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लखनऊ का वर्तमान स्वरूप कब अस्तित्व में आया , When did the present form of Lucknow come into existence in hindi
When did the present form of Lucknow come into existence in hindi लखनऊ का वर्तमान स्वरूप कब अस्तित्व में आया ?
लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ गोमती नदी के किनारे पूर्वी उत्तर प्रदेश के मध्य में अवस्थित है। आधुनिक लखनऊ के निर्माण का श्रेय नवाब असफ-उद-दौला को है, जिसने 1775 में लखनऊ को राजधानी बनाया था। लखनऊ नवाबी शान की विशिष्ट शैली, नृत्य, कविता, संगीत को अपने में समाये हुए है। औरंगजेब की मस्जिद, बड़ा इमामबाड़ा यहां स्थित प्रसिद्ध मुगल स्मारक हैं। 50 मीटर लंबे तथा 15 मीटर ऊंचे बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण असफ-उद-दौला ने करवाया था। इसी के समीप ही रूमी दरवाजा स्थित है। हुसैनाबाद इमामबाड़ा (छोटा इमामबाड़ा) में चांदी का सिंहासन है तथा इसे मुहर्रम के दिन सजाया जाता है। इसके दक्षिण में ही जामी मस्जिद स्थित है, जिसका निर्माण मुहम्मद शाह ने 1840 में शुरू करवाया था। हजरत अब्बास की दरगाह तथा बादाम महल यहां स्थित अन्य प्रसिद्ध स्मारक हैं। लखनऊ के रेजिडेंसी क्षेत्र के प्रसिद्ध स्थलों में केसरबाग महल (1850) सआदत अली खान का मकबरा (1814), खुर्शीद बेगम, नूर बक्श कोठी, तारावाली कोठी, खुर्शीद मंजिल, मोती महल, छत्तर मंजिल आदि मुख्य हैं। लखनऊ के दक्षिणी क्षेत्र के प्रसिद्ध स्थलों में शाह गजफ विंगुील्ड उद्यान, क्राइस्ट गिरजाधर, दिलखुश, विलायती बाग आदि प्रमुख हैं। राज्य संग्रहालय, मोतीलाल बाल संग्रहालय, गांधी संग्रहालय, तस्वीर संग्रहालय आदि यहां के प्रसिद्ध संग्रहालय हैं।
रामपुरः उत्तर प्रदेश स्थित रामपुर की स्थापना शाह आलम एवं हुसैन खान ने 1623 में की थी। रामपुर स्थित महल एवं किले का अपना विशेष आकर्षण है। यहां स्थित राज्य पुस्तकालय में 16वीं-18वीं शताब्दी की कुछ बहुमूल्य पांडुलिपियां संग्रहीत हैं।
रामेश्वरमः ऐसी मान्यता है कि तमिलनाडु स्थित इस नगर में राम ने शिव की आराधना की थी। यहां स्थित रामलिंगेश्वर मंदिर की खोज चोल राजाओं द्वारा की गई थी, लेकिन इसका निर्माण नायक काल के दोरान हुआ था। गंधमदान पर्वतम तथा कोटानदरमस्वामी मंदिर यहां स्थित अन्य प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल हैं। रामेश्वरम से 20 किलोमीटर दूर मंडपम स्थित जलीय अनुसंधान संस्थान में अनेक जलीय प्राणी सुरक्षित हैं। मंडपम मुख्यतः मुस्लिम समुदाय बहुल एक मत्स्य ग्राम है।
लकुंडीः कर्नाटक स्थित लकुंडी में 11वीं तथा 12वीं शताब्दी के 17 हिन्दू एवं जैन मंदिर दर्शनीय हैं। जैन बस्ती तथा काशी विश्वरेश्वर मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं। लकुंडी से 10 किलोमीटर दूर स्थित कुकनूर तथा इट्टागी के महादेव मंदिर, नवलिंग परिसर, कालेश्वर मंदिर भी दर्शनीय हैं।
लद्दाखः जम्मू-कश्मीर स्थित लद्दाख लेह सिंधु नदी के उपजाऊ क्षेत्र में अवस्थित है। 16वीं शताब्दी के मध्य में निर्मित लेह महल का निर्माण राजा सिंगे नामगयाल ने किया था। आज भी इस महल पर राज परिवार का अधिकार है। महल के एक भाग को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। लेह गोम्पा, सोमा गोम्पा, शांति स्तूप तथा शंकर गोम्पा यहां स्थित प्रमुख गोम्पा हैं। लेह स्थित लेह मस्जिद एवं मणि दीवारें भी विशेष रूप से दर्शनीय हैं। हेमिस, लोसार एवं लद्दाख उत्सव यहां के प्रमुख उत्सव हैं।
लेह से आठ किलोमीटर दूर स्थित स्पीतुक में 11वीं शताब्दी का बौद्ध विहार है। यहां स्थित महाकाल मंदिर (16-17वीं शताब्दी) भी विशेष रूप से दर्शनीय है। लेह से 16 किलोमीटर दूर स्थित फ्यांग मंे नामगयाल वंश के सस्ंथापक द्वारा 16वीं शताब्दी में निर्मित गोआन विहार है। यहां 14वीं शताब्दी के कश्मीर ताम्रों के अतिरिक्त मूर्तियों को भी संकलित किया गया है। यहां से कुछ दूर स्थित बासगो 15-17वीं शताब्दी के मध्य शाही निवास स्थल था। यहां शेष रहे मंदिरों में ताशी नामगयाल द्वारा 16वीं शताब्दी के मध्य में निर्मित उच्च मैत्री मंदिर प्रमुख है। 17वीं शताब्दी में निर्मित सरजांग मंदिर नक्काशीयुक्त प्रवेश द्वार के लिए दर्शनीय है। लेकिर स्थित विहार की स्थापना लाद्देन गयालपो ने की थी। लेह से 70 किलोमीटर दूर स्थित अल्छी धर्म चक्र विहार परिसर के लिए विशेष रूप से दर्शनीय है। अल्छी स्थित वृहत मंदिर परिसर लद्दाख क्षेत्र में सबसे प्रमुख बौद्ध केंद्र है। धु-खांग, लोटसावा, चोसकर, लखांग सोमा, सम-सटेक आदि इस परिसर के मुख्य भाग हैं।
लोथलः गुजरात स्थित लोथल साबरमती एवं भोगावो नदियों के मध्य अवस्थित है। लोथल में हड़प्पा सभ्यता (250 ईसा पूर्व-1700 ईसा पूर्व) के कुछ विशेष अवशेष हैं। लोथल में हड़प्पा सभ्यता की श्रेष्ठ वास्तुकला को देखा जा सकता है। लोथल में हड़प्पा सभ्यता के शहर से संबंधित कुंए, ईंटों से निर्मित मकान, स्नानघर आदि अपने में एक इतिहास को समाहित किए हुए हैं। लोथल स्थित पुरातात्विक संग्रहालय में इस स्थल से संबंधित ताम्र एवं कांस्य औजारों को संग्रहीत किया गया है।
वसाई (भदरेश्वर)ः वसाई एक मंदिर तथा दो मस्जिदों के लिए प्रसिद्ध है। 1248 में निर्मित जैन मंदिर तथा सोलह खंभी मस्जिद विशेष रूप से दर्शनीय हैं। जैन मंदिर के 52 प्रकोष्ठों में तीर्थंकरों की 150 मूर्तियां हैं तथा सोलह खंभी मस्जिद इस्लामी वास्तुकला का श्रेष्ठ रूप लिए हुए है।
वारंगलः आंध्र प्रदेश स्थित वारंगल हैदराबाद से 140 किलोमीटर दूर स्थित है। 12वीं एवं 13वीं शताब्दी में वारंगल काकित्य साम्राज्य की राजधानी थी। यहां स्थित वारंगल किले का निर्माण 13वीं शताब्दी में किया गया था। हनमकोंडा के समीप स्थित शिवा रुद्रेश्वर मंदिर का निर्माण 1163 में रुद्रदेव द्वारा किया गया था। यहां शिव, विष्णु तथा सूर्य को समर्पित नंदी का निर्माण किया गया है। 12वीं एवं 13वीं शताब्दी में काकित्य शासकों द्वारा पखल, लखनावरम, रमप्पा तथा धनपुर में कृत्रिम झीलों का निर्माण किया गया था। इन वन्यजीव उद्यानों में पशु-पक्षियों की अनेक प्रजातियां निवास करती हैं। पालमपेट शिव को समर्पित रमप्पा मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, इस मंदिर की दीवारों पर स्त्री नृतकियों को दर्शाया गया है। पालमपेट से 9 किलोमीटर दूर स्थित धनपुर मंे 13वीं शताब्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर हैं। इन मंदिरों के कुछ भाग अब ध्वस्त हो गए हैं।
वाराणसीः उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित वाराणसी (बनारस) भारत की सबसे पवित्र नगरी है। इस प्राचीन नगरी का इतिहास 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक का है। आर्य इस नगर के सबसे प्राचीन निवासी थे। वाराणसी को सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा वाणिज्य केंद्र बनाने का श्रेय आर्यों को ही है। वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय में लगभग 1,50,000 दुर्लभ पांडुलिपियों को संग्रहीत किया गया है। वाराणसी के पुराने शहर में विश्वनाथ मंदिर (1777), अन्नपूर्णा मंदिर, ज्ञान कूप मंदिर प्रमुख हैं। ज्ञानवापी मस्जिद तथा आलमगीर मस्जिद यहां स्थित प्रसिद्ध मस्जिदें हैं। 1825 में बाजी राव-प्प् द्वारा निर्मित भैरोंनाथ मंदिर, गोपालमंदिर, दुग्र मंदिर (18वीं शताब्दी), तुलसी मानस मंदिर (1964), भारत माता मंदिर आदि कुछ अन्य प्रसिद्ध मंदिर हैं। वाराणसी में लगभग 100 से अधिक घाट हैं। यहां स्थित कुछ प्रमुख घाट हंै दसवमेधा घाट, मुंशी घाट, अहिल्या बाई घाट, दरभंगा घाट, राणा महल घाट, धोबी घाट, चैकी घाट, राजा घाट, मानसरोवर घाट, हनुमान घाट, कर्नार्टटक घाट, तुलसी घाट, मनमंंिदिर घाट, ललिता घाट, रामघाट, सिंधिया घाट तथा पंचगंगा घाट आदि। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय मंे स्थित भारत कला भवन संग्रहालय तथा भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक नया विश्वनाथ मंदिर अन्य दर्शनीय स्थल हैं। रामनगर किले में स्थित संग्रहालय में वस्त्रों, हथियारों, फर्नीचर तथा पालकियों आदि को संग्रहीत किया गया है।
वास्कोडिगामाः गोआ के मध्य भाग में अवस्थित वास्कोडिगामा प्राचीन इमारतों तथा समुद्र तटों के लि, प्रसिद्ध है। वास्कोडिगामा स्थित केसल राॅक तथा पाॅलट प्वांइट दर्शनीय स्थल हैं। वास्कोडिगामा के समीप स्थित मारमगो का मारमगो किला विशेष रूप से दर्शनीय है। वास्कोडिगामा के समीप स्थित प्रमुख समुद्र तट हंै बोगमालो, हंसा एवं बैना आदि।
विजयनगरः आंध्र प्रदेश में विजयनगर के बौरा गांव की बौरा गुफाएं अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इन गुफाओं के अंदर एक शिवलिंग तथा गाय की मूर्ति है। ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम वर्ष इन्हीं गुफाओं में बिताया था।
विजयवाड़ाः कृष्णा एवं बुडामेरू के मध्य स्थित विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा नगर तथा भारत का सबसे बड़ा रेलवे जंक्शन है। विजयवाड़ा अपने अनेक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थित प्रमुख मंदिर हैं मोÛलाराजापुरम, ब्रह्मरंभा, मल्लेश्वर तथा कनकदुग्र।
विदिशाः मध्य प्रदेश स्थित विदिशा दिल्ली भोपाल माग्र पर भोपाल से 57 किलोमीटर दूर अवस्थित है। बेतवा एवं बेस नदियों के संगम पर स्थित विदिशा का संबंध ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से है। ऐसी मान्यता है कि विदिशा निवासी सांची स्मारकों के रखवाले (संरक्षक) हैं। विदिशा में बीजामण्डल मस्जिद एवं गुम्बज का मकबरा नामक इस्लामी स्मारकों के अवशेष हैं। यहां से 3 किलोमीटर दूर बेतवा के दूसरे किनारे पर खंभा बाबा स्थित है, जो कि अशोक स्तंभ के समान किंतु उससे छोटा है। इसका संबंध 140 ईसा पूर्व से है। विदिशा से 4 किलोमीटर दूर उत्तर में प्रसिद्ध उदयगिरि गुफाएं अवस्थित हैं। यह गुफाएं गुप्तकालीन कला की समृद्धि की परिचायक हैं। इन गुफाओं में पहली, पांचवीं तथा नौवीं गुफाएं विशेष रूप से दर्शनीय हैं। उदयगिरि से 60 किलोमीटर दूर स्थित उदयपुर 11वीं शताब्दी के नीलकंठेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
विष्णुपुरः पश्चिम बंगाल स्थित विष्णुपुर 17वीं एवं 18वीं शताब्दी के बंगाल मृण्यमूर्ति मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। विष्णुपुर में राधा और कृष्ण को समर्पित लगभग दो दर्जन मंदिर हैं। रसमानचा, जोर मंदिर, मदन मोहन मंदिर, श्याम राय मंदिर, लालजी, मदन गोपाल आदि मुख्य मंदिर हैं। विष्णुपुर के समीप स्थित जयरामबाती एवं कमरपुकार तथा गढ़ मंडारन किला मुख्य दर्शनीय स्थल हैं।
वेल्लौरः तमिलनाडु स्थित वेल्लौर क्रिश्चियन चिकित्सा काॅलेज एवं अस्पताल के लिए विश्व प्रसिद्ध है। वेल्लौर किले में विजयनगर वास्तुशिल्प को उसके श्रेष्ठ रूप में देखा जा सकता है। वेल्लौर स्थित जलकांतेश्वर मंदिर का निर्माण पल्लवों द्वारा सातवीं शताब्दी में किया गया था। वेल्लौर स्थित चिकित्सा काॅलेज की स्थापना इडा स्कडर ने 1900 में की थी। वेल्लौर से 35 किलोमीटर दूर स्थित पोलुर जैब शैल नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। तिरुमलाई मंदिर में स्थापित जैन मूर्ति तमिलनाडु की सबसे ऊंची मूर्ति है।
वैष्णो देवीः जम्मू-कश्मीर स्थित वैष्णो देवी जम्मू शहर से 61 किलोमीटर उत्तर में अवस्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक गुफा है। महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती को समर्पित यह गुफा 1700 मीटर की ऊंचाई पर 30 मीटर लम्बी तथा 1-5 मीटर ऊंची है। गुफा के समीप स्थित भैरों मंदिर भी दश्र्रनीय है। त्रिकूट पहाड़ियों की गोद में बसा कटरा विशेष रूप से दर्शनीय स्थल है।
शांतिनिकेतनः पश्चिम बंगाल स्थित शांतिनिकेतन की स्थापना का श्रेय महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर (रवींद्रनाथ टैगोर के पिता) को है। शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय दर्शन, संस्कृत, कला, भारतीय संगीत आदि के अध्ययन का प्रमुख केंद्र है। उत्तरायण परिसर, प्रार्थनाघर छतीमताला, श्रीनिकेतन आदि विशेष दर्शनीय भाग हैं। रविन्द्र भवन संग्रहालय, नंदन संग्रहालय, कला भवन दीर्घा प्रमुख संग्रहालय हैं। शांतिनिकेतन से 58 किलोमीटर उत्तर-दक्षिण में स्थित बकरेश्वर गर्म पानी के चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। यहां शिव, शक्ति तथा विष्णु को समर्पित अनेक मंदिर हैं। बकरेश्वर स्थित शिव मंदिर एवं महिषासुरमर्दिनी मंदिर प्रमुख हैं। शांतिनिकेतन से 80 किलोमीटर दूर स्थित तारापीठ का तारा मंदिर इस क्षेत्र का प्रसिद्ध मंदिर है।
शोलापुरः शोलापुर के समीप प्रवाहित भीमा नदी के किनारे अवस्थित पंधरपुर महाराष्ट्र की आध्यात्मिक राजधानी है। विथोबा की समाधि के अतिरिक्त पंधरपुर स्थित दर्जनों स्नान घाट बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करते हैं।
श्रवणबेलागोलाः कर्नाटक स्थित श्रवणबेलागोला गोमतेश्वर की बृहत् एकाश्म मूर्ति के कारण भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। विंध्यगिरि पर स्थित गोमतेश्वर की मूर्ति मैदान से 150 मीटर की ऊंचाई पर अवस्थित है। यहां स्थित भंडारी बस्ती में 24 तीर्थंकारों की मूर्तियां हैं। चंद्रगिरि में 14 समाधियां हैं। श्रवणबेलागोला से कुछ दूर स्थित कमबदहाली की पंचाकुटु बस्ती में तीन तीर्थंकारों (आदिनाथ, नेमीनाथ तथा शांतीनाथ) की समाधियां हैं। कमबदहाली में अनेक उत्कृष्ठ जैन प्रतिमाएं भी हैं।
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