संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए सुझाव suggestions for balanced regional development of industries in hindi

By   March 5, 2021

suggestions for balanced regional development of industries in hindi  संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए सुझाव ? 

प्रमुख सीमाएँ
उपर्युक्त समीक्षा से स्पष्ट है कि प्रादेशिक विषमताओं के उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा अनेक उपाय किए गए हैं। किंतु इन उपायों की कतिपय सीमाएँ हैं। इन सीमाओं में कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण निम्नलिखित हैंः

प) इन सभी स्कीमों की एक सबसे बड़ी कमी यह है कि क्षेत्र में इन स्कीमों की वास्तविक भौतिक प्रगति के बारे में बहुत ही कम प्रतिपुष्टि (प्रति सूचना) प्राप्त होती है। यह भावना बड़े पैमाने पर व्याप्त है कि अधिकांश योजनाएँ सिर्फ कागजी योजनाएँ हैं और इनकी तकनीकी आर्थिक व्यवहार्यता नहीं है और धरातल पर तद्नुरूप वास्तविक कार्रवाई भी नहीं होती है। स्वंय नौकरशाही औरध्अथवा स्थानीय उच्च कुलीनतंत्र में विपुल निधियों के क्षरण की भी शंका की जाती है। इस तरह की भावना तब तक बनी रहेगी जब तक कि प्रत्येक जिला/ब्लॉक में सुदृढ़ परियोजना निर्माण ब्यूरो द्वारा पेशेवर ढंग से क्षेत्र योजना नहीं तैयार की जाती है तथा प्रगति की नियमित, व्यापक, और स्वतंत्र निगरानी/मूल्यांकन नहीं की जाती है।

पप) यद्यपि कि क्षेत्र विकास स्कीमों के लिए जुटाई गई निधि प्रकट तौर पर विशाल प्रतीत होती हैं, अधिक विकसित प्रदेशों की तुलना में कम विकसित क्षेत्रों में उपलब्ध प्रति व्यक्ति कुल विकासात्मक परिव्यय कम है। अतएव, निधियों के आवंटन की पूरी वर्तमान व्यवस्था पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है।

पपप) औद्योगिक और परिवहन सब्सिडियों (राज सहायता) के प्रभावों का मूल्यांकन नहीं किया गया है। किंतु जो थोड़ा बहुत प्रमाण उपलब्ध है, उससे पता चलता है कि राज सहायता का आकर्षण प्रभाव केवल तभी होता है जब कि बुनियादी आधारभूत संरचना सुलभ हो।

पअ) विभिन्न राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों से या तो आयकर रियायतों अथवा केन्द्रीय निवेश राज सहायता स्कीम और लाइसेन्स हेतु पिछड़े क्षेत्रों की पहचान के लिए मानदंडों में एकरूपता और स्थायित्व नहीं है। परिणामस्वरूप, पिछड़े क्षेत्रों के चयन की विद्यमान प्रक्रिया ने अखिल भारतीय परिपेक्ष्य में पिछड़े प्रदेशों और क्षेत्रों के विकास के संवर्द्धन की क्षमता को कम कर दिया है। इसके दो कारण हैंः

एक, चूँकि बड़ी संख्या में क्षेत्रोंध्जिलों का वर्गीकरण पिछड़े क्षेत्रों के रूप में किया गया था, इसलिए उपलब्ध प्रोत्साहनों और संसाधनों का अनेक प्रदेशों में अत्यन्त ही विरल वितरण हुआ है।

दो, एक राज्य में पिछड़े क्षेत्रों की पहचान अखिल भारतीय औसत की अपेक्षा राज्य के औसत विकास सूचकांक के साथ चयनित विकास सूचकांकों की तुलना के आधार पर किया जाता है।

 संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए सुझाव
संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए हम तीन उपाय समूहों का सुझाव दे सकते हैं ये निम्नलिखत हैः
क) आधारभूत संरचना नीति
ख) राज्य स्तर पर नियोजन
ग) वित्तीय संसाधनों का अंतरण (न्यागमन)

 आधारभूत संरचना नीति
संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए पहली और सबसे बड़ी आवश्यकता आधारभूत संरचना सुविधाओं (जैसे जलापूर्ति, कर्जा और परिवहन) का विस्तार है। आधारभूत संरचना सेवाओं की आवश्यकताओं के दोहरे चरित्र पर बल दिये जाने की आवश्यकता है। आधारभूत संरचना सेवाएँ उपभोग की मदों और उत्पादन एवं पूँजी निर्माण में आदान दोनों के रूप में आवश्यक हैं। अतएव, अन्य बातों के साथ-साथ उन तक पहुँच प्रत्येक क्षेत्रध्समुदाय का बुनियादी अधिकार माना जाना चाहिए, विशेषकर इसलिए कि निर्धन देशों में राज्य को इनमें से अधिकांश सेवाएँ प्रदान करनी पड़ती हैं अथवा उनके लिए अत्यधिक राज सहायता (सब्सिडी) देना पड़ता है। इन सेवाओं को प्रदान करने के वैकल्पिक साधनों बीच चयन के लिए लागत लाभ विश्लेषण का प्रयोग किया जा सकता है, किंतु इसका उपयोग यह निर्णय करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए कि क्या कोई खास क्षेत्रध्समुदाय को यह उपलब्ध । कराया जाए अथवा इससे वंचित रखा जाए।

 राज्य स्तर पर नियोजन
संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए दूसरी महत्त्वपूर्ण पूपिक्षा नियोजन तंत्र का विकेन्द्रीकरण है। इस बात पर सामान्यतया सहमति है कि भारत जैसे विशाल उप-महाद्वीपीय अर्थव्यवस्था में अति-केन्द्रीकृत नियोजन निश्चित तौर पर अकुशल होती है। इस बात की आवश्यकता है कि संतुलित बहु-स्तरीय नियोजन का उद्भव होना चाहिए जिसे राज्य और ब्लॉक/जिला स्तरों पर कार्य करना चाहिए। कुछ अंतरों के साथ प्रत्येक स्तर के नियोजन की रूपरेखा और पद्धति में जरूर कुछ सामान्य विशेषताएँ होती हैं। इनमें से, सबसे महत्त्वपूर्ण की पहचान निम्नवत् की जा सकती हैः

एक, विभिन्न स्तरों पर कार्यों का अनुकूलतम विभाजन होना चाहिए। हम विभिन्न कार्यों को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैंः
प) कुछ क्षेत्रों की नियोजन केन्द्र से राज्यों और निचले स्तरों तक पूर्णतया हस्तांतरित कर देना चाहिए; इन क्षेत्रों में हम कृषि, भूमि विकास, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, आवास, जलापूर्ति, स्वास्थ्य, स्वच्छता, स्कूली शिक्षा, वयस्क शिक्षा इत्यादि सम्मिलित कर सकते हैं।
पप) अन्य क्षेत्रों में स्कीम की नियोजन में स्कीम के भौगोलिक विस्तार के आकार के अनुसार सभी स्तरों द्वारा हिस्सेदारी किया जाना चाहिए; इनमें हम सिंचाई, खनन, ऊर्जा, उच्चतर शिक्षा और परिवहन सम्मिलित कर सकते हैं;
पपप) इस तरह से क्षेत्रकों अथवा स्कीमों के वर्गीकरण के पीछे यह सिद्धान्त है कि (क) सभी कृषि और संबंधित क्षेत्रों, और (ख) आधारभूत संरचना और सामाजिक सेवा क्षेत्रों के लिए नियोजन को यथासंभव अधिक से अधिक विकेन्द्रीकृत करना चाहिए क्योंकि इन क्षेत्रों में कार्यकलाप या तो अवस्थिति अथवा प्राकृतिक संसाधन से आबद्ध होते हैं अथवा वे सार्वभौमिक आवश्यकता वाली होती हैं। इन सभी क्षेत्रों में, सफल नियोजन के लिए विस्तृत स्थानीय ज्ञान होना आवश्यक होता है।

दो, किसी भी स्तर पर नियोजन का मुख्य उद्देश्य दी गई अवधि में क्षेत्र में किए जाने हेतु कुल निवेश का निर्धारण और विभिन्न क्षेत्रकों, उप प्रदेशों तथा परियोजनाओं के बीच इसका आबंटन है। इस कृत्य को सम्पादित करने के क्रम में किसी भी स्तर पर नियोजन निकाय को सुदृढ़, विशेषीकृत और सापेक्षिक रूप से स्वायत्त एजेन्सी होना चाहिए जिसमें पूर्णकालिक प्रौद्योगिकीविद्, अर्थशास्त्री और प्रशासकों को रखा जाना चाहिए।

तीन, एक योजना में परियोजनाओं की स्कीमों का सेट आवश्यक रूप से सम्मिलित होता है। अतएव, योजना की गुणवत्ता साधारण रूप से योजना में सम्मिलित एक-एक स्कीमों की गुणवत्ता का परिणाम होता है। चूंकि समीक्षा और मूल्यांकन की आवश्यकता को पहले ही सर्वत्र स्वीकार किया जा चुका है, नियोजन के प्रत्येक स्तर पर परियोजना निर्माण एजेन्सियों को सुदृढ़ करने की तात्कालिक आवश्यकता पर बल देना जरूरी है। अच्छी परियोजनाएँ बनाने के लिए बड़े पैमाने पर नए आँकड़ों का संग्रह, चिन्तन, डिजायन तैयार करना और विश्लेषण की जरूरत होती है। अतएव, इस कार्य को अनिवार्य रूप से विशेषीकृत और पूर्णकालिक कार्य समझना चाहिए।

 वित्तीय संसाधनों का अंतरण (न्यागमन)
संतुलित प्रादेशिक विकास की एक अन्य महत्त्वपूर्ण शर्त उन सूत्रों, जिनके अनुसार केन्द्रीय संग्रहित संसाधनों का राज्यों को अंतरण किया जाता है, को सतत् रूप से प्रगतिशील बनाया जाए। राज्यों के बीच संसाधनों के वितरण के लिए वित्त आयोग और योजना आयोग द्वारा प्रयुक्त सूत्रों में उपयोग किए गए मुख्य घटक इस प्रकार हैंः
– जनसंख्या
– कर संग्रह
– पिछड़ेपन के कुछ सूचकांक
– बृहत् सिंचाई और विद्युत परियोजनाओं अथवा विशेष सेवाओं के उन्नयन के लिए अपेक्षित परिव्यय।

जनसंख्या घटक पर बल. जिसे विभिन्न सूत्रों में 70 से 90 प्रतिशत तक भार दिया गया है, समझने योग्य है किंतु कर संग्रह प्रयासों और बड़ी परियोजनाओं के समानुपातिक आबंटन के सामान्यतया प्रतिगामी स्वरूप लेने की संभावना होती है। प्रति व्यक्ति उच्च आय वाले राज्यों में कर संग्रह और परियोजना निर्माण क्षमता स्वाभाविक रूप से अधिक होती है। इसलिए, वांछनीय यह है कि आबंटन सूत्र से इन मानदंडों को पूरी तरह से हटा दिया जाए। सिर्फ जनसंख्या और पिछड़ेपन के उपयुक्त सूचकांक के समानुपातिक आबंटन ही किए जाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि राज्यों के द्वारा संसाधनों को जुटाने के लिए उठाए गए कदमों पर ध्यान देने की भी आवश्यकता है।

पुनः यह भी बताने की आवश्यकता है कि राज्यों के अंदर पिछड़े प्रदेशों पर केन्द्र-राज्य अंतरण के समय बिचार नहीं किया जाता है। इतना ही नहीं, इस तरह का अंतरण अथवा अंतरण की मात्रा परिणामोल्पादक नहीं होती है जितना कि इस अंतरण का उपयोग किस तरह से किया गया। यह आवश्यक है कि संसाधन आबंटन की इकाई राज्यों की अपेक्षा जिला होना सर्वोच्च प्राथमिकता सबसे पिछड़े जिलों को दिया जाना चाहिए। यहाँ निधियों और न्यायता को अत्यंत अल्प मात्रा में सर्वत्र वितरित करने की बजाए औद्योगिक पिछड़ेपन के आधार पर प्राथमिकता वाले निवेश क्षेत्रों को चिन्हित कर संसाधनों के गहन अभिनियोजन पर ध्यान केन्द्रित करना अधिक उपयोगी हो सकता है। शंकर आचार्य समिति ने प्रोत्साहनों के लिए राज्य में पिछड़े जिलों की पहचान के लिए आठ बिन्दु वाले मानदंड का सुझाव दिया है। सुझाए गए मानदंड निम्नवत् है

– उस क्षेत्र की प्रति व्यक्ति घरेलू उत्पाद
– उस क्षेत्र की कुल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा
– उस क्षेत्र में कुल नियोजन की तुलना में विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार का अनुपात
– प्रति व्यक्ति पक्की सड़क
– प्रति 1000 जनसंख्या पर टेलीफोन कनेक्शन
– बैंक शाखाओं की संख्या तथा प्रत्येक बैंक शाखा द्वारा सेवा प्रदत्त औसत जनसंख्या
– ऋण और जमा, प्रति 1000 जनसंख्या

बोध प्रश्न 3
1) संतुलित प्रादेशिक विकास के कार्यक्रमों से जुड़ी प्रमुख सीमाओं की पहचान कीजिए।
2) संतुलित प्रादेशिक विकास के लिए आप किस प्रकार की आधारभूत संरचना नीति का सुझाव देंगे?
3) सरकार के विभिन्न स्तरों पर कार्यों के अनुकूलतम विभाजन का सुझाव दीजिए।