श्री अरबिंदो कौन थे ? अरबिंदो घोष के विचार (sri aurobindo in hindi) अरविन्द घोष पुस्तकें शिक्षा दर्शन

By   August 30, 2020

(sri aurobindo in hindi) श्री अरबिंदो कौन थे ? अरबिंदो घोष के विचार अरविन्द घोष पुस्तकें शिक्षा दर्शन इन हिंदी |

श्री अरबिंदो का राजनीतिक चिंतन
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
श्री अरबिंदो: उनका जीवन और कृतित्व
प्रारंभिक जीवन-निर्माण का दौर
तैयारी का दौर
राजनीतिक सक्रियता का दौर
बाद का दौर-1910 के बाद के वर्ष
श्री अरबिंदो के राजनीतिक चिंतन की दार्शनिक बुनियाद
राजनीतिक चिंतन: प्रारंभिक दौर
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर श्री अरबिंदो के विचार
अंग्रेजी राज की प्रकृति
राष्ट्र की अवधारणा और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धांत
अंतिम लक्ष्य-स्वराज
राजनीतिक कार्यवाही का सकारात्मक कार्यक्रम
दूसरा दार-1910 से बाद के वष
मानव समाज का उद्विकास
मानव एकता की प्रकृति
आलोचनात्मक मूल्यांकन
राष्ट्रवाद का सिद्धांत-आध्यात्मिक या धार्मिक
राजनीतिक मुद्दों पर जोर –
श्री अरबिंदो: अराजकतावादी/आतंकवादी
सारांश
उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में श्री अरबिंदो के राजनीतिक चिंतन और भारत में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन में उनके योगदान पर विचार किया गया है। इस इकाई को पढ़ने के बाद, आपको इस योग्य होना चाहिए कि आपः
ऽ उनके चिंतन को ढालने के लिए जिम्मेदार कारकों को गिना सकें,
ऽ उनके चिंतन की दार्शनिक बुनियादों का विश्लेषण कर सकें,
ऽ राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारणा, राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के उद्देश्य, राजनीतिक कार्यवाही के उनके सकारात्मक कार्यक्रम, मानव एकता आदि पर उनके विचारों का विवरण दे सकें, और
ऽ स्वतंत्रता आंदोलन में एक चिंतक और कार्यकर्ता के रूप में उनकी भूमिका का मूल्यांकन कर सकें।

प्रस्तावना
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक और बीसवीं शताब्दी का पदार्पण आधुनिक भारत के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। इस दौरान, धार्मिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पश्चिम की प्रेरणा वाले उदारवाद और अंग्रेजी राज के विरोध में एक सशक्त शक्ति के रूप में भरकर आया। बंगाल में रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद और पंजाब में स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय परंपरा में रुचि के पुनर्जागरण का नेतृत्व किया। इस आंदोलन का परिणाम भारतीय युवाओं में गर्व की भावना भरने के उद्देश्य से भारतीय परंपरा की फिर से विवेचना करने के प्रयास के रूप में सामने आया। इस आंदोलन का एक और पहलू था, इसका क्रांतिकारी राजनीतिक दृष्टिकोण। इन दो पहलुओं ने एक दूसरे को मजबूत किया। श्री अरबिंदो भारतीय राष्ट्रवाद को एक आध्यात्मिक बुनियाद देने वाले, इस नेतृत्व परंपरा के सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। इस इकाई में श्री अरबिंदो के जीवन और उनके चिंतन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों की झांकी प्रस्तुत की गई है। इसके बाद, हमने राष्ट्रवाद पर उनके विचारों की दार्शनिक बुनियादों, उनके द्वारा निर्धारित राजनीति कार्यवाही की दिशा और स्वराज का विश्लेषण किया है। अंत में भारतीय राजनीतिक चिंतन में उनके योगदान का मूल्यांकन किया गया है।

श्री अरबिंदो: उनका जीवन और कृतित्व
श्री अरबिंदो का जन्म 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ता में हुआ था। उनका जीवन घटनाओं से पूर्ण रहा और उन्होंने दर्शन और राजनीति के क्षेत्र में भरपूर योगदान दिया। उनके जीवन काल को चार दौरों में बांटकर उसका अध्ययन किया जा सकता है:

प्रारंभिक जीवन-निर्माण का दौर
अरबिंदो का पालन-पोषण पूरी तौर पर पश्चिमी ढंग से हुआ। चैदह साल (1879 से 1873) तक उन्होंने इंग्लैंड में पढ़ाई-लिखाई की। इस दौरान, उन्होंने असाधारण बौद्धिक योग्यता दिखाई। उन्होंने कई प्राचीन और आधुनिक यूरोपीय भाषाएं सीखीं। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान वह भारतीय राजनीति में रुचि लेने लगे और भारत के कुछ युवा क्रांतिकारियों के संपर्क में आये। उन पर आयरिश राष्ट्रवादियों और आयरलैंड की आजादी के लिए उनके प्रयासों का भी गहरा असर पड़ा। वह 1893 में 21 वर्ष की उम्र में अपने सीने में राष्ट्रवाद की धधकती आग और इसके लिए काम करने की दृढ़ इच्छा किये भारत लौटे।

तैयारी का दौर
भारत आकर उन्होंने बड़ौदा रजवाड़े में सरकारी नौकरी कर ली। बड़ौदा में उन्होंने भारतीय इतिहास, दार्शनिक ग्रंथों और बंगाली साहित्य का गहन अध्ययन किया। वह भारतीय दर्शन और साहित्य में छिपे आध्यात्मवाद से प्रभावित हुए और उससे उनके राजनीतिक चिंतन में एक नया आयाम जुड़ा। इस दौरान, अरबिंदो ने देश की उस समय की हालत पर काफी कुछ लिखा और राष्ट्र, राष्ट्रवाद आदि पर अपने विचारों को विस्तार से सामने रखा। वह सामान्य तौर पर स्वतंत्रता आंदोलन और विशेष तौर पर बंगाल चल रही क्रांतिकारी गतिविधियों के संपर्क में भी रहे। फिर भी क्रांतिकारी राजनीति में अपनी रुचि के कारण वह अपनी आध्यात्मिक खोज से दूर नहीं रहे।

राजनीतिक सक्रियता का दौर
वर्ष 1905 में बंगाल का बंटवारा हो गया। इस घटना से देश भर में गहरा क्षोभ फैल गया। अरबिंदो ने बड़ौदा की अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया (1906) और वह सक्रिय राजनीति में कूद पड़े, जिसके साथ उनके जीवन के तीसरे दौर की शुरुआत हुई। राजनीतिक सक्रियता का यह दौर बहुत संक्षिप्त (1906-1910) रहा। इस दौर में, उन्होंने राजनीति में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और तिलक के नेतृत्व वाले क्रांतिकारी समूह को अपना समर्थन दिया। उन्होंने कांग्रेस के सरल अधिवेशन में हिस्सा लिया। उन्होंने इस दौर में राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न विषयों पर जम कर लिखा। 1908 में, उन्हें मानिकटोला बम कांड में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 1909 में, बाइज्जत बरी कर दिया गया। छूटने के बाद, वह कुछ समय राजनीति में बने रहे। 1910 में, वह सक्रिय राजनीति से हट गए, वह चंद्र नगर चले गये और वहां से पौंडिचेरी आ गये। सक्रिय राजनीति से उनका अचानक हट जाना आध्यात्मिक विकास के प्रति उनकी इच्छा का परिणाम था।

बाद का दौर-1910 के बाद के वर्ष
इस दौर में, अरबिंदो ने मुख्य तौर पर मानवता और उसके आध्यात्मिक विषय के व्यापक संदर्भो में लेखन किया। उन्होंने मानव विकास और इसके मानव एकता के अंतिम लक्ष्य के संदर्भ में अपने विचारों और विचारधाराओं को विस्तार से सामने रखा। ‘‘लाइफ डिवाइन, ‘‘एसेज ऑन गीता,‘‘ ‘‘द सिंथेसिस ऑफ योग‘‘ जैसे उनकी महत्वपूर्ण कृतियां इसी दौर में लिखी गयीं। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि उनकी राजनीतिक सक्रियता और आध्यात्मिक विकास अलग-अलग नहीं, एक दूसरे से जुड़े थे। उनका राजनीतिक चिंतन उनकी यौगिक और आध्यात्मिक दृष्टि का ही विस्तार था। इसलिए, राजनीति की प्रमुख अवधारणाओं पर उनके विचारों का अध्ययन करने से पहले, उन दार्शनिक बुनियादों को समझना आवश्यक है, जिनसे उनका राजनीतिक चिंतन उभरा।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: 1) अपने उत्तर नीचे दिए स्थान पर लिखें।
2) अपने उत्तरों का मिलान इकाई के अंत में दिये उत्तरों से कर लें।
1) अरबिंदो के राजनीतिक चिंतन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक कौन से हैं?
2) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये:
i) श्री अरबिंदो ने इंग्लैंड में…………………..का अध्ययन किया।
क) प्राचीन और आधुनिक यूरोपीय भाषाओं
ख) भारतीय साहित्य
ग) ईसाई धर्मशास्त्र
ii) भारत लौटकर उन्होंने………………………से संपर्क किया।
क) उदारवादी नेताओं
ख) बंगाल के क्रांतिकारियों
ग) भारतीय राजकुमारों
iii) श्री अरबिंदो ने…………………..में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।
क) 1893
ख) 1901
ग) 1906
iv) बाद के दौर में श्री अरबिंदो ने मुख्य तौर पर………………….के संदर्भ में लिखा।
क) मानव एकता
ख) स्वतंत्रता संग्राम
ग) विश्व युद्धों

बोध प्रश्न 1 के उत्तर 
1) 9.2.1, 9.2.2
2. i) क ii) ख iii) ग iv) क

 श्री अरबिंदो के राजनीतिक चिंतन की दार्शनिक बुनियाद
अरबिंदो के लेखन में विविध प्रभावों की झलक देखने को मिलती है। इनमें से दर्शन में आदर्शवाद की भारतीय परंपरा का उनपर सबसे अधिक प्रभाव दिखायी देता है। उनके निर्माण या तैयारी के दौर में उन पर होमर से लेकर गेटे तक के यूरोपीय दार्शनिकों का । सबसे अधिक प्रभाव पड़ा और उनके राजनीतिक चिंतन पर गीता, उपनिषदों और वेदांत के अध्ययन का गहरा असर पड़ा। जैसा कि रोम्यां रोला ने कहा, श्री अरबिंदो ‘‘एशिया की प्रतिभा’’ (जीनियस) और यूरोप की प्रतिभा का सबसे उत्कृष्ट जोड़ थे। उन्होंने पश्चिमी दर्शन को आदर्शवादी परंपरा से मिलाने का प्रयास किया। रामकृष्ण और विवेकानन्द ने जिस वेदांत दर्शन का प्रतिपादन किया था, उसका भी अरबिंदो के चिंतन पर प्रभाव पड़ा। उन्हें भारत की बौद्धिक परंपरा की असाधारण विविधता और तेजस्विता या स्थायी प्रकृति से भी प्रेरणा मिली। उनका विश्वास था कि वेदांत के साधुओं और बुद्ध के लेखों में भारतीय मन की प्रतिमा का प्रतिबिंब देखने को मिलता है। लेकिन, उनके अनुसार, बाद में जाकर भारत की दार्शनिक परंपरा अपने दृष्टिकोण में संकीर्ण हो गयी और अपनी गतिमयता और सक्रियता खो बैठी। जबकि, इसके विपरीत पश्चिमी दर्शन ने अपनी गतिमयता को बनाये रखा और उसका विकास होता रहा। अरबिंदो भारत और पश्चिम की दार्शनिक परंपरा के सर्वोत्तम तत्वों को मिलाना चाहते थे।

उन्होंने अपने उद्विकास के सिद्धांत में इस विश्व की उत्पत्ति, प्रकृति और नियति की व्याख्या की। उनके सृजन के सिद्धांत के अनुसार, पदार्थ विकास के कई चरणों से होकर निकलता है, वनस्पति और जंतु के चरणों से मन और महामन के चरणों तक। उनकी दृष्टि में पदार्थ आत्मा का छिपा रूप है, जो प्रगतिशील ढंग से आत्मा के उजागर होने की स्थिति की ओर विकास करती है, जो सर्वोत्तम, उन्मुक्त और परम यथार्थ है। उद्विकास की इस प्रक्रिया में, मन से महामन की ओर परिवर्तन में, योग की तकनीक इस प्रक्रिया को तीव्र करने में मानव की मदद करती है। श्री अरबिंदो ने ‘‘आंतरिक योग’’ या ‘‘पूर्ण योग’’ के नाम से अपनी तकनीक का विकास किया, जिसमें चार योगों-अर्थात् कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, और राज योग-की तकनीकों और तांत्रिक दर्शन का समावेश है। इस आंतरिक योग के माध्यम से कोई योगी महामानसिक स्तर तक उठ सकता है, जिससे आनंद की प्राप्ति होगी। आनंद की प्राप्ति से व्यक्ति को आत्मज्ञान और मानव सेवा में मदद मिलती है।

उनके अनुसार पदार्थ क्योंकि आत्मा से भिन्न नहीं होता, इसलिए पदार्थ का क्रमिक उद्विकास होने से वह शुद्ध आत्मा में बदल जाएगा। मार्ग में इस प्रक्रिया को धीमा करने वाली बाधाओं के बावजूद आत्मिक पूर्णता की दिशा में मानवता की प्रगति चलती रहेगी। इस प्रक्रिया में, कुछ विकसित आत्माएं मार्गदर्शक का काम करेंगी और दूसरों के लिए मार्ग ढूंढने को कड़ा संघर्ष करेंगी। अरबिंदो का विश्वास था कि भारत की आत्मिक चिंतन और व्यवहार की परंपरा बहुत उन्नत है और पूरी मानवता अपनी आध्यात्मिक यात्रा में इसका लाभ उठा सकती है। वह चाहते थे कि भारत इस क्षेत्र में नेतृत्व करे और इसीलिए उनका सोचना था कि भारत को स्वतंत्र होना चाहिए जिससे वह विश्व के आध्यात्मिक पुनरुद्धार में अपनी सही भूमिका निभा सके।

राजनीतिक चिंतन: प्रारंभिक दौर
अरबिंदो के लेखन की बारीकी से जांच करने से पता चलता है कि उन्होंने अपनी राजनीति गतिविधि के प्रारंभिक दौर में विद्यमान राजनीतिक महत्व के मसलों पर व्यापक रूप से लिखा। उस समय उनके राजनीतिक चिंतन में निम्न बातें शामिल थींः
ऽ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारत में अंग्रेजी राज के बारे में उनके विचार
ऽ राष्ट्र की अवधारणा और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धांत
ऽ उनका कार्यवाही कार्यक्रम-निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत आदि।
इस दौर के उनके लेखों को हमारे देश की उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम पच्चीस वर्षों की राजनीतिक पृष्ठभूमि में रख कर देखा जाना चाहिए। उनका उद्देश्य जनसाधारण को विदेशी शासकों के खिलाफ संघर्ष के लिए जागृत करना और उनका अंतिम लक्ष्य देश के लिए पूर्व स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

बाद के दौर में, अर्थात् 1910 से बाद के वर्षों में, अरबिंदो के विचारों में मानवता के लिए जीवन के आध्यात्मिक प्रयोजनों की आवश्यकता की स्पष्ट छवि दिखायी देती है। इस अनुच्छेद में, हम उनके चिंतन पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिनकी अभिव्यक्ति उनके जीवन के प्रारंभिक दौर (1883-1905) में और उनकी राजनीतिक गतिविधि के पहले दौर (1905-1910) में हुई। बाद में हम मानव एकता पर उनके विचारों का अध्ययन करेंगे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर श्री अरबिंदो के विचार
इंग्लैंड से लौटने पर श्री अरबिंदो ने भारत की राजनीतिक स्थिति को देखा और ‘‘बंदे मातरम्’’ जैसी पत्रिकाओं में लेख लिखकर अपने विचार व्यक्त किये। उस समय वह कांग्रेस संगठन और उसके नेताओं के आलोचक थे। उन्होंने चार बातों के लिए कांग्रेस की आलोचना की-अर्थात् प) इसके लक्ष्य और उद्देश्य, पप) इसका संगठन, पपप) नेताओं के उद्देश्य और पअ) उनके लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन द्वारा अपनाये गये तरीके। इसका यह मतलब नहीं है कि वह बुनियादी तौर पर कांग्रेस के विरोधी थे। इसके विपरीत उन्होंने तो यह ऐलान किया कि ’’कांग्रेस हमारे लिये वही थी जो मनुष्य के लिए सबसे प्रिय, सबसे ऊंची और सबसे पवित्र वस्तु होती है।’’ लेकिन इसी के साथ-साथ, उन्होंने इसके कामों को लेकर अपने मोहभंग और असंतोष को व्यक्त करने में भी कोई हिचक नहीं दिखायी।

कांग्रेस संगठन के ध्येयों और उद्देश्यों को लेकर उनका सोचना यह था कि कांग्रेस के पास ‘‘राष्ट्रीय स्वतंत्रता’’ का कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं था। कांग्रेस के नेता कुछ प्रशासनिक सुधार जैसी छोटी-मोटी बातों पर अपना समय नष्ट कर रहे थे, जोकि समय की मांग को पूरा करने में बिल्कुल अपर्याप्त थे। अरबिंदो के अनुसार कांग्रेसी नेताओं की मांगें, ‘शर्मनाक ढंग से संकोची‘ थीं।

कांग्रेस के संगठन के बारे में, उनका सोचना था कि कांग्रेस एक मध्यम वर्गीय संगठन है। नये पढ़े-लिखे मध्यम वर्गीय नेता केवल सत्ता और भारतीय राजतंत्र में स्थान पाने में दिलचस्पी रखते थे। अरबिंदो ने राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी संख्या में सर्वहारा वर्ग के लोगों को शामिल कर उसे एक जन आंदोलन का रूप् देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका विश्वास था कि राष्ट्रीय आंदोलन के क्षितिज पर भारतीय सर्वहारा का उदय कांग्रेस को एक सचमुच राष्ट्रीय और जनप्रिय संगठन का रूप देने की समस्या को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कारक होगा।

तीसरे, कांग्रेसी नेताओं के उद्देश्यों के बारे में उनका सोचना यह था कि वे निष्ठावान नेता नहीं थे। वे दब्बू थे और अपने शासकों को नाराज करने से डरते थे। उनका विश्वास था कि संगठन के इन दोषों ने देश के राष्ट्रीय आंदोलन पर उल्टा असर डाला था।

वह सोचते थे कि कांग्रेसी नेताओं ने अंग्रेजी राज को सही ढंग से नहीं देखा या समझा और इसलिए अपने लक्ष्य को हिम्मत के साथ सामने रखने के बजाय, ये नेता, अंग्रेजी शासकों की उदारता और न्याय-भावना पर भरोसा करते रहे। वे कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों या सभाओं में व्यर्थ के आवेदनों, निवेदनों आदि का सहारा लेते रहे।

इसलिए अरबिंदो ने एक व्यापक आधार वाले संगठन की आवश्यकता पर बल दिया, जो देश की समूची ताकत को इसे विदेशी शासन से मुक्त कराने में लगा सके। इस तरह। जनसाधारण में स्वाधीनता की भावना भरने पर उनका बल देना, स्वतंत्रता आंदोलन को एक जनआंदोलन का रूप देने की दिशा में पहले प्रयासों में से एक था।
अंग्रेजी राज की प्रकृति
आंग्ल-मराठी अखबार ‘‘इंदु प्रकाश‘‘ में लिखे अरबिंदो के पहले राजनीतिक लेख अंग्रेजी राज पर सीधा प्रहार थे। बेशक, राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लेने वाले कुछ नेता भी उस समय अंग्रेजी राज की आलोचना कर रहे थे, लेकिन उनकी अलोचना अप्रत्यक्ष थी। अरबिंदो के लेख इस तरह की आलोचना से हटकर थे। उन्होंने देश में ऐसी सनसनी फैला दी कि न्यायमूर्ति एम.जी. रानाडे को इंदु प्रकाश के संपादक को अरबिंदो से यह अनुरोध करना पड़ा कि वह अपने तेवर में नरमी लायें, जिस पर अरबिंदो ने अनिच्छा से अमल किया।

अरविंदो दो उद्देश्यों से अंग्रेजी राज की आलोचना करते थे। पहले, वह देश में अंग्रेज विरोधी भावनाओं को मजबूत करना चाहता थे, और दूसरे, वह अंग्रेजों की श्रेष्ठता की भ्रांति को तोड़ना चाहते थे।

उन्होंने यह विचार व्यक्त किया कि जैसा भारतीय बुद्धिजीवी समझते थे, अंग्रेजी राजनीतिक व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ नहीं थी। वह सामाजिक स्वतंत्रता और समानता के न होने की आलोचना करते थे। इसलिए, वह यह मानते थे कि अंग्रेजी व्यवस्था की नकल करना हमारे देश के हित में नहीं है। भारत में अंग्रेजी राज की प्रकृति के बारे में उनका विचार यह था कि ‘‘बुनियादी तौर पर यह व्यापारिक है और चरित्र से शोषक।’’ इसलिए इसकी बुनियाद को ही कमजोर किया जाना चाहिए, जिससे देश के लिए स्वतंत्रता और स्वाधीनता हासिल की जा सके।

अरबिंदो अंग्रेज अफसरों के व्यवहार को रूखा और अशिष्ट बताते थे। उनका मानना था कि अंग्रेजों ने भारत में जो प्रशासनिक व्यवस्था कायम की थी, वह भारतीय जनता, उनकी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था, उनके मन और प्रतिभा के बिल्कुल अनुपयुक्त थे। वह अंग्रेजियत में रंगे उन भारतीयों की भी आलोचना करते थे, जो अंग्रेजी जीवन शैली और संस्कृति को अपनाने के काबिल समझते थे।

लेकिन, उन्हें अंग्रेजों के अनुभव से सीखने पर कोई ऐतराज नहीं था। वैसे वह यूरोप के विचारों और विचारधाराओं की बिना सोचे समझे नकल करने के खिलाफ है। उन्हें भारतीयों में अपने अतीत को अनदेखा करने और भविष्य की कोई स्पष्ट ध्वनि न होने पर एतराज था।

राष्ट्र की अवधारणा और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धांत
अरबिंदो की राष्ट्र की अवधारणा पर महान बंगाली उपन्यासकार बंकिमचंद्र का गहरा प्रभाव था। उनका यह मानना था कि राष्ट्र केवल एक भूमि का टुकड़ा या मनुष्यों का समूह नहीं है। न तो यह कोई अलंकार है और न ही मन की उपज। यह एक भौगोलिक इकाई या लोगों की कल्पना से भी बढ़कर है। इस तरह, अरबिंदो की राष्ट्र की अवधारणा गहरी और राष्ट्र के बारे में आम राष्ट्रभक्त धारणाओं से बहुत भिन्न है।

उनके लिए भारत उनकी मां समान था और इसलिए वह पूरी तौर पर उसके प्रति समर्पित थे। वह भारत को मां देवी की तरह महिमामंडित करते थे और युवा राष्ट्रभक्तों को यह सलाह देते थे कि वे अपने राष्ट्र के लिए काम करें जो उनकी मां है। वह मानते थे कि मातृभूमि को मुक्त कराना उसके बच्चों का सबसे पहला कर्त्तव्य है, जिसके लिए उन्हें अपनी जान तक कुर्बान करने को तैयार रहना चाहिए। जैसे कि अरबिंदो ने समझा, राष्ट्र एक जबरदस्त शक्ति है जो राष्ट्र निर्माण करने वाली लाखों इकाइयों की शक्ति से बनी है। इस तरह यह एक जीती-जागती सत्ता है। उन्होंने अनेक लेखों और कविताओं में मातृभूमि के प्रति प्रेम और समर्पण की अपनी गहरी भावना को व्यक्त किया। उनका विश्वास था कि इस तरह की राष्ट्रभक्ति से चमत्कार हो सकते हैं। इस तरह अरबिंदो की राष्ट्रवाद की परिभाषा में एक आध्यात्मिक आयाम था, जो राष्ट्रवाद शब्द की आम राष्ट्रभक्त समझ से भिन्न था।

अरबिंदो के विचार में राष्ट्रवाद केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं है। न तो यह कोई राजनीतिक कार्यक्रम है और न ही बुद्धिजीवियों के समय काटने का कोई मनोरंजन। उनके विचार में, राष्ट्रवाद धर्म के बराबर है। यह एक धर्म और एक मत है जिसे व्यक्ति को जीना चाहिए। यह ईश्वर का दिया हुआ धर्म है। इसलिए इसे कुचला नहीं जा सकता। अगर बाहरी ताकतें लगाकर इसे दबाने की कोशिश भी की जाती है तो, अपने अंदर ईश्वर की शक्ति होने के कारण यह फिर उभर आता है और जीवित रहता है। राष्ट्रवाद अमर है। यह मर नहीं सकता क्योंकि इसे मनुष्य ने नहीं, ईश्वर ने बनाया है। अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रवादी होना चाहता है, तो उसे अपने राष्ट्र के लिए काम करना चाहिए। उनकी राय में राष्ट्रवाद एक गहरी और भक्तिपूर्ण धार्मिक साधना है। यही अरबिंदो की राष्ट्रवाद की अवधारणा और उनके समय के दूसरे चिंतकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की राष्ट्रवाद की अवधारणा का अंतर है। बंगाल के बंटवारे ने जिस राष्ट्रवादी आंदोलन की चिंगारी भड़कायी, वह अरबिंदो की राय में ईश्वर की प्रेरणा और मार्गदर्शन वाला आंदोलन था। उनकी राय में इस आंदोलन का मार्गदर्शन किसी राजनीतिक आत्म हित के हाथ में नहीं था, बल्कि यह एक धार्मिक उद्देश्य था जिसे पूरा करने की कोशिश लोग कर रहे थे। इस तरह उनके लिए राष्ट्रवाद एक धर्म है जिसके जरिये लोग ईश्वर को अपने राष्ट्र में अपने देशवासियों में मूर्त करने की कोशिश करते हैं।

अंतिम लक्ष्य-स्वराज
विदेशी प्रभुत्व से भारत की मुक्ति अरबिंदो का अंतिम लक्ष्य था। स्वराज, अर्थात् भारतीयों द्वारा स्वशासन प्रकृति से केवल आर्थिक और राजनीतिक ही नहीं था। मानवता के उत्थान को समर्पित भारत के आध्यात्मिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह आवश्यक था। अरबिंदो ने निम्न कारणों से भारत की स्वाधीनता की वकालत कीः
ऽ स्वतंत्रता बौद्धिक, नैतिक, वैयक्तिक और राजनीतिक हर प्रकार के तर्कसंगत विकास के लिए अनिवार्य है, इसलिए यह अपने आप में राष्ट्रीय जीवन की एक आवश्यकता है। इसलिए केवल स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता हासिल करने का प्रयास भी निरर्थक नहीं था।
ऽ दूसरे मनुष्यों के विकास की प्रक्रिया में आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति भौतिक उन्नति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अरबिंदो की राय में, आध्यात्मिक प्रगति वाले भारत की यह नियति है कि वह दुनिया की प्रगति का नेतृत्व करे और इसलिए भी भारत को स्वतंत्र होना चाहिए।
ऽ भारत अच्छे ढंग से और खुशहाल रहे, इसके लिए भी आवश्यक था कि भारत में स्वराज हो। इसके लिए यह आवश्यक था कि भारतवासी गुलामों की तरह नहीं, बल्कि आजाद लोगों की तरह रहकर मनुष्य जाति के आध्यात्मिक और बौद्धिक लाभ के लिए काम करें।

अरबिंदो के जीवन के प्रारंभिक चरण में उनके चिंतन और गतिविधियों पर राष्ट्रवाद की जो अवधारणा प्रमुख रूप से विद्यमान थी, वह मनुष्य जाति की एकता की दिशा में ले जाने वाली एक सीढ़ी मात्र थी। मनुष्य जाति की इस एकता को वह प्रकृति की अंतिम योजना और मानव विकास का अनिवार्य लक्ष्य मानते थे। (इस बिंदु पर अनुच्छेद 10.5 में विस्तार से चर्चा की गयी है।) राष्ट्रीय स्वाधीनता के इस लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने कुछ तरीके समझाये। राजनीतिक गतिविधियों से उनका जो थोड़े समय का जड़ाव रहा उसमें उन्होंने राजनीतिक कार्यवाही की जो योजना रखी उस पर हम विस्तार से बात करेंगे।

राजनीतिक कार्यवाही का सकारात्मक कार्यक्रम
वर्ष 1906 में अरबिंदो ने अपनी बड़ौदा की नौकरी छोड़ दी और सक्रिय राजनीति में कूद पड़े। इसी दौर में उन्होंने उन राजनीतिक तरीकों के बारे में सोचा और लिखा जिन्हें अंग्रेजों के खिलाफ अपनाया जाना था। उन्होंने राजनीतिक कार्यवाही का जो मार्ग सुझाया, उसके दो सैद्धांतिक आधार थे। अंग्रेजी प्रभुत्व से पूरी स्वतंत्रता उनका अंतिम लक्ष्य था और उनका मानना था कि इसे विदेशी मालिकों की दया की दुहाई देकर हासिल नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए लाखों भारतवासियों की असीम शक्ति को सही दिशा में इस्तेमाल करना आवश्यक था।

अरबिंदो के अनुसार, जनता की आंतरिक शक्ति और बल के इस अपार भंडार को सही दिशा देने के लिए विभिन्न किस्म की राजनीतिक कार्यवाहियों का सहारा लिया जा सकता था, अर्थात् 1) क्रांतिकारी संगठन बनाकर उनके जरिये गुप्त क्रांतिकारी प्रचार किया जाये। इस कार्यवाही का लक्ष्य एक हथियारबंद विद्रोह की तैयारी करना था। 2) दूसरे, लेखों, भाषणों, जनसंपर्क आदि के जरिये विदेशी शासन के खिलाफ लगातार प्रचार किया जाए। उस समय बहुत से लोग इसे एक असंभव योजना मानते थे क्योंकि उनकी राय में ब्रिटिश साम्राज्य इतना मजबूत था कि उसे ऐसी तरकीबों से हिलाना असंभव था। 3) तीसरे, विभिन्न संगठनों के जरिये जनसाधारण को जागृत करके असहयोग और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे तरीकों से विदेशी शासन का खुला और पूरा विरोध किया जाए। अरबिंदो ने इन तीनों ही तरीकों को आजमाया। जब वह बड़ौदा में थे, उस समय भी उनके संपर्क बंगाल और महाराष्ट्र के क्रांतिकारी संगठनों से थे। उन्होंने बड़ौदा सेना में अपने बंगाली संपर्कों के जरिये गुप्त टोलियां बनाने की कोशिश की। उसी समय उन्होंने तिलक जैसे क्रांतिकारी कांग्रेस नेताओं से सम्पर्क बढ़ाया और कांग्रेस में नरमपंथियों के असर को कम करने में उनका साथ दिया। बंगाल के बंटवारे के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति में, उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध के तरीकों का आयोजन और प्रचार किया।

निष्क्रिय प्रतिरोध के तरीके की उनकी वकालत नरमपंथी नेताओं के संवैधानिक तरीकों से उनके मोह भंग का परिणाम था। वह प्रस्ताव पारित करने, आवेदन भेजने और अंग्रेजी शासकों के साथ बातचीत करने जैसे तरीकों के खिलाफ थे। इसकी जगह वह विदेशी सामान का बहिष्कार, शासकों के साथ असहयोग आदि जैसे तरीकों की वकालत करते थे। उनकी दृष्टि में उस समय ये ही तरीके सबसे उपयुक्त थे, क्योंकि भारतीयों पर शासन ऐसे शासकों का था जो अवाम की मांगों के प्रति संवेदनरहित और अत्याचारी थे।

इस तरह, उन्होंने जिन तरीकों की वकालत की, वे नैतिक या आध्यात्मिक न होकर अत्यंत व्यावहारिक राजनीतिक उपाय थे। इन तरीकों को अपनाते समय बल प्रयोग को वह अस्वीकार नहीं करते थे। हिंसा अरबिंदो के लिए निषेध नहीं थी। परिस्थितियों की मांग लेने पर बल और हिंसा का इस्तेमाल औचित्यपूर्ण था। गांधी जी के सविनय प्रतिरोध के तरीके और अरबिंदो के निष्क्रिय प्रतिरोध के बीच यही अंतर था। गांधी जी हिंसा को अनैतिक मानते थे और इसलिए उनकी दृष्टि में यह हानिकर और अवांछनीय थी। वह इसे नैतिक कायरता से दूषित मानते थे और यह भी मानते थे कि जिस लक्ष्य को पाने के लिए इसका इस्तेमाल होना था, उससे इसका मेल नहीं बैठता। लेकिन अरबिंदो के लिए निष्क्रिय प्रतिरोध राष्ट्रीय पुनरुद्धार का एक व्यापक कार्यक्रम था।

कार्यवाही का कार्यक्रम

अंग्रेज शासकों के निरंकुश और दमनकारी उपायों का प्रतिरोध करने के लिए कार्यवाही का जो कार्यक्रम प्रस्तावित था, बहिष्कार उसका प्रमुख महत्वपूर्ण अंग था। इस संदर्भ में ‘बहिष्कार‘ का अर्थ था ऐसा कोई भी काम करने से संगठित रूप से इंकार करना जिससे अंग्रेज अफसरों को प्रशासन चलाने में मदद मिले। यह असहयोग तब तक चलना था जब तक अवाम की आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होती। बहिष्कार के इस तरीके को कार्यक्रम के अग्रिम मोर्चे पर रखने का उद्देश्य विद्यमान स्थितियों में प्रशासन को असंभव बनाना था। बहिष्कार का मुख्य निशाना अंग्रेजी सामान था, क्योंकि अंग्रेजी शासकों के हाथों आर्थिक शोषण को तुरंत रोकना था। अरबिंदो का यह विश्वास था कि अगर यह हो गया तो, इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी साम्राज्य ध्वस्त हो जाएगा।

अंग्रेजी ढंग की शिक्षा का बहिष्कार इस कार्यक्रम का एक और अंग था। इस शिक्षा पद्धति की बुनियादें राष्ट्र विरोधी और दोषपूर्ण थीं, इस पर पूरी तरह से सरकार का नियंत्रण था और इसका इस्तेमाल शासक अपने प्रति निष्ठा बनाने और राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना को हतोत्साहित करने के लिए कर रहे थे। इस कार्यक्रम में सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार शामिल था और इसका उद्देश्य ऐसी राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थाओं और शिक्षा पद्धति की स्थापना करना था जिसका लक्ष्य देश के युवाओं में देश की समस्याओं के प्रति जागरुकता, राष्ट्र के प्रति प्रेम और मानसिक तैयारी का वातावरण बनाना था, जिससे वे विदेशी ताकत के प्रभत्व के खिलाफ लड़ सकें। इस कार्यक्रम में अंग्रेजी ढंग की न्यायिक व्यवस्था के बहिष्कार की भी वकालत थी। इस व्यवस्था को पक्षपातपूर्ण, महंगा, शासकों के राजनीतिक लक्ष्यों के अधीन और इस देश की जनता के लिए विनाशकारी माना गया। न्याय करने का ढंग अफसरशाही होने के लिए इसकी आलोचना की गयी।

अंतिम, इस कार्यक्रम में प्रशासन का बहिष्कार भी शामिल था। अधिशासी (या कार्यकारी) और प्रशासनिक तंत्र के बारे में यह माना गया कि वह निर्मम, दमनकारी, मनमाना, हस्तक्षेप करने वाला और अनावश्यक रूप से कतहल रखने वाला था। बहिष्कार का उद्देश्य इस प्रशासनिक तंत्र का ढांचा भर रहने देने का था, जिससे शासक इस देश के असहाय जनसाधारण को शोषित और तंग करने के अपने प्रयासों में इसका इस्तेमाल न कर पाये।

अरबिंदों इस बात को पूरी तरह से जानते थे कि देश के लिए व्यवस्था और अनुशासन महत्वपूर्ण थे। बहिष्कार की वकालत करते समय, उन्होंने इस बात की वकालत भी की थी कि विद्यमान व्यवस्था का स्थान लेने के लिए वैकल्पिक प्रबंध भी किये जायें। इस कार्यक्रम को वह आत्म-विकास की योजना मानते थे और उनका विश्वास था कि अगर लोगों ने दृढ़ता से इन तरीकों को लागू कर लिया, तो अंग्रेजी राज को चुटकियों में खत्म किया जा सकता था।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: 1) अपने उत्तर नीचे दिये स्थान पर लिखें।
2) अपने उत्तगं का मिलान इकाई के अंत में दिये उत्तरों से करें।
1) उन चार बिंदुओं को संक्षेप में लिखें जिनके आधार पर अरबिंदो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलोचना करते थे।
2) अरबिंदो की राष्ट्र की अवधारणा को संक्षेप में समझायें।
3) निम्न वक्तव्य सही हैं या गलत बताएंः
i) अरबिंदो अंग्रेजी राज की इसलिए आलोचना करते थे, क्योंकि वह अंग्रेज विरोधी भावनाओं को मजबूत करना चाहते थे। (सही/गलत)
ii) राष्ट्रवाद अनैतिक है, इसलिए इसे कुचला नहीं जा सकता। (सही/गलत)
iii) निष्क्रिय प्रतिरोध का अर्थ है शासकों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करके उनका विरोध करना। (सही/गलत)
iv) अरबिंदो हिंसा को निषेध मानते थे और अहिंसक तरीकों की वकालत करते थे।
(सही/गलत)
v) बहिष्कार का उद्देश्य प्रशासन के क्रियाकलाप को असंभव करना था। (सही/गलत)

बोध प्रश्न 2 के उत्तर 
1) 9.4.1
2) 9.4.3
3) i) सही ii) सही iii) गलत iv) गलत v) सही

दूसरा दौर-1910 से बाद के वर्ष
हम पहले ही बता चुके हैं कि अरबिंदो ने 1910 में नाटकीय ढंग से राजनीति छोड़ दी और पौंडिचेरी चले गये। ऐसा उन्होंने रहस्यात्मक अनुभवों के जरिये अपनी अंतरात्मा की लगातार पुकार के बाद किया। इस दौर के उनके लेख मुख्य रूप से दार्शनिक प्रकृति के हैं, जिनमें हमें उनके पहले के राजनीतिक विचारों का विस्तार मिलता है, अब इनकी अभिव्यक्ति मानवता और उसके आध्यात्मिक भविष्य के व्यापकतर संदर्भ में हुई।

मानव समाज का उद्विकास
अरबिंदो का तर्क है कि मानव समाज को अपने विकास की प्रक्रिया में तीन चरणों से होकर निकलना होता है। पहला चरण सहजता का चरण होता है। इस चरण में, समुदाय के निर्माण के स्वरूप और कार्यकलाप, इसकी परंपराएं और प्रथाएं और संस्थात्मक संगठन स्वाभाविक संगठित विकास के परिणाम होते हैं। प्राकृतिक मूल प्रवृत्तियां और परिवेश संबंधी आवश्यकताएं इसके निर्माण में एक अहम भूमिका अदा करते हैं। लोग कुछ चिन्हों में विश्वास करते हैं, जिनकी प्रकृति कल्पना और मूल प्रवृत्ति के गुणों वाली होती है। एक ही नस्ल या नातेदारी वाले लोग समान चिन्हों का इस्तेमाल करते हैं जो उनके लिए धर्म बन जाते हैं। इस तरह, विकास के इस चरण में, प्राकृतिक मूल-प्रवृत्तियां और धार्मिक चिन्ह साथ-साथ चलते हैं।

दूसरा चरण चेतना का चरण है, जिसमें लोग आध्यात्मिक स्तर पर स्वयं के प्रति सचेत हो जाते हैं और बुद्धि और सृजनात्मक शक्ति की मदद से जीवन और इसकी समस्या के बारे में सोचने लग जाते हैं। इस चरण की प्रकृति मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक और नैतिक होती है। इस चरण में बुद्धिजीवी महत्वपूर्ण हो जाते हैं और तर्क या विद्रोह या प्रगति या स्वतंत्रता के युग के पहलकर्ताओं के रूप में आगे आते हैं।

तीसरा चरण तर्क की जीत और हार दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। इस चरण में मनुष्य सामूहिकता में और भी गहनता से और उद्देश्य के साथ जीने लगते हैं। इस चरण में मनुष्य का जीवन सहज स्वतंत्रता, सहानुभूति और एकता के रोध से और व्यक्तिगत और सामुदायिक अस्तित्व की भावना से निर्देशित होता है। यहां से, मानवजाति को इस आध्यात्मिक समाज के विचार को मूर्त रूप देने की ओर बढ़ना होता है। यह वह आदर्श है जिसकी ओर समाज के उद्विकास की यह प्रक्रिया इशारा करती है।

इस आध्यात्मिक समाज में एक नियंत्रण करने वाले तंत्र के रूप में राष्ट्र के लिए कोई जगह नहीं होगी। लोग ईश्वर या अपने ही बृहत्तर रूप की तरह इसकी पूजा नहीं करेंगे। राष्ट्र के रूप में विभिन्न अस्मिताओं के आधार पर कोई टकराव या संघर्ष नहीं होगा। समूह के रूप में राष्ट्रों के भीतर एकता तो होगी ही, बल्कि, मानवजाति की अंतिम एकता भी होगी। अरबिंदो ने इस एकता को हासिल करने की प्राथमिक जिम्मेदारी भारत को सौंपी थी।

मानव एकता की प्रकृति
यह राज्य या किसी और संगठन के कड़े कानून के अधीन स्थापित कोई यांत्रिक एकता नहीं होगी, क्योंकि इस तरह की संभवतः एकता विभिन्न समूहों, व्यक्तियों या नस्लों की विविधता या अनेकता को नकार देगी। सभी व्यक्तियों और समुदायों को अपनी संभावनाओं के पूर्ण विकास और अपनी बहुआयामी अनेकता की पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए पूरा अवसर मिलेगा।

भविष्य का समाज एक जटिल एकता का समाज होगा, एक ऐसा विश्व समाज जिसमें विद्यमान राष्ट्र एक समग्रता का अंतर्निहित अंग होंगे। राष्ट्रीय समाज सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में काम करते रहेंगे, लेकिन उनकी भौतिक सीमाओं की कोई प्रासंगिकता न होगी क्योंकि वे मानवजाति की एकता के सपने को साकार करने के लिए इन सीमाओं के पार देखेंगे।

अरबिंदो उस समय में इस तरह के आध्यात्मिक समाज के उदय के रास्ते में आने वाली समस्याओं और बाधाओं के बारे में जानते थे, लेकिन वह निकट भविष्य में ऐसे समाज के उदय के प्रति आशावादी थे। वह विश्व एकता और विश्वशांति को हासिल करने के बारे में आशावान ही नहीं, निश्चित भी थे। शांति और एकता की मनुष्य की आकांक्षा 1920 में राष्ट्र संघ और 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की शक्ल में कुछ हद तक यथार्थ हो गयी थी। वह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सामने इस तरह के संगठनों की व्यावहारिक सीमाओं को भी जानते थे, लेकिन एक एकताबद्ध या संयुक्त विश्व के उदय में उनका दृढ़ विश्वास था। उनका यह विश्वास था कि यह निश्चित है क्योंकि इसका होना मानवता मात्र के बने रहने के लिए आवश्यक है और इस मामले में असफलता का मतलब होता है, खद मानव जाति की असफलता। ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि मानवता ने जब-तब भले ही भलें की हों, वह अपने ही खात्मे के लिए काम नहीं करने वाली।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: 1) अपने उत्तर नीचे दिये स्थान पर लिखें।
2) अपने उत्तरों का मिलान इकाई के अंत में दिये उत्तरों से कर लें।
1) अरबिंदो के अनुसार, मानव समाज किन चरणों से होकर अपना विकास करता है।
2) अरबिंदो की भविष्य के समाज की कल्पना को संक्षेप में समझाएं।

आलोचनात्मक मूल्यांकन
अरबिंदो के राजनीतिक चिंतन के अध्ययन से आलोचना के कुछ बिंदु उठ खड़े होते हैं, जिनकी चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। उसके बाद ही हम भारतीय राजनीतिक चिंतन और राष्ट्रीय आंदोलन में उनके योगदान पर विचार करेंगे।

राष्ट्रवाद का सिद्धांत-आध्यात्मिक या धार्मिक?
अरबिंदो के आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत के संदर्भ में यह तर्क किया जाता है कि इसे कहा तो आध्यात्मिक राष्ट्रवाद है, लेकिन वास्तव में यह हमारी जानकारी में धार्मिक था, और इसलिए इसका चरित्र प्रतिक्रियावादी था। यह जनसाधारण को भावनात्मक आधार पर जागृत करने का, और गरीबी, आर्थिक शोषण, समानता जैसे उन असली मुद्दों से । उनका ध्यान हटाने का प्रयास था, जो व्यक्ति और समुदाय दोनों की प्रगति के लिए हानिकर है। यह देश की सांस्कृतिक विरासत के शेष में हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की दुहाई थी। यही नहीं यह भी तर्क दिया जाता है कि राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक पूर्णता का साधन मानना आम आदमी के लिए आवश्यकता से अधिक आदर्शवादी और काल्पनिक है। धर्म को राजनीति से जोड़ना, वह भले ही आध्यात्मिकता के नाम पर हो, भारत जैसे बहुधर्मीय, बहुसांस्कृतिक, बहुसंख्यक समाज में एक खतरनाक बात है। यह तर्क किया जाता है कि अंतिम विश्लेषण से इस कोशिश का परिणाम भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदायों हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कलह बढ़ाने के रूप में सामने आया, जिसके अंतिम परिणामस्वरूप देश का बंटवारा हुआ।

बहरहाल, अरबिंदो के हिमायती यह दावा करेंगे कि उनकी मानव एकता और राष्ट्रवाद की अवधारणा का आधार हिंदू सनातन धर्म की उनकी समझ थी, जो उनके लिए जीवन का एक मुक्त और सार्वभौम दर्शन था। राष्ट्रवाद की उनकी अवधारणा स्पष्ट रूप से राजनीति के प्रति उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण का संकेत देती है। केवल उनके राष्ट्रवाद के सिद्धांत में ही नहीं, बल्कि उनके समग्र राजनीतिक दर्शन में ही आध्यात्मिकता का संकेत मिलता है। उनके लिए राजनीति व्यक्तिगत, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक विकास की बहत्तर प्रक्रिया का एक पहल है। वह भारत की स्वाधीनता को इस प्राचीन देश के जीवन में एक ऐसे मोड़ के रूप में देखते थे, जो मानव जाति के आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भमिका निभाने की दिशा में इसके लिए आवश्यक था। वह यह विश्वास करते थे कि भारत की यह भूमिका पूर्व निर्धारित थी और भारत केवल हिंदू धर्म की शिक्षा के जरिये ही उस स्तर तक उठ सकता था। राष्ट्रवाद किसी की अवहेलना करने का बीड़ा नहीं उठा सकता। इसलिए व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह समाज के सभी वर्गों को राजनीतिक जीवन की मुख्य धारा में ले आये। भारत के संदर्भ में, उनका मानना था कि हिंदू सभ्यता के बाहर के आदिवासियों सहित सभी वर्गों को राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्रक्रिया का अंग बनना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रवाद किसी को बाहर नहीं छोड़ता। अरबिंदो के अनुयायियों का कहना है कि इसी अर्थ में उनकी आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को समझा जाना चाहिए।

राजनीतिक मुद्दों पर जोर
आलोचक बताते हैं कि अरबिंदो ने सामाजिक सुधार के मुद्दों पर कम ध्यान दिया, जो शायद कहीं अधिक महत्वपूर्ण और अनावश्यक थे। इसी सिलसिले में क्रांतिकारियों का बचाव यह था कि यह उस समय की परिस्थितियों में प्राथमिकता देने का मामला था। उनके लिए राष्ट्रीय स्वाधीनता के मुद्दे की तुलना में सामाजिक सुधार का मसला किसी तरह भी गैर महत्वपूर्ण नहीं था, लेकिन राष्ट्रीय स्वाधीनता को प्राथमिक महत्व का समझा था। इस संदर्भ में अरबिंदो का बहुत स्पष्ट दृष्टिकोण था। उनका कहना था, ‘‘राजनीतिक स्वतंत्रता किसी भी देश का प्राण है, पहले राजनीतिक स्वतंत्रता का लक्ष्य साधे बिना सामाजिक सुधार, शैक्षिक सुधार, औद्योगिक प्रसार, नस्ल के नैतिक सुधार का प्रयास करना अज्ञान और निरर्थकता की पराकाष्ठा है।’’

श्री अरबिंदो: अराजकतावादी/आतंकवादी?
विदेशी शासन के खिलाफ बल या हिंसक साधनों के इस्तेमाल की अरबिंदो जो वकालत करते थे, उसके लिए उनकी आलोचना की जाती है कि वह अपने दृष्टिकोण और कर्म में अराजकतावादी भी थे और आतंकवादी भी। वह निश्चित रूप से अराजकतावादी नहीं थे और न ही वह कोई आतंकवादी थे, लेकिन नैतिक और आध्यात्मिक आधार पर उन्होंने हिंसा के इस्तेमाल से असहमति नहीं जतायी। लेकिन वह किसी हिंसक अराजकतावादी की तरह व्यक्तियों के खिलाफ अविवेकपूर्ण आतंकवाद से सहमत नहीं थे। भविष्य के समाज की अपनी कल्पना में उन्होंने आध्यात्मिक स्तर पर मानव एकता की बृहत्तर योजना में सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में राष्ट्रों के अस्तित्व को स्वीकार किया। इसलिए, अरबिंदो पर अराजकतावादी होने का आरोप निराधार है।

जहां तक अरबिंदो के हिंसक साधनों के इस्तेमाल की वकालत करने और क्रांतिकारी टोलियों के साथ उनके साथ का सवाल है, यह कहा जा सकता है कि यह अंग्रेज शासकों के और भी असहिष्णु और असभ्य होते तरीकों के खिलाफ उनकी प्रतिक्रिया थी। यह अंग्रेजी नीति और बंगालं के बंटवारे के खिलाफ प्रतिक्रिया थी। यह एक भावुक राष्ट्रभक्त की उसकी मातृभूमि के बर्बर शोषण और विदेशी शासकों के साथ अत्याचारी शासन के खिलाफ प्रतिक्रिया थी। उनके लिए, लक्ष्य महत्वपूर्ण थे, चाहे उन्हें किन्हीं भी साधनों से हासिल किया जाये। बहरहाल थोड़े समय में ही इस रणनीति की सीमाएं बहुत स्पष्ट हो गयीं। अरबिंदो ने खुद इनकी ओर संकेत किया है। अरबिंदो ने इस ओर भी संकेत किया कि नैतिक मापदंड केवल सापेक्ष होते हैं, और उन्हें सार्वभौम नहीं माना जा सकता। अरबिंदो के अनुसार, यह सबसे अच्छी नीति है कि हिंसा से बचा जाये, लेकिन इससे न तो पूरी तौर से बचा जा सकता है और न ही इस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

सारांश
हमने अरबिंदो के चितन की आलोचना के कछ बिंदुओं पर बात की। अब हम आधुनिक भारतीय राजनीतिक चितन और राष्ट्रीय आंदोलन में उनके योगदान का आंकलन करेंगे। उनका आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धांत आधुनिक चिंतन के क्षेत्र में एक अनूठा योगदान है। उनके लेखों ने उनके समय के पढ़े-लिखे युवाओं को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के उद्देश्य को अपनाने के लिए प्रेरित किया। राष्ट्रवाद की अवधारणा की आध्यात्मिक अर्थों में विवेचना करके उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया आयाम दिया और इसे आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ से ऊपर उठाया और देश में राष्ट्रवादियों के सामने एक नये किस्म का आध्यात्मिक आदर्शवाद स्थापित किया गया।

दूसरे, विदेशी प्रभुत्व या शासन से पूर्व स्वतंत्रता की स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम लक्ष्य के रूप में वकालत करके उन्होंने हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की बनावट को एक बदलाव दिया। उस समय जबकि नरमपंथी राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, उनका यह कदम बहुत साहसी था।

तीसरे, यह बताया जा सकता है कि अरबिंदो राष्ट्रीय आंदोलन को एक व्यापक आधार देने की आवश्यकता को पहचानने या मान्यता देने वाले पहले राजनीतिक चिंतक थे। उन्होंने 1893 में ही राष्ट्रीय आंदोलन में समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी और जनसाधारण को जागृत करने की आवश्यकता पर बल दिया था। इस अर्थ में वह एक सच्चे जनवादी थे, जो कुछ व्यक्तियों की बौद्धिक पहल की अपेक्षा अनेक व्यक्तियों की सम्मिलित कार्यवाही पर निर्भर करते थे। उनके निष्क्रिय प्रतिरोध की वकालत करने ने जनर में नये सिरे से विश्वास भर दिया और अंग्रेजी राज की वास्तविकता और भांति के अंतर्विरोध को उजागर कर दिया।

भारतीय राष्ट्र के लिए पूर्ण आजादी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्रांतिकारी तरीकों की वकालत करके उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच क्रांतिकारी भावना के लिए एक अनुकूल वातावरण बना दिया और उनके नेता के रूप में इसमें हिस्सा लेकर उन्होंने सिद्धांतवादी और व्यवहारवादी दोनों के रूप में एक मिसाल कायम कर दी, जो अपने आप में विषयवक्ता और नेता दोनों के गुणों का अनूठा संगम है।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणीः- 1) अपने उत्तर नीचे दिए स्थान पर लिखें।
2) अपने उत्तरों का मिलान इकाई के अंत में दिए उत्तरों से कर लें।
1) आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत की आलोचना के दो मुख्य बिंद् बताइए।
2) क्या अरबिंदो अराजकतावादी थे?
3) रिक्त स्थानों की पूर्ति करके वाक्यों को पूरा कीजिए।
i) केवल उनके राष्ट्रवाद के सिद्धांत में ही नहीं, बल्कि उनके सामग्री राजनीतिक दर्शन में भी…………………मिलता है।
ii) राजनीतिक स्वतंत्रता किसी देश का……………..है।
iii) अरबिंदो पर…………………….होने का आरोप निराधार है।
iv) उन्होंने………………..और……………….दोनों के रूप में एक मिसाल कायम कर दी जो अपने आप में विष्यवक्ता और नेता के गुणों का अनूठा संगम है।

बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 4
1) देखिये 9.6.1
2) देखिये 9.6.3
3) i) आध्यात्मिकता का संकेत, ii) प्राण, iii) अराजकतावादी, iv) सिद्धांतवादी-व्यवहारवादी

उपयोगी पुस्तकें
करुणाकरण के.पी. (1975) इंडियन पॉलिटिक्स फ्रॉम दादाभाई नौरोजी टू गांधी, गीतांजलि प्रकाशन, नई दिल्ली।
मेहता वी.आर. (1983): आइडियोलॉजी, माडर्नाइजेशन ऐंड पॉलिटिक्स इन इंडिया, मनोहर पब्लिकेशंस, नई दिल्ली।
सर्मा जी.एन. (.) (1973): द विजन ऑफ श्री अरविंदो, दीप्ति पब्लिकेशंस, श्री अरबिंदो आश्रम, पौडिचेरी। सर्मा जी.एन. और शाकिर मुईन (1976): पॉलिटिक्स ऐंड सोसायटी: राम मोहन राय टू नेहरू, परिमल प्रकाशन, औरंगाबाद (अध्याय 3)।
सिंह करन (1970): प्रॉफेट ऑफ इंडियन नेशनलिज्म, भारतीय विद्या भवन, मुम्बई।
पैंटन टॉमस (संपा.) (1988): पॉलिटिकल थॉट इन मॉडर्न इंडिया, सेज पब्लिकेशनस, नई दिल्ली (अध्याय 12)।
वर्मा पी.पी. (1971): मॉडर्न इंडियन पॉलिटिकल थॉट, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, आगरा।