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sonography in hindi या ultra sound Technique , रेडियो प्रतिरक्षी आमापन (radioimmunoassay in hindi)
sonography in hindi या ultra sound Technique : चिकित्सा के क्षेत्र में इस तकनीक को Eco-graphy के नाम से भी जाना जाता है।
चिकित्सा क्षेत्र की इस तकनीक में Transducer नामक एक उपकरण का उपयोग किया जाता है जिसमे Lead Zermonate नामक क्रिस्टलीय पदार्थ भरा जाता है।
भरे गए क्रिस्टलीय पदार्थ में विद्युत विभव को गुजारने से एक विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे Peizo electric effect (पीजो विद्युत प्रभाव) के नाम से जाना जाता है।
इस प्रभाव के कारण उच्च तरंग दैर्ध्य वाली ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है।
उत्पन्न होने वाले ध्वनी तरंगो की तरंग दैर्ध्य 20 किलोहर्ट्ज़ से भी ज्यादा होती है।
उत्पन्न होने वाली इस पराध्वनिक को जब शरीर के अंगो पर डाला जाता है तो यह तरंगे शरीर के अंगो से टकराकर पुन: लौटती है तथा पुनः लौटने की यह क्रिया Eco के नाम से जानी जाती है।
प्राप्त होने वाली eco की पूर्ण श्रृंखला को ट्रांस्ड्यूसर के द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है जो इन्हें विद्युत संकेतो में परिवर्तित कर देता है तथा परिवर्तित संकेत एक मोनिटर पर लगे पर्दे पर द्विविमीय चित्र में दिखाई देते है।
प्राप्त चित्रों के अध्ययन से किसी विशिष्ट अंग/उत्तक की स्थिति , आकृति , आकार तथा घटक का पता लगाया जा सकता है।
उपरोक्त तकनीक से प्राप्त चित्रों को सोनोग्राम के नाम से जाना जाता है।
सोनोग्राफी तकनीक रेडियो ग्राफी की तुलना में सस्ती तथा आरामदायक तकनीक है।
उपरोक्त चिकित्सकीय तकनीक के विभिन्न उपयोग है जो निम्न प्रकार से है –
(A) गर्भास्त शिशु की वृद्धि ज्ञात करने हेतु तथा उनकी असमानताओं का पता लगाने में सहायक।
(B) उपरोक्त तकनीक के द्वारा गुर्दे तथा पित्ताशय में निर्मित होने वाली पथरी का पता लगाया जा सकता है।
(C) आंतीय अवरोध , गर्भाशय तथा फेलोपियन नलिका आदि की असमानताओं का पता लगाने हेतु उपरोक्त तकनीक का उपयोग किया जाता है।
(D) इस तकनीक का मुख्यतः उपयोग प्रसव तथा प्रसूति सम्बन्धित कठिनाइयो को दूर करने हेतु किया जाता है।
(E) एक धडकते ह्रदय की सोनोग्राफी में डॉप्लर प्रभाव के उपयोग से प्रवाहित होने वाले रक्त का चित्र प्राप्त किया जा सकता है।
रेडियो प्रतिरक्षी आमापन (radioimmunoassay in hindi)
चिकित्सा के क्षेत्र में यह तकनीक एक विश्लेषणात्मक तकनीक है जिसका प्रयोग बहुत पहले से किया जा रहा है।
इस तकनीक के अंतर्गत शरीर में पाए जाने वाले ऐसे पदार्थ जो अत्यधिक सूक्ष्म मात्रा में पाये जाते है जैसे नेनोग्राम , माइक्रोग्राम , पिकोग्राम।
ऐसे पदार्थो का पारम्परिक भारतीय तथा आयतनिक प्रकार से इनकी मात्रा ज्ञात किया जाना असम्भव है। इसके कारण ऐसे पदार्थो को रेडियो सक्रीय बनाकर प्रतिरक्षियो के साथ क्रिया करवाई जाती है तथा इस क्रिया से साम्य अवस्था होने पर प्रतिजन प्रतिरक्षी सिमित प्राप्त किया जाता है। प्राप्त किये गए समिश्र को उपयुक्त अभिकर्मको के द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है तथा इसके फलस्वरूप प्राप्त अवक्षेपी तथा प्लाभी भागो को पृथक करके रेडियो सक्रीय मापक के द्वारा इन पदार्थो की सही मापन कर लिया जाता है।
इस प्रकार की चिकित्सा तकनीक से किसी प्रकार की कोई हानि शरीर पर उत्पन्न नहीं होती क्योंकि यह तकनीक शरीर के बाहर संपन्न की जाती है।
प्रश्न : RIA की सहायता से शरीर में उपस्थित किन पदार्थो की मात्रा का मापन किया जाता है ?
उत्तर : उपरोक्त तकनीक से निम्न पदार्थो की मात्रा का मापन किया जाता है –
1. विभिन्न जैविक घटक जैसे विटामिन B-12 आदि।
इसके अतिरिक्त कुछ हार्मोन जैसे – थायरोक्सीन , कार्टीसोल , टेस्टो स्टेरोन , एस्ट्रोजन , ट्रोपिक हार्मोन तथा ट्राई आइसो थाइरोनिन – [T3]
इसके अतिरिक्त कुछ प्रतिजन पदार्थ जैसे आस्ट्रेलियन प्रतिजन तथा कुछ औषधि जैसे Digitoxin , Digokein आदि।
नोट : शरीर में उत्पन्न होने वाले अन्त स्त्रावी तंत्र के किनारों को ज्ञात करने हेतु यह तकनीक अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुई है , इस तकनीक की सहायता से रक्त में किसी एक विशिष्ट हार्मोन की अधिकता या इस हार्मोन को स्त्रावित करने वाली अन्त: स्त्रावी ग्रंथि की अतिसक्रियता या किसी ट्रोपिक हार्मोन के विभिन्न प्रभावों का अध्ययन इस तकनीक से संभव हो सका है।
उपरोक्त विधि के द्वारा कुछ विशिष्ट विकार जैसे अर्बुद , लैंगिक Hormor शुक्राही तथा कुछ अन्य विकार जैसे इंसुलिलोमा आदि का निदान संभव तथा इस तकनीक से इन विकारों का पता लगाकर इनका इलाज उचित रूप से किया जा सकता है।
नोट : उपरोक्त सभी चिकित्सा तकनीको के अलावा सम्पूर्ण चिकित्सा क्षेत्र में अनेक चिकित्सकीय तकनीके है जिनका इस स्तर पर अध्ययन नहीं है परन्तु कुछ प्रमुख चिकित्सकीय तकनीके निम्न है –
(A) X-Ray रेडियो ग्राफी तकनीक
(B) एंजियोग्राफी
(C) PET (positron emission tomography तकनीक )
(D) पॉली ग्राफी
(E) अंतर दृशी प्रक्रिया या एन्डोस्कोपी
(F) लेजर तकनीक या लेजर माइक्रो सर्जरी या लेजर सूक्ष्म शल्य क्रिया
(G) अंग या उत्तक प्रत्यारोपण
(H) इमो डाइलोसीस (haemodialysis)
(I) Prosthesis
(J) प्रतिस्थापन शल्य क्रिया चिकित्सा
(K) क्रायो शल्य क्रिया चिकित्सा
(L) जीन उपचार
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