शामन और ब्राह्मण किसे कहते है | शामन या ब्राह्मण की परिभाषा क्या है samanas and brahmanas in hindi

By   January 31, 2021

samanas and brahmanas in hindi शामन और ब्राह्मण किसे कहते है | शामन या ब्राह्मण की परिभाषा क्या है ?

 शामन और बाहमणः धार्मिक दर्शन
(Samanas and Brahmanas The Religious Philosophies)
छठी शताब्दी में भारतीय दर्शन के सभी विचार, कम से कम अपने प्रारंभिक रूप में ही सही,
अपनी संस्थाओं में उन्हें संस्थानिक व्यवहार का रूप दिया। संन्यास की परंपरा ही इन विभिन्न दर्शनों की सबसे प्रमुख विशेषता थी। यह युग परिभाजकों (परिव्राजक शब्दों का पाली रूप) और शामन (श्रमण का पाली रूप) जिन्होंने गृहस्थ जीवन से संन्यास ले लिया था, में कहा जाता है कि वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक इसलिए घूमते रहते थे कि अपने जैसे चिंतकों से विचारों का आदान-प्रदान करें। इसी अनवरत गतिशीलता के चलते वे अपने विचारों का प्रचार कर सकें और अपने अनुयायी भी बना सकें।

बलि देने की मुख्य प्रचलित परंपरा पर आधारित होने के कारण ये शामन एक सुर में ब्राह्मणों का विरोध करते थे। समाज में ब्राहमणों की सर्वोच्चता के भी वे विरोधी थे। इसलिए उन्हें अनास्थावादी धर्म कहा जाता था। इन विचारों की विविधता से संकेत मिलता है कि किस तरह इन दार्शनिकों के वैचारिक आलोक में तेजी से परिवर्तित हो रहे समाज को समझने की जटिल कोशिश की गई होगी। यह तर्क दिया जा सकता है कि सहज सामुदायिक जीवन के बिखरने से एक बेगानापन उपजा होगा और ऐसी पृष्ठभूमि के कारण दार्शनिक, मानवीय अस्तित्व की समस्या से जूझने लगे होंगे। और इस तरह की पृष्ठभूमि के चलते भारतीय समाज में जैन तथा बौद्ध धर्म उभरे। इस पाठ के अगले अनुभागों में हम जैन तथा बौद्ध धर्म की विवेचना करेंगे।

बोध प्रश्न 1
प) महावीर और बुद्ध के युग में राजनीतिक प्रणाली की विशेषता, किसकी मौजूदगी से पता चलती है,
क) राजशाही पर आधारित राज्य
ख) गोत्र पर आधारित कुलीनता
ग) उपर्युक्त दोनों
घ) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं
पप) महावीर और बुद्ध के युग में राज्य के गठन की तीन मुख्य विशेषताओं की व्याख्या करें।
पपप) बुद्ध के युग में इनमें से किसने जन्म के आधार पर समाज में सर्वोच्च स्थान का दावा किया था?
क) कर्मकार
ख) दास
ग) ब्राह्मण
घ) उपर्युक्त सभी।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
प) ग)
पप) क) व्यवस्थित कृषि विकास
ख) राज्य की सीमा के विस्तार के लिए तथा राज्य के अंदर प्रभावशाली नियंत्रण के लिए स्थायी सेना
ग) प्रभावशाली सरकारी तंत्र का गठन प) ग) बोध प्रश्न 2
पपप) ग)

उद्देश्य
इस इकाई में जैन तथा बौद्ध धार्मिक विश्वासों-आस्थाओं के संगठन तथा दर्शन पर प्रकाश डाला गया है। इसके अध्ययन के पश्चात, आपः
ऽ भारत में जैन तथा बौद्ध दर्शन के आविर्भाव की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि की व्याख्या कर सकेंगे,
ऽ जैन धर्म की मूल शिक्षाओं का वर्णन कर सकेंगे,
ऽ भारत में जैन धर्म के उत्थान तथा विकास पर चर्चा कर सकेंगे,
ऽ जैन जीवन शैली की विवेचना कर सकेंगे,
ऽ बौद्ध धर्म की मूल शिक्षाओं का वर्णन कर सकेंगे,
ऽ बौद्ध दर्शन तथा तत्कालीन समाज के संबंधों की विवेचना कर सकेंगे,
ऽ बौद्ध धर्म के उत्थान और विकास की समीक्षा कर सकेंगे, और
ऽ बौद्ध धर्म एवं हिन्दू धर्म की समानताओं पर प्रकाश डाल सकेंगे।

प्रस्तावना
इस खंड की पिछली इकाई में हमने हिन्दू धर्म पर चर्चा की थी। इस इकाई में हम जैन और बौद्ध धर्म के बारे में चर्चा करेंगे जिनका उद्भव हिन्दू धर्म से ही हुआ है। प्राचीन भारत में कुछ राजनीतिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक दर्शन, आर्थिक एवं सामाजिक आधार और धर्म विशेष के व्यवहारों की पृष्ठभूमि में ही ये धर्म विकसित हुए। इन धर्मों के आविर्भाव की पृष्ठभूमि पर विस्तृत विवेचन हम इस इकाई में करेंगे। इसी इकाई के अनुभाग 20.3 में जैन धर्म के मूल सिद्धांत पर चर्चा की गई है। इसी इकाई के अनुभाग 20.4 में जैन धर्म के उत्थान और विकास पर चर्चा की गई है। बौद्ध धर्म ने समाज में जड़ जमाते धर्मतंत्र, असमतावादी दर्शन और व्यवहारों से हटकर विभिन्न सिद्धांतों के आधार पर समाज को, संगठित करने और उसे एक वैकल्पिक समाज बनाने की दृष्टि दी। बुद्ध के सामाजिक दर्शन की जड़ें स्पष्टतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी के समाज में देखी जा सकती हैं। राजनीतिक रूप से देखें तो राज्य की संरचना तथा कुछ संस्थाओं के उत्थान के परिप्रेक्ष्य में यह दिखता है।

 बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उद्गम की पृष्ठभूमि
(The Emergence of Jainism and Buddhism)
ईसा की छठी शताब्दी पूर्व एक घटना घटी जिसने भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ी है। क्योंकि इसने गहन दार्शनिक चिंतन का अवलोकन किया है। इस शताब्दी के इस अनोखे चरण में कई चिंतकों ने अपना सहयोग दिया, किन्तु महावीर और बुद्ध द्वारा दिया गया दार्शनिक और सामाजिक चिंतन भारत में जन्में अभी तक के सभी महापुरुषों से श्रेष्ठतम रहा है। भगवान बुद्ध ऐसे भारतीय मानव चिंतक थे, जिन्होंने भारतीय परम्पराओं को स्थापित किया और विश्व को अपने धर्म की ओर आकर्षित होने के लिए बाधित किया। बौद्ध धर्म ने अपने समकालीन समाज में तीव्र परिवर्तन करने के लिए बहुत ही गंभीर और व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किये तथा मानव कल्याण के लिए शान्ति, धैर्य और सामाजिक दर्शन को विश्व के सामने रखा। भगवान बुद्ध ने एक अच्छे समाज की रचना करने की दृष्टि प्रदान की जो वर्ण व्यवस्था और असमानताओं के व्यवहारों वाले समाज के स्थान पर अथवा उसके विरुद्ध विभिन्न सिद्धांतों को स्थापित करके नये समाज की रचना व उसके संगठन की ठोस संभावनाओं को हमारे सामने रखता है।

भगवान बुद्ध के सामाजिक दर्शन के आधार को ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में उस समय के गणराज्यों की राज्य या शासन व्यवस्था और उस समय की संस्थाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

 राजनीतिक व्यवस्था (The Political System)
बुद्ध के युग की राजनीतिक व्यवस्था में दो तरह की सरकारें दिखती हैं-राजशाही और गण-संघ । इन शासन प्रणालियों की स्थिति को भौगोलिक रूप से देखना अपने आप में बहुत आकर्षक है। गंगा-यमुना की घाटी में राजशाही थी तो हिमालय की तलहट्टी में गण-संघ फलफूल रहे थे। इन गण-संघों में एक या अधिक क्षत्रियों के कुल जैसा कि सावय, मल्ल अथवा लिच्छवी विराजमान थें । गण-संघ इस सिद्धांत पर संगठित थे कि समग्र कुल सत्ता के संचालन में उनकी हिस्सेदारी बनी रहेगी।

विभिन्न राजनीतिक इकाइयों के झगड़े होते रहते थे। जैन तथा बौद्ध साहित्य के आधार पर जो छवि उभरती है वह नये युग क्षितिज के विस्तार तथा राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की थी जिसकी परिणति मौर्य साम्राज्य के गठन में हुई।

उपलब्ध बौद्ध साहित्य के आधार पर यह संभव है कि राज्य विशेषरूप से मगध साम्राज्य के गठन की प्रक्रिया को लिपिबद्ध किया जा सके। ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में मगध के शासक बिंबसार ने राज्य के संगठन की क्रमबद्ध और गूढ़ कोशिश की। आदिम संगठनों वाली पशुपालन और कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था की जगह आर्थिक सुव्यवस्थित कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था कायम हो चुकी थी। यह राज्य के गठन में एक बड़ा कारक बनी। इसके चलते ही यह संभव हुआ कि राज्य एक बड़ी और नियमित सेना का खर्च उठा सके। गंगा की घाटी से आगे तक राज्य की सीमा विस्तृत करने के लिए ऐसे संघ की नितांत आवश्यकता थी। साथ ही राज्य की आंतरिक स्थिति पर भी प्रभावकारी नियंत्रण बनाये रखने के लिए इसकी जरूरत थी। इसके साथ-साथ कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण के लिए एक बड़े सरकारी तंत्र की जरूरत पड़ी होगी और जो राज्य के गठन के लिए भी एक अनिवार्य जरूरत थी। आदिम लड़ाकुओं की जगह नियमित सेना ने ले ली। सेना में कई विशेष विभाग भी कायम किये गये थे। इस तरह सेना राजा के हाथों में नियंत्रण का एक औजार बन गई। अपनी सीमाओं को बढ़ाती आक्रामक राजशाही और दिनों दिन बढ़ती जाती सेनाओं ने गण-संघों के महत्वाकांक्षी नौजवानों को आकर्षित करना शुरू कर दिया। उन नौजवानों को यह संभावना दिख रही थी कि वे अपनी सैन्य कुशलता का उपयोग कर सकेंगे। इसके लिए अनुकूल स्थिति यह थी कि एक-एक करके गण-संघों का पतन होता जा रहा था।

क्षेत्रीय विस्तार और गण-संघों का पतन (Territorial Expansion and Collapse of Gana&Sanghas)

भगवान बुद्ध के यग में भारतीय राज्य की सीमा का विस्तार तथा सुदृढीकरण दो स्तरों पर हो रहा था। गंगा की घाटी के राजशाही राज्य, विशेषकर कौशल और मगध अपने पड़ोसी कमजोर राज्यों को हड़पकर सीमा का विस्तार कर रहे थे। लेकिन वहीं वे अपना वर्चस्व हासिल करने के लिए एक-दूसरे से भी लड़ भी रहे थे। इसमें अंततोगत्वा मगध को जीत हासिल हुई। गण-संशों का पतन सबसे पहले हुआ । शाक्य और मल्ल छोटे गण-संघ तो भगवान बुद्ध के जीवनकाल में ही समाप्त हो गये थे। गणसंघों और राजशाही के बीच संघर्ष सिर्फ इसलिए नहीं था कि उनके राजनीतिक स्वरूप में फर्क था। बल्कि उनके बीच पूरी की पूरी एक जीवन दृष्टि का अंतर था। गण-संघों में एक गोत्र के लोग भूमि पर सामुदायिक नियंत्रण रखते थे जबकि राजशाही में सामुदायिक भावना का अभाव था। इसके बावजूद गण-संघों का पतन पाँचवीं तथा छठी शताब्दी में उनके पड़ोस में चलती परिवर्तन की तेज. आंधी के चलते अनिवार्य हो गया।

 राजनीतिक दर्शन (Political Philosophy)
महावीर और बुद्ध के युग के राजनीतिक दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वह सत्ता के प्रति पूर्णतः व्यावहारिक दृष्टि अपनाता है। राजशाही में सत्ता के पूर्ण और मनमाने उपयोग की छूट रहती है तथा राजा पर उसके दुरुपयोग पर अंकुश लगाने का कोई प्रभावकारी प्रावधान नहीं होता। राजा अपनी कोई भी इच्छा जनता और राज्य पर थोप सकता है। राजा का अपनी जनता पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह देखा गया है कि सत्ता का उपयोग वैधानिक और नियंत्रित तरीके से करने के बजाय मनमर्जी तथा स्वेच्छाचारिता से करता है। कानून का उपयोग भी अक्सर नहीं होता, बल्कि उसका उपयोग एकदम व्यक्तिगत तथा मनमाने ढंग से किया जाता रहा है। तत्कालीन साहित्य स्पष्ट दर्शाता है कि कैसे पुरानी संस्थाएं ध्वस्त हो गई, लेकिन उनकी जगह दूसरी नयी संस्थाएं नहीं बनायी गई। पुराने समाज के लोगों की सामूहिक शक्ति आदिम संस्थाओं के द्वारा अभिव्यक्त हुआ करती थी, लेकिन वे अब राज्य के विस्तार में फायदेमंद नहीं थीं। पूरे समुदाय की दृष्टि में सत्ता मूल्यों का साधन बनने के बजाए अपने आप में साध्य हो गई थी। बुद्ध के सामाजिक दर्शन

उत्पादन के नये संगठन (New Organisations of Production)
इतिहासकार इस,बात पर परस्पर असहमत हैं कि लोहे के उत्पादन में बुद्ध और महावीर के युग में नये उत्पादन संबंधों के उत्थान में कितना योगदान दिया। फिर उत्पादन के नये संबंधों के उत्थान में योगदान देने वाले अन्य तत्वों के बारे में काफी हद तक सहमति दिखती है। अर्थव्यवस्था, विशेषरूप से कृषि में उल्लेखनीय विस्तार हुआ था । पौघ को रोप कर धान की खेती करने वाली प्रक्रिया के आते ही जनसंख्या विस्फोट जैसी स्थिति आ गई। बौद्ध तथा जैन धर्म ग्रंथों में कई नये आवासीय परिसरों के बसने का उल्लेख आता है। जिससे स्पष्ट है कि पुराने आवासीय परिसरों, कृषि, जनसंख्या आदि का विस्तार वीरान इलाकों में भी हुआ। कृषि और रिहायशी इलाकों के विस्तार के साथ-साथ हस्तशिल्प के उत्पादन में भी वृद्धि हुई। उन ग्रंथों में अनेक हस्तशिल्पों, मुद्राओं का जिक्र आता है जिससे तत्कालीन अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्व का पता चलता है। व्यापार, व्यापार मार्ग, संगठित व्यापारिक गतिविधियों को चलाने वाली “श्रेणियों‘‘ का भी उल्लेख मिलता है। इसलिए भगवान बुद्ध के युग को ‘‘द्वितीय शहरीकरण‘‘ का युग कहा जाता है।

उन ग्रंथों से भी स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों के संग वर्णित “गहपति‘‘ कृषि के विस्तार में उल्लेखनीय भूमिका निभाते थे। उनमें से कुछ तो भूमि के बड़े इलाकों पर नियंत्रण रखते थे। ये गहपति राजशाही के जनपदों के बड़े करदाता थे और इसलिए वे राजा की स्वं-प्रभुता के लिए अनिवार्य और उसके खास समझे जाते थे।

 सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification)
अर्थव्यवस्था में बढ़ती जटिलता के चलते स्पष्ट रूप से स्तरीकृत समाज का उत्थान हुआ । समाज के कुछ तबकों के पास भरपूर जमीन थी वहीं बाकी लोगों के पास उत्थान के साधन नहीं थे। इसलिए उस काल में वैतनिक (वेतन पाने वाले मजदूर) तथा कर्मकार (दैनिक मजदूरी पाने वाले श्रमिक) जैसी श्रेणियाँ भी उभरी। कर्मकारों का जिक्र अक्सर दासों (हमेशा ताबेदारी में रहने वाले श्रमिक) के साथ आता है जिससे यह लगता है कि वे (कर्मकार) भी कुछ ऐसे गुलामी के बंधनों के चलते स्वतंत्र नहीं थे। दलिद (पाली भाषा में दरिद्र) शब्द, जो अत्यंत गरीबी के लिए प्रयुक्त होता है, भी पाठ में मिलता है। इसका विपरीतार्थक शब्द समृद्धि तो यही बतलाता है कि नये समाज में स्पष्ट आर्थिक विडम्बना मौजूद थी। आर्थिक विडम्बनाओं के साथ ही सामाजिक विडम्बनाएं भी थी। कुछ परिवारों को ऊंचा स्तर प्राप्त था तो कुछ निम्न स्तर के समझे जाते थे। जन्म के आधार पर समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने का दावा ब्राह्मण करते थे लेकिन इस दावे के विरोध के प्रमाण भी मौजूद हैं।

संक्षेप में कहें तो यह कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में समाज परिवर्तन की प्रसव-पीड़ा से गुजर रहा था । समाज में असमानता के आर्विभाव के अतिरिक्त राजनीतिक इकाइयों, सामाजिक एवं आर्थिक संस्थाओं में बदलाव तथा पुनर्रचना ने पुराने युग के गोत्र तथा रक्त संबंधों से जुड़े संगठनों तथा अन्य सामूहिक इकाइयों को बेकार कर दिया था। इनकी जगह सिर्फ अब व्यक्ति, व्यक्तिवाद और लालच दिखाई देने लगा। कुछ लोगों के हाथों में असीम सत्ता आ गई थी लेकिन ऐसा कोई मानदंड नहीं बन पाया था जो शोषक और शोषित, राजा और प्रजा के बीच मध्यस्थता कर सकें। प्रश्नों से बिंधे ऐसे समाज में जैन, बौद्ध तथा अन्य असनातनी दर्शन सृजनात्मक उत्तर के रूप में सामने आये।