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चीनी उद्योग क्या है | भारत में चीनी उद्योग की परिभाषा किसे कहते है Sugar industry in hindi in india
Sugar industry in hindi in india meaning definition चीनी उद्योग क्या है | भारत में चीनी उद्योग की परिभाषा किसे कहते है ?
चीनी उद्योग
चीनी उद्योग भारत में वस्त्र उद्योग के बाद अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला दूसरा सबसे बड़ा उद्योग है।
गन्ना की फसल और इसके प्रसंस्करण क्षेत्र में लगभग 36 मिलियन कुशल और अकुशल श्रमिकों को रोजगार प्राप्त है। साथ ही, बड़ी संख्या में लोग चीनी के व्यापार और गन्ना तथा चीनी के परिवहन के कार्य में संलग्न हैं। चीनी उद्योग के कुछ उपोत्पाद कुछ अन्य उद्योगों जैसे, अल्कोहल, प्लास्टिक, कागज, इत्यादि में कच्चेमाल के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। आधुनिक चीनी उद्योग के लिए गन्ने की खेती के विस्तार ने कई ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास और स्थानीय जनता की समृद्धि में योगदान किया है। इसके अलावा यह उद्योग केन्द्र और राज्य के राजकोषों में प्रतिवर्ष लगभग 1600 करोड़ रु. का भी योगदान करता है। भारत विश्व में सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता और उत्पादक देश के रूप में उभरा है।
पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान विकास
नियोजित आर्थिक विकास के कार्यक्रम शुरू करने और उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के प्रवर्तन के साथ चीनी उद्योग का विनियमित और नियोजित विकास होना संभव हुआ।
सरकार की लाइसेन्स नीति से भारतीय चीनी उद्योग की संरचना में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुएः
प) चीनी उद्योग के लिए 1952 के बाद जो लाइसेन्स जारी किए गए उनमें से अधिकांश उष्ण कटिबंधीय प्रदेश (अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल इत्यादि) के लिए थे जबकि इससे पूर्व चीनी उद्योग का विकास उप-उष्णकटिबंधीय प्रदेश (अर्थात् उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, असम और पश्चिम बंगाल) में हुआ था।
पप) सरकार की सहकारी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने की सुविचारित नीति के कारण सहकारिता क्षेत्र में भी चीनी उद्योग का खूब विकास हुआ है।
विभिन्न योजनाओं के दौरान इस उद्योग का कार्य निष्पादन अत्यन्त ही उल्लेखनीय रहा है, जो निम्नलिखित तथ्यों द्वारा बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है:
प) देश में चीनी मिलों की संख्या जो वर्ष 1950-51 में 139 थी बढ़ कर इस समय 572 हो गई है (सहकारिता क्षेत्र में 314, संयुक्त और निजी क्षेत्र में 188 और सार्वजनिक क्षेत्र में 70)
पप) चीनी का कुल उत्पादन जो 1950-51 में 11.34 लाख टन था (और 1931-32 में 1.5 लाख टन) बढ़कर 1999-2000 में लगभग 165 लाख टन हो गया है जिससे विश्व में सबसे बड़े चीनी उत्पादक के रूप में भारत का स्थान और पक्का हो गया है।
पपप) पिछली शताब्दी के तीस के दशक के आरम्भ में जहाँ, देश की कुल गन्ना उत्पादन का मात्र 3 प्रतिशत चीनी उत्पादन होता है वहीं अब यह बढ़ कर 20 प्रतिशत हो गया है।
चीनी उद्योग की नियति में उतार-चढ़ाव आता रहा है । यद्यपि कि उत्पादन में वृद्धि की प्रवृत्ति बनी रही है, इसमें बीच-बीच में कमी भी आई है, जैसा कि नीचे तालिका 12.2 में देखा जा सकता है:
तालिका 12.2: भारत में चीनी उत्पादन (लाख टन)
वर्ष निर्गत वर्ष निर्गत
1990-91
1991-92
1992-93
1993-94
1994-95 120.47
132.77
105.62
98.00
126.10 1995-96
1996-97
1997-98
1998-99
1999-2000 147.81
153.03
131.60
155.20
165.00
वास्तव में, पिछले बीस वर्षों के दौरान चीनी उत्पादन में एक विशेष प्रवृत्ति का विकास हुआ है जिसमें अधिशेष उत्पादन से लाभप्रदता में कमी आती है और किसानों का बकाया बढ़ता है। इसमे अगले मौसम में गन्ना उत्पादक कम गन्ना उपजाते हैं जिससे उत्पादन में गिरावट आती है। इसके बाद चक्र का दूसरा चरण आरम्भ हो जाता है।
इस संदर्भ में सरकार की नीति, घरेलू माँग की तुलना में आपूर्ति के समायोजन के लिए बारी-बारी से आयात और निर्यात की अनुमति देना रहा है।
चीनी उद्योग की वर्तमान समस्याएँ
वर्तमान स्थिति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:
एक, पिछले दशक या इसके आस-पास के दौरान चीनी अर्थव्यवस्था की विशेषता चीनी की माँग और आपूर्ति के बीच भारी और आवर्ती असंतुलन रहा है। एक समय में भारी कमी और फिर अधिशेष के कारण बारी-बारी से उद्योग को नियंत्रित और नियंत्रण से मुक्त भी करना पड़ता है। नीति में जल्दी-जल्दी बदलाव ने न सिर्फ उद्योग के विकास अपितु कृषि अर्थव्यवस्था को भी काफी प्रभावित किया है। यह मूल्य समानता और देश में सीमित भूमि-संसाधन की समस्या के
दो, यद्यपि कि चीनी अर्थव्यवस्था को अगस्त 1998 से लाइसेन्स मुक्त कर दिया गया है, तथापि चीनी उद्योग अभी भी भारी नियंत्रण में है। गन्ना के लिए केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित सांविधिक न्यूनतम मूल्य (एस एम पी) और इस सांविधिक न्यूनतम मूल्य के अतिरिक्त राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित राज्य सूचित मूल्य (एस ए पी) है। लेवी चीनी का मूल्य गन्ना के सांविधिक न्यूनतम मूल्य और औद्योगिक लागत और मूल्य ब्यूरो द्वारा यथा संस्तुत परिवर्तन लागतों के आधार पर जोन-वार (क्षेत्र-वार) निर्धारित किया जाता है। ‘‘खुली बिक्री के लिए चीनी‘‘ के मूल्य पर कोई नियंत्रण नहीं है, स्थायित्व को बनाए रखने के लिए प्रत्येक माह में जारी किए जाने वाले कोटा को निर्धारित करके बाजार में इसकी आपूर्ति को विनियमित किया जाता है। सरकार द्वारा निर्यात कोटा निर्धारित किया जाता है और चीनी के निर्यात का काम नामांकित एजेन्सी द्वारा किया जाता है।
तीन, देश की सभी चीनी उत्पादक क्षेत्रों में रुग्णता का प्रभाव देखा जा सकता है।
मिशन मोड परियोजना
सरकार ने एक मिशन मोड परियोजना की स्थापना की है। इस परियोजना का लक्ष्य 30 मॉडल (आदर्श) चीनी कारखानों का विकास करना है। सरकार ने चीनी प्रौद्योगिकी मिशन की भी स्थापना की है तथा चीनी कारखानों के लिए दो आधुनिक प्रौद्योगिकियों की पहचान की है। विद्यमान चीनी मिलों में प्रौद्योगिकी अन्तराल की पहचान और उभरती हुई प्रौद्योगिकियों के लिए अनुसंधान और विकास समर्थन ने इस पूरी प्रक्रिया को अत्यावश्यक रूप से आगे बढ़ाया है।
बोध प्रश्न 1
1) भारतीय अर्थव्यवस्था में सूती वस्त्र उद्योग का महत्त्व बतलाइए।
2) विगत पचास वर्षों के दौरान भारतीय सूती वस्त्र उद्योग की संरचना में क्या मुख्य परिवर्तन हुए हैं?
3) नई वस्त्र नीति 2000 की विशेषताएँ संक्षेप में बताएँ।
4) पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान चीनी उद्योग के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करें।
5) भारत में चीनी उद्योग द्वारा सामना की जा रही प्रमुख समस्याओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
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