या जीवन संतुष्टि के बारे में समाज अथवा नागरिकों द्वारा व्यक्त मत -डब्ल्यू.एच.आर. 2012 खुशहाली के प्रमुख मापों के आधार पर इन अध्ययनों की कथा का सार प्रस्तुतकरता हैः
;i) दैगिक आवेगें में उतार-चढ़ाव, तथा;
;ii) एक व्यक्ति का जीवन के बारे में समग्र मूल्यांकन।
पहली कोटि को प्रायः ‘प्रभावित’ या ‘कृत्रिम’ खुशहाली कहते हैं, जबकि दूसरी को ‘मूल्यांकनीय खुशहाली’।
यह जागना आवश्यक है कि दोनों ही प्रकार की खुशहालिओं के पहले से जागने योग्य (Predictable) कारक हैं, जिनमें हमारी मानवीय प्रवृत्ति तथा सामाजिक जीवन के अनेक पक्ष उजागर होते हैं। प्रभावित खुशहाली (effective Happiness) दैनंदिन की मित्रता की खुशी, परिवार के साथ समय बिताना और यौन क्रिया और दफ्रतर में अपने वरिष्ठ के साथ बैठकों में प्रतिबिंबित होती है। दूसरी ओर मूल्यांकनीय खुशहाल जीवन के और ही आयामों की माप करती है -उगकी जो समग्र खुशहाली अथवा निराशा के लिए जिम्मेदार होते हैं। उच्चतर आय, शरीर और मन की बेहतर तंदुरुस्ती और साथ ही व्यक्ति के अपने समुदाय के प्रति उच्च विश्वास -ये सब उच्च जीवन संतुष्टि के कारक हैं, जबकि खराब स्वास्थ्य तथा समुदाय में गहरे विभाजन निम्न स्तर की जीवन संतुष्टि के परिचायक हैं।
खुशहाली विभिन्न समाजों एवं कों में प्रणालीगत रूप में भिन्न होती है और इसके कारण पहचाने जा सकते हैं। यहाँ तक कि जन-नीतियों की रूपरेखा और उगके कार्यान्वयन के तरीकों से इन्हें बद भी जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है किए किस प्रकार विशेष प्रकार की नीतियों को गू कर राष्ट्रीय आय को बढ़ाया जा सकता है, उसी प्रकारलोगों की खुशहाली अथवा सुख की भी अभिवृद्धि की जा सकती है। भूटान इस दिशा में अत्यंत और गहरी अंतदृष्टि से युक्त सर्वथा नये प्रयास कर रहा है। एक घर की आय जीवन संतुष्टि मेंयोग करती है, लेकिन सीमित रूप में, दूसरी चीजें अधिक प्रभावी होती हैं:
;i) सामुदायिक विश्वास अथवा भरोसा।
;ii) शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य।
;iii) गवर्नेंस (राजकाज) की गुणवत्ता एवं कानून का शासन।
आय बढ़ाकर विशेषकर निर्धन समाजों में खुशहाली बढ़ाई जा सकती है, लेकिन सहयोग और एकता बढ़ाकर बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं – खासकर धनी समाजों में जहाँ आय की सीमांत उपयोगिता निम्न होती है। यह आकस्मिक नहीं है कि दुनिया के वही सबसे सुखी और खुशहाल देश उच्चतम आय वाले देश भी बनने की ओर अग्रसर होते हैं जिगके यहाँ सामाजिक समानता, भरोसा तथा गुणवत्तापूर्ण गवर्नेंस होता है। हाल के वर्षों में डेनमार्क ऐसे देशों में शीर्ष पर है। यह भी अनायास नहीं है कि पिछले पचास वर्षों में अमेरिका में जीवन-संतुष्टि स्तर नहीं बढ़ा है, जबकि इसी अवधि में असमानता बढ़ी है, सामाजिक भरोसे में कमी आई है औरलोगों का सरकार में विश्वास कम हुआ है।
खुशहाली के सह-संबद्धों की पहचान कर लेना एक बात है और पूरे समाज में अनुकूल जन-नीतियों के इस्तेमालसे खुशहाली का स्तर बढ़ा देना दूसरी बात। भूटान के जी.एन.एच. (Gross National Happiness) का यही लक्ष्य है आरै अधिक-से-अधिक देशाों के लिए लिए जीवन-संतुष्टि स्तर बढ़ाने के लिए प्रेरणा भी। प्रमुख लक्ष्य यह है कि पूरे समाज के खुशहाली स्तर को मापने में विभिन्न प्रयासरत देश ‘खुशहाली जाल’ (Happiness Trap) की अनदेखी कर सकते हैं जो कि अमेरिका में हाल के दशकों में देखने को मिले, जहाँ कि जी.एन.पी. लगतार ऊपर चढ़ता रहा जबकि जीवन संतुष्टि का स्तर नीचे गिरता रहा।
भूटान में जबसे (1972) राजा ने सुख के लक्ष्य को दौलत के लक्ष्य से ऊपर रखा तबसे जीएनएच (ग्राॅस नेशनल हैप्पीगैस) का विचार अन्वेषण और विकास की एक कहानी सुनाता है। भूटान के लिए सुख महज प्रेरणदायक सूचनापट्ट से बढ़कर साबित हुआ; यह शासन और नीति-निर्माण के लिए भी सुव्यवस्था का सिद्धांत बन गया। ‘जीएनएच इंडेक्स’ दुनिया में अपनी तरह का पह है, सुख को मापने का एक गंभीर, विचारवान और निरंतर प्रयास। उन मापों को सरकारी नीतियां तैयार करने में प्रयोग किया जाता है। ऐसा माना जा रहा है कि आगे वाले सों में दुनिया के कई देश भूटान और हाल ही में प्रकाशित दो वल्र्ड हैप्पिगैस रिपोट्र्स से सीखेंगे।