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मतदान कौन कर सकता है | भारत में मत दान कौन व्यक्ति कर सकते है who can vote in india elections in hindi
who can vote in india elections in hindi मतदान कौन कर सकता है | भारत में मत दान कौन व्यक्ति कर सकते है ?
कौन मतदान कर सकता है?
जबकि मतदाता के लिए कोई निर्धारित अधिकतम आयु-सीमा नहीं है, परन्तु भारतीय संविधान के मूल प्रावधानों के अनुसार, 21 वर्ष आयु से ऊपर के सभी भारतीय नागरिक चुनावों के समय वोट देने के हकदार हैं। वर्ष 1988 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री, राजीव गाँधी द्वारा कराये गए 61वें संविधान संशोधन द्वारा नागरिकों की निम्नतम मतदान आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी गई जो 28 मार्च 1989 से प्रभावी हो गई। इसके अतिरिक्त किसी भी निर्वाचन-क्षेत्र में एक मतदाता के रूप में पंजीकृत किए जाने के लिए कोई व्यक्त्ति, अनावास के आधार पर, अथवा उसके अस्वस्थ होने पर, अथवा उसे अपराध या भ्रष्टाचार या अवैध व्यवसाय के आधार पर कानून के तहत अयोग्य घोषित न किया गया हो।
चुनाव कौन लड़ सकता है?
इकाई 10 में आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा और विधान परिषद् हेतु चुनाव लड़ने के लिए कौन सुयोग्य है। सभी प्रतिस्पर्धी प्रत्याशियों को यदि लोकसभा चुनाव लड़ना हो तो 10,000 रुपये और यदि विधानसभा चुनाव लड़ना हो तो 5,000 रुपये जमा कराने होते हैं। इसको प्रत्याशियों की प्रतिभूति राशि माना जाता है। अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति समुदाय से सम्बद्ध प्रत्याशियों के लिए जमानत राशि यदि लोकसभा चुनाव लड़ना हो तो 5,000 रुपये और यदि विधानसभा चुनाव लड़ना हो तो 2,500 रुपये है। यह प्रतिभूति राशि उन सभी प्रत्याशियों को लौटा दी जाती है जो उस निर्वाचन क्षेत्र में डाले गए कुछ वैध मतों की संख्या के एक-बटा-छह से अधिक मत प्राप्त करते हैं। अन्य सभी प्रत्याशी अपनी प्रतिभूति राशि हार जाते है।
इसके अतिरिक्त, नामांकन उस निर्वाचन क्षेत्र से जिससे प्रत्याशी, यदि – वह किसी पंजीकृत राजनीतिक दल द्वारा प्रायोजित किया जा रहा होय चुनाव लड़ना चाहता है, कम से कम एक पंजीकृत मतदाता द्वारा समर्थित हो, और यदि वह प्रत्याशी स्वतंत्र प्रत्याशी हो तो कम से कम दस पंजीकृत मतदाताओं द्वारा समर्थित हो।
भारतीय चुनावों का इतिहास
भारत में, हमारी सरकार संघीय स्वरूप वाली है, जहाँ हमारी सरकार के दो सेट होते हैं – राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय सरकार और राज्य स्तर पर राज्य सरकार। जैसा कि आप इकाई 18 में पढ़ चुके हैं, 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा स्थानीय स्वशासन को भी सरकार की तीसरी पंक्ति का संवैधानिक दरजा दे दिया गया है। इसी के साथ, ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत और शहरी क्षेत्रों में नगर पालिका के रूप में भी हम सरकार को तीसरी पंक्ति रखते हैं। सरकार के ये तीनों ही स्तर लोकप्रिय रूप से निर्वाचित सरकार होते हैं, और लोग इन तीनों ही निकायों – संसद, विधानसभा और ग्राम पंचायत, के लिए अपने प्रतिनिधि चुनने हेतु मतदान करते हैं। यहाँ हम अपने देश में कराए जाने वाले संसदीय और विधानसभा चुनावों पर ही ध्यान केन्द्रित करेंगे।
भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार, नैत्य निर्वाचन प्रत्येक पाँच वर्ष बाद होना चाहिए, परन्तु सदन के असामयिक भंग होने की सूरत में (संसद के मामले में लोकसभा अथवा राज्य विधानसभा के मामले में विधानसभा) कारण चाहे जो हो, आगामी चुनाव यथाशीघ्र होना चाहिए। हमारे देश में पहले आम चुनाव (संसदीय चुनाव) 1952 में कराये गए। तब से 1999 तक 13 आम चुनाव (लोकसभा चुनाव) हो चुके हैं। यद्यपि अधिकांश लोकसभा चुनाव सदन के पाँच वर्ष की अवधि समाप्त करने पर कराये गए हैं, तथापि कुछ निर्धारित समय से काफी पहले हुए हैं। जब चुनाव नियत समय से काफी पहले कराए जाते हैं, इसको मध्यावधि चुनाव‘ कहा जाता है। 1980, 1991, 1998 व 1999 के लोकसभा चुनाव नियत समय से काफी पहले कराए गए मध्यावधि चुनाव थे। यद्यपि 1971 का लोकसभा चुनाव 1967 के लोकसभा चुनाव से चार साल बाद हुआ था, यह एक मध्यावधि चुनाव नहीं था। भारतीय चुनावों के इतिहास में, केवल 1977 के लोकसभा चुनाव देश में राष्ट्रीय आपात्काल की उद्घोषणा के कारण लगभग दो वर्ष के लिए आस्थगित किए गए थे।
अधिकतर राज्य स्वाधीनता के समय बनाए गए, परन्तु ऐसे भी राज्य हैं जो उसके बाद बने । जैसा कि आप इकाई 17 में पढ़ चुके हैं, राज्यों की सूची में नवीनतम संयोजन उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तथा बिहार राज्यों से बनाए गए उत्तरांचल, छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड का है। वर्तमान में, भारत में 28 राज्य और सात केन्द्र-शासित प्रदेश हैं।
कुछ राज्यों में द्वि-सदनी व्यवस्था है – निम्न सदन को विधानसभा और उच्च सदन को विधान परिषद् कहा जाता है। द्वि-सदनी विधानमण्डल वाले राज्य हैं – बिहार, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश । अन्य सभी राज्यों में, राज्य विधानसभा में एक एकल सदन, विधानसभा होती है। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, किसी राज्य विधानसभा में निम्न सदन में सीटों की कुल संख्या 500 से अधिक नहीं होनी चाहिए, और साथ ही सदन में सदस्य-संख्या 60 से कम नहीं होनी चाहिए। सिक्किम, मिजोरम और गोवा राज्य इसके अपवाद हैं क्योंकि इन सभी तीन राज्यों में विधानसभा में सीटों की संख्या 60 से कम है।
राज्य विधानसभा में उच्च सदन (विधान परिषद्) की कुल सदस्य-संख्या के अनुसार, यह निम्न सदन (विधानसभा) की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए, पर साथ ही यह 40 सदस्यों से कम नहीं होनी चाहिए। (अनुच्छेद 171)। जबकि विधानसभा के सदस्य जनता द्वारा सीधे चुने जाते हैं, विधान परिषद् के सदस्य एक निर्वाचन-मण्डल द्वारा परोक्ष रूप से चुने जाते हैं। विधानसभा की कुल सदस्य-संख्या राज्य-राज्य के अनुसार भिन्न-भिन्न है। विधानसभा में सर्वाधिक, 403 विधानसभा सीट-संख्या उत्तरप्रदेश में है और सबसे कम सिक्किम राज्य में, जिसके पास विधानसभा में कुल 32 सीटें हैं। यदि हम राज्य विधानसभा चुनावों की जाँच करें, वर्ष 2002 तक देश में 263 राज्य विधानसभा चुनाव कराए जा चुके हैं।
बोध प्रश्न 1
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) 61वाँ संविधान संशोधन क्या कल्पना करता है?
2) ‘मध्यावधि चुनाव‘ से आप क्या समझते हैं?
बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
1) 64वें संविधान संशोधन ने नागरिकों की मतदान आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी।
2) जब चुनाव निर्धारित समय से काफी पहले कराया जाता है तो यह ‘मध्यावधि चुनाव‘ कहलाता है।
कौन चुनाव संचालित करता है?
भारतीय निर्वाचन आयोग भारत में चुनाव संचालन के लिए सर्वाच्च संवैधानिक प्राधिकरण है। संसद के लिए तथा प्रत्येक राज्य की विधायिका के लिए सभी चुनाव और राष्ट्रपति व उप-राष्ट्रपति के कार्यालय के लिए भी चुनाव कराने के लिए निर्वाचन सूचियों की तैयारी के अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण की शक्तियाँ इस संवैधानिक प्राधिकरण में ही निहित हैं।
निर्वाचन आयोग में होते हैं – मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की वह संख्या जो राष्ट्रपति समय-समय पर तय कर उनकी नियुक्ति कर सकता है। चुनाव कानूनों के अनुसार, यदि निर्वाचन आयोग बहु-सदस्यीय निकाय बन जाता है, मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव आयोग के अध्यक्ष की भाँति व्यवहार करना पड़ता है।
आरम्भ से ही, निर्वाचन आयोग में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ही रहा है। परन्तु वर्ष 1989 में, नौवीं लोकसभा से कुछ सप्ताह पूर्व ही, चुनाव आयोग को तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा एक बहु-सदस्यीय निकाय बना दिया गया। 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने चुनाव आयोग को पुनः एक एक-सदस्यीय निकाय बनाने के लिए नियमों को संशोधित किया। लेकिन वर्ष 1993 में, जब कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी, उसने चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय निकाय बनाने के लिए एक अध्यादेश जारी कर दिया। दो चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए और तब से, निर्वाचन आयोग एक तीन-सदस्यीय निकाय बना हुआ है। आज तक भारत में 12 चुनाव आयुक्त हो चुके हैं। श्री सुकुमार सेन भारत के प्रथम चुनाव आयुक्त थे। वर्तमान में, श्री जे.एम. लिंगडोह मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जिन्होंने जून 2001 में डॉ. एम.एस. गिल का स्थान लिया।
इसके अलावा, भारत के निर्वाचन आयोग में, प्रत्येक राज्य में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी होता है, जो कि राज्य में चुनाव संचालित कराने का समस्त प्रभारी होता है।
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