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वहाबी आंदोलन किसने शुरू किया था , कब प्रारंभ हुआ , wahabi movement in india started by in hindi
भारत में वहाबी आंदोलन किसने शुरू किया था , कब प्रारंभ हुआ , wahabi movement in india started by in hindi ?
प्रश्न: वहाबी आन्दोलन
उत्तर: वहाबी आंदोलन अठारहवीं शताब्दी के प्रथम भाग में अरब निवासी अब्दुल वहाब के नेतृत्व में हुआ। इस आंदोलन का प्रचार-प्रसार रायबरेली के सैयद अहमद ने किया। यह आंदोलन भारत में पुनः मुस्लिम राज्य स्थापित करना चाहता था।
भाषा एवं साहित्य
मणिपुरी
मणिपुर साहित्य मणिपुरी भाषा में लिखा गया (जो है मीटिलोन)। इसे मीटि साहित्य के तौर पर भी जागा जाता है। मणिपुरी साहित्य हजारों वर्ष पुराना है जब इसकी सभ्यता फली-फूली। लेकिन 1729 में, मेडिंगू पमहेबा (1709-1748) के शासन के दौरान, पूया मेथबा (प्राचीन मणिपुरी धर्म ग्रंथों का जलना), ने प्राचीन मणिपुरी ग्रंथों एवं सांस्कृतिक इतिहास का विध्वंस कर दिया। इसने मणिपुरी साहित्य के एक नए युग का सूत्रपात किया।
मीटि के लेखन का एक लंबा इतिहास रहा। यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि मीटि पुया (प्राचीन धर्मग्रंथ) और मीटि मायेक (मणिपुरी लिपि) पहली बार कब अस्तित्व में आए। हालांकि लिखित संविधान लोईयम्बा शिनयेन (1110), मेडिंगू लोईयम्बा (1074-1122) के शासन काल के दौरान, संकेत करता है कि इस युग में लेखन कार्य प्रारंभ हो चुका था।
प्रारंभिक मणिपुरी साहित्य में रीति-रिवाज, इतिहास, या लोक कथा,ं गद्य एवं कवित्त रूप में शामिल किए गए हैं। प्राचीन मीटिलोन (मणिपुरी भाषा) का उल्लख्ेानीय कार्य है नुमित कप्पा, ओउग्रि, खेनचो, साना लामोक (12वीं शताब्दी) हिजिन हिराव, निंÛथाउरोग (17वीं शताब्दी)।
सबसे प्राचीन साहित्यिक कार्यों में से एक नुमित कप्पा मीटिलोन के साथ मणिपुरी लिपि में लिखा गया जो कवित्त रूप में था। टी.सी. होडसन प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी पुस्तक में मेथीस मीटिलोन साहित्यिक कार्य का अंग्रेजी में अनुवाद किया।
मणिपुरी साहित्य एवं संस्कृति में भारी बदलाव मेडिंगू चरेरोंगबा (1697-1709) और उनके उत्तराधिकारियों के शासन के दौरान आया। 18वीं शताब्दी की समाप्ति के साथ, मैत्राबक (मणिपुर) ने अपनी संस्कृति, अर्थव्यवस्था एवं राजव्यवस्था का संपूर्ण विकास प्राप्त किया।
अंगोम गोपी मेडिंगू पमहेबा के शासनकाल के दौरान प्रसिद्ध कवि एवं बुद्धिजीवी थे। वे न केवल मीटिलोन (मणिपुरी भाषा) में निपुण थे अपितु संस्कृत और बंगाली भाषा में भी पारंगत थे। उन्होंने क्रितिबास की रामायण और गंगादास की महाभारत का मीटिलोन में अनुवाद किया। उन्होंने परिखिट, लंगका कांड, अरण्य कांड, किष्किण्डा कांड, सुंदर कांड, और उत्तर कांड का भी लेखन किया।
मणिपुरी साहित्य के इतिहास में स्वर्णिम समय 1779 में रचित उपन्यास थे। यह वह समय था जब धार्मिक पुस्तकें मुख्यधारा में थीं। साना माणिक को सबसे पहला मणिपुरी उपन्यास माना जाता है।
मेडिंगू चिंगथांगखोम्बा के ज्येष्ठ पुत्र, नबानंदा युबराज, राजघराने से एक प्रसिद्ध लेखक थे, और उन्होंने रामकृष्ण दास की विराट पर्व का मीटिलोन (विराट शथुप्लोन) में अनुवाद किया।
लेनिनधन नओरिया फूलो (1888-1941) मीटि संस्कृति के पुगर्जागरण एवं पुनर्रुद्धार आंदोलन के अग्रदूत थे। मणिपुरी कविता में उनके महान योगदान में युमलई लेरोग (1930), अपोकपा मैपुगि टुंगनाफाम (1931) टेंगबनबा अमाशुंग लेनिंगथाॅऊ लैबो (1933) और अथोईबा शेरेंग (1935) शामिल हैं। उनके प्रमुख गद्य कार्य में मीटि येलहोउ मायेक (1931) मीटि हाओबेम वारी (1934),एगि वारेंग (1940) आते हैं। हीजैम इराबोट ने 1922 में प्रथम पत्रिका मीटि का प्रकाशन किया। इस समय तक, आधुनिक मणिपुरी साहित्य खबेरकपम चाओबा, लामाबेम कमाल और हीजैम अंगनघल के कार्यों से एक मान्यता प्राप्त लेखन बन गया।
आधुनिक मणिपुरी कविता को स्पष्ट रूप से दो समूहों लामाबेम कमाल और उनके समकालीनों की कविता जो प्रारंभिक चरण को प्रस्तुत करती है और अधिक आधुनिक युवा कवियों की कविताएं जो समकालीन विश्व की तस्वीर को प्रकट करते हैं।
मीनाकेतन की शैली बेहद नई एवं वैयक्तिक है। निलाबिर शर्मा,गौरकिशर, आर.के. इलबांगबम प्रसिद्ध कवि हैं। युवा कवियों समरेन्द्र, नीलकांत, पद्मकुमार, श्री वीरेन, इबोमचा, इबोहल, इबोपिश्क, मधुबिर, ज्योतिन्द्र और इबेमपिश्क की कविताओं ने अंधविश्वास, क्रोध, परम्परागत मूल्यों पर प्रश्न करना और समाज में आस्था एवं अखण्डता के अभाव पर अत्यधिक गहरी समझएवं दृष्टि को अभिव्यक्त किया।
अनुवाद के क्षेत्र में, नबदविपचंद्र बेहद प्रसिद्ध है, जो माइकल मधुसूदन की मेघनंद बाधा काव्य का मणिपुरी में अनुवाद है। टैगोर की गीतांजलि का अनुवाद ए. मीनाकेतन और कृष्ण मोहन द्वारा किया गया। गौरकिशर ने कालीदास की मेघदूत का मणिपुरी में अनुवाद किया। कासीराम की कुमारसंभव, किर्ताजुनियम, रघुवंश काव्य, क्रितिवास की रामायण और भगवद् गीता का अनुवाद मणिपुरी में किया गया। प्रारंभिक नाटकों में ललित का सती खोंगनेग और अरेप्पा मारूप, लेरनेमयुम इबुंघल का नरसिंह, डोरेन्द्रजीत का मोरंग थोईबी, बीर सिंह का बीर तिकेन्द्रजीत, बीरमंगोल का चिंगू खोंगनेग थाबा, श्यामसुंदर का मेनू पेमचा और बोरमानी का केग लंजा प्रमुख हैं।
समकालीन नाटककार नए विषयों एवं तकनीक के साथ नाटकों को लेकर सामने आए। उनके शोध एवं खोज में सुगमता से राजनीतिक एवं सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को प्रस्तुत किया गया। इनमें अग्रणी नाटककार जी.सी. टोंगब्रा, नेत्रजित, एमण्के. बिनोदिनी देवी, रामचरण, कान्हलाल, ए. सुमोंरेंद्रो, टोमचाऊ और सनाजाओबा हैं। रतन थिरूयेम ने वर्ष 1976 में ‘कोरस रेपटरी थिएटर’ की इंफाल में नींव रखी।
20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, लामाबेम कमाल, खबेररकपम चाओबा और हीजैम अंगघल ने मणिपुरी में प्रथम मौलिक उपन्यास लिखने का प्रयास किया। आर.के. शीतलजीत, एच. गुनो, थोईबी देवी, आर.के. इलांगबम, राम सिंह, इबोहल, भाग्य, नोबीचंद, इबोमचा, चितरेश्वर, एमण्के. बिनोदिनी और पाचा मीटि का नाम अन्य समकालीन उपन्यासकारों के होते हुए भी बेहद उल्लेखनीय है।
सूरचंद सरमा,श्यामसुंदर, रघुमनी सरमा और निशान सिंह का नाम प्रसिद्ध अनुवादकों में लिया जा सकता है।
मणिपुरी में आलोचनात्मक साहित्य ने लोकप्रियता हासिल की। अरबिया मणिपुरी साहित्यगी इतिहास (पंडित खेलचंद्र) और मणिपुरी साहित्यगी अश्म्बा इतिहास (कलाचंद शास्त्री) ने मणिपुरी साहित्य के प्रारंभिक एवं मध्यकाल का सर्वेक्षण किया। मैती उपन्यास (मीनाकेतन) और मणिपुरी साहित्य अमासुंग साहित्यकार (दीनामनी) ने प्रमुख मणिपुरी उपन्यासों का आलोचनात्मक सर्वेक्षण किया। चंद्रमणि का साहित्यगी नैनबा वारेंग, कलाचंद शास्त्री का शेरेंग लेटेंगे, गोकुल शास्त्री का साहित्य मिंगशेल पंडित ब्रजबिहारी शर्मा का अलंगकर कौमुदी और लोरेमबेम इबोयेइमा का अलंगकर ज्योति भी प्रसिद्ध आलोचनात्मक कृतियां हैं।
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