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एपॉक्साइड किसे कहते हैं Epoxides definition अभिक्रिया लिखिए reaction mechanism in hindi
अभिक्रिया लिखिए reaction mechanism in hindi एपॉक्साइड किसे कहते हैं Epoxides definition zeisel method in hindi जीसल विधि पर टिप्पणी लिखिए ?
जीसल विधि (Ziesel’s Method)
यह ईथर में ऐल्कॉक्सी समूह के परीक्षण एवं भारात्मक आंकलन (Quantitative estimation) की विधि है। इसमें ईथर के ज्ञात भार की अभिक्रिया 57% HI से कराते हैं । अभिक्रिया के फलस्वरूप बने वाष्पशील ऐल्किल आयोडाइड को सिल्वरनाइइट्रेट के ऐल्कोहॉली विलयन में अवशोषित कर लेते हैं। ऐल्किल आयोडाइड एवं सिल्वर नाइट्रेट की अभिक्रिया से सिल्वर आयोडाइड का अवक्षेप प्राप्त होता है। इस अवक्षेप को जल से धोकर सुखा लेते हैं। इस शुष्क अवक्षेप का भार ज्ञात कर लेते हैं। Agl, RI एवं -OR के मोल में निम्नलिखित सम्बन्ध हैं:
Agl = RI = -OR
इस प्रकार ईथर के भार एवं सिल्वर आयोडाइड के भार से ऐल्कॉक्सी समूह की संख्या और भारात्मक आकलन किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- ऐनिसॉल में -OCH, समूह का भारात्मक आंकलन निम्न प्रकार किया जा सकता है।
ऐनिसोल के ज्ञात भार की सांद्र HI ( 57% HI ) के साथ अभिक्रिया पर यह निम्न प्रकार अपघटित होता है-
इस प्रकार प्राप्त CH3I को सिल्वरनाइट्रेट के ऐल्कोहॉली विलयन में अवशोषित करने पर सिल्वर आयोडाइड का अवक्षेप प्राप्त होता है जिसे जल से धोकर सुखा लेते हैं। इसका भार ज्ञात कर लेते हैं-
माना ऐनिसोल का भार W ग्राम है और प्राप्त AgI का भार w ग्राम है।
उपयोग : ईथर के उपयोग निम्नलिखित है
(i) कार्बनिक यौगिकों जैसे तेल, वसा, रेजिन आदि के लिये यह एक अच्छा विलायक है।
(ii) कुछ अभिक्रियाओं जैसे वुर्ज अभिक्रिया, ग्रीन्यार अभिकर्मक बनाने में ईथर का उपयोग उदासीन विलायक के रूप में होता है।
(iii) ईथर का उपयोग सर्जरी में निश्चेतक के रूप में होता है।
(iv) प्रशीतक के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
(v) परफ्यूम तथा धुआँ रहित पाउडर बनाने में इसका उपयोग होता है।
(vi) ईथर तथा ऐल्कोहल के मिश्रण को नेटेलाइट (Natallite) कहते हैं। इसका उपयोग पेट्रोल के स्थान पर किया जाता है।
एपॉक्साइड (Epoxides)
प्रस्तावना
तीन सदस्यीय वलय युक्त चक्रीय ईथर एपॉक्साइड कहलाते हैं। IUPAC नामकरण में इन्हें ऑक्सीरेन कहते हैं। सरलतम एपॉक्साइड का साधारण नाम एथिलीन ऑक्साइड है।
एपाक्साइडों का संश्लेषण
(i) ऐल्कीन की परऑक्सी अम्ल के साथ अभिक्रिया – ऐपॉक्सीकरण (Epoxidation)
एक ऐल्कीन की परऑक्सी अम्ल से अभिक्रिया पर एपॉक्साइड बनते हैं। इस अभिक्रिया को एपॉक्सीकरण कहते हैं। साधारणतया परऑक्सी ऐसीटिक अम्ल (CH3CO2OH) एवं परॉक्सीबेंजोइक अम्ल (CôH5CO2OH) आदि को प्रयुक्त करते हैं। विलायक के रूप में डाइक्लोरोमेथेन या क्लोरोफॉर्म लेते हैं।
ऐल्कीन का परऑक्सीअम्ल से एपॉक्सीकरण द्विबंध पर समपक्ष योग (cis addition) है। ऐल्कीन में एक दूसरे के सापेक्ष समपक्ष (cis) प्रतिस्थापी एपॉक्साइड में भी एक दूसरे के समपक्ष ही रहते है। इसी प्रकार ऐल्कीन में विपक्ष प्रतिस्थापी एपॉक्साइड में भी विपक्ष (Trans) ही रहते हैं।
समपक्ष -2- ब्यूटीन से समपक्ष – 2,3 – डाइमेथिल ऑक्सीरेन और विपक्ष – 2 – ब्यूटीन से विपक्ष 2,3- डाइमेथिल ऑक्सीरेन बनता है
आजकल एपॉक्सीकरण के लिये मैग्नीशियममोनोपरऑक्सी थैलेट ( MMPP) प्रयुक्त करते हैं।
साइक्लोहेक्सीन की मैग्नीशियम मोनोपरऑक्सीथैलेट से अभिक्रिया पर 1,2- एपॉक्सीसाइक्लोहेक्सेन बनता है।
(2) निकटवर्ती हैलोहाइड्रिन से (Form vicinal halohydrins)
निकटवर्ती हैलोहाइड्रिन ऐल्कीन की हाइपोहैलस के साथ अभिक्रिया से सुगमता से बनाये जा सकते हैं। ये हैलोहाइड्रिन क्षार के साथ अभिक्रिया करके एपॉक्साइड में बदल जाते हैं।
एपॉक्साइड की रासायनिक अभिक्रियाऐं
एपॉक्साइड अणुओं में तीन सदस्यीय वलय उच्च तनाव (high strain) के कारण नाभिक स्नेही अभिकर्मकों के प्रति उच्च क्रियाशील होती हैं और वलय सुगमता से खुल जाती है।
एपॉक्साइड की अम्ल उत्प्रेरित वलय खुलने वाली अभिक्रियाऐं (Acid catalysed ring opening reactions of epoxides)
दुर्बल नाभिक स्नेही अभिकर्मक जैसे जल, ऐल्कोहॉल आदि अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में अथवा अम्ल अभिकर्मक एपॉक्साइड के साथ अभिक्रिया करके 2- प्रतिस्थापी एथेनाल व्युत्पन्न बनाते हैं। उदाहरणार्थ
अम्ल उत्प्रेरण में नाभिक स्नेही आक्रमण एपॉक्साइड पर न होकर इसके सयुग्मी अम्ल पर होता अम्ल उत्प्रेरित अभिक्रिया में असममित एपॉक्साइड की तीन सदस्यीय वलय के अधिकतम ऐल्किल प्रतिस्थापित C – परमाणु पर नाभिक स्नेही आक्रमण होता है। उदाहरणार्थ- 2, 2, 3 – ट्राइमेथिल ऑक्सीरेन की मेथेनॉल के साथ H2SO4 की उपस्थिति में अभिक्रिया से 3- मेथॉक्सी -3- मेथिल – 2- ब्यूटेनॉल बनता है।
नाभिक स्नेही आक्रमण के पश्चात प्राप्त उत्पाद में विन्यास का प्रतीपन (Inversion of configuration) हो जाता है।
क्रिया विधि
अम्ल उत्प्रेरित वलय खुलने वाली अभिक्रिया की क्रियाविधि निम्न प्रकार है।
पद -1 एपॉक्साइड के ऑक्सीजन परमाणु पर अम्ल से प्रोटॉन के स्थानान्तरण पर ऑक्सोनियम आयन (एपॉक्साइड का संयुग्मी अम्ल) बनता है।
पद-2 उपर्युक्त पद में प्राप्त ऑक्सोनियम आयन के C-परमाणु पर नाभिक स्नेही (यहाँ जल) का आक्रमण होता है और वलय का कार्बन-ऑक्सीजन बंध टूट जाता है जिससे वलय खुल जाती है।
पद 3 उपर्युक्त पद में प्राप्त 2- हाइड्रॉक्सी एथिल ऑक्सेनियम आयन जल को प्रोटॉन स्थानान्तरित | करके अम्ल उत्प्रेरक को पुनः उत्पन्न कर देता है।
एपॉक्साइडों की क्षार उत्प्रेरित वलय खुलने वाली अभिक्रियाऐं (Base-catalysed ring opening reactions of epoxides)
प्रबल क्षार जैसे ऐल्कॉक्साइड या हाइड्रॉक्साइड ऋणायनों की एपॉक्साइड के साथ अभिक्रिया से तीन सदस्यीय वलय खुल जाती है। अभिक्रियाऐं जल या ऐल्कोहॉल में की जाती है।
एथिलीन ऑक्साइड बहुत ही अभिक्रियाशील यौगिक है। यह ऋणायनिक नाभिक स्नेही के साथ | तीव्रता से और ऊष्माक्षेपी रूप से अभिक्रिया करके 2- प्रतिस्थापी एथेनॉल व्युत्पन्न बनाता है।
एपॉक्साइडों की क्षार उत्प्रेरित वलय खुलने वाली अभिक्रिया में उस C- परमाणु पर विन्यास का प्रतीपन हो जाता है जिस पर नाभिक स्नेही अभिकर्मक का आक्रमण होता है। उदाहरणार्थ –
असममित एपॉक्साइड पर नाभिक स्नेही आक्रमण कम प्रतिस्थापित कार्बन परमाणु पर होता है।
क्रियाविधि-
क्षारउत्प्रेरित वलय खुलने वाली अभिक्रियाओं की क्रिया विधि निम्न प्रकार दी जा सकती है-
यह एक SN2 अभिक्रिया है ।
एपॉक्साइड वलय के खुलने का अभिविन्यास (Oreintation of epoxide ring opening)
जैसा कि ऊपर बताया गया है एपॉक्साइड वलय की अम्ल एवं क्षार दोनों प्रकार से उत्प्रेरित अभिक्रिया में नाभिक स्नेही एपॉक्साइड वलय के जिस C-परमाणु पर आक्रमण करता है, उस C-परमाणु पर विन्यास का प्रतीपन (Inversion of configuration) हो जाता है। अम्ल उत्प्रेरित अभिक्रिया में नाभिक स्नेही का आक्रमण वलय के अधिक प्रतिस्थापित C- परमाणु पर और क्षार उत्प्रेरित अभिक्रिया में वलय के कम प्रतिस्थापित C-परमाणु पर होता है।
इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार ले सकते हैं
(i) 1,2- एपॉक्सीसाइक्लोपेन्टेन के अम्ल उत्प्रेरित जल अपघटन पर विपक्ष 1, 2 – साइक्लोपेन्टेन डाइऑल बनता है।
नोट- यदि प्रोटॉनीकृत एपॉक्साइड (II) पर अभिकर्मक का आक्रमण स्थिति – 2 पर होता है तो यौगिक (IV) का प्रतिबिम्ब समावयवी प्राप्त होता है।
(2) इसी प्रकार समपक्ष – 2, 3 – डाइमेथिल ऑक्सीरेन के अम्ल उत्प्रेरित जल अपघटन ब्यूटेनडाइऑल के प्रतिबिम्ब समावयवी प्राप्त होते हैं। यदि अभिक्रिया पथ (a) एवं पथ (b) प्रक्रिया चल सकती है।
यदि विपक्ष –2, 3– डाइमेथिल ऑक्सीरेन के अम्ल उत्प्रेरित जल अपघटन से मीसो – 2,3 – ब्यूटेनडाइऑल प्राप्त होता है। अभिक्रिया (a) एवं (b) दो पथ से चल सकती है परन्तु दोनों पथ से मीसो -2, 3- ब्यूटेनडाइऑल ही प्राप्त होता है ।
4.12 एपॉक्साइड के साथ ग्रीन्यार अभिकर्मक एवं आर्गेनो लीथियम अभिकर्मकों की
अभिक्रिया
एपॉक्साइड की ग्रीन्यार अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया-
अभिकर्मक RMgX का नाभिकस्नेही ऐल्किल समूह एपॉक्साइड के आंशिक रूप से धनावेशित रूप से एपॉक्साइड ग्रीन्यार अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करके प्राथमिक ऐल्कोहॉल देते हैं। ग्रीन्यार धनावेशित C–परमाणु पर आक्रमण करके एपॉक्साइड वलय को खोल देता है। प्राथमिक ऐल्कोहॉल का लवण प्राप्त होता है जो अम्लीकृत करने पर प्राथमिक ऐल्कोहॉल में बदल जाता है (यह अभिक्रिया . एपॉक्साइड वलय की क्षार उत्प्रेरित अभिक्रिया के अनुरूप है।
उदाहरणार्थ— (i) फेनिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड की ऑक्सीरेन के साथ अभिक्रिया पर 2- फेनिलएथेनॉल बनता है।
(ii) फेनिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड की 2 – मेथिल ऑक्सीरेन के साथ अभिक्रिया पर 1-फेनिल – 2- प्रोपेनॉल प्राप्त होता है। इस अभिक्रिया में नाभिक स्नेही आक्रमण एपॉक्साइड वलय के कम प्रतिस्थापित
C- परमाणु पर होता है।
(iii) एथिल मैीशियम ब्रोमाइड की ऑक्सीरेन से अभिक्रिया पर ब्यूटेनॉल बनता है।
नोट- प्रतिस्थापित ऑक्सीरेन से द्वितीयक या तृतीयक ऐल्कोहॉल भी बनाये जा सकते हैं [ऊपर उदाहरण (ii) देखें] ।
ऑर्गेनोलीथियम यौगिकों की एपॉक्साइड के साथ अभिक्रिया-
ऑर्गेनोलिथियम यौगिक भी एपॉक्साइडों के साथ अभिक्रिया करके ऐल्कोहॉल बनाते हैं। इसमें ऑर्गेनोलीथियम ( R:Li ) नाभिक स्नेही ऐल्किल समूह, एपॉक्साइड वलय के आंशिक रूप से धनावेशित कम प्रतिस्थापित C–परमाणु पर आक्रमण करके एपॉक्साइड वलय को खोल देता है ओर ऐल्कोहॉल का लवण प्राप्त होता है जो अम्लीकृत करने पर ऐल्कोहॉल देता हैं। ये अभिक्रियाऐं एपॉक्साइड वलय की क्षार उत्प्रेरित अभिक्रियाओं के अनुरूप होती है।
कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैं-
(i) तृतीयक ब्यूटिल लीथियम की ऑक्सीरेन के साथ अभिक्रिया निम्न प्रकार होती है-
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