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वी.डी. सावरकर | वी डी सावरकर कौन थे विनायक दामोदर सावरकर पुस्तकें | जीवनी vinayak damodar savarkar in hindi
( vinayak damodar savarkar in hindi ) V D savarkar वी.डी. सावरकर | वी डी सावरकर कौन थे विनायक दामोदर सावरकर पुस्तकें | जीवनी ? द सिक्स ग्लोरियस एपोक्स आफ इण्डियन हिस्ट्री विनायक दामोदर सावरकर the history of the war of indian independence is a book written by whom in hindi ?
वी.डी. सावरकर
जीवन-रेखा
वी.डी. सावरकर (मई, 1883 फरवरी, 1966)
एक उत्कृष्ट राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी आतंकवादी नायक सावरकर बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में अपने साहसिक राजनीतिक कार्यों से प्रकाश में आए। 1906-1910 के बीच उन्होंने इंग्लैंड में शिक्षा ली और साथ ही, क्रांतिकारी क्रियाकलाप चलाया। इंग्लैंड में ही मादाम कामा, लाला हरदयाल और मदनलाल धींगरा जैसे अन्य क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। उन्हें पचास वर्षों के कारावास का दंड मिला। जिसके अनेक वर्ष उन्होंने अंडमान में बिताए। 1923 में उन्हें रतनगिरि लाया गया। 1937 में मुक्त होने पर उन्होंने डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी और बाद में हिंदू महासभा की सदस्यता ली।
सावरकर के राजनीतिक विचार
सावरकर का राजनीतिक दर्शन भारत के राष्ट्रीय स्वरूप पर केंद्रित था। भारतीय राष्ट्रवाद की भौगोलिक अभिव्यक्ति इसके सांस्कृतिक पहलुओं के सामंजस्य में रही है। उनका प्रबल तर्क था कि अधिसंख्यक हिंदुओं द्वारा अनुशरित धार्मिक व्यवस्था के रूप में हिंदुत्व की व्याख्या के विपरीत, यह हिंदुत्व अथवा जनमानस और चेतना में व्याप्त हिंदुत्व ही है जो भारत की राष्ट्रीयता के केंद्र भाग में स्थित है। इस प्रकार की अवधारणा में हिंदुत्व के अंतर्गत इस देश के अनेकानेक स्थानीय धर्म और भौगोलिक रूप से निकट देशों के जनसमुदाय भी आ जाते हैं। अपने विचार बिंदु पर बल देते हुए सावरकर ने लिखा था…. लाखों की संख्या वाले सिख, जैन, लिंगामत, अनेक समाजी और अन्य समुदाय इस कथन पर गहरा रोष व्यक्त करेंगे कि वे-जिनके पूर्वजों की दसवीं पीढ़ी तक में हिंदुओं का रक्त संचारित हो रहा था-अब अचानक हिंदू नहीं रह गये हैं। अनेक रंगतों और मतमतांतर कला हिंदू धर्म जीवंत हैं और विकास कर रहे हैं और हिंदू संस्कृति के परिवेश में अपना अस्तित्व संजोए हुए हैं। हिंदुओं के लिए धर्म की पहचान इतनी पूर्णता के साथ देश से जुड़ी हैं कि यह देश उनके लिए न केवल पितृ भू बल्कि पुण्य भू भी है।
फिर वे इस बात पर बल देते हैं कि हिंदुस्तान में जन्में और पले होने के कारण इस देश के लिये उनकी समर्पण तथा उत्सर्ग भावना असीम थी। इसलिए, राष्ट्रवाद की समतल्यता हिंदू अधिसंख्यक होने के कारण हिंदू ही राष्ट्र का स्वरूप निर्धारण करेंगे। ईसाई, मुसलमान, सिख, जैन आदि अल्पसंख्यकों को हिंदुत्व के विकास को बढ़ावा देने के लिये बहुसंख्यक हिंदुओं से स्वतंत्र सहयोग करना चाहिए और स्वयं को राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में निमज्जित कर लेना चाहिए। हिंदू राष्ट्र की स्पष्ट पहचान को निरूपित करते हुए सावरकर ने चेतावनी दी कि क्षुद्र लाभों के लिए धर्म परिवर्तन करने वालों को इस पवित्र भूमि पर कोई स्थान नहीं मिलेगा। एक अन्य प्रसंग में उन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्य में मुसलमानों तथा ईसाइयों की समान रूप से भागीदारी मानने से इंकार किया। राजनीतिक सत्ता में इसलिए वे ही साझादार हो सकते हैं, जिनकी भावनाएं इस भूमि में मूल हैं और जो इस देश को अपनी पुण्य भूमि मानते हैं (जैन, सिख, लिंगागत, समाजी इत्यादि)। जहां तक कि नागरिक एवं राजनीतिक जीवन स्तर पर तथा सार्वजनिक नियक्तियों के मामले में सानुपातिक प्रतिनिधित्व पर बल दिया जाता है, हिंदू एक एकीकत भारत के निर्माण की प्रक्रिया में अल्पसंख्यकों का सहयोग स्वीकार करने को तैयार होंगे। लेकिन वे समानता, विशेष बर्ताव तथा समान रूप से सत्ता में साझेदारी की मांग को स्वीकार नहीं करेंगे, यद्यपि योग्यता के आधार पर समान अधिकार, प्रतिनिधित्व और न्यायसंगत प्रतियोगी अवसर बने रहेंगे।
तात्कालीन भारत में उभरती राजनीतिक स्थितियों की आवश्यकता, कांग्रेस की समझौतापरस्त नीतियों और वृहत्तर इस्लामवाद के वर्चस्व को देखते हुए, सारवरकर ने कुछ विशेष कदम सुझाएः
1) नेतृत्व संघर्ष में नेतृत्व हथियाकर बाहरी हस्तक्षेप के विरुद्ध हिंदू समुदाय को सुसंगठित करने के लिये उन्होंने विस्तार से, मुगल शासकों को नियंत्रण में रखने संबंधी प्रयासों के लिये शिवाजी के गुणों और बुद्धिमता की प्रशंसा की।
2) पूर्ववर्ती हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म को परिधि में लाने के लिए शुद्धीकरण की प्रक्रिया पर बल दिया। उनके विचार से यह गैर-हिंदुओं में कट्टरपंथियों को अलग-थलग कर देगा। बहुसंख्यक हिंदू समुदाय द्वारा उठाये गये ऐसे कदम भारत की संश्लिष्ट राष्ट्रीय संकृति को क्षतिग्रस्त करेंगे, जिसमें इस्लाम का भी योगदान है। लेकिन अधिकाधिक बढ़े हुए मुस्लिम जुझारूपन के सामने, उनकी दृष्टि में, कोई और विकल्प था भी नहीं।
अनेक सिद्धांत मसलों पर सावरकर का दृष्टिकोण निम्न उद्धरण में अच्छी तरह व्यक्त होता हैः ‘एक सच्चा हिंदू देश भक्त एक भारत राज का प्रेमी भी होता है। हिंदुस्तान उनकी पुण्यभूमि और मातृभूमि होने के कारण हिंदुओं का हिंदुस्तान के लिए प्रेम असीमित है। जिसे राष्ट्रवाद कहा जाता है, उनकी परिभाषा, दरअसल बहुसंख्यक समुदाय के राष्ट्रीय साम्यवाद के रूप में की जा सकती है। हिंदुस्तान में हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले और संख्या में सर्वाधिक हिंदू ही हैं जो राष्ट्रीय समुदाय का संघ होते हैं और राष्ट्र के राष्ट्रवाद की रचना और सूत्रीकरण । विश्व के प्रत्येक देश में ऐसा ही है। अल्पसंख्यक अपनी अलग धार्मिक आस्था और सभ्यता बनाए रखते हुए बहुसंख्यक समुदायों के साथ सहयोग करते हैं और इन देशों के सार्व जीवन तथा प्रशासन में स्वयं को रचा बसा लेते हैं।’’
बोध प्रश्न 5
टिप्पणीः 1) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये गये स्थान का प्रयोग करें।
2) अपने उत्तर का इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से मिलान करें।
1) सावरकर के राजनीतिक विचारों की तार्किक समीक्षा कीजिए।
सारांश
इस इकाई में आपने उन्नीसवीं सदी भारत में हिंदू पुनरुत्थान के तीन अग्रणी व्यक्तियों-दयानंद सरस्वती. विवेकानंद और सावरकर के राजनीतिक तथा अन्य विचारों का अध्ययन किया है। धर्म और राजनीति के अंतः साक्ष्य के विशेष प्रसंग में उनके विचार आपको स्पष्ट किए गये। इससे आपको राजनीति तथा धर्म के अंतःसंबंधों पर अपने विचार ढालने में सहायता मिलेगी और समकालीन भारत की घटनाओं के बोध के लिए एक अंतदृष्टि।
कुछ उपयोगी पुस्तकें
राय, लाजपत, अ हिस्ट्री ऑफ आर्य समाज, ओरियंट लांगमैन, 1967।
जोर्डन्स, जे.टी.एफ. दयानंद सरस्वती, हिज लाइफ ऐंड आईडयाज, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1978।
पंथम, थॉमस और डौयश, के. एल (संपा), मॉडर्न इंडियन पॉलिटिकल थॉट, सेज पब्लिकेशंस, नई दिल्ली, 1986 ।
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