कठपुतली कला क्या है ? परिचय कठपुतली कला के प्रकार परिभाषा किसे कहते है कहां की प्रसिद्ध है

By   July 5, 2021

कठपुतली कला के प्रकार परिभाषा किसे कहते है कहां की प्रसिद्ध है कठपुतली कला क्या है ? परिचय ?

भारतीय कठपुतली कला
परिचय
कठपुतली कला मनोरंजन के प्राचीन रूपों में से एक है। कलाकार द्वारा नियंत्रित की जा रही कठपुतली का विचारोत्तेजन तत्व इसे मनोरम अनुभव प्रदान करता है, जबकि प्रदर्शन का एनीमेशन और निर्माण की कम लागत इसे स्वतंत्र कलाका के बीच लोकप्रिय बनाती है। इसका प्रारूप कलाकार को रूप, डिजाइन, रंग और गतिशीलता के मामले में अबाधित स्वतंत्रता प्रदान करता है और इसे मानव जाति के सबसे सरल आविष्कारों में से एक बनाता है।

भारतीय इतिहास या भारत में उद्गम
कठपुतली कला दीर्घकाल से मनोरंजन और शैक्षिक उद्देश्यों से भारत में रुचि की विषय-वस्तु रही है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के उत्खनन स्थलों से सॉकेट युक्त कठपुतलियां मिली हैं, जिससे कला के एक रूप में कठपुतली कला की उपस्थिति का पता चलता है। कठपुतली रंगमंच के कुछ संदर्भ 500 ईसा पूर्व के आसपास की अवधि में मिले हैं हालांकि, कठपुतली का प्राचीनतम लिखित संदर्भ प्रथम और द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास रचित तमिल ग्रंथ शिलप्पादिकारम में मिलता है।
कला के रूप के अतिरिक्त कठपुतली का भारतीय संस्कृति में दार्शनिक महत्व रहा है। भागवत में ईश्वर को सत्, रज और तम रूपी तीन सूत्रों से ब्रह्मांड का नियंत्रण करने वाले कठपुतली के सूत्रधार के रूप में वर्णित किया गया है। इसी प्रकार, भारतीय रंगमंच में, कथावाचक को सूत्रधार या ‘सूत्रों का धारक‘ कहा जाता था।
सम्पूर्ण भारत के विभिन्न भागों में नाना प्रकार की कठपुतली परंपराओं का विकास हुआ। प्रत्येक कठपुतलियों का अपना अलग रूप था। पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं और स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार कहानियों को अपनाया गया। कठपुतली कला ने चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और नाटक के तत्वों को आत्मसात् किया और कलात्मक अभिव्यक्ति के अनूठे अवसरों का निर्माण किया। हालांकि, समर्पित दर्शकों और वित्तीय सुरक्षा के अभाव ने आधुनिक काल में कला के इस रूप के निरंतर पतन के मार्ग में प्रशस्त किया है।
भारत में कठपुतली कला को व्यापक रूप से चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। कछ प्रमुख उदाहरणों के साथ प्रत्येक की संक्षिप्त रूपरेखा इस प्रकार दी गई है:

सूत्र कठपुतली

सूत्र कठपुतलियों या मैरियोनेट का भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में प्रमुख स्थान है। सूत्र कठपुतलियों की विशेषताएं इस प्रकार हैंः
ऽ कठपुतलियां लकड़ी से तराशी गई सामान्यतरू 8-9 इंच की लघु मूर्तियां होती हैं।
ऽ त्वचीय रंग वाली लकड़ी को रंगने और आंख, होंठ, नाक आदि जैसी अन्य मुखाकृतिक विशेषताओं का संयोजन करने के लिए तैलीय रंग का प्रयोग किया जाता है।
ऽ अंग बनाने के लिए शरीर के साथ लकड़ी के छोटे-छोटे पाइप बनाए जाते हैं। इसके बाद शरीर को रंगीन लघु पोशाक से ढंका और सिला जाता है।
ऽ यथार्थवादी अनुभूति देने के लिए लघु आभूषण और अन्य सामग्रियां संलग्न की जाती हैं।
ऽ धागा हाथ, सिर और शरीर की पीठ में छोटे छेद से जुड़ा होता हैं । इसके बाद इसे कठपुतली कलाकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
भारत में सूत्र कठपुतली के कुछ लोकप्रिय उदाहरण हैंः

कठपुतली
राजस्थान क्षेत्र की परंपरागत सूत्र कठपुतलियों को कठपुतली के रूप में जाना जाता है। इसका नाम कठ यानी लकड़ी और ‘पुतली‘ यानी गुड़िया से निकला है। कठपुतलियों को पारंपरिक उज्ज्वल राजस्थानी पोशाक पहनाई जाती है। प्रदर्शन नाटकीय लोक संगीत के साथ होता है। कठपुतलियों की एक अनूठी विशेषता पांवों का अभाव है। धागा कठपुतली कलाकार की उंगली से जुड़ा होता है।

कुंधेई
ओडिशा की सूत्र कठपुतलियों को कुंधेई के रूप में जाना जाता है। इन्हें हल्की लकड़ी से बनाया जाता हैं और लंबी स्कर्ट पहनाई जाती है। कठपुतलियों में अपेक्षाकृत अधिक जोड़ होते हैं, इस प्रकार कठपुतली कलाकार को अधिक लचीलापन मिलता है। धागे त्रिकोणीय आधार से जुड़े होते हैं। कुंधेई कठपुतली प्रदर्शन पर ओडिसी नृत्य का उल्लेखनीय प्रभाव है।

गोम्बायेट्टा
यह कर्नाटक का पारंपरिक कठपुतली प्रदर्शन है। इन्हें यक्षगान रंगमंच के विभिन्न पात्रों के अनुसार तैयार और डिजाइन किया जाता है। इस कठपुतली कला की एक अनूठी विशेषता यह है कि कठपुतली नचाने के लिए एक से अधिक कठपुतली कलाकारों की सहायता ली जाती है।

बोम्मालट्टम
बोम्मालट्टम तमिलनाड के क्षेत्र की स्वदेशी कठपुतली है। इसमें छड़ी और सूत्र कठपुतली की विशेषताओं का समाजन होता है। धागे कठपुतली नचाने वाले द्वारा सिर पर पहने जाने वाले लोहे के छल्ले से जुड़े होते हैं। बोम्मालट्टम कठपुतलियां भारत में पायी जाने वाली सबसे बड़ी और भारी कठपुतलियां होती हैं इनमें से कुछ की ऊंचाई 4.5 फुट जितनी बड़ी और वजन 10 किलोग्राम का होता है। बोम्मायलट्टम रंगमंच के चार विशिष्ट चरण हैं- विनायक पूजा, कोमली, अमानट्टम और पुसेनकनत्तम।

छाया कठपुतलियां
भारत में छाया कठपुतली की समृद्ध परंपरा रही है। छाया कठपुतली की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं:
ऽ छाया कठपुतलियां चमड़े से काट कर बनाई गईं समतल आकृतियां होती हैं।
ऽ चमड़े के दोनों ओर आकृतियों को एक समान चित्रित किया जाता है।
ऽ कठपुतलियां श्वेत स्क्रीन पर रखी जाती हैं। इसके पीछे से प्रकाश डाला जाता है जिससे स्क्रीन पर छाया बन जाती है।
ऽ आकृतियों को इस प्रकार चलाया जाता है कि खाली स्क्रीन पर बनने वाला छायाचित्र कहानी कहने वाली छवि बनाता है।
छाया कठपुतली के कुछ लोकप्रिय उदाहरण इस प्रकार हैं:

तोगालु गोम्बायेट्टा
यह कर्नाटक का लोकप्रिय छाया रंगमंच है। तोगालु गोम्बायेट्टा कठपुतलियों की एक अनूठी विशेषता सामाजिक स्थिति के आधार पर कठपुतली के आकार में भिन्नता है। यानी राजाओं और धार्मिक आकृतियों की विशेषतः बड़ी कठपुतलियां होती हैं जबकि आम लोगों और नौकर-चाकरों को छोटे कठपुतलियों द्वारा दिखाया जाता है।

रावणछाया
यह छाया कठपुतली में सबसे नाटकीय है और ओडिशा क्षेत्र में मनोरंजन का लोकप्रिय रूप है। कठपुतलियां हिरण की त्वचा से बनी होती हैं और निर्भीक, नाटकीय मुद्राओं को दर्शाती हैं। इनमें कोई जोड़ नहीं होता है। लिहाजा यह अधिक जटिल कला बन जाती है। साथ ही वृक्षों और जानवरों के रूप में भी कठपुतलियों का प्रयोग होता है। इस प्रकार रावणछाया कलाकार गीतात्मक और संवेदनशील नाटकीय कथा का सृजन करते हुए अपनी कला में अत्यंत प्रशिक्षित होते है।

थोलू बोम्मालटा
यह आंध्र प्रदेश का छाया रंगमंच है। इसमें प्रदर्शन के साथ शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि होती है और यह महाका, और पुराणों की पौराणिक और भक्तिमय कथाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। कठपुतलियां आकार में बड़ी होती है दोनों ओर रंगी होती हैं।

दस्ताना कठपुतलियां
दस्ताना कठपुतलियों को आस्तीन, हाथ या हथेली की कठपुतलियों के रूप में भी जाना जाता है। ये पोशाक के रूप में लंबी उड़ने वाली स्कर्ट पहने सिर और हाथों वाली छोटी आकृतियां होती हैं। कठपुतलियां सामान्यतः कपड़े या लकड़ी की बनी होती हैं, लेकिन कागज की कठपुतलियों के भी कुछ रूपांतर दिखाई देते हैं। कठपुतली नचाने वाला दस्ताने के रूप में कठपुतली पहनता है और अपनी तर्जनी से सिर को नचाता है। अंगूठे और बीच की उंगली का उपयोग करके दोनों हाथ चलाए जाते हैं जिससे मूल रूप से निर्जीव कठपुतली को जीवन और अभिव्यक्ति मिलती है।
सामान्यतः ड्रम या ढोलक की लयबद्ध ताल के साथ प्रदर्शन वाली दस्ताना कठपुतलियां सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोकप्रिय हैं। भारत में दस्ताना कठपुतलियों का लोकप्रिय उदाहरण इस प्रकार हैं:

पावाकूथु
यह केरल की पारंपरिक दस्ताना कठपुतली प्रदर्शन है। इसकी उत्पत्ति 18 वीं सदी ईस्वी के आसपास हुई। कठपुतलियों को रंगीन दुपट्टों, पंखों और हेडगियर (भ्मंकहमंत) से सजाया जाता है। यह कथकली नृत्य शैली से अत्यधिक प्रभावित है। नाटक रामायण और महाभारत की कथाओं पर आधारित होती हैं।

छड़ी कठपुतलियां
छड़ी कठपुतलियां दस्ताना कठपुतलियों के अपेक्षाकृत बड़ा रूपांतर हैं और स्क्रीन के पीछे से कठपुतली कलाकार छड़ी से इन्हें नियंत्रित करता है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत में लोकप्रिय है। कुछ लोकप्रिय उदाहरण इस प्रकार हैं:

यमपुरी
यह बिहार की पारंपरिक छड़ी कठपुतली है। कठपुतलियां सामान्यतः लकड़ी की बनी होती हैं और इनमें कोई भी जोड़ नहीं होता है। इन्हें लकड़ी के एक टुकड़े से तराशा जाता है और उसके बाद चमकदार रंगों से रंगा और सजाया जाता है।

पुतुल नाच
यह बंगाल-ओडिशा-असम क्षेत्र का पारंपरिक छड़ी कठपुतली नृत्य है। आकृतियां सामान्यतः 3-4 फूट लम्बी होती हैं और जात्रा के पात्रों की भांति कपड़े पहने होती हैं। इनमें सामान्यतः तीन जोड़ होते हैं- गर्दन पर और कंधों पर।
प्रत्येक कठपुतली कलाकार ऊंचे पर्दे के पीछे होता है। ये सभी अपनी कमर से जुडी छडी के माध्यम से एक-एक कठपुतली नियंत्रित करते हैं। कठपुतली कलाकार पर्दे के पीछे के चारों ओर चलता है और इसी प्रकार की गति कठपुतलियों को भी प्रदान करता है। प्रदर्शन के साथ हारमोनियम, झांझ और टेबल बजाने वाले 3-4 संगीतकारों का संगीतमय दल संगत देता है।

अभ्यास प्रश्न – प्रारंभिक परीक्षा
1. कठपुतली कला का सबसे पुराना लिखित संदर्भ मिलता है:
(a) शिलप्पदिकारम (b) नाट्यशास्त्र
(c) सामवेद (d) शकुंतलम
2. भारतीय कठपुतली कला के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
(i) कथा कहने वाला सूत्रधार कहा जाता है।
(ii) कठपुतली, सूत्र कठपुतली होती है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल (i) (b) केवल (ii)
(c) (i) और (ii) दोनों (d) न तो (i) न ही (ii)
3. निम्नलिखित में से कौन-सा सही ढंग से सुमेलित नहीं है?
(a) कठपुतली-सूत्र कठपुतली (b) कुन्धेई-छड़ी कठपुतली
(c) रावनछाया-छाया कठपुतली (d) पवकुथु-दस्ताना कठपुतली
4. निम्नलिखित में से कौन-सा सही ढंग से सुमेलित नहीं है?
(a) कठपुतली-राजस्थान (b) बोम्मालट्टम-आंध्र प्रदेश
(c) रावण छाया-ओडिशा (d) पावाकुथु-केरल
5. यमपुरी क्या है?
(a) युद्ध कला (b) कठपुतली कला का रूप
(c) लोक नृत्य (d) लोक संगीत
6. पैरों की अनुपस्थिति अनूठी विशेषता हैः
(a) गोमबयेट्टा (b) पुतुल नाच
(c) बोमालट्टम (d) कठपुतली
उत्तरः
1. ;a) 2. ;c) 3. ;b) 4. ;b)
5. ;b) 6. ;d)

अभ्यास प्रश्न – मुख्य परीक्षा
1. भारत में कठपुतली उद्योग के विकास की बहुत संभावना है। परीक्षण करें।
2. भारत में कठपुतली कला के वर्गीकरण का वर्णन करें।