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तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध कब हुआ था , कारण क्या थे , परिणाम , third anglo maratha war in hindi
third anglo maratha war in hindi तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध कब हुआ था , कारण क्या थे परिणाम ?
प्रश्न: तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध
पिण्डारियों के दमन के साथ ही तृतीय मराठा युद्ध शुरू हुआ। मेल्कम ने इन्हें मराठा शिकारियों के साथ शिकारी कुत्ते की उपमा दी है। चीतू, वासिल, मुहम्मद करीम खां आदि पिण्डारियों के मुख्य नेता थे। लॉर्ड हेस्टिग्स ने सर हिसलोप को पिण्डारियों के दमन का कार्यभार सौंपा। जैसे ही पिण्डारियों का आखेट शुरू हुआ, तो यह तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध में परिवर्तित हो गया। अंग्रेजों ने मराठों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया व उनके साथ अलग-अलग संधि की गई।
प्रश्न: ब्रिटिश काल में उत्तर-पश्चिमी सीमांत समस्या क्या थी? और उसे कैसे सुलझाया गया ?
उत्तर: उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र सदा से ही भारत के लिए समस्या उत्पन्न करता रहा। यहां कबिलाई जातियों का प्रभाव था। सर चॉल
नापयर ने सिंध के 150 मिल सीमा पर बसे बुगती, डोम्बकी, जकरानी और बलोची कबिलाईयों के लिए अनेक बनवाएं और वहां सेना तैनात की। शुरूआत में कंपनी ने कबिलाईयों को अपनी आत्म रक्षार्थ हथियार बांटे, लेकिन वे हथियारों की वजह से लुटेरे बन गए। बाद में फ्रीअर और जेकब ने नेपियर की नीति को बदला तथा वहां एक घटस सेना लगाई। सिंचाई हेतु नहर निर्माण करवाया व यातायात हेतु सड़के बनवाई। इसके बावजूद बलोची अपनी लटमा बाज नहीं आए तो सरकार ने भी लूट और हत्या की नीति अपनाई जिसे श्बधिक और वज्र नीतिश् नाम से जाना जाता। जो सफल नहीं हुई। लिटन ने मेजर सण्डेमन को ब्लूचिस्तान का सैनिक अधिकारी बनाकर भेजा।
पेशावर व डेराजात में कमीश्नरी स्थापित की गई। कमीश्नरों को अपने एजेंट के रूप में नियुक्त किया गया। 1877 ब्लूचिस्तान को एक पॉलिटिकल एजेंसी के रूप में गठित कर दिया। 1891 में लार्ड लेंसडाउन ने सर मार्टिमर (आर्किलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) को एक शिष्ट मंडल के साथ काबुल भेजा, जिसने अफगान शासक अब्दुल रहमान के साथ 1893 में सीमा रेखा संबंधी समझौता किया, जिसे श्डूरण्ड लाईनश् कहा गया जो भारत व अफगान के मध्य सीमा रेखा है। लाई ऽ कर्जन ने सैनिक विकेन्द्रीकरण के स्थान पर केन्द्रीकरण की नीति अपनाई व कबाइलियों के साथ समझौता किया। कर्जन ने उत्तर पश्चिमी सीमावर्ती 5 जिलों यथा – हजारा, पेशावर, कोहार, बन्नू तथा डेरा इस्माईल खां एवं वे प्रदेश जो प्रशासनिक रूप से अफगानिस्तान व डूरण्ड लाईन के मध्य थे उनको मिलाकर 1901 में भारत का नया प्रांत बनाया, जिसे श्उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांतश् कहा। 1932 में इसे गर्वनर स्टेट का दर्जा प्रदान किया। सर रल्फग्रिफिथ को प्रथम गर्वनर बनाया।
प्रश्न: देशी राज्यों के प्रति सुरक्षित घेरे की नीति का आशय क्या है? इसका क्रियान्वयन किस प्रकार किया गया? कम्पनी इस नीति द्वारा अपने उद्देश्यों में कहां तक सफल रही? विवेचना कीजिए।
उत्तर: इस नीति का आशय है कम्पनी का अपने क्षेत्रों को सीधे सुरक्षा प्रदान करना। अपने क्षेत्रों के चारों ओर के पड़ोसी क्षेत्रों को सुरक्षित रखने का
प्रयास अर्थात् पड़ोसी क्षेत्रों को सीधे आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करना ताकि एक सुरक्षा तंत्र विकसित हो सके। इसके लिए पड़ोसी क्षेत्र को
फर क्षेत्र के रूप में तब्दील किया गया। अतः राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किए बगैर अपने सुरक्षित घेरे में रहना।
इस नीति के कारण एवं उद्देश्य
ऽ कम्पनी समानता की हैसियत प्राप्त कर अपने क्षेत्रों को फ्रांसीसी तथा भारतीय शक्तियों (अफगानों व मराठों से) के आक्रमण से बचाना
चाहती थी।
ऽ कम्पनी अन्य भारतीय शक्तियों के मुकाबले पूरी तरह मजबूत स्थिति में नहीं थी।
ऽ इस नीति का मुख्य उद्देश्य कम्पनी द्वारा सभी क्षेत्रीय वाणिज्यिक एवं व्यापारिक उपलब्धियों को सुरक्षित रखना था।
ऽ भारतीय रियासतों को अपनी रक्षार्थ कम्पनी पर निर्भर करने पर बाध्य कराना।
इस नीति के तहत मुख्य तथ्य
ऽ तटस्था की नीति।
ऽ अहस्तक्षेप की नीति।
ऽ सीमित उत्तरदायित्व की नीति।
ऽ भारतीय राज्यों को एक-दूसरे से संबंध स्थापित करने से रोकने की नीति।
ऽ वैल्जली की सहायक संधि की नीति और सीमित हस्तक्षेप की शुरुआत।
घेरे की नीति की समीक्षा
चूंकि इस नीति में आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की रोक थी। इसलिए प्रत्यक्ष अधीनता की स्थिति नहीं थी तथा ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना नहीं हुई थी। मैसूर को छोड़कर सभी संधियां समानता के आधार पर की गई थी। इन संधियों द्वारा इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया था कि शासक का अपनी प्रजा पर पूर्ण अधिकार बना रहे, लेकिन इन सबके बावजूद भा घर की नीति अपने मूल स्वरूप में लचीली थी, क्योंकि अहस्तक्षेप का सिद्धांत किसी नैतिकता पर आधारित नहीं था। यह विभिन्न गवर्नर जनरलों के अनुरूप बदली जा सकती थी और परिणामतः कई मौकों पर हस्तक्षेप भी किए गए, जैसे वारेन हेस्टिग्स क समय प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध और वैल्जली द्वारा चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध और द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध लड़े गए।
कुछ राज्य जैसे अवध, कर्नाटक और तंजौर एक अजीबोगरीब द्वैध-शासन की बुराई से घिर गए थे तथा वैल्जली का सहायक संधियों से भारतीय राज्यों की ब्रिटिश शासन पर आधारित होने की परम्परा की शुरुआत हुई।
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