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लोक सभा अध्यक्ष की नियुक्ति कौन करता है | लोकसभा अध्यक्ष कौन है who elect the speaker of lok sabha in india

who elect the speaker of lok sabha in india in hindi लोक सभा अध्यक्ष की नियुक्ति कौन करता है | लोकसभा अध्यक्ष कौन है ?

लोक सभा अध्यक्ष
लोक सभा अध्यक्ष की स्थिति न्यूनाधिक इंग्लैंड के हाउस ऑव कॉमन्स के स्पीकर‘ की भाँति होती है। अध्यक्ष पद उच्च गरिमा और प्राधिकार का प्रतीक होता है। एक बार इस पद हेतु चुने जाने के बाद अध्यक्ष अपनी पाटी से संबंध तोड़ लेता है और एक निष्पक्ष रीति से कार्यारंभ करता है। वह सदस्यों के अधिकारों तथा विशेषाधिकारों के अभिभावक के रूप में काम करता है।

सदन की कार्यवाही के एक व्यवस्थित और कुशल संचालन को सुनिश्चित करने के लिए अध्यक्ष को अनेक अधिकार प्रदान किए गए हैं। वह सदन की कार्यवाहियाँ संचालित करता है, सदन की व्यवस्था और मर्यादा को कायम रखता है और व्यवस्था-बिंदुओं को निर्धारित करता है, सदन के नियमों की व्याख्या करता है तथा लागू करता है। अध्यक्ष ही प्रमाणित करता है कि कोई विधेयक धन-विधेयक है अथवा नहीं और उसका निर्णय अंतिम होता है। अध्यक्ष ही अधिप्रमाणित करता है कि दूसरे सदन अथवा भारत के राष्ट्रपति को उसकी सहमति हेतु प्रस्तुत किए जाने से पूर्व उसका सदन विधेयक को पारित कर चुका है। सदन के नेता की सलाह से अध्यक्ष ही कार्यवाही का क्रम निर्धारित करता है। वह ही निर्धारित करता है प्रश्नों, प्रस्तावों तथा संकल्पों की ग्राह्यता। अध्यक्ष प्रथमदृष्टया वोट नहीं देगा, परंतु किसी बराबरी की स्थिति में वह अपने निर्णायक मत का प्रयोग कर सकता है। किसी ठोस प्रस्ताव को छोड़कर, लोक सभा अध्यक्ष के आचरण पर सदन में चर्चा नहीं की जा सकती है। उसका वेतन और भत्ते भारतीय समेकित कोष से देय होते हैं ताकि पद का स्वतंत्र लक्षण कायम रहे।

अध्यक्ष पद का एक विशेष लक्षण है कि सदन भंग होने की स्थिति में भी अध्यक्ष अपना पद खाली नहीं करता है। नए सदन द्वारा एक अन्य अध्यक्ष चुने जाने तक वह अपने पद पर बना रहता है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सदन की अध्यक्षता करता है।

विधायिका का पतन
वर्तमान में, विधायिका और पालिका के अनुकूल शक्तिवर्धन में ह्रास को इंगित करती एक सशक्त प्रवृत्ति विद्यमान है। संसद की प्रतिष्ठा और प्रकार्यात्मकता के इस ह्रास में अनेक कारकों का योगदान है।

संसद निस्संदेह विधायी उपायों के ब्यौरों में अपना पूरा समय नहीं लगा सकती है। यह अधिक-से-अधिक विस्तृत नीति निर्धारित कर सकती है और शेष को कार्यकारिणी द्वारा हाथ में लिए जाने हेतु छोड़ सकती है। इस प्रकार, सभी विधेयकों में आवश्यक विनियम तथा उप-नियम रचने हेतु सरकार को अधिकार देता एक अनुच्छेद होता है। इस प्रकार, प्रतिनियुक्त विधायिका संसद के अधिकार काफी हद तक छीन लेती है, परिणाम होता है संसद की प्रतिष्ठा का पतन ।

भारत में सर्वदा-परिवर्तनशील राजनीतिक तथा नैतिक परिस्थितियाँ भी संसद के प्रतिष्ठा पतन हेतु जिम्मेदार हैं। पार्टी प्राबल्य, पार्टी संगठन का अभाव, राजनीतिक दल-बदल की घबराहट, भ्रष्टाचार तथा राजनीतिज्ञों का गिरता मनोबल सभी ने संसद की प्रतिष्ठा के अपक्षय में योगदान किया है। भारत में संसद के सामने एक बड़ा खतरा सभी राजनीतिक दलों में विविध तथा विभाजक बलों की बढ़वार द्वारा खड़ा किया गया है। सत्तारूढ़ व विपक्षी दल, दोनों विचारधारा की बजाय विचार के औचित्य और राजनीतिक प्रयोजन द्वारा अधिक प्रेरित होते हैं। विपक्ष की प्रभावहीनता और एक सशक्त सुस्पष्ट जनमत के अभाव ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली कार्यकारिणी की तुलना में संसद की स्थिति को अधिक कमजोर किया है। सिद्धांततः हमारे यहाँ संसदीय प्रणाली है जहाँ कार्यप्रणाली को विधायिका द्वारा नियंत्रित किया जाता है, परंतु वास्तव में, विधायिका के अधिकार कार्यकारिणी के हाथों में आ गए हैं।

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