JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now

हिंदी माध्यम नोट्स

लघु उद्योग किसे कहते हैं | लघु उद्योग की परिभाषा क्या है , महत्व , प्रकार , नाम लिस्ट small scale industry in hindi meaning

small scale industry in hindi meaning definition business लघु उद्योग किसे कहते हैं | लघु उद्योग की परिभाषा क्या है , महत्व , प्रकार , नाम लिस्ट ?

उद्देश्य
यह इकाई आपको लघु उद्योग और ग्रामोद्योग विषय से परिचित कराएगी। भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में उनके आकार और महत्त्व पर उनके द्वारा उत्पादित निर्गत और रोजगार के सृजन के संदर्भ में चर्चा की जाएगी। लघु उद्योगों के संवर्धन में सरकार की नीति की भूमिका पर संक्षेप में चर्चा भी इस इकाई में की जाएगी। इसको पढ़ने के बाद आप:

लघु उद्योग का अभिप्राय समझ सकेंगे;
ऽ ग्रामोद्योग और आधुनिक लघु उद्योगों के बीच अंतर समझ सकेंगे;
ऽ उनके द्वारा नियोजित कर्मकारों की संख्या और उनके द्वारा उत्पादित निर्गत के बारे में समझ सकेंगे;
ऽ अपनाई गई सरकारी नीतियों का स्वरूप जान सकेंगे; तथा
ऽ लघु उद्योगों के संवर्धन के लिए अपनाई गई नीतियों की जाँच कर सकेंगे।

प्रस्तावना
लघु उद्योग और बृहत् उद्योग क्या है? आप लघु उद्योग और बृहत् उद्योग में कैसे अंतर करते हैं? भारत में ‘‘लघु उद्योग‘‘ से सिर्फ विनिर्माण कार्यकलाप का पता चलता है। बड़ी फैक्टरियों जैसे कपड़ा मिलों, जूट मिलों, कागज के कारखानों और चीनी मिलों तथा इस्पात संयंत्रों में बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं। हम टाटा स्टील, अम्बुजा सीमेन्ट और अरविन्द मिल्स, हिन्दुस्तान मशीन टूल्स (एच एम टी), टाटा इंजीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव (टेल्को) और मारुति-सुजुकी लिमिटेड के बारे में जानते हैं। इस प्रकार की कंपनियों/फैक्टरियों में एक उभयनिष्ठ बात क्या है? इन सभी में सैकड़ों या हजारों कर्मकार नियोजित हैं तथा इनमें विद्युत चालित भारी मशीनों और संयंत्रों का उपयोग किया जाता है। क्या हमें इस बात की भी जानकारी है कि छोटी स्थापनाओं, जैसे वर्कशॉप (कर्मशाला), बोल्ट-नट्स जैसे कल-पुर्जों का उत्पादन करने वाली फैक्टरियों, फुटविअर, गारमेन्ट फैक्टरियों जिसमें कुछ सिलाई और बुनाई मशीनें होती हैं, में इससे भी बड़ी संख्या में लोग नियोजित हैं। वे भारतीय औद्योगिक क्षेत्र के बृहत् और विकासमान भाग हैं। इसे लघु उद्योग क्षेत्र कहा जाता है। यह विजातीय क्षेत्र है। इस क्षेत्र की उत्पादन इकाइयाँ घरेलू/पारिवारिक परिसरों, किराए के भवनों, औद्योगिक सम्पदाओं और अपनी फैक्टरियों में कार्यरत हैं। इनमें से कुछ विद्युत/ऊर्जा का उपयोग करती हैं तो कुछ नहीं करती हैं। लघु संस्थापनाओं में अत्यधिक दक्ष कर्मकार (जैसे हीरा के आभूषण निर्माण में) और अकुशल कर्मकार (जैसे बीड़ी बनाने में) दोनों ही अपनी जीविका अर्जित कर रहे हैं।

इन फैक्टरियों की आम विशेषता क्या है? ये अपने उत्पादन के पैमाने के हिसाब से छोटी हैं अर्थात् प्रतिदिन अथवा प्रतिसप्ताह उनके उत्पादन का निर्गत कम होता है। लघु उद्योग के संदर्भ में ‘‘पैमाना‘‘ शब्द का अभिप्राय निर्गत का पैमाना है जो एक इकाई अथवा फैक्टरी में उत्पादन किया जा सकता है। कुछ लघु उद्योगों में साधारण मशीनों जैसे सिलाई मशीनों, मशीन टूल्स और माउल्डिंग/शेपिंग मशीनों का उपयोग किया जाता है। दूसरे शब्दों में, उनमें थोड़ी पूँजी लगती है अथवा निवेश होता है। वे सामान्यतया स्वामित्व अथवा साझीदारी प्रतिष्ठान होते हैं। कई मामलों में यह पारिवारिक व्यवसाय होता है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है। स्वामी और प्रबन्धक एक ही व्यक्ति होता है। कुछ मजदूरी देकर श्रमिक रखते हैं जबकि उनमें से कई ऐसा नहीं करते हैं तथा परिवार के सदस्य ही कर्मकार की भाँति काम करते हैं।

इन फैक्टरियों के उत्पादों को कौन खरीदता है? उनका बाजार कहाँ है? इनमें से अधिकांश स्थानीय बाजारों की आवश्यकता पूरी करते हैं। इनमें से कई बड़ी फैक्टरियों अथवा दूसरी छोटी फैक्टरियों से आदेश लेते हैं। तब उन्हें उप ठेकेदार कहा जाता है; वे उत्पाद की बताई गई निर्धारित विशेषताओं के अनुरूप उत्पादन करते हैं। हम उनका वर्गीकरण कैसे करते हैं? उनकी संबंधित विशेषताएँ क्या हैं ? यह जानना आवश्यक है कि क्या सरकार उन्हें सफल बनाने के लिए तथा लोगों को अधिक संख्या में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उन्हें चिन्हित करना और सहायता देना चाहती है।

बोध प्रश्न 1
1) आप लघु उद्योग से क्या समझते हैं? क्या आप लघु उद्योग और बृहत् उद्योग के बीच अंतर करने के लिए किसी अन्य मानदंड के बारे में सोच सकते हैं?

 लघु उद्योग की परिभाषा और प्रकार
लघु उद्योग दो प्रकार के होते हैं: परम्परागत अथवा ग्राम्य और आधुनिक। परम्परागत प्रकार के उद्योग अपनी उत्पादन प्रक्रिया में विद्युत का उपयोग नहीं करते हैं। ग्रामोद्योगों में अनेक प्रकार के उद्योग सम्मिलित हैं। इसमें शामिल हैं:
ऽ खादी: हाथ से कताई किए गए सूत से हाथ से ही बने वस्त्र को खादी कहा जाता है।
ऽ विशेष ग्रामोद्योग जैसे अनाजों और दालों का प्रसंस्करण, गन्ना से गुड़ और खाण्डसारी का विनिर्माण, घानी तेल, हाथ से बने कागज, मधुमक्खी पालन, ग्रामीण बर्तन, बढ़ईगिरी, लोहारगिरी और फल प्रसंस्करण ।
ऽ हस्त चालित करघे: मिलों में बने सूत से हाथ द्वारा बुनाई
ऽ हस्तशिल्प: कलात्मक और सांस्कृतिक मूल्य की वस्तुओं के उत्पादन में शिल्पकारों के परम्परागत कौशल का समावेश
ऽ रेशम उत्पादन: मलबरी और दूसरे प्रकार के रेशम
ऽ नारियल जटा (कॉयर) की जाली, कताई और बुनाई

‘‘आधुनिक लघु उद्योग‘‘ वे हैं जिनमें विद्युत और मशीनों का उपयोग किया जाता है। कपड़ा बनाने के लिए विद्युतचालित करघा, प्लास्टिक की वस्तुएँ बनाने वाली इकाइयाँ, परिधान, चावल मिल और फुटवियर आदि इसके कुछ उदाहरण हैं।

निम्नलिखित सूची आधुनिक लघु उद्योगों को निरूपित करती हैं:
ऽ ओटोमोबाइल सहायक उपकरण और कलपुर्जे
ऽ धातु कास्टिंग्स
ऽ घरेलू विद्युत उपकरण जैसे आयरन, मिक्सर इत्यादि
ऽ होजियरी और निटवीयर
ऽ बाई साइकिल के पुर्जे
ऽ हैण्ड टूल्स
ऽ वैज्ञानिक उपकरण
ऽ स्टोरेज बैटरी
ऽ इस्पात के फर्नीचर और अलमारी
ऽ घरेलू बर्तन
ऽ कृषि उपकरण
ऽ सिले सिलाए परिधान
ऽ वायर और केबुल
ऽ प्लास्टिक माउल्डिंग और एक्स्टूजन
ऽ पेन्ट और वार्निश

उपरोक्त सूची से आप तुरन्त समझ सकते हैं कि उपरोक्त उत्पाद लघु उद्योग और बृहत् उद्योग दोनों क्षेत्रों में उत्पादित किए जा सकते हैं।

इकाई 11 में आपने फर्म के आकार के बारे में सीखा है विहंगावलोकन करते हुए, कार्यकलाप के पैमाना अथवा फर्म के आकार की माप के लिए आमतौर पर तीन मानदंडों का उपयोग किया जाता है। निर्गत माप, रोजगार माप और पूँजी माप। वास्तविक निर्गत, अर्थात् टन प्रति दिन, का उपयोग फर्म का आकार मापने के लिए किया जा सकता है। उत्पादित निर्गत के मूल्य का उपयोग निर्गत की प्रत्येक इकाई के मूल्य से वास्तविक माप को गुणा करके किया जा सकता है। उत्पाद की कीमत वर्ष-दर-वर्ष अलग-अलग हो सकती है। इसलिए निर्गत के मूल्य का अधिक उपयोग नहीं किया जाता है। रोजगार अथवा नियोजित कर्मकारों की संख्या का फर्म के आकार की माप के लिए अधिक उपयोग किया जाता है।

अन्तरराष्ट्रीय प्रचलन
सामान्यतया 50 कर्मकारों से कम नियोजित करने वाले फर्मों की परिभाषा लघु उपक्रम के रूप में की जाती है। जिन फर्मों में 50 से 99 तक कर्मकार नियोजित होते हैं उन्हें मध्यम उपक्रम कहा जाता है। और 100 कर्मकारों से अधिक कर्मकारों वाले उपक्रमों को बृहत् उपक्रम कहा जाता है।

 भारत में परिभाषा
भारत में सरकारी एजेन्सियाँ फर्म के आकार की माप के लिए परिसम्पत्तियों के मूल्य का उपयोग करती हैं। यह पूँजी माप है और यह फर्म में नियोजित कर्मकारों की संख्या को हिसाब में नहीं लेता है। इसलिए एक लघु फर्म में 100 से अधिक कर्मकार हो सकते हैं। इस परिभाषा के अंतर्गत हम यह प्रश्न करते हैं, ‘‘संयंत्र और मशीनों में आपके निवेश का मूल्य क्या है ?‘‘ यह मूल्य भी समय के साथ बदलता है। इस समय प्रचलित परिभाषाओं का अगले भाग में वर्णन किया गया है।

सरकारी परिभाषाएँ
लघु उद्योग ः इकाइयाँ जिनके संयंत्र और मशीनों में निवेश 10 मिलियन रु. से अधिक नहीं है।
अनुषंगी इकाइयाँ ः इकाइयाँ जिनके संयंत्र और मशीनों में निवेश 10 मिलियन रु. से अधिक नहीं है तथा निम्नलिखित कार्यकलापों में संलग्न हैं:
– कलपुर्जी और सहायक उपकरणों का निर्माण।
– उत्पादन का आधा अन्य इकाइयों को आपूर्ति की जाती है।
अत्यन्त लघु इकाइयाँ ः इकाइयाँ जिनके संयंत्र और मशीनों में निवेश 2.5 मिलियन रु. से अधिक नहीं है।

लघु उद्योगों का महत्त्व
लघु उद्योग शब्द के प्रयोग का यह अभिप्राय नहीं है कि उद्योग का आकार लघु है। इसका सिर्फ यह अभिप्राय है कि औद्योगिक इकाई का आकार छोटा है। लघु औद्योगिक क्षेत्र संबंधी सांख्यिकी लघु उद्योग क्षेत्र की परिभाषा के आधार पर अलग-अलग हैं। यहाँ हम राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योग क्षेत्र का महत्त्व जानने के लिए नियोजन परिभाषा का उपयोग करेंगे। यहाँ आप खंड 1 में इकाई 3, जो औद्योगिक सांख्यिकी के संबंध में है, को पुनः देख सकते हैं। आपको स्मरण होगा कि कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत 10 से अधिक कर्मकारों और विद्युत उपयोग करने वाली इकाइयों तथा 20 से अधिक कर्मकारों किंतु विद्युत का उपयोग नहीं करने वाली इकाइयों का पंजीकरण किया जाता है। इसे ‘‘संगठित क्षेत्र‘‘ कहा जाता है। जो इकाइयाँ कारखाना अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत नहीं हैं वह ‘‘असंगठित क्षेत्र‘‘ का प्रतिनिधित्व करती हैं। हम असंगठित क्षेत्र को लघु उद्योग क्षेत्र मान सकते हैं क्योंकि अधिकांश लघु इकाइयों में यह देखा गया है कि 10 से कम कर्मकार हैं।

हम विनिर्माण शुद्ध घरेलू उत्पाद (एन डी पी) में लघु उद्योग क्षेत्र के योगदान के बारे में अनुमान लगाने के लिए राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी आँकड़ों का प्रयोग कर सकते हैं। तालिका 13.1 में इन क्षेत्रों में अपंजीकृत विनिर्माण, कुल विनिर्माण और सभी आर्थिक कार्यकलापों का योग, और एन डी पी (मिलियन रु. में) प्रस्तुत किया है।

तालिका 13.1: आर्थिक कार्यकलापों के अनुसार शुद्ध घरेलू उत्पाद (1980-81 मूल्य)
वर्ष अपंजीकृत विनिमय
बिलियन रुपये कुल विनिर्माण
बिलियन रुपये सभी आर्थिक कार्यकलापों का (एनडीपी)।
कुल विनिमय में
अपंजीकृत योग
बिनियम का
प्रतिशत हिस्सा
1980-81
1990-91
1991-92
1992-93
1993-94
1994-95
1995-96 93.6
172.1
161.7
171.3
177.0
196.3
223.2 216.4
448.6
432.0
450.0
487.7
545.7
622.0 1224.3
2122.5
2139.8
252.4
2391.0
25777.0
2761.3 43.3
38.3
37.4
38.1
36.3
35.9
35.8
1996-97 236.2 667.8 2968.4 35.4
स्रोत: राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी

तालिका 13.1 से स्पष्ट है कि 1980-81 से कुल विनिर्माण में अपंजीकृत क्षेत्र का हिस्सा घटते जा रहा है। लघु उद्योग क्षेत्र का अभी भी विनिर्माण क्षेत्र के शुद्ध घरेलू उत्पाद में 35 प्रतिशत के करीब हिस्सा है। लघु उद्योग क्षेत्र का एक अन्य महत्त्वपूर्ण योगदान रोजगार के सृजन के मामले में है। विनिर्माण नियोजन का लगभग 80 प्रतिशत लघु क्षेत्र में पाया जाता है। तथापि, नियोजन हिस्सा में भी गिरावट आ रही है जो तालिका 13.2 को देखने से पता चलता है।

तालिका 13.2: नियोजन हिस्सा
संस्थापनाओं के प्रकार 1984-85 1989-90 1994-95
फैक्टरी
गैर फैक्टरी 16.8
83.2 20.2
79.8 21.5
78.5
स्रोत: सिडबी 2000

बोध प्रश्न 2
1) कुल विनिर्माण शुद्ध घरेलू उत्पाद (एन डी पी) में बृहत उद्योग और लघु उद्योग के अंश की गणना कीजिए?
2) नवीनतम राष्ट्रीय लेख सांख्यिकीय के सहयोग से, कुल विनिर्माण में अपंजीकृत विनिर्माण के प्रतिशत हिस्से की गणना कीजिए।

 लघु उद्योग क्षेत्र में निर्गत की संरचना
मूल्य संवर्द्धन में अपने योगदान के हिसाब से सबसे महत्त्वपूर्ण लघु उद्योग कौन-कौन से हैं ? इस प्रश्न का सही-सही उत्तर देना कठिन है। हम लघु उद्योग संबंधी विशेषज्ञ समिति के प्रतिवेदन में दिए गए अनुमानों पर निर्भर कर सकते हैं। इसे नीचे दी गई तालिका 13.3 में दर्शाया गया हैै।

तालिका 13.3: लघु उद्योग क्षेत्र में मूल्य संवर्द्धन का वितरण, 1984-85
उद्योग मूल्य संवर्द्धन हिस्सा
खाद्य उत्पाद
बीवरेज और तम्बाकू
सूती वस्त्र
ऊन, रेशम इत्यादि
जूट वस्त्र
वस्त्र उत्पाद
काष्ठ और फर्नीचर
कागज और मुद्रण
चर्म उत्पाद
रबड़ और पेट्रोलियम
रसायन
गैर धात्विक खनिज उत्पाद जैसे सीमेन्ट इत्यादि
बुनियादी धातु उद्योग
धातु उत्पाद
गैर विद्युत मशीनें
विद्युत मशीनें
परिवहन जैसे मोटर वाहन और स्कूटर तथा उनके कलपुर्जे
अन्य विनिर्माण 29.9
24.7
9.3
27.8
2.2
62.8
79
27.8
47.9
19
10
20.3
9
56.5
23
12
14.2
46.9
स्रोत: लघु उपक्रमों संबंधी विशेषज्ञ समिति का प्रतिवेदन, 1997

तालिका 13.3 में प्रस्तुत आँकड़ों से लघु उद्योग क्षेत्र में निम्नलिखित उद्योगों को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। वे इस प्रकार हैं: काष्ठ उत्पाद, वस्त्र उत्पाद, धातु उत्पाद, चर्म उत्पाद और खाद्य तथा बीवरेज।

उपरोक्त उद्योग सुलभ अवस्थिति, प्रक्रिया और बाजार संबंधी कतिपय लाभों के बारे में जाने जाते हैं। उपरोक्त उद्योगों में छोटे फैक्टरियों की प्रमुखता का यही कारण है। निम्नलिखित कारकों का उल्लेख किया जा सकता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
ऽ मुख्य रूप से प्रकीर्ण (बिखरे हुए) कच्चे मालों का प्रसंस्करण (खाद्य फसल, फल, दुग्ध उत्पाद)
ऽ स्थानीय बाजार वाले उत्पाद (काष्ठ फर्नीचर, टिन और डब्बे, इस्पात के बक्से, प्लास्टिक उत्पाद)
ऽ भारी और स्थूल उत्पाद (कंक्रीट के सामान, ईंट और अन्य भवन-निर्माण सामग्री)
ऽ पारिवारिक उत्पादन प्रणाली वाले उत्पाद (होजिरी और परिधान)
ऽ जिनका सामान्यतया स्थानीय संयोजन किया जाता है (कृषि उपकरण)
ऽ सस्ते कच्चे मालों पर निर्भर करने वाले उत्पाद (चमड़ा)

 लघु उद्योगों का स्थानीयकरण
ये कुछ क्षेत्रीय केन्द्रों में केन्द्रित हैं। उन केन्द्रों में लघु इकाइयाँ समूह के रूप में है और उन्हें समुच्चयन की मितव्ययिता का लाभ मिलता है। समुच्चयन की मितव्ययिता ‘‘लागत लाभ‘‘ हैं जो एक इकाई को इसलिए प्राप्त होता है कि वह समान उत्पादों का उत्पादन करने वाली फैक्टरियों के समूह में अवस्थित है। उदाहरण के लिए, सस्ती मजदूरी पर कुशल मजदूरों और कच्चे मालों की उपलब्धता। वे इस प्रकार हैं:
कास्टिंग्स (हावड़ा, पश्चिम बंगाल)
ऽ हैण्ड टूल्स (जालन्धर, नागपुर)
ऽ ताले (अलीगढ़)
ऽ खेल-कूद के सामान (मेरठ, जालन्धर, दिल्ली)
ऽ टाइल्स (केरल)
ऽ दियासलाई (शिवकाशी, तमिलनाडु)
ऽ ओटोकम्पोनेन्ट्स (मोटर के कलपुर्जे) (गुड़गाँव, हरियाणा)
ऽ इलैक्ट्रॉनिक्स (नोएडा, यू.पी.)
ऽ हीरा (सूरत, गुजरात)
ऽ परिधान (तिरुपुर, तमिलनाडु)

इस पैटर्न के विकास में अनेक कारकों जैसे कच्चे मालों की उपलब्धता, कुशल मजदूर और इस बाबत सरकार की निश्चित नीति का योगदान है।

बोध प्रश्न 3
1) तालिका 13.3 का उपयोग कर, उन उद्योगों का उदाहरण दें जिसमें लघु उद्योगों का प्रमुख स्थान है तथा जिसमें बृहत् उद्योगों का योगदान महत्त्वपूर्ण है।

 लघु उद्योगों के संवर्धन की नीति

छोटे फर्मों के लिए मुख्य रूप से दो तरह की नीतिगत सहायता उपलब्ध है। पहला संवर्धनात्मक है। छोटे फर्मों को कम ब्याज दरों पर अधिमानी ऋण मिलता है। यह सरकार की प्राथमिकता क्षेत्र ऋण नीति का अंग है । दूसरा छोटे फर्म अपने उत्पाद पर कम उत्पाद शुल्क देते हैं। छोटे फर्मों द्वारा उत्पादित अनेक उत्पाद, उत्पाद कर से मुक्त हैं। कई राज्य सरकारें नए लघु उपक्रम शुरू करने के लिए पूँजी राजसहायता भी उपलब्ध कराती हैं। लघु उपक्रमों को बिक्री कर के भुगतान से भी छूट मिली हुई है। भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) भारत में लघु उद्योगों की सहायता करने तथा उसके संवर्धन के लिए कुछ प्रमुख संस्थाओं में से एक है।

संरक्षण नीति: इस नीति के अंतर्गत केन्द्र सरकार ने 800 से अधिक उत्पादों का चयन किया है तथा यह आदेश दिया है कि बड़े फर्मों को उन उत्पादों के उत्पादन से निषेध कर दिया जाए। सिर्फ छोटे फर्मों को ही उन उत्पादों का उत्पादन करने तथा बिक्री करने की अनुमति है। इन्हें आरक्षित उत्पाद कहा जाता है। इस नीति का उद्देश्य छोटे फर्मों को बड़े फर्मों की प्रतिस्पर्धा से बचाना है।

तथापि, उल्लेखनीय है कि लघु उद्योगों को विदेश से होने वाले सस्ते आयातों की प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्राप्त नहीं है। उदारीकरण की नीति के अंतर्गत भारत में आयात की अनुमति दी गई है। आयातित उत्पाद बहुधा लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से सीधी प्रतिस्पर्धा करते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी लघु उपक्रमों को वस्तुएँ तथा सेवाओं की खरीद के समय अधिमानता देते हैं।

 लघु उद्योगों से संबंधित मुद्दे
भारत में लघु उद्योग नीति के सामने एक मुख्य मुद्दा उत्पाद आरक्षण की नीति का प्रयोग करके

इस नीति का अनुसरण निम्नलिखित मान्यताओं के कारण किया जाता है। लघु उद्योगों में प्रति इकाई निर्गत अधिक श्रम तथा प्रति इकाई निर्गत कम पूँजी का उपयोग होता है। इसलिए बृहत् उपक्रमों की अपेक्षा उनमें अधिक रोजगार का सृजन होता है। लघु उद्योगों के अनेक आलोचकों ने यह दलील दी है कि छोटे फर्म अकुशल हैं। अर्थात् , वे बृहत् फर्मों की तुलना में प्रति इकाई निर्गत अधिक श्रम और अधिक पूँजी का भी उपयोग करते हैं। दूसरे शब्दों में वे दुर्लभ संसाधनों को बड़ी मात्रा में बर्बाद करते हैं। छोटे फर्म वास्तव में अकुशल ही हैं यह साफ नहीं है। इस बात की सत्यता जाँचने के लिए और अधिक अध्ययनों की आवश्यकता है।

लघु उद्योगों को आयातित मालों से बड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। यह एक विरोधाभास है। बड़े फर्मों को आरक्षित उत्पादों का उत्पादन करने से रोककर सरकार विदेशी उत्पादकों की सहायता कर रही है। इसका एक अच्छा विकल्प यह है कि बड़े फर्मों को सभी उत्पादों के उत्पादन की अनुमति दी जाए तथा छोटे उत्पादकों को अपनी उत्पादकता बढ़ाने में सहायता की जाए। इससे वे बड़ी भारतीय कंपनियों तथा सस्ते आयातों दोनों की चुनौती का सामना कर सकेंगे।

यहाँ यह स्मरण रखना महत्त्वपूर्ण है कि भारत जैसी अल्प पूँजी अर्थव्यवस्था में छोटे उपक्रमों की उत्पादकता में वृद्धि करना अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। इसलिए लघु उद्योगों की सहायता के लिए बेहतर सरकारी नीति बनाने हेतु चिन्तन तथा विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है।

सारांश
इस इकाई में भारतीय औद्योगिक अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों की भूमिका पर चर्चा की गई है। इस इकाई को पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि ग्रामोद्योग आधुनिक लघु उद्योगों से अलग हैं। लघु उद्योगों का विनिर्माण मूल्य संवर्धन में कम योगदान है। सरकार लघु उद्योगों का संवर्धन करने के लिए अनेक प्रोत्साहन देती है। सरकार आरक्षण नीति का उपयोग करके लघु उत्पादकों को बड़े उत्पादकों से संरक्षण प्रदान करती है। तथापि, छोटे उत्पादकों के सामने आयात से प्रतिस्पर्धा की बड़ी समस्या है। हमें भारत में लघु उद्योगों के संवर्धन के लिए और अच्छी औद्योगिक नीति तैयार करने पर विचार करने की आवश्यकता है।

शब्दावली
परम्परागत अथवा ग्रामोद्योग ः उद्योग जो विद्युत का उपयोग नहीं कर रहे हैं।
आधुनिक लघु उद्योग ः उद्योग जो विद्युत और मशीनों का उपयोग करते हैं।
समुच्चयन की मितव्ययिता ः एक स्थान पर फैक्टरियों के समूहीकरण के कारण लागत में आने वाली कमी।
संवर्धनात्मक नीति ः अधिमानी बैंक ऋण और कर नीति ।
संरक्षणात्मक नीति ः बृहत् उद्योगों की प्रतिस्पर्धा से संरक्षण।
आरक्षित उत्पाद ः सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन के लिए आरक्षित उत्पाद।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
सन्देसरा, जे.सी, (1992). इण्डस्ट्रियल पॉलिसी एण्ड प्लानिंग, सेज पब्लिकेशनस् नई दिल्ली
सिडबी, (1999 और 2000). लघु उद्योग क्षेत्र संबंधी सिडबी प्रतिवेदन
उद्योग मंत्रालय, (1997). लघु उपक्रमों संबंधी विशेषज्ञ समिति, आबिद हुसैन समिति का प्रतिवेदन।

 बोध प्रश्नों के उत्तर अथवा संकेत
बोध प्रश्न 1
1) भाग 13.1 और 13.2 देखिए।

बोध प्रश्न 2
1) अपंजीकृत क्षेत्र का हिस्सा 100 में से घटाइए।
2) नवीनतम राष्ट्रीय लेख सांख्यिकीय को लेकर, तालिका 13.1 में दिए गए प्रारूप में गणना कीजिए।

बोध प्रश्न 3
1) कॉलम 2 में दिए गए प्रतिशत हिस्सा को 100 में से घटाइए। इससे आपको बृहत् उद्योग का हिस्सा पता चलेगा।

Sbistudy

Recent Posts

Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic

Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…

2 weeks ago

Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)

Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…

2 weeks ago

Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise

Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…

2 weeks ago

Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th

Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…

2 weeks ago

विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features

continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…

2 weeks ago

भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC

भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…

2 weeks ago
All Rights ReservedView Non-AMP Version
X

Headline

You can control the ways in which we improve and personalize your experience. Please choose whether you wish to allow the following:

Privacy Settings
JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now