JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now

हिंदी माध्यम नोट्स

Categories: sociology

भारतीय चुनाव में जाति की भूमिका | भारतीय समाज में चुनाव जाति क्या है role of caste in indian elections in hindi

role of caste in indian elections in hindi india’s electoral process भारतीय चुनाव में जाति की भूमिका | भारतीय समाज में चुनाव जाति क्या है ?

अनुभवजन्य वास्तविकता के रूप में जाति
एक अनुभवजन्य वास्तविकता के रूप में वर्ण व्यवस्था को समझने का आधार जाति-समूहों, जैसे जाति को विशेष ग्रामीण/शहरी संदर्भ में देखना है । यह समाज में स्थान और पहचान का एक स्रोत है। मगर पहचान रोजाना के अनौपचारिक संबंधों का प्रकार्य नहीं है। उदाहरण के लिए अमूमन जाति एक तमिल ब्राह्मण और उत्तर प्रदेश के कान्य-कुब्ज ब्राह्मण के बीच विवाह का आधार नहीं बनती। मगर उनमें यह एहसास हो सकता है कि वे एक ही वंश से जुड़े हैं और संकट और चुनौती की घड़ियों में एक-दूसरे से सहयोग भी कर सकते हैं। इसलिए, कोई यह पूछ सकता है कि क्या जाति एक हित समूह है? क्या साझे हित विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न जातियों के लोगों को एक जाति के लोगों के बनिस्वत अधिक सहजता से एक दूसरे के समीप ला सकते हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि जाति एक संसाधन है, मगर इस संसाधन की प्रकृति जाति के अनुसार बदल जाती है । एक जाति विशेष की हैसियत उसकी स्थिति पर निर्भर करती है जो उसे एक क्षेत्र विशेष में प्राप्त है। आज सवर्ण और मझोली जातियों के लिए जाति पहचान/सदस्यता बोझ बन गई है क्योंकि सरकारी नौकरियों, संसद और विधानसभाओं के साथ-साथ उच्च-शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का एक खास प्रतिशत अनुसूचित जातियों/जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।

यह दृष्टिकोण कि जाति और वर्ग विचारधारा से एक-दूसरे के विलोम हैं, सही नहीं है। यह मान लेना कि जाति के नष्ट हो जाने पर वर्ग एक सामाजिक वास्तविकता के रूप में उभर सकता है, दोनों के बीच में जो संबंध है उसे गलत समझना होगा। दोनों ही भारत की सामाजिक संरचना के अविभाज्य अंग रहे हैं। इसलिए दोनों के गठजोड़, उसकी निरंतरता और उसमें आने वाले परिवर्तन का अध्ययन जरूरी है।

जाति एक अति जटिल व्यवस्था है क्योंकि यह सत्ताधिकार या शक्ति संबंधों और आर्थिक क्रिया-कलापों की एक पद्धति भर नहीं है। अगर यह एक पहलू से कमजोर पड़ती है तो वहीं यह दूसरे पक्ष से शक्तिशाली बन जाती है। निस्संदेह इस प्रक्रिया में कुछ परिवर्तन, परिवर्धन और सहवर्धन अवश्य होते हैं। हमें इस व्यवस्था की गतिशीलता को गंभीरता से विश्लेषण करने की आवश्यकता है। आखिरकार अनुष्ठानों, शुद्धि-अशुद्धि और सामाजिक-जीवन के अन्य अभौतिक पहलुओं का आधार वर्ग ही है। उदाहरण के लिए, जाट सभा जैसा संगठन सिर्फ एक जातिगत संगठन नहीं है बल्कि असल में यह ग्रामीण किसानों का एक संगठन है। इसी तरह किसान सभा भी ग्रामीण किसानों का संगठन भर नहीं है बल्कि यह खेती-बाड़ी के पेशे में लगी कृषक जातियों विशेषकर उत्तरी भारत में जाटों और अन्य राज्यों की ऐसी ही जातियों का संघ है।

जाति चुनाव
कोई पंद्रह वर्ष पहले जयपुर के बीच में स्थित स्टेशन रोड़ पर खंडेलवाल वैश्य महासभा के वार्षिक चुनाव हुए। इस चुनाव में सैकड़ों कारें, जी, ऑटोरिक्शा और स्कूटर-मोटरसाइकिल लगे हुए थे। सड़क के दोनों तरफ चुनाव के लिए लगभग 60 स्टॉल लगे थे। इस सड़क पर आने-जाने वाले यातायात को दूसरे मार्ग पर मोड़ दिया गया और स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए पुलिस बंदोबस्त भी किया गया था। यह सिर्फ जातिवाद का प्रदर्शन ही नहीं था, बल्कि इसमें जाति की अंदर की गुटबाजी भी खूब देखने में आई। लेकिन इस चुनाव में हजारों रुपये खर्च करके चुने जाने वाले लोगों को आखिर क्या हासिल होना था? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए हमें गंभीर विश्लेषण करना होगा कि जाति और वर्ग किस प्रकार परस्पर काम करते हैं।

बॉक्स 3.02
सही अर्थों में जाति ढांचे का कोई समरूप पैटर्न पूरे भारत में नहीं मिलता। भारत में हजारों जातियां हैं जिनके नाम-उपनाम अलग-अलग हैं। लेकिन पूरे देश में सिर्फ पांच या छह वर्ग हैं। यहां यह याद रखना जरूरी है कि भारतीय समाज में सामाजिक विभाजन के स्पष्ट रूप से ये भिन्न आधार वास्तव में एक दस से ज्यादा भिन्न नहीं हैं। भारत में अनेक मध्यम वर्ग हैं जिनका उत्पादन प्रक्रियाओं से कोई संबंध नहीं है, बल्कि ये आधुनिक भारतीय राज्य उपकरण की उपज हैं।

भारत में वर्ग संघर्ष असल में जाति संघर्ष और जाति संघर्ष वर्ग संघर्ष है। इन दोनों को अलग करना व्यर्थ और यांत्रिक होगा। इस विधि-वैज्ञानिक तर्क, कि दोनों विशिष्ट और भिन्न हैं क्योंकि दोनों का संबंध क्रमशः “सामाजिक‘‘ और ‘‘आर्थिक वास्तविकताओं‘‘ से है, इसको भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि इस बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद नहीं हैं कि ये दोनों एकदम अलग है

यह दृष्टिकोण भारत के सामाजिक संरचना के अध्ययन के लिए जाति-वर्ग गठजोड़ पर केन्द्रित है। इसमें सामाजिक ढांचे, संस्कृति, इतिहास और द्वंद्वात्मकता को सामाजिक स्तर के ऊपरी हिस्सों और हाशिये पर नों तरफ से समझने और उनका विश्लेषण करने पर बल दिया गया है।

गठजोड़ से यह मतलब नहीं कि जाति और वर्ग में तदनुरूपता या सममिति विद्यमान रहती है। परस्पर निर्भरता, अंतर्विरोध, सममिति और वर्चस्व इस गठजोड़ की अभिन्न विशेषताएं हैं। आंद्रे बेटीली बताते हैं कि गांव में जाति और सत्ताधिकार की क्रम-परंपराएं कुछ हद तक अतिव्यापन करती हैं मगर साथ में वे एक दूसरे की काट भी करती हैं।

बेटीली कहते हैं कि सामाजिक जीवन में कई क्षेत्र अब कुछ हद तक ‘‘जाति-मुक्त‘‘ हो रहे हैं । ब्राह्मणवादी परंपरा के अलावा भारतीय समाज में योद्धा राजपूतों की परंपरा, भारतीय दस्तकारों, व्यापारियों की परंपराएं, वर्गीय और सांस्कृतिक परंपराएं साथ-साथ विद्यमान थीं।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय समाज के बहु-आयामी होने और जाति व्यवस्था के कारण जाति की सटीक परिभाषा बेहद जटिल है। जाति के ढांचागत पहलू की यह कहकर व्याख्या की जाती है कि यह स्तरीकरण का एक सामान्य सिद्धांत है। एक सांस्कृतिक व्यवस्था के रूप में जाति को शुद्धि और अशुद्धि की विचारधारा की प्रधानता और क्रम परंपरा, पृथककरण और सम्मिलनशीलता की धारणाओं के संदर्भ में, समझा जाता है।

एफ. जी. बेली जाति को स्तरीकरण की एक संवश्त (बंद) प्रणाली कहते हैं जबकि बेटीली वर्ण-व्यवस्थी के पहलुओं को ‘संवश्त‘ और ‘विवश्त‘ दोनों रूपों में देखते हैं। बेली के अनुसार जाति ज्यादा खंडीय होती जा रही है जिसका कारण भारत में विभेदित ढांचों का उदय है। विश्लेषण में इन भिन्नताओं के चलते जाति की एक साझी परिभाषा विकसित नहीं हो पाई है।

जाति और गतिशीलता
जाति हालांकि वास्तव में ज्यादा लचीली व्यवस्था नहीं है, मगर यह अपने सदस्यों को कुछ निश्चित क्षेत्रों में गतिशीलता की अनुमति देती है। कोई जाति अंतरजातीय निर्भरता के मामले में वर्ण-व्यवस्था के नियमों से संचालित होती है। मगर वहीं दूसरी जाति को अपनी प्रथाओं, अनुष्ठानों और अधिकारों का पालन करने में अन्य जातियों के सापेक्ष स्वतंत्रता भी प्राप्त होती है।

श्रीनिवास के अनुसार कृषि उत्पादन के लिए आज भी कई जातियों के परस्पर सहयोग की उतनी ही आवश्यकता पड़ती है। जाति मुहावरे का चलन बड़ा व्यापक है। मार्क्स ने उत्पादन की एशियाई विधि को भारत में वर्ण-व्यवस्था की स्थिरता से जोड़ कर देखा था। उधर, बेटीली भारतीय समाज के ‘‘जाति-दर्शन‘‘ को प्रचारित करने के लिए ड्यूमोंट को विशेष रूप से दोषी ठहराते हैं। उनके अनुसार, इस तरह का ‘जाति मॉडल‘ विचारों और मूल्यों के अध्ययन में भौतिक हितों का कोई विश्लेषण नहीं देता। दोनों के बीच एक द्वंद्वात्मक संबंध है। मगर ड्यूमोंट और पोकॉक की ‘दोहरस विरोध‘ की धारणा ‘द्वंद्वात्मकता‘ की उस धारणा से कोई मेल नहीं खाती जो मार्क्स ने दी थी। बेटीली यह भी कहते हैं कि आर्थिक और राजनीतिक द्वंद्व तो होते हैं मगर वे निश्चित सीमा तक अपनी स्वतंत्रता लिए रहते हैं। इसलिए इनका अध्ययन जाति और धार्मिक विश्वासों और विचारों से स्वतंत्र रहकर किया जा सकता है। जाति मॉडल में इस तरह के वैकल्पिक समझ का कोई मार्ग नहीं है।

एडमंड लीच का सहयोग को जाति और स्पर्धा को वर्ग कहना भी बचकाना और अविश्वसनीय है। प्रभावी जातियों के परिवारों में अपने आधिपत्य को बनाए रखने के लिए निम्न जातियों के संरक्षण देने की आपस में न सिर्फ होड़ रहती है बल्कि निम्न जातियां भी इन परिवारों का कृपापात्र बनने की होड़ में लगी. रहती हैं। इस तरह की स्पर्धा कोई नई बात नहीं है। प्राचीन और मध्ययुगीन भारत में क्षत्रियों और ब्राह्मणों में अपने-अपने क्षेत्राधिकार के विरोधी दावों के कारण युद्ध भी होते थे। लीच का यह मत, कि जाति सिर्फ एक श्जातिश् थी और ‘वर्ग‘ जैसी स्थिति तभी उभरी जब संरक्षक लोग परस्पर होड़ करने लगे, इस ऐतिहासिक वास्तविकता को नजरअंदाज कर देता है कि समाज में अंतरजातीय संघर्ष और ऊंची जातियों के विरुद्ध निम्न जातियों के विद्रोह होते रहे हैं।

वर्ग की व्याख्या
वर्ग और वर्ग द्वंद्व की मार्क्सवादी धारणाओं की छाप हमें भारतीय कृषि और शहरी औद्योगिक ढांचों के अध्ययनों में मिलती है। मार्क्स (1951) ने भारत पर लिखे दो लेखों में जाति और ग्रामीण समुदाय के पारंपरिक लोकाचार का विवेचन किया था। शरू में मार्क्स (1947) का मानना था कि एशियाई उत्पादन विधि में भमि के रूप में निजी संपत्ति नहीं है और जाति. कषि और ग्रामीण हस्तशिल्पों में एक खास गठबंधन के कारण अर्थव्यवस्था जड़ है मगर सी.टी. कूरियन का मानना है कि एशियाई विधि का विश्लेषण वर्गीय अंतर्विरोधों और वर्गीय ढांचों की भूमिका को नकारता नहीं है। भारत की पूर्व-पूंजीवादी आर्थिक संरचना जाति और वर्ग पर आधारित थी जो पास-पास थे।

वर्ग पर चर्चा करने के लिए दो प्रश्न यहां प्रासंगिक हैंः (1) भारतीय समाज में वर्गीय संरचना के विश्लेषण के लिए हम कौन सी विधि प्रयोग कर सकते हैं? और (2) वर्ग-जाति गठजोड़ क्या है, प्रत्येक क्षेत्र में इसके फलितार्थ और अंतर्संबंध क्या हैं? इन प्रश्नों पर चर्चा करने के पीछे हमारा आशय मार्क्सवादी नजरिए को स्वीकारना या नकारना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि यह हमें क्या उपयोगी अंतदृष्टि प्रदान कर सकता है।

भारत में कृषि पर निर्भर जनसंख्या की वर्गीय संरचना का विश्लेषण करते हुए अशोक रुद्र कहते हैं कि भारती कृषि में सिर्फ दो वर्ग हैं-बड़े जमींदार और खेतीहर मजदूर । इन दोनों वर्गों में वैमनष्यपूर्ण संबंध हैं और भारतीय ग्रामीण समाज का यही सबसे प्रमुख अंतर्विरोध है। ए.आर. देसाई की भी यही धारणा है।

बॉक्स 3.03
रुद्र जोरदार ढंग से तर्क देते हैं कि भारतीय कृषि में पूंजीवादी संबंध और पूंजीवादी विकास है। इसलिए इसमें दो वर्ग हैं- संपन्न और निर्धन । भारत में राज्य ने अपने विकास की रणनीति के रूप में पूंजीवादी समाज के नियम अपना लिए हैं। इस सिद्धांत का एक निहितार्थ यह है कि जो संदर्भ आधार अभी तक पूरे विश्व के लिए लागू होता था वह अब भारतीय समाज के लिए भी लागू होगा। इसका दूसरा निष्कर्ष यह है कि भारतीय समाज के विश्लेषण के लिए सबसे प्रभावी कारक सभी स्थितियों और संदर्भो में आर्थिक है।

वी.एम. दांडेकर कहते हैं कि भारत में वेतनभोगियों द्वारा हड़ताल सामान्य बात है। इनमें दो सौ रुपये से लेकर कई हजार का वेतन पाने वाले श्रमिक शामिल हैं। इसलिए वेतन-भोगी मजदूरों को एक विषामांगी श्रेणी के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस तरह भारत की कुल श्रमशक्ति का तीन-चैथाई हिस्सा मार्क्सवाद की कसौटी से बाहर छूट जाता है। एक कल्याणकारी राज्य होने के कारण भारतीय राज्य आज सबसे बड़ा नियोक्ता, सबसे बड़ा रोजगार देने वाला है। क्या भारतीय राज्य किसी उद्योगपति या मजदूरों के नियोक्ता की तरह एक पूंजीवादी, शोषक और दमनकारी ऐजेंसी है? लगभग एक करोड़ कामगार छोटे उद्योगों और पारिवारिक-स्वामित्व वाले उद्यमों में कार्यरत हैं । इन उद्योगों का सामना वर्ग-वैमनष्य और हड़तालों से कभी नहीं होता। संगठित श्रमिकों की संख्या कुल श्रमशक्ति का मात्र नौवां भाग भर है। ऐसी स्थिति में क्या हम मार्क्सवादी नजरिए को स्वीकार कर सकते हैं? वर्ग, जाति और व्यवसाय का अतिव्यापन, अभिजात वर्ग के द्वंद्व, पैरोकार समूह और गुट, मध्यम वर्गों का प्रभाव और “मिश्र वर्गों‘‘ और ‘भद्र किसानों की उपस्थिति, इन सब कारकों को भारत के वर्गीय ढांचे के गंभीर विश्लेषण के लिए ध्यान में रखा जाना चाहिए। जजमानी प्रथा की व्याख्या भी हम वर्ग संबंधों और उत्पादन विधि के परिप्रेक्ष्य में दे सकते हैं। आइए, अब हम जाति क्रम परंपरा और व्यवसाय पर नजर डालते हैं।

जाति-क्रम-परंपरा और वर्ग-संघर्ष
भारत में कई वर्षों से दलितों पर आक्रमण किए जा रहे हैं, उनकी हत्या की जा रही है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है और उन्हें तरह-तरह के अत्याचारों और अपमान का निशाना बनाया जा रहा है। अरुण सिन्हा कहते हैं कि यह अत्याचार छिट-पुट घटनाएं नहीं बल्कि हरिजनों के विरुद्ध छेड़ा गया ‘वर्ग युद्ध‘ है। इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित एक लेख में सिन्हा कहते हैं, “बिहार के गांवों में धनाढ्य कृषक वर्ग के उदय ने चमार, दुसाध, कुर्मी, यादव, भूमिहार इत्यादि सभी जातियों के खेतिहार मजदूरों को अपने जातिगत संगठनों को त्यागकर मजदूर संघों की तरह लड़ने के लिए विवश कर दिया है।‘‘ इसे वर्ग संघर्ष‘ कहा जाना चाहिए, जिसमें जातिगत मतभेदों को भुला दिया गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि हरिजन या चमार खेतिहार मजदूर को भूमिहार या ब्राह्मण मजदूर के समकक्ष सिर्फ इसलिए खड़ा नहीं किया जा सकता है कि दोनों का स्थान वर्गीय ढांचे में एक ही है।

स्वतंत्र भारत की वास्तविक स्थिति यह है कि पिछड़ी जातियों का धनाढ्य कृषक वर्ग आज वर्ग क्रम परंपरा के शीर्ष पर काबिज है। यह वही वर्ग है जो सवर्ण जातियों के सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रहा है।

बोध प्रश्न 2
1) वर्ग को सामाजिक परिघटना के रूप में पांच पंक्तियों में स्पष्ट कीजिए।
2) जाति क्रम परंपरा और वर्ग संघर्ष के बारे में पांच पंक्तियां लिखिए।

गौर तलब है कि जनता पार्टी के शासन में बिहार में वर्चस्व के ढांचे में एक परिवर्तन आया जिससे राज्य की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के दूरगामी परिणाम निकले। इस दौरान ब्राह्मणों का वर्चस्व काफी हद तकं कम हुआ।

 

 बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 2
1) भारत की कृषि और शहरी औद्योगिक संरचनाओं के अध्ययन के लिए मार्क्सवादी धारणा को बडे पैमाने पर प्रयोग किया गया है। यह कहा गया है कि भारत की पूर्व-पूंजीवादी संरचना जाति और वर्ग दोनों पर आधारित है। रुद्र और दांडेकर सहित विभिन्न लेखकों ने कृषि के अपने विश्लेषणों में वर्ग को प्रयोग किया है।
2) ऐसा पाया गया है कि जाति क्रम परंपरा के निचले स्तर के लोगों पर बड़े ही व्यवस्थित ढंग से हमला किया गया है। सिन्हा को यह वर्ग युद्धश् लगता है न कि संयोग से होने वाले अत्याचार । स्वतंत्र भारत में वास्तविक स्थिति यह है कि पिछड़ी जातियों के धनाढ्य कृषकों का एक वर्ग ग्रामीण वर्ग क्रम परंपरा के शीर्ष पर आ पहुंचा है। यही वर्ग ऊंची जातियों के सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है। जिसमें उसे कछ सफलता भी हासिल हुई है।

Sbistudy

Recent Posts

Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic

Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…

2 weeks ago

Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)

Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…

2 weeks ago

Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise

Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…

2 weeks ago

Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th

Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…

2 weeks ago

विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features

continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…

2 weeks ago

भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC

भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…

2 weeks ago
All Rights ReservedView Non-AMP Version
X

Headline

You can control the ways in which we improve and personalize your experience. Please choose whether you wish to allow the following:

Privacy Settings
JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now