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युवा अलगाव किसे कहते है | युवाओं में अलगाव की परिभाषा कारण और निवारण क्या है segregation in youth in hindi
segregation in youth in hindi युवा अलगाव किसे कहते है | युवाओं में अलगाव की परिभाषा कारण और निवारण क्या है ?
युवा वर्ग की बदलती हुई मूल्य पद्धति और अलगाव
पिछले दो दशकों में हमारी परंपरागत मूल्य पद्धति में बृहत् परिवर्तन हुए हैं। आइए, हम इन परिवर्तनों की विवेचना करें। यह पता लगाएँ कि क्या इन परिवर्तनों का हमारे समाज पर कोई प्रभाव हुआ है? इस संदर्भ में हमने युवाओं के अलगाव पर विशेष ध्यान दिया है।
बदलती हुई मूल्य पद्धति
परंपरागत हिंदू पद्धति में जीवन को सामाजिक दायित्वों सहित चार स्पष्टतः निर्देशित अवस्थाओं में देखा जाता है। इसमें युवा अवस्था को कोई सत्ता प्राप्त नहीं थी। परंतु दूसरी अवस्था अर्थात् गृहस्थ में कुछ कार्य दिए हुए होते थे।
इस पद्धति में वयोवृद्धों को सम्मान दिया जाता था, और ‘‘युवावस्था‘‘ अलाभकर होती थी। यह भी नोट किया जाना चाहिए कि हिंदू समाज (स्तरीकृत) में शिक्षा कुछ निश्चित जातियों (स्तर) तक ही सीमित थी। इसलिए सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक गतिशीलता भी लगभग संकुचित थी। आज इस मूल्य को विपरीत देखा गया, विशेषकर स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद यह पद्धति धर्म और क्षेत्र को ध्यान में रखे बिना परिवर्तित हो गई है।
मूल्य पद्धति में परिवर्तन लाने वाला महत्त्वपूर्ण कारक जन शिक्षा पद्धति का विकास था। नई विचारधाराओं और मूल्यों का संचार शिक्षा के माध्यम से किया गया। यह युवा विद्यार्थियों को परिवर्तन के लिए सुग्राही बनाती है। कई समाजशास्त्रीय अध्ययनों में इस विचारधारा का समर्थन किया गया है कि युवा विद्यार्थी परिवार, जाति पदक्रमित प्रस्थिति की धारणाओं (अस्पृश्यता सहित) तर्कसंगति, धर्मनिरपेक्षता, समानता, सामाजिक न्याय, महिलाओं की स्थिति एवं इसी तरह के अन्य क्षेत्रों में सामाजिक परिवर्तन के लिए बहुत उत्सुक हैं (डामले 1977, पृष्ठ 203)। इस पर बल दिया जाना चाहिए क्योंकि ग्रामीण और शहरी युवाओं में अंतर के बावजूद उनकी परंपरागत मूल्य पद्धति लगभग समान है।
अलगाव
अलगाव शब्द अन्य लोगों से विमुखता और स्थापित प्रतिमानों के बारे में भ्रम की भावना को दर्शाता है। बहुत से लेखक अलगाव की संकल्पनाओं में शक्ति का अभाव, निरर्थकता, अकेलेपन की भावना और विमुखता जैसी धारणाओं को शामिल करते हैं।
अलगाव के कई कारण हैं। विद्यमान परिप्रेक्ष्य में कुछ कारक महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते हैं।
प) पीढ़ी दर पीढ़ी अंतर
उनमें एक है, युवा और वृद्ध पीढ़ी में मतभेद। युवा विशेषकर शहरी क्षेत्रों में अपने माता-पिता पर अधिक आश्रित रहते हैं। एक तरफ तो उनकी आकांक्षाओं और अपेक्षाओं में वृद्धि हुई है। दूसरी ओर वे परंपराओं की शक्तियों का विरोध करते हैं। आधुनिक भारतीय युवा बहुतमत से परंपरागत मूल्यों और प्रतिमानों से बंधे नहीं रहना चाहते थे। वे धर्मनिरपेक्ष जीवन शैली एवं तर्कसंगत दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं। इससे विरोधाभास पैदा होता है और बाद में यही अलगाव को जन्म देता है।
पप) बेरोजगारी
अलगाव को उत्पन्न करने वाला दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक घोर रूप से व्याप्त बेरोजगारी की स्थिति है। एक आयु स्तर पूरा करने के तुरंत बाद युवा आर्थिक सुरक्षा चाहते हैं। परंतु जब वे कोई काम पाने में असफल होते हैं, तो वे अकेलापन महसूस करते हैं। यह एक निर्णायक स्थिति होती है। यहाँ पर वे किसी भी बुराई के शिकार हो जाते हैं, जैसे मानसिक रुग्णता, आपराधिक कार्यकलाप, नशीली दवाओं का सेवन । यहाँ ग्रामीण और शहरी दोनों युवा वर्ग करीब-करीब समान स्थिति में होते हैं। सच्चिदानंद (1988) के अनुसार, ‘‘वे (ग्रामीण) बालक जो अपना अध्ययन जारी रखने के लिए शहरों में नहीं जा सकते हैं और गाँव में रह जाते हैं, वे अपना समय गपशप में ही बिताते हैं और कभी-कभी असामाजिक कृत्यों में लग जाते हैं। यह भी पाया गया है कि ऐसे बहुत से शिक्षित युवक राहजनों व डकैतियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ऐसी स्थिति भारत के बहुत से भागों में आम है।‘‘
उत्तर-पूर्वी और मध्यवर्ती भारत के भागों में कुछ अध्ययन किए गए थे। इनसे विश्वविद्यालय और कालेज परिसरों में ‘‘नशीली दवाओं के व्यसन‘‘ की व्यापक घटनाओं का पता चला है। यह पूरी तरह से तय नहीं किया जा सकता है कि अलगावित युवा नशीली दवाओं के शिकार हुए हैं अथवा नशीली दवाओं के व्यसन के कारण ही वे अलगावित हुए हैं। ये दोनों कारक एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। और साथ-साथ कार्य करते हैं।
पपप) पहचान का संकट
पहचान जागरूकता की ऐसी भावना को दिखाती है जिसमें व्यक्ति जाने अथवा अनजाने में विद्यमान सामाजिक ढाँचे में अस्तित्व, मान्यता और प्रतिफल के लिए प्रयत्न करता है। अपने अस्तित्व के लिए संसाधन प्राप्त करने तथा वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में स्थान पाने के लिए आजकल युवा वर्ग अपनी पहचान को परिभाषित करने की कोशिश करता है।
यह महसूस किया जा रहा है कि शिक्षा और व्यवसाय के मामले में युवाओं को संतोषजनक स्थिति में नहीं रखा गया है। अपने व्यक्तित्व की पहचान की खोज करने के बदले युवा पहचान संकट के विक्षोभ से गुजर रहे हैं। इसके फलस्वरूप वे अपर्याप्तता के निराकरण के रूप में पुनर्जागरण की ताकतों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इस उभरते हुए पहचान संकट से निपटने के लिए समुचित आदर्श के अभाव में युवा वर्ग विशेषकर शिक्षित बेरोजगार युवा गलत कार्यों में लग जाते हैं।
बोध प्रश्न 2
1) परंपरागत हिंदू पद्धति में जीवन को सामाजिक दायित्वों सहित चार स्पष्टतः निर्देशित अवस्थाओं में देखा जा सकता है। इस पद्धति में युवाओं को प्राप्त है:
क) बिना किसी सामाजिक दायित्व के पर्याप्त प्राधिकार। ( )
ख) सामाजिक दायित्व सहित पर्याप्त प्राधिकार। ( )
ग) कोई अधिकार नहीं अपितु जीवन की दूसरी अवस्था अर्थात् गृहस्थ
में कुछ कार्य सौंपे हुए होते थे। ( )
घ) सभी गलत हैं। ( )
2) ग्रामीण और शहरी युवाओं के बीच अंतर होता है; और उनकी परंपरागत मूल्य पद्धति
क) भी भिन्न होती है। ( )
ख) लगभग एक-समान होती है। ( )
ग) इन दो विपरीत मापों में निर्धारित नहीं की जा सकती। ( )
3) निम्नलिखित में से कौन-सा युवा वर्ग के अलगाव का कारण नहीं है?
क) युवा और वृद्ध पीढ़ी के बीच मतभेद ( )
ख) व्यापक बेरोजगारी ( )
ग) नशीली दवाओं की लत ( )
घ) रोजगार का विस्तृत कार्य क्षेत्र ( )
बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) ग
2) ख
3) घ
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