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तीर्थ यात्रा किसे कहते हैं |  तीर्थयात्रा क्या हैं (What are Pilgrimages in hindi) परिभाषा बताइए अर्थ मतलब

(What are Pilgrimages in hindi)  तीर्थ यात्रा किसे कहते हैं |  तीर्थयात्रा क्या हैं परिभाषा बताइए अर्थ मतलब ? 

तीर्थयात्राएँ क्या हैं ? (What are Pilgrimages?)
संसार के तमाम प्रमुख धर्मों में कुछ विशेष स्थानों की पवित्रता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, और स्थानों की यात्रा या उसकी अनुशंसा की गई है। ये स्थान चमत्कारों के लिए विश्वासियों या भक्तों के धार्मिक जीवन के लिए प्रेरणा या आस्था के पुनःजीवन के लिए प्रसिद्ध हैं। किसी भी संस्कृति में धार्मिक विश्वास रखने वालों को दूर स्थित ऐसे किसी स्थान का ‘‘बुलावा‘‘ आ सकता है और वे वहां जाने का निश्चय कर सकते हैं। उस पवित्र स्थान की ऐसी यात्रा ही तीर्थयात्रा होती है।

 तीर्थयात्रा और तीर्थयात्री की परिभाषाएँ (Definition of Pilgrimage and Pilgrim)
अधिकांश लोग तीर्थयात्री के अपने देश या विदेश में स्थित किसी पवित्र स्थान या भवन की यात्रा को तीर्थयात्रा समझतें है। तीर्थयात्रा का उद्देश्य किसी भौतिक, प्रतीकात्मक, नैतिक या आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति होती है, जो तीर्थयात्री के विश्वास के अनुसार उस पवित्र स्थल से मिलती है। तीर्थयात्रा इसलिए की जा सकती है क्योंकि इस प्रकार की यात्रा मुख्यात्मक मानी जाती है। प्रत्यक्ष रूप से या किसी संत के माध्यम से दैवीय कृपा की प्राप्ति का विचार सामान्यतया इस प्रकार की यात्रा से जुड़ा होता है । इस यात्रा से अपेक्षित लाभ सांसारिक हितों की संतुष्टि से लेकर सर्वोच्च आध्यात्मिक प्राप्ति तक हो सकते हैं। लेकिन यात्रा का आधार तीर्थयात्री या यात्रियों का धार्मिक विश्वास होता है। पवित्र स्थान की यात्रा हमेशा किसी ऐसे धार्मिक उद्देश्य से जुड़ी होती है जो किसी न किसी अर्थ में धार्मिक विचार और विश्वास होते हैं।

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि तीर्थयात्रा में बार-बार दिखाई पड़ने वाली दो महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं:
प) पवित्र स्थान, और
पप) यात्रा करने की क्रिया

‘‘तीर्थयात्राएँ असाधारण पवित्र यात्राएँ होती हैं‘‘ (सरस्वती, 1985-103)। यह सही है कि तीर्थयात्रा जिस रूप में भारत में या और कहीं भी की जाती है उसके पीछे तीर्थयात्री के अत्यधिक विविध उद्देश्य होते हैं।
तीर्थयात्राएँ विवेकहीन आवा-जाही या प्रवास नहीं होती। वे प्राचीन और मध्य युग में प्रचलित विवेकहीन सामूहिक प्रवासों के विपरीत, ऐच्छिक और व्यक्तिगत होती हैं। प्रत्येक यात्रा की व्यक्तिगत क्रिया होती है जो किसी व्यक्तिगत निर्णय का परिणाम होती है और उसकी परिणति व्यापक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अनुभव में होती हैं। इस प्रकार तीर्थयात्रा किसी अंतिम मूल्य या किसी आध्यात्मिक अनुभव की तलाश में की जाने वाली यात्रा होती है। क्या किसी पास के पवित्र स्थान की प्रत्येक यात्रा तीर्थयात्रा होती है ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए बॉक्स 30.01 देखिए।

बॉक्स 30.01
कोई भक्त जब किसी स्थानीय या पड़ोस के पवित्र स्थल में प्रति दिन या कभी-कभी आता जाता है तो क्या वह तीर्थयात्रा होती है ? नहीं, यह एक पवित्र स्थल की ष्यात्राष् मात्र होती है। तीर्थयात्रा सामान्यतया लंबी दूरी और लंबे समय की यात्रा होती है। वास्तव में, तीर्थयात्रा से आशय ऐसी यात्रा से होता है जो घर से दूर की जाती है और इस दौरान व्यक्ति अकेला चाहे थोड़े समय के लिए ही होता है, लेकिन एक बंधन में बंध जाता है। हिंदू तीर्थयात्री एक ‘‘यात्री‘‘ अर्थात यात्रा करने वाला होता है। तीर्थयात्री की यात्रा घरेलू सामाजिक पृष्ठभूमि की उलझनों के बीच शुरू होती है। फिर तीर्थयात्री इन उलझनों से बाहर और दूर किसी ऐसे स्थान पर जाता है जो प्रतिदिन के सांसारिक जीवन की जटिल समस्याओं से अलग होता है। तीर्थस्थल की यात्रा से तीर्थयात्री को तीर्थस्थल में आवश्यक उपयुक्त मानसिक स्थिति की तैयारी का अवसर मिलता है।

तीर्थयात्रा का व्यक्तिवादी पक्ष (Individualistic Aspect of Pilgrimage)
उप-अनुभाग 30.4.1 में उल्लिखित तीर्थयात्रा के संगठन से जुड़े सामूहिक पक्ष के अलावा, हिंदू, बौद्ध और ईसाई संस्कृतियों में तीर्थयात्राओं के विभिन्न अध्ययनों से तीर्थयात्रा का व्यक्तिवादी पक्ष उजागर हुआ है। हिंदू तीर्थयात्रा, विशेषकर काशी की यात्रा, प्रमुख रूप से मोक्ष की व्यक्तिवादी तलाश है। सभी संस्कारों का उद्देश्य ऐसे पुण्य अर्जित करना है जो सामूहिक रूप से नहीं बाँटे जा सकते। तीर्थयात्रा का पुण्य व्यक्तिगत रूप से अर्जित किया जाता है, और तीर्थयात्रा का अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष‘ की प्राप्ति अर्थात व्यक्ति की अपनी आत्मा की मुक्ति है। तीर्थयात्रा व्यक्ति का अपना मामला होता है। यह सच है कि ऐसे उदाहरण भी हैं जिनमें तीर्थयात्रा करने के उद्देश्य पवित्रता, भक्ति और सामुदायिक तथा सामाजिक निष्ठा के सामान्य वातारण में जन्म लेते हैं। लेकिन बहुधा तीर्थयात्रा ष्किसी वचन या प्रतिज्ञा का परिणाम होती है, कहीं कुछ गलत हो गया होता है, कोई खतरा सामने होता है या अत्यधिक अपेक्षित कोई अच्छी वस्तु नहीं मिल पा रही होती हैष् इसी कारणवश तीर्थयात्रा की जाती है। (वही, 255), तीर्थयात्री किसी व्यक्तिगत कामना की पूर्ति के लिए पवित्र स्थान की यात्रा करता है। बौद्ध तीर्थयात्री बुद्ध के अवशेष वाले पवित्र स्थल की प्रदक्षिणा करते हैं। यह व्यक्तिगत आध्यात्मिक उत्थान की यात्रा का प्रतीक होता है।

सांसारिक अस्तिव से संबंधित कुछ विशिष्ट उद्देश्य होते हैं। इनमें सामान्यतया उस देवी या देवता से प्रतिज्ञा की जाती है जिससे तीर्थयात्री अपनी किसी महत्वपूर्ण समस्या का समाधान के लिए आशीर्वाद की कामना करता है। जैसे, कोई पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर तीर्थयात्रा कर सकता है। दूसरे प्रकार का उद्देश्य धार्मिक पुण्य कमाना है। इस प्रकार के उद्देश्य की परिभाषा देना कठिन है। इसे धन या व्यवसाय में सफलता के लिए प्रार्थना करना नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि करने की इच्छा के रूप में समझा जा सकता है। प्रत्येक तीर्थयात्रा से संबंधित एक पवित्र परिसर होता है। टर्नर (1974 रू 189) के अनुसार तीर्थयात्राएँ गतिविधियों की प्रक्रियाएँ होती हैं और उसके अनुसार ष्तीर्थयात्राओं में वस्तुगत स्तर पर प्रक्रियाओं का एक संबद्ध जाल होगा जिनमें प्रत्येक में एक विशेष स्थल की यात्रा शामिल होगी। इस प्रकार के स्थल, विश्वासियों या श्रद्धालुओं के अनुसार, ऐसे स्थान होते हैं जहाँ दैवीय या अतिमानवीय शक्ति का कोई रूप प्रकट हुआ हो, जिसे मीरशा एलिएड ‘‘ईशदर्शन‘‘ (जीमवचींदल) कहता है । ( टर्नर 1974: 189)।

 तीर्थयात्रा की पवित्रता (Sacredness of Pilgrimage)
पवित्र ऐसी वस्तुएँ और क्रियाएँ होती हैं जिन्हें पावन के रूम में विशिष्ट स्थान प्राप्त होता है और जो श्रद्धा की अधिकारी होती हैं। इस तरह की वस्तुएँ और क्रियाएँ अक्सर उस समाज के प्रमुख मूल्यों का प्रतीक होती हैं। पवित्र को अक्सर अपवित्र की तुलना में रखकर समझा जाता है। जो अपवित्र होता है वह साधारण होता है, पवित्र नहीं । इमाइल दुर्खाइम (देखिए ई.एस.ओ.-15 के खंड-1 की इकाई 3 के पृष्ठ 42-43 ) के अनुसार सभी धर्म संसार को दो विपरीत लोकों में विभाजित करते हैं रू पवित्र और अपवित्र । वे इन लोकों में भेद करने के लिए नियम भी निर्धारित करते हैं। पवित्र और अपवित्र के इस ठेठ विभाजन की व्यापक आलोचना हुई है। उदाहरण के लिए, पवित्र और अपवित्र के बीच ध्रुवीय विरोध की धारणा को भारतीय संदर्भ में सावधानी के साथ लागू किया जाना चाहिए क्योंकि, भारतीय धार्मिक चिंतन (विपरीत को अपने में सम्मिलित करने के अर्थ में) श्रेणीबद्ध है, मात्र द्वैतवादी (द्विपक्षीय विरोध को मान्यता देने वाला) नहीं । इसका अर्थ यह हआ कि अपवित्र अर्थात जो पवित्र का विलोम होते हए भी पवित्र में शामिल है और इस प्रकार उसके अधीनस्थ है (मदन 1991: 3)। अपनी पवित्रता के लिए प्रसिद्ध काशी जैसे तीर्थस्थान में भी स्थान की व्यवस्था के संदर्भ से, इसके संस्कारों के संपादन के संदर्भ में और सांस्कारिक पेशेवरों के व्यवसाय के संदर्भ में पवित्र और सांसारिक के बीच कोई स्पष्ट भेद नहीं है।

इस संदर्भ में दो उदाहरण दिए जा सकते हैं ब्राहमण पुरोहितों का मंदिरों में या संस्कारों के संपादन के समय गंगा की धाराओं पर तीर्थयात्रियों से पैसे ऐंठना काशी में एक आम दृश्य होता है। दूसरा उदाहरण डोमों का पवित्र अग्नि पर अधिकार का है। जिसकी आवश्यकता मृतकों के मोक्ष के लिए होती है। वह मृतक ब्राह्मण भी हो सकता है।

तीर्थस्थान की पवित्रता तीर्थयात्रियों में शुद्धता के प्रति चिंता के कारण होती है। तीर्थयात्रियों को अपने शरीर और मन से अपवित्रता के धब्बों को धो देना होता है। जहाँ तक हिंदू तीर्थयात्रियों की बात है, तीर्थयात्रा अति संयम के कारण अपने आप में शुद्धीकरण होती है। तीर्थयात्रा और तीर्थस्थानों से जुड़ी पवित्रता के स्तर के लिए बॉक्स 30.02 देखें । पवित्र होने और शुभ होने के बीच के अंतर का ज्ञान करने के लिए अगला अनुभाग 30.2.4 भी देखें।

बॉक्स 30.02
पवित्रता का स्तर तीर्थस्थानों की यात्रा और वहाँ होने वाले क्रियाकलापों के विभिन्न पक्षों की विशेषता बताता है। तीर्थस्थानों की सांक्रांतिकता उस समय स्पष्ट हो जाती है जब उनकी तुलना घाट से की जाती है। घाट किसी नदी का छिछला भाग या छिछली धारा होती है, जहाँ से पैदल पार जाना संभव होता है । इस स्थान पर नाव के बिना किसी वाहन से भी नदी को पार किया जा सकता है। वास्तव में, तीर्थ संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ होता है किसी नदी, नहाने के स्थान और तीर्थस्थान में उतरने के लिए बना रास्ता, सड़क, घाट या सीढ़ियाँ । तीर्थ शब्द का इस्तेमाल अन्य अर्थों में भी होता है। लेकिन तीर्थ के विभिन्न अर्थों के इस्तेमाल में पवित्रता का एक प्रतीकात्मक मूल्य होता है। जो किसी उच्च किस्म के स्थान, स्थिति या व्यक्ति से संबद्ध होता है। इस प्रतीकात्मकता का महत्व ‘‘पार करने‘‘ (संक्रांति या पारगमन) में है। घाट लगने या पार उतरने की धारणा में एक पार करने के स्थान का अर्थ निहित होता है। अर्थात (पवित्र और अपवित्र के) दो लोगों के बीच का माध्यम या सांक्रांतिक स्थल ष्तीर्थष् ऐसा ही स्थान होता है, और तीर्थयात्रा का स्थान भी ऐसा ही होता है। उसी तरह, एक विद्वान पवित्र, दीक्षित या भक्तजन सांसारिक समाज से ऊपर उठकर मनुष्य और परमात्मा के बीच खड़ा हो जाता है और जो इस तरह एक चैराहे और घाट का काम करता है।

 तीर्थयात्रा में शुभ-अशुभ (Auspiciousness in Pilgrimage)
शुभ-अशुभ का विचार तीर्थयात्रा का एक महत्वपूर्ण तत्व है। शुभ-अशुभ में और पवित्र/ अपवित्र में अंतर होता है। शुभ/अशुभ का संबंध घटनाओं से और अंततोगत्वा एक घटना-संरचना के रूप में स्वयं जीवन से होता है। पवित्रध्अपवित्र की स्थिति मूल रूप से वस्तुओं से संबद्ध होती है। किसी नदी या जलाशय के किनारे स्थित हिंदुओं का तीर्थस्थान पवित्र माना जाता है और उसके लिए की गई यात्रा को शुभ माना जाता है। यदि तीर्थस्थान पर दो या दो से अधिक नदियों का संगम हो तो उस स्थान की पवित्रता और बढ़ जाती है और वहाँ की तीर्थयात्रा और भी शुभ हो जाती है (मदान 1987ः52) शुभ में मंगल कामना और कल्याण निहित होते हैं। शुभ समय या घटना या व्यवहार को कल्याणकारी माना जाता है।

तीर्थयात्री ऐसी वस्तुओं या व्यक्तियों को अत्यंत महत्व देते हैं जो शुभंकर होते हैं, चाहे ऐसी वस्तुएँ या व्यक्ति अपवित्रता से ग्रस्त ही क्यों न हों, इस तरह पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तीर्थयात्रा करने वालों से यह कहा जाता है कि देवदासियों के दर्शन और उनकी प्रदक्षिणा करना शुभ होता है, अर्थात उनसे कल्याण होता है। मंदिर में पूजा करने वाले कुछ लोग नृत्य करती हुई देवदासियों के चरणों की धूल लेते हैं या फिर जहाँ वे नृत्य करती हैं वहाँ जमीन पर लोटते हैं। ऐसा वे अपने कल्याण की आशा में या देवी कृपा प्राप्त करने की आशा में करते हैं। (मार्गलीन 1985: 109), क्योंकि उन्हें यह बताया जाता है कि देवदासियाँ जगन्नाथ की पत्नी लक्ष्मी का साक्षात रूप हैं। वास्तव में, केवल देवदासियों का दिन और वर्ष की विभिन्न घड़ियों में मंदिर के बाहरी गर्भगृह में नाचने-गाने का अधिकार होता है। वे मंदिर परिसर में होने वाले अनेक अन्य शुभ अनुष्ठानों और कार्यक्रमों से भी जुड़ी होती हैं। इसलिए तीर्थयात्री उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं।

लेकिन देवदासियों को मंदिर के आंतरिक गर्भ गृह में जाने की अनुमति नहीं होती। इस निषेध । का कारण देवदासियों का गणिका या वेश्या होना होता है। इस तरह उनका शरीर अपवित्र होता है। लेकिन तीर्थयात्रियों के लिए देवदासियों के दर्शन या उनकी पूजा शुभ होती है (मार्गलीन 1985 रू 35)।

 विभिन्न धार्मिक परंपराओं में तीर्थयात्राएँ (Pilgrimages in ffDierent Religious Traditions)
कुछ प्रमुख धर्मों के अनुयायी जिस तरह से तीर्थयात्राएँ करते हैं उसके संक्षिप्त विवरण में हमें तीर्थयात्राओं की प्रकृति और कार्यप्रणाली को और अच्छे ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।

तीर्थों की सामाजिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Socio Historical Background of Pilgrimages)
तीर्थों का उदय इतिहास के विभिन्न कालों में हुआ है और उन्होंने विभिन्न मार्गों को ग्रहण किया है। तीर्थ की परंपरा अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग पाई जाती है। पहले हम टर्नर द्वारा इतिहास में तीर्थों के वर्गीकरण की संवीक्षा करेंगे। यह वर्गीकरण मुख्य रूप से पश्चिम के और ईसाई धर्म के अनुभवों पर आधारित है। वैसे इसकी सार्वभौमिक वैधता का दावा किया गया है। फिर हम समय के साथ बदलने वाली ष्हजष् की व्याख्याओं की चर्चा करेंगे। अंत में हम भारत में तीर्थ के अर्थ और उसकी प्रथा की निरंतरता और उसमें आए बदलाव पर दृष्टि डालेंगे।

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