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truman doctrine in hindi ट्रूमैन सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य क्या था

ट्रूमैन सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य क्या था truman doctrine in hindi ?
चर्चिल की फुल्टन (Fulton) वक्तता (मार्च, 1946) : लगभग उसी समय ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल ने. १ मार्च, 1946 को अमेरिका के मिसौरी राज्य में, फुल्टन नामक स्थान पर, वेस्टमिन्स्टर कॉलेज में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था, राष्ट्रपति टूमैन की उपस्थिति में, अपने प्रसिद्ध भाषण में श्आंग्ल अमेरिकी एकता और सैनिक सहयोगश् को बनाये रखने पर बल दिया, क्योंकि उसके मतानुसार श्स्टेटिन से ट्रीस्ट तक के सम्पूर्ण क्षेत्र पर लोहे का पर्दा (Iron Curtain) गिर चुका था और साम्यवादी पंचमांग वर्ग (Fifh Column) से, सभ्यता के लिए खतरा उत्पन्न हो गया था संक्षेप में, चर्चिल ने यह समझाने की कोशिश की कि साम्यवाद के प्रसार को सीमित करने के लिए पश्चिमी राष्ट्रों को संगठित होकर हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। रूस में उसकी बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। प्रमुख रूसी समाचार पत्र प्रावदा ने उसे विषैला एवं विद्वेषपूर्ण शब्दों से अतिरंजित बतलाकर उसकी निन्दा की। स्टालिन ने उसे एक ऐसा हानिकारक कार्य बताया, जिससे मित्र-राष्ट्रों में मनमुटाव बढ़ सकता था और जो शांति एवं सुरक्षा के लिए अहितकर था।
टूमैन सिद्धांत (Truman Doctrine) : 1946 में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों एवं विदेशमंत्रियों की परिषद् की बैठकों में पश्चिमी-राष्ट्रों और रूस के नेताओं के मतभेद उजागर होते रहे। 12 मार्च, 1947 को, राष्ट्रपति ट्रमैन नै, अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों के समक्ष एक संदेश प्रस्तुत किया, जिसमें उसने अपनी नीति के प्रमुख तत्वों को स्पष्ट किया। अपने ऐतिहासिक भाषण में टूमैन ने साम्यवाद का प्रसार रोकने के लिए यूनान (ग्रीक) और तुर्की को सहायता देने का निश्चय व्यक्त किया, क्योंकि उसका विश्वास था कि अमेरिका की यह नीति होनी चाहिए कि वह बाह्य दबाव अथवा सशस्त्र अल्पसंख्यक दलों द्वारा सत्ता हस्तगत करने के प्रयत्नों का प्रतिरोध करने वाले स्वतंत्र लोगों का समर्थन करें। यही ट्रमैन सिद्धांत के नाम से जाना जाता था। इसके पश्चात् साम्यवाद का परिरोधन (Containment), अमेरिका की विदेश नीति का प्रमुख अंग बन गया। टूमैन सिद्धांत की घोषणा का सोवियत संघ की नीति पर गहरा प्रभाव पड़ा जो कि स्वाभाविक था। उसके बाद यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत-युद्ध  आरम्भ हो चुका था, जो किसी भी समय तीव्र-युद्ध का रूप धारण कर सकता था।
मॉर्शल योजना (1947) : टूमैन सिद्धांत की घोषणा के तीन महीने के अंदर, 5 जून, 1947 को, अमेरिका के विदेश मंत्री जार्ज मार्शल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया, जिसमें यूरोप के आर्थिक पुनरुद्धार के लिए एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। उसी. कार्यक्रम को मार्शल योजना कहा जाता था। इस योजना पर विचार करने के लिए जुलाई में, पेरिस में 16 यूरोपीय राष्ट्रों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें यूरोप के आर्थिक पुनरुद्धार कार्यक्रम को पूरा करने के लिए एक सहयोग समिति बनायी गयी। सोवियत संघ और उसके समर्थक राष्ट्रों ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया और उसे डालरों के द्वारा राजनैतिक दबाव डालने और अन्य राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की योजना बताया। मोलोताव ने फ्रांस और ब्रिटेन को यह चेतावनी भी दी कि इस योजना को स्वीकार करने से, यूरोप दो गुटों में विभाजित हो जाएगा। ष्केनेथ इनग्रामष् के मतानुसार, मार्शल योजना ने श्दोनों गुटों का दृढीकरण कर दिया, साम्यवादी जगत एवं पश्चिमी राष्ट्रों के बीच विरोध की खाई को पहले से अधिक चैड़ा कर दिया।
कामिन्फार्म (Cominform) की स्थापना (5 अक्टूबर, 1947) : वास्तव में मार्शल योजना से रूसी नेता चिन्तित हो उठे। उन्होंने पूर्वी-यूरोप के राष्ट्रों को अधिक संगठित करने के लिए मार्शल योजना के समान एक पृथक आर्थिक योजना बनायी। वारसा में 9 यूरोपीय राष्ट्रों के साम्यवादी नेताओं के सम्मेलन में, साम्यवादी सूचना या कामिन्फार्म की स्थापना करने का निश्चय किया गया। अमेरिका में इसे कुछ वर्ष पूर्व के अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी संगठन श्कामिण्टर्नश् का ही दूसरा रूप माना गया, जिससे वहां पर साम्यवाद-विरोधी भावना बढ़ी।
इस प्रकार के तनावपूर्ण वातावरण में, नवम्बर, 1947 में आस्ट्रिया और जर्मनी के साथ संधि की शर्ते तय करने के उद्देश्य से, विदेश मंत्री परिषद् की एक बैठक लंदन में हुई। किन्तु उसमें कोई निर्णय नहीं हो सका। फरवरी, 1948 में चेकोस्लोवाकिया में साम्यवादी दल ने वहां की प्रजातंत्रीय सरकार को हुआकर बलपूर्वक सत्ता हस्तगत कर ली। इस प्रकार पर्वी यरोप का एकमात्र राष्ट्र, जिसकी सहानुभूति पश्चिमी राष्ट्रों के साथ भी, रूसी प्रभाव-क्षेत्र में चला गया। इसका पश्चिमी राष्ट्रों पर गहरा असर पड़ा और वे अधिक चिन्तित हो उठे। मार्च-अप्रैल, 1948 में, युगोस्लाविया के साम्यवादी नेता टीटो और सोवियत संघ के नेताओं में सैद्धांतिक मतभेदों के कारण फूट पड़ गयी। जिससे कामिन्फार्म की एकता का धक्का पहुंचा और पूर्व-पश्चिम का शक्ति-संतुलन भी प्रभावित हुआ।
जर्मनी में 1945 के पश्चात् शीतयुद्ध की राजनीति
पश्चिमी जर्मनी : 1945 में जर्मनी की पराजय के पश्चात् उसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रेंच और रूसी क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया था। जून, 1948 में पूर्वी एवं पश्चिमी जर्मनी में पृथक मुद्राएं प्रचलित की गयी और उसी के बाद रूसियों ने बर्लिन का संरोध (Blockade) आरम्भ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी-राष्ट्रों को, पश्चिमी बर्लिन को आवश्यक सामग्री भेजने के लिए सैकड़ों वायुयानों का प्रयोग करना पड़ा। बर्लिन का यह संरोध सितम्बर, 1949 तक चलता रहा।
तद्नुसार सितम्बर, 1948 में बान (Bonn) में, 11 प्रादेशिक सभाओं द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा का अधिवेशन हुआ। इस सभा ने जर्मनी के संघीय गणतंत्र (Federal Republic of Germany) का नया संविधान तैयार किया, जिसे मई, 1949 में स्वीकार कर लिया गया। नवीन संविधान के अनुसार पश्चिमी जर्मनी के 11 प्रदेशों का संघीय गणतंत्र (Bundes public) बनाया गया। उसमें दो सदनों की राष्टीय संसद की व्यवस्था की गयी. प्रथम – संघीय सभा या बुन्देस्टाग (Bundestag), जो जनता द्वारा चार वर्ष के लिए निर्वाचित की जाती थी और द्वितीय-संघीय परिषद् या बुन्देस्राट (Bundesrat) जिसमें संघटक प्रदेशों के प्रतिनिधि सम्मिलित किये गए थे।
14 अगस्त, 1949 को नए संविधान के अनुसार संघीय सभा या बुन्देस्टाग के निर्वाचन सम्पन्न हुए। बुन्देस्टाग के 402 स्थानों में से क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक दल को 139, सोशल डेमोक्रेटिक दल को 131, फ्री डेमोक्रेटिक दल को 52, बवेरियन पार्टी को 17, जर्मन पार्टी को 17 और साम्यवादी दल को 15 स्थान प्राप्त हुए। चुनाव के पश्चात् क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक दल के 72 वर्षीय नेता कोनराड एडेनावर (Konrad Adenauer) ने फ्री डेमोक्रेटिक दल एवं जर्मन पार्टी के सहयोग से जर्मन संघीय गणराष्ट्र का प्रथम मंत्रिमण्डल बनाया। उसी समय फ्री डेमोक्रेटिक दल के थियोडोर ट्रंस (Theodore Heuss) को गणतंत्र का प्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित किया गया।
बान सरकार के चांसलर (प्रधानमंत्री) के रूप में कोनराड एडेनावर को जटिल आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अर्थमंत्री एरहार्ड की सामाजिक-बाजार अर्थव्यवस्था (Social-market Economy) की नीति को जो आश्चर्यजनक सफलता मिली, उसे आर्थिक जगत में एक चमत्कार माना गया।
राजनैतिक क्षेत्र में एडेनावर की सरकार के तीन प्रमुख लक्ष्य थे
(अ) मित्र राष्ट्रों द्वारा उस पर लगाये गए समस्त आर्थिक एवं राजनैतिक प्रतिबंधों को समाप्त करके पूर्ण राष्ट्रीय प्रभुसत्ता प्राप्त करना।
(ब) यूरोप की महान शक्तियों में पुनः अपना स्थान प्राप्त करना।
(स) नवीन प्रजातंत्र के अंतर्गत, जर्मनी का पुनः एकीकरण करना।
पूर्वी जर्मनी-जर्मन लोकतंत्रीय गणतंत्र (German Democratic Republic) : जून, 1948 में रूसी प्रतिनिधि ने चार राष्ट्रों की नियंत्रण परिषद् से संबंध विच्छेद कर लिया और उसके पश्चात् तीनों पश्चिमी राष्ट्रों ने अपने क्षेत्रों का एकीकरण करने का निश्चय किया। उसी समय में सोवियत सरकार ने पूर्वी-जर्मनी में साम्यवादी व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए हर सम्भव उपाय किये। 1948 में सोवियत संघ द्वारा समर्थित जन कांग्रेस (People’s Congress) का गठन किया गया। – जन कांग्रेस ने अपने सदस्यों में से 400 प्रतिनिधि चुनकर श्जर्मन जन-परिषद् (People’s Council) बनायी। उसी श्जन-परिषद्श् ने सितम्बर, 1948 में पूर्वी-जर्मनी के लिए एक संविधान की रूपरेखा तैयार की, जिसे मार्च, 1949 में अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया गया। मई 1949 में, पूर्वी-जर्मनी में भी जन-कांग्रेस के चुनाव कराये गये, जिसमें मतदाताओं को केवल एक ही दल के प्रत्याशियों की सूची पर मतदान करने के लिए कहा गया। नव-निर्वाचित जन-कांग्रेस ने नवीन श्जन-परिषद्श् के लिए 330 प्रतिनिधि चुने। अगस्त, 1949 में पश्चिमी जर्मन-संघीय गणराष्ट्र की स्थापना का सोवियत संघ ने विरोध किया और अक्टूबर में पूर्वी-जर्मनी में श्जर्मन लोकतंत्रीय गणतंत्रश् की स्थापना की।
उसी समय नवीन श्जन परिषद्श् ने एक नया संविधान घोषित किया – जिसके अनुसार द्विसदनीय संसद की स्थापना की गयी। प्रथम निम्न सदन या लोक सदन (People’s Chamber) था, और द्वितीय उच्च सदन या राष्ट्रों का सदन (Chamber of the States) था, जिसमें पांच संघटक राष्ट्रों के प्रतिनिधि भेजे जाते थे। द्वितीय सदन को बहत कम अधिकार दिये गये थे। वास्तव में सत्ता के सभी सूत्र जर्मन सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी (Sozialistiche Einheitspartie DeutSchlands) की केन्द्रीय समिति के हाथों में केन्द्रित थे। इस प्रकार पूर्वी-जर्मनी में, रूस के नियंत्रण में साम्यवादी व्यवस्था स्थापित कर दी गयी।
सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी के नेता विलहेम्स पेक (Wilhelm Pieck) को संसद के द्वारा राष्ट्रपति चुना गया और उसी दल के प्रमख सदस्य ओटी ग्रोटवाल (Otto Grotewohl) को प्रधानमंत्री बनाया गया। साम्यवादी सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी ने प्रारम्भ में भी सोवियत प्रणाली के आधार पर पूर्वी जर्मनी के पुननिर्माण का कार्य आरम्भ किया।
बर्लिन का विरोध (जून, 1948) रू बर्लिन में सहबद्ध राष्ट्र-नियंत्रण-परिषद् में कुछ दिनों से आपसी मतभेद बढ़ते जा रहे थे, जिनके कारण जून, 1948 के अन्त में रूसी पक्ष ने बर्लिन की घेराबन्दी आरम्भ कर दी। इससे संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गयी। पश्चिमी राष्ट्रों ने यह विवाद संयुक्त राष्ट्रसंघ में प्रस्तुत किया। अन्त में दोनों पक्षों में समझौता हो गया और रूस ने घेराबन्दी समाप्त कर दी। वास्तव में बर्लिन में दोनों पक्षों के बीच शीत-युद्ध का प्रथम शक्ति परीक्षण हुआ, जिसके फलस्वरूप अमेरिका का रुख पहले की अपेक्षा कड़ा हो गया। .

उत्तरी अटलाण्टिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organçation) (अप्रैल, 1949) रू रूस की शीत-यद्ध की नीति के कारण पश्चिमी राष्ट्रों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अधिक संगठित करने का निश्चय किया। उसी उद्देश्य से उत्तरी अटलाण्टिक क्षेत्र के अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, लक्जेम्बर्ग, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, नार्वे सहित 12 राष्ट्रों ने 4 अप्रैल 1949 को, वाशिंगटन में उत्तरी अटलाण्टिक संधि पर हस्ताक्षर किए। पामर एवं पार्किन्स के मतानुसार, यह युगान्तरका घटना थी। रूस ने उसे आक्रामक आंग्ल-अमेरिकी श्गुट का ऐसा हथियार बताया जिसका उद्देश्य विश्व पर प्रपन स्थापित करना था। सितम्बर, 1948 में राष्ट्रपति ट्रमैन को यह सूचना मिली कि रूस ने भी अणुबम का सफल परीक्षण के श्लिया था, जिससे पश्चिमी राष्ट्रों की चिंता बढी। उसके बाद अमेरिका ने हाइड्रोजन बम तैयार किया। इस प्रकार दोनों पक्षों में शस्त्रास्त्रों की होड़ चलती रही जो विश्वशांति के लिए खतरनाक थी।
चीन में साम्यवादी लोक-गणतंत्र की स्थापना (1 अक्टूबर, 1949) : 1 अक्टूबर, 1949 को चीन में च्यांग-काई-शेक की सरकार के स्थान पर साम्यवादी लोक-गणतंत्र की स्थापना हुई, जिससे रूस के पक्ष को बल मिला। उसके बाद अमेरिका ने जनवादी चीन की सरकार को संयक्त-राष्ट्रसंघ में प्रवेश नहीं करने दिया, जिससे सोवियत संघ और अमेरिका के प्रतिनिधियों में बड़ी झड़पे हुई और शीत-युद्ध की उग्रता में वृद्धि हुई।
कोरिया का युद्ध (जून, 1950 – जुलाई, 1953) : जून, 1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण का अमेरिका एवं पश्चिमी राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र-संघ के माध्यम से दक्षिणी कोरिया को सहायता दी। कछ समय बाट र उत्तरी कोरिया की ओर से युद्ध में प्रवेश किया, जिससे स्थिति काफी बिगड़ गयी। पश्चिमी राष्ट्रों का यह विश्वास उत्तरी कोरिया ने रूस और चीन की प्रेरणा से ही दक्षिण कोरिया पर आक्रमण किया था। तीन वर्ष के भीषण जर बाद जुलाई, 1953 में युद्धविराम समझौता हो सका। किन्तु इस युद्ध ने शीत-युद्ध को अधिक प्रखर बना दिया।
इसी अवधि में इण्डोचाइना (हिन्द चीन) में भी, हो-चीमिन्ह ने नेतृत्व में साम्यवादियों एवं फ्रांसीसियों का संघर्ष चल रहा था, जिसमें साम्यवादियों को चीन से और फ्रांसीसियों को अमेरिका से सहायता मिल रही थी। जिनेवा सम्मेलन (अप्रैल-जुलाई 1954) में वियतनाम संबंधी युद्ध-विराम समझौता हो गया, परन्तु अमेरिका की सरकार उससे असंतुष्ट थी।
सीटो (SEATO) : अमेरिका के विदेशमंत्री डलेस के प्रयत्नों से, दक्षिण पूर्वी एशिया में साम्यवाद की रोकथाम के लिए 8 सितम्बर, 1954 को दक्षिण-पूर्वी एशिया संधि-संगठन (SEATO) की स्थापना की गयी। सीटो (SEATO) नाटो का एशियाई संस्करण था इसका मूल उद्देश्य डोमिनो सिद्धांत (साम्यवाद के प्रसार को रोकना) को प्रभावी रूप में लाग करना था। इसके संस्थापकों में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, ब्रिटेन, थाइलैण्ड, फिलीपीन्स और पाकिस्तान थे।
सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (बगदाद पैक्ट) (CENTO-1955) : नाटो का पश्चिमी एशियाई संस्करण, जिसकी स्थापना साम्यवाद के प्रसार को पश्चिमी एशिया में रोकने के लिए हुआ। इसके सदस्यों में ब्रिटेन, ईरान, तुर्की और पाकिस्तान थे। क्योंकि पश्चिमी एशिया में अमेरिका ने सेन्टो के माध्यम से इस क्षेत्र के प्रभावशाली देशों को साथ लेने का प्रयत्न किया। यह उल्लेखनीय है, कि इजरायल, अमेरिका का पहले से ही प्रभावशाली मित्र था।
अंजुस (ANZUS) रू एशियाई प्रशांत क्षेत्र में नाटो का संस्करण, शीतयुद्ध के दौरान जिसकी स्थापना अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड द्वारा मिलकर की गयी। यह उल्लेखनीय है, कि चीन के साम्यवादी होने और कोरियाई संकट (1950) के बाद अमेरिका साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए प्रतिबद्ध था।
वारसा पैक्ट (1955) : साम्यवादी सैन्य संगठन की स्थापना 1955 में वारसा सम्मेलन के दौरान हुई। साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ के पास था। सोवियत संघ ने नाटो के विकल्प में वारसा पैक्ट की नींव रखी, जिसमें सोवियत संघ के अतिरिक्त पूर्वी यूरोपीय देश, हंगरी, पोलैण्ड, बुल्गारिया इसके सदस्य थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद वारसा पैक्ट का भी औपचारिक विघटन कर दिया गया।
इसी बीच संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठकों में दोनो गुटों के बीच संघर्ष चलता रहा। सभी प्रमुख समस्याओं के संबंध में रूस, पश्चिमी राष्ट्रों के प्रस्तावों का निरंतर विरोध करता रहा। उसने अपने श्वीटोश् के अधिकार का भी अधिक से अधिक प्रयोग किया। निःशस्त्रीकरण की सभी योजनाएं भी उसके असहयोग के कारण विफल हो गयी।
जनवरी, 1953 में अमेरिका में टूमैन के स्थान पर, आइजनहॉवर राष्ट्रपति बने और जान फास्टर डलेस ने विदेश मंत्री का पद ग्रहण किया। नये रिपब्लिकन प्रशासन ने शांति बनाये रखने की अपील की। दूसरी ओर रूस में, 5 मार्च, 1953 का स्टालिन की मृत्यु के बाद, सोवियत सरकार की नीति में भी कुछ नरमी आयी। इसी के फलस्वरूप कोरिया में युद्ध-विराम हुआ। फरवरी, 1954 में बर्लिन में विदेश मंत्रियों की परिषद् की भी बैठक हुई, जिसमें जर्मनी की संधि की समस्या का सलझाने का पुनः प्रयत्न किया गया, किन्तु उसका कोई परिणाम नहीं निकला। जुलाई, 1955 में बड़ी शक्तियों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति आइजनहॉवर और रूस के बुलगानिन ने एक-दूसरे के प्रा सद्भावना प्रदर्शित की और आणविक अस्त्रों को सीमित करने के विषय में वार्ता की। 1956 से 1958 तक पश्चिमी एशिया शीत-युद्ध का अखाड़ा बना रहा। ईरान का तेल विवाद, स्वेज नहर का संकट, लेबनान में अमेरिकी फौजों का भेजा जाना आदि अवसरों पर, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे का डटकर विरोध किया। 1959 में डलेस के त्यागपत्र और खुश्चेव को न्यूयाक यात्रा के बाद शीत-युद्ध में कुछ कमी आई।

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