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शेखावाटी ब्रिगेड क्या थी | शेखावाटी ब्रिगेड का मुख्यालय कहाँ था , स्थापना किसने की कब कहाँ हुई Shekhawati Brigade

Shekhawati Brigade ki sthapna , ka mukhyalay headquarters located in hindi शेखावाटी ब्रिगेड क्या थी | शेखावाटी ब्रिगेड का मुख्यालय कहाँ था , स्थापना किसने की कब कहाँ हुई और किसके द्वारा क्यों की गयी ?
प्रश्न : शेखावाटी ब्रिगेड ?
उत्तर : शेखावटी में शांति और व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर 1835 में अंग्रेजों ने जयपुर के खर्चे पर ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में झुंझुनूं में शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना की। इस सेना की भर्ती , प्रशिक्षण और कमांड ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के हाथों में थी।

प्रश्न : ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भरतपुर राज्य के साथ संधि की विवेचना कीजिये। 

उत्तर : वैसे तो कम्पनी ने सबसे पहले 1803 में भरतपुर राज्य के साथ संधि की थी परन्तु आपसी अविश्वास के कारण यह संधि क्रियान्वित नहीं हो पायी। दौलतराव सिंधिया की आक्रामक और विध्वंसात्मक गतिविधियों से आतंकित होकर अंग्रेजों ने पुनः भरतपुर से संधि करनी चाही लेकिन भरतपुर ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। उल्टे होल्कर को अपने यहाँ शरण दी। इस पर अंग्रेजों ने भरतपुर पर आक्रमण किये। तीन आक्रमणों में भरतपुर विजयी रहा लेकिन चौथे आक्रमण में उसे घुटने टेकने पड़े। इस प्रकार नवम्बर 1805 ईस्वीं में भरतपुर ने अंग्रेजों से संधि कर ली। इससे पूर्व 1803 ईस्वीं में भरतपुर तथा अंग्रेजों के मध्य जो संधि हुई थी उसकी तुलना में यह संधि भरतपुर के लिए अपमानजनक थी लेकिन आगे चलकर भरतपुर को इससे काफी लाभ हुआ।
जयपुर राज्य ने 1803 में संधि पर हस्ताक्षर किये। 12 दिसम्बर 1803 को जयपुर महाराजा सवाई प्रतापसिंह तथा कम्पनी की तरफ से जनरल लेक के मध्य एक समझौता हुआ जिसे 15 जनवरी 1804 को भारत के तात्कालिक गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली ने अनुमोदित किया। इसी प्रकार 1803 में जोधपुर महाराजा भीमसिंह के साथ भी लार्ड लेक ने संधि की चर्चा की लेकिन भीमसिंह की असामयिक मृत्यु होने पर नए महाराजा मानसिंह ने 22 नवम्बर 1804 को कंपनी के साथ संधि पत्र पर हस्ताक्षर किये। इसी प्रकार अलवर महाराजा तथा भरतपुर महाराजा के साथ नवम्बर – दिसम्बर 1803 में कम्पनी के साथ संधि संपन्न हुई।
सन 1811 में चार्ल्स मेटकाफ ने यह सुझाव दिया कि राजस्थान के राजपूत शासकों का ‘एक परिसंघ’ बना दिया जाए जो ब्रिटिश संरक्षण में कार्य करे जिससे कि राजपूताना में पिण्डारी तथा मराठाओं की लूटमार को रोका जा सके और शांति तथा व्यवस्था स्थापित की जा सके। लार्ड हेस्टिंग्ज ने मेटकाफ की नीति का अनुमोदन किया। तदनुसार 1817-18 में राजपूताना के अधिकांश शासकों ने संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।
राजपूताना में सर्वप्रथम 14 नवम्बर 1803 को जनरल लेक ने अलवर राज्य के साथ रक्षात्मक और आक्रामक संधि की। तत्पश्चात सितम्बर 1803 में भरतपुर के साथ 12 सितम्बर 1803 में जयपुर के साथ 22 दिसंबर 1803 में जोधपुर 1804 में धौलपुर राज्य के साथ संधि की।
राजपूताना को व्यापक स्तर पर संधियों का दौर लार्ड हेस्टिंग्ज (1813-23) के काल में रहा। इस समय ब्रिटिश रेजिडेन्ट मेटकाफ ने राजपूत राज्यों के साथ सहायक संधि की।
इस दौर में सर्वप्रथम करौली महाराजा हरवक्षपाल सिंह ने 9 नवम्बर 1817 को चार्ल्स मेटकाफ के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर किये। 17 नवम्बर 1817 में अमीर खां पिंडारी ने अंग्रेजों के सामने समर्पण कर संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। अमीर खां ने लूटपाट और धन वसूली बंद कर दी। बदले में उसे टोंक-रामपुरा का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया गया। 26 दिसम्बर 1817 में काटा महाराव उम्मेदसिंह के प्रशासक झाला जालिमसिंह ने भी कोटा को सहायक संधि में बाँध दिया।
1818 के वर्ष में राजपूताना के लगभग सभी शासक सहायक संधि से बंध गए। उदयपुर पुनः जोधपुर , बीकानेर , पुनः जयपुर , बूंदी , किशनगढ़ , प्रतापगढ़ , बाँसवाड़ा , डूंगरपुर रियासतों ने 1818 में अंग्रेजों से संधि कर ली। 1819 में जैसलमेर और 11 सितम्बर 1823 में सिरोही के चौहान शासक शिवसिंह ने भी संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इस प्रकार 1823 तक राजपूताना के सभी शासक सहायक संधि में बंध गए।
प्रश्न : 1857 की क्रान्ति में राजधानी साहित्यकारों का योगदान का वर्णन कीजिये।
उत्तर : कवि शंकरदान दामौर ने अंग्रेजों को ‘मुलकरा रा मीठा ठग’ की संज्ञा देते हुए 1857 ईस्वीं की क्रांति को अपनी खोई हुई स्वतंत्रता को वापस प्राप्त करने का अनमोल अवसर बताते हुए लिखा –
फाल हरिण चुक्यां फटक , पाछो फाल न पावसी।
आजाद हिन्द करवा अवर , औसर इस्यो न आवसी।
हुलासी का नाम सर्वप्रथम आता है जिसने वीर रस के गीतों के माध्यम से अंग्रेजों के विरोध करने का आह्वान उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही कर दिया था। इस ब्राह्मण कवि ने अपनी वीरों द्वारा अंग्रेजों का अंतिम दम तक विरोध करने का बड़ा ही ओजस्वी वर्णन किया है।
दलजी कवि (डूंगरपुर) ने अपनी व्यंग्य कविताओं के माध्यम से शासकों , सामन्तों और जनता में ब्रिटिश विरोधी भावना का संचार किया। भरतपुर के शासक रणजीतसिंह , आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह , निंबाज ठाकुर सांवतसिंह , कोठारिया के रावत जोधसिंह , सलूम्बर के रावत केसरीसिंह आदि व्यक्तियों द्वारा अंग्रेजों से लौहा लेने पर चारण कवियों ने इनका यशोगान किया है। सभी जगहों के चारण , भाटों ने स्थानीय वीर नायकों जैसे कुशलसिंह चंपावत , डुंगजी जवारजी की प्रशंसा में वीर रस के गीतों की रचना कर और जगह जगह गाकर जनसामान्य को क्रांति के लिए प्रेरित किया।
इस प्रकार चारण कवियों ने अपनी काव्य रचना द्वारा नरेशों और सामन्तों को अपने कर्तव्य पालन के प्रति सजग किया है। इन्होने अपनी ओजस्वी और भावपूर्ण रचनाओं द्वारा देश की स्थिति का चरित्र – चित्रण किया और जनसामान्य और शासक वर्ग को अपने प्राचीन गौरव का भान कराकर देश हित के लिए कार्य करने को प्रेरित किया।
क्रांति के प्रमुख स्थल : नसीराबाद , नीमच , आउवा , कोटा , बिथौठा , चेलावास , धौलपुर आदि के अलावा सुगाली देवी और कामेश्वर महादेव मंदिर भी क्रांति के प्रमुख केंद्र थे।
सुगाली देवी : आउवा के ठाकुरों की कुलदेवी जिसका 9 वीं सदी का मंदिर आउवा में है , 1857 की क्रान्ति के विद्रोह , नियंत्रण और क्रियान्वयन का मुख्य केन्द्र रहा। कुशालसिंह चंपावत इसके परम भक्त थे। इसे अंग्रेजों ने बाद में तहस नहस किया।
कामेश्वर महादेव : आउवा में 9 वीं सदी का कामेश्वर महादेव मंदिर 1857 के विप्लव में क्रान्तिकारियों की योजना बनाने और क्रियान्वित करने का विशिष्ट केंद्र रहा। बाद में अंग्रेजों ने इसे तहस नहस किया।
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