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स्वप्रेरित धारा की परिभाषा क्या है | स्वप्रेरित धारा किसे कहते है स्वप्रेरित धारा के प्रभाव के उदाहरण (self induction current examples in hindi)
स्वप्रेरित धारा की परिभाषा क्या है | स्वप्रेरित धारा किसे कहते है (self induction current examples in hindi)
स्वप्रेरित धारा के प्रभाव के उदाहरण
- प्रतिरोध बॉक्स के अन्दर लगी तार की कुण्डलियाँ तार को दोहरा करके बनाई जाती है : स्वप्रेरण के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए प्रतिरोध बॉक्स के प्रतिरोध तार को दोहरा करके कुचालक पदार्थ के बेलन पर लपेट देते है। ऐसा करने से कुण्डली के प्रत्येक भाग में विद्युत धारा दो विपरीत दिशाओं में बहती है। ये दोनों भाग एक दूसरे के चुम्बकीय क्षेत्र को निरस्त कर देते है जिससे कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स का मान लगभग शून्य हो जाता है जिससे कुण्डली में स्वप्रेरण प्रभाव नगण्य हो जाता है।
- व्हीट स्टोन सेतु के प्रयोग में पहले बैटरी कुँजी को तथा फिर धारामापी की कुंजी को दबाया जाता है : यदि धारामापी की कुँजी पहले और बैट्री की कुंजी बाद में दबायी जाएगी तो सेतु की विभिन्न भुजाओं में लगी कुंडलियों में प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाएगी जिससे मुख्य धारा अपना स्थायी मान कुछ समय बाद प्राप्त करेगी। इससे सेतु की सन्तुलन की अवस्था में भी धारामापी में क्षणिक विक्षेप आयेगा तथा संतुलन की अवस्था संदिग्ध हो जाती है। इसके विपरीत यदि पहले बैट्री की कुँजी को दबाते है तो कुंजी के पूर्णतया दब जाने पर प्रेरित धाराएँ समाप्त हो जायेंगी और प्रेक्षण में धोखा नहीं होगा।
- प्रत्यावर्ती धारा पर स्वप्रेरकत्व का वही प्रभाव होता है जो दिष्ट धारा पर ओमीय प्रतिरोध का होता है – चित्र में एक परिनालिका और एक विद्युत बल्ब एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत के साथ श्रेणी क्रम में जुड़े है। परिपथ पूरा होने पर बल्ब तेजी के साथ चमकता है। अब यदि परिनालिका के अन्दर लोहे की पतली छड़ों को एक एक करके डाले तो हम देखते है कि बल्ब की चमक क्रमशः कम होती जाती है। इसका कारण है कि नर्म लोहे की छड़े रखने पर परिनालिका का स्वप्रेरकत्व बढ़ जाता है। स्वप्रेरकत्व बढने के कारण ही प्रत्यावर्ती धारा का मान कम हो जाता है। स्पष्ट है कि प्रेरकत्व प्रत्यावर्ती धारा के मार्ग में उसी प्रकार रुकावट डालता है जिस प्रकार दिष्ट धारा के मार्ग में ओमीय प्रतिरोध रुकावट डालता है। चोक कुण्डली इसी सिद्धान्त पर बनाई गयी है।
- स्वप्रेरकत्व का प्रामाणिक प्रदर्शन : जब दो बल्ब समानांतर क्रम में जोड़े जाते है जिनमें एक में स्वप्रेरकत्व (कुण्डली) और दूसरे में प्रतिरोध R जुड़ा होता है।
(i) जब कुंजी को बंद किया जाता है –
B1 – तुरंत जलेगा।
B2 – धीरे धीरे जलेगा।
क्योंकि जब कुण्डली में धारा प्रवाहित होगी तो उसमें विद्युत वाहक बल प्रेरित होगा जो धारा के बढ़ने का विरोध करेगा। इसी कारण B2 बल्ब धीरे जलेगा। दूसरी तरफ , प्रतिरोध में कोई भी विद्युत वाहक बल प्रेरित नहीं होता है। इसलिए B1 बल्ब में कुंजी (K) लगते ही अधिकतम धारा प्रवाहित होती है तथा तुरंत जलने लगता है।
(ii) जब कुँजी को खोल दिया जाता है –
B1 – तुरंत बंद हो जाता है।
B2 – धीरे धीरे बंद होता है।
क्योंकि B2 में प्रेरित विद्युत वाहक बल धारा के घटने का विरोध करता है। इसलिए B2 बल्ब धीरे बंद होता है। दूसरी तरफ B1 में कोई भी प्रेरित विद्युत वाहक बल नहीं है। इसलिए उसमें धारा का प्रवाह तुरंत बंद हो जाता है। इसी कारक B1 तुरंत बंद हो जाता है।
परिनालिका का स्वप्रेरकत्व (self inductance of solenoid in hindi)
माना एक लम्बी वायु परिनालिका में फेरों की संख्या N , इसका अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल A और इसकी लम्बाई l है।
चूँकि परिनालिका की एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या
n = N/l
अत: परिनालिका में i धारा बहने पर उसके अन्दर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता –
B = u0.ni = u0(N/l).i . . . . . . . . समीकरण-1
अत: परिनालिका से सम्बद्ध कुल चुम्बकीय फ्लक्स
ϕ’ = N ϕ
यहाँ ϕ = परिनालिका के प्रति फेरे के साथ सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स
= BA
अथवा
ϕ = u0(N/l).i.A . . . . . . . . समीकरण-2
चूँकि ϕ’ = N ϕ
ϕ’ = N.u0(N/l).i.A
अथवा
ϕ’ = u0.(N2/l).i.A . . . . . . . . समीकरण-3
लेकिन स्वप्रेरकत्व की परिभाषा से –
ϕ’ = L.i . . . . . . . . समीकरण-4
चूँकि समीकरण-3 और समीकरण-4 से –
L.i = u0(N2/l)i.A
अथवा
L = u0N2A/l
अत: परिनालिका के अन्दर u चुम्बकशीलता का क्रोड़ रखा हो तो –
L = uN2A/l
यदि क्रोड़ के पदार्थ की आपेक्षिक चुम्बकशीलता ur हो तो
ur = u/u0
u = ur.u0
अत:
L = ur.u0N2A/l
प्रेरकत्वों का संयोजन (combination of inductance)
नोट : यह संयोजन केवल उस स्थिति में जब उनके मध्य अन्योन्य प्रेरकत्व (M) शून्य होता है।
(1) श्रेणीक्रम में प्रेरकत्व (inductance in series) : माना L1 और L2 स्वप्रेरण गुणांक वाली दो प्रेरण कुण्डलियों चित्र की तरह श्रेणीक्रम में जुडी है तथा उनके मध्य की दूरी अधिक है। संयोजन में धारा बहने पर उनके सिरों के मध्य उत्पन्न स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल क्रमशः eL1 और eL2 हो तथा संयोजन का कुल स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल eL हो तो –
eL = eL1 + eL2 . . . . . . . . समीकरण-1
यदि परिपथ में धारा परिवर्तन की दर di/dt है तो
eL1 = -L1.di/dt . . . . . . . . समीकरण-2
और
eL2 = -L2.di/dt . . . . . . . . समीकरण-3
यदि संयोजन का तुल्य प्रेरकत्व L है तो
e = -L.di/dt
समीकरण-1 में मान रखने पर –
-L.di/dt = -L1.di/dt + (-L.di/dt)
अथवा
L = L1 + L2
अर्थात कुण्डलियों के श्रेणी संयोजन का कुल प्रेरकत्व उनके अलग अलग प्रेरक्त्वों के योग के बराबर होता है बशर्तें कि कुण्डलियों के मध्य की दूरी अधिक हो।
(2) समान्तर क्रम में प्रेरकत्व (inductance in parallel)
माना L1 और L2 स्वप्रेरण गुणांक वाली दो कुण्डलियाँ समांतर क्रम में जुडी है। दोनों के सिरों के मध्य समान स्वप्रेरित विभवान्तर eL उत्पन्न होगा। मुख्य धारा I का I1 भाग L1 प्रेरकत्व वाली कुण्डली और I2 भाग L2 प्रेरकत्व वाली कुण्डली से होकर गुजरता है। यदि दोनों में धारा परिवर्तन की दर क्रमशः dI1/dt और dI2/dt हो तो
eL = -L1dI1/dt
dI1/dt = -eL/L1 . . . . . . . . समीकरण-1
eL = -L2dI2/dt
dI2/dt = -eL/L2 . . . . . . . . समीकरण-2
यदि संयोजन का तुल्य प्रेरकत्व L हो तो –
eL = -LdI/dt
dI/dt = -eL/L . . . . . . . . समीकरण-3
चूँकि I = I1 + I2
अत: दोनों तरफ t के सापेक्ष अवकलन करने पर
dI/dt = dI1/dt + dI2/dt . . . . . . . . समीकरण-4
समीकरण-4 में समीकरण-1 , समीकरण-2 और समीकरण-3 से मान रखने पर –
-eL/L = -eL/L1 + (-eL/L2)
अथवा
1/L = 1/L1 + 1/L2
नोट : यदि कुण्डलियों के मध्य अन्योन्य प्रेरण गुणांक (M) हो कुण्डली का स्वप्रेरकत्व –
Lp = L1L2 – M2/(L1 + L2) + 2M
प्रश्न 1 : एक कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक 5 हेनरी है। उसमें बहने वाली धारा 0.1 सेकंड में 12A से 7A में बदल जाती है। कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल की गणना कीजिये।
उत्तर : प्रेरित विद्युत वाहक बल eL = 250 V
प्रश्न 2 : एक प्रेरण कुण्डली में 0.2 सेकंड में धारा शून्य से बढ़कर 5 एम्पियर हो जाती है जिससे 20 वोल्ट का प्रेरित विभवान्तर उत्पन्न होता है। कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक ज्ञात कीजिये।
उत्तर : L = 0.8 H
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