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Categories: sociology

कर्मकांड किसे कहते हैं | कर्मकाण्ड की परिभाषा क्या है कर्मकाण्डी तत्व अर्थ मतलब ritual in hindi meaning

ritual in hindi meaning definition कर्मकांड किसे कहते हैं | कर्मकाण्ड की परिभाषा क्या है कर्मकाण्डी तत्व अर्थ मतलब ?

कर्मकांड : वह संस्कार , कार्य या प्रक्रिया जिसमें व्यक्ति प्रतिदिन समान तरीके से उस कार्य को संपन्न करता है | उस संस्कार को ही कर्मकाण्ड कहते है |

कर्मकाण्डी तत्व (Ritual Elements)
बिरहोर कर्मकाण्डों का गठन विभिन्न अवयवों अथवा तत्वों द्वारा हुआ है जो कि एक दूसरे के साथ अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। संक्षेप में, ये निम्न प्रकार के हैं:

क) प्रयोजन (Purpose): बुरी आत्मा से सुरक्षा, स्वास्थ्य, प्रजनन एवं भोजन में भाग्य का साथ, शिकार में सुनिश्चित सफलता, परिवार की भलाई के लिए, आत्मा की किसी शरारत से बचना, किसी दुश्मन की मृत्यु तथा बीमारी का कारण, टाण्डा की सुरक्षा, आत्मा के चिकित्सक का प्रशिक्षण, तूफान एवं बिजली गिरने से रोकथाम, वर्षा की कामना, खोए हुए किसी कुत्ते को खोज निकालने, मक्खियों व मच्छरों को दूर भगाने, अपने प्रिय व्यक्ति को आकर्षित करने, पौधों के जीवन को नियंत्रित करने, जन्म एवं मृत्यु के प्रदूषण से शुद्धि, मृत आत्माओं की शांति, तथा जीवन-चक्र तथा आवर्ती त्योहारों से जुड़े संस्कार।
ख) कर्मकाण्ड कराने वाला (Performer): नाया पुजारी, कोटवार अथवा डिम्बार यानि कर्मकाण्ड सहायक, भती यानि दैवीय शक्ति वाला व्यक्ति, कबीले का सरदार तथा महिला।
ग) तैयारी (Preparation): स्नान करना, सिर तथा अंगों में तेल की मालिश, उपवास करना, नमक न खाना, कर्मकाण्ड के स्थल की मिट्टी, गोबर तथा पानी से सफाई करना तथा आग द्वारा शुद्धिकरण करना इत्यादि ।
घ) निष्पादन एवं प्रक्रिया (Performance and Process)
1) कर्मकाण्ड का समय: जनवरी-फरवरी, जुलाई, सितम्बर-अक्तूबर-नवम्बर, शुक्रवार, सोमवार, सुबह, दोपहर, शाम जैसे समय।
2) कर्मकाण्ड का स्थान: ऊँची भूमि, पहाड़ी, जंगल, खेत, परिवार की झोंपड़ी, आत्मा का निवास, चैकोर स्थान, पूर्व की दिशा में मुँह करके।
3) कर्मकाण्ड की सामग्री: चट्टान अथवा पत्थर, बाँस अथवा लकड़ी के प्याले, मिट्टी की लुगदी, दोना, फूल, पेड़ की छालें, आत्मा का डिब्बा, जिसमें एक छोटी डिब्बी में थोड़ा सिंदूर तथा एक बाँस की नली में थोड़ा अरुआ चावल सम्मिलित होते हैं, आत्मा का जाल, भूसा कूटने की मूसली, तीर के फल, लोहे की लड़ियां अथवा जंजीरें, टोटम वाली वस्तुएं, जैसे – चावल की लेल, बौंगा सौरी (एक प्रकार की जंगली घास) इत्यादि।
4) चढ़ावे की चीजें: अरुआ चावल, खून से रंगा चावल, नमक, हल्दी, मिर्च, सिंदूर, पानी, शहद, चावल का मांड, शराब, बलि की मुर्गी, बकरी, सूअर अथवा भैंस का खून, हिरन के बाल अथवा खाल, बंदर का भुना गोश्त इत्यादि।
5) बलि: कूटम एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें सूअरों की बलि उनकी गर्दन पर किसी कुल्हाड़ी द्वारा प्रहार करके की जाती है तथा जबाई प्रक्रिया (जिसमें किसी हथियार से ढाई प्रहार किए जाते हैं) जोकि मुसलमानों में प्रचलित तरीके जैसा है, मुर्गी का सिर चाकू से काटकर अलग कर दिया जाता है और मुर्गी की बलि जहाँ गर्दन मरोड़ते हुए दी जाती है, उसे निगच्चा ढंग की बलि कहा जाता है।
6) रंग: सफेद मुर्गी, चितकबरी (लाल तथा सफेद धब्बों वाली) मुर्गी, सफेद बकरी, लाल बकरी, काली बकरी।
7) कर्मकाण्डी चित्रकला: फर्श पर चावल के आटे से एक आकृति टाकचनरी विवाह समारोह जो कि जमीन पर काले कोयले के चूरे, लाल मिट्टी तथा सफेद चावल के आटे के साथ बाना-साना संस्कार के लिए बनाया जाता है, जिसमें काला रंग संतप्त आत्मा, लाल रंग नागायेरा-बिन्दीचेरा तथा सफेद रंग बानु-बौण्डा के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं।
8) आत्मा को खोजने की विधि: खारी-होरा प्रक्रिया जिसमें मती एक कुल्हाड़ी के बट की नीचे की तरफ रखते हुए उसे सीधा खड़ा करके अपने एक हाथ से पकड़ कर नीचे बैठ जाता है, और अपने सामने एक पत्ते पर रखे चावल के दानों को अपने चारों तरफ छिड़कते हुए शुरुआत करता है, तथा विभिन्न आत्माओं का बुदबुदाते हुए आह्वान करता है और गाना-गाने वाले सुर में उनसे सवाल-जवाब करता है, आत्माओं को खोजने की डब-होरा प्रक्रिया के अंतर्गत मति एक टोकरी में कुछ चावल लेकर अपने हाथ से उन्हें टोकरी में रगड़ते हुए अपने आहवान को तब तक बुदबुदाता है, जब तक कि वह भूत उसे अपनी गिरफ्त में नहीं ले लेता, जो कि समस्या के लिए जिम्मेवार है।

9) आवाज: वर्षा कराने हेतु किए जाने वाले समारोह के लिए लोग पास की पहाड़ी पर चढ़ जाते हैं और सभी आकारों के पत्थरों को नीचे लुड़काने लगते हैं जिससे गूंज भरा शोर होने लगता है जो कि साथ ही साथ उनकी झोपड़ियों की छत पर गिरने वाली बारिश की नकल करते हए धीमी गति, तेज तथा निरंतरता वाली आवाजें निकालते हुए एक ढोल बजाये जाने के चलते और भी बढ़ जाता है। जनजाति के ईश्वर अथवा यम आत्मा का आह्वान “कोक-रो-चो” की आवाज निकालते हुए मुर्गे की बाँघ की नकल करते हुए किया जाता है: जिसमें ऊँची आवाज में रुदन की चीखों से मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों की गूंज हवा में चारों ओर सुनाई पड़ती है।

बोध प्रश्न 1
पप) कर्मकाण्डी तत्व कौन-कौन से हैं ? उनमें से किसी एक की लगभग आठ पंक्तियों में व्याख्या कीजिए।

बोध प्रश्न 1 उत्तर

पप) कर्मकाण्डी तत्व तथा अवयव बिरहोर कर्मकाण्डी ढाँचे का अभिन्न हिस्सा हैं। वे सभी परस्पर संबद्ध हैं। उदाहरण के लिए किसी कर्मकाण्ड को करने का मकसद कर्मकाण्ड करने वाले से जुड़ा होता है साथ ही कर्मकाण्ड की तैयारी तथा कर्मकाण्ड की प्रक्रिया आदि से संबंधित होता है। कर्मकाण्ड का मकसद बुराई से रक्षा, स्वास्थ्य में भाग्यशाली, शिकार में सफलता आदि हो सकता है।

उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बाद, आपः
ऽ जनजातीय कर्मकाण्डी जटिलता के मूल अवयवों को पहचान सकेंगे,
ऽ मनुष्य को एक कर्मकाण्डी जीव मानने वाली जनजातीय अवधारणा को समझ सकेंगे,
ऽ व्याख्या रहित जनजातीय धर्म के धर्मशास्त्रीय रूझान को व्यक्त कर सकेंगे,
ऽ ईसाई धर्म की चुनौती का सामना करने के जनजातीय तरीके पर चर्चा कर सकेंगे,
ऽ सांस्कृतिक प्रसारण के मौखिक एवं लिखित साधनों के माध्यम से बदलाव की प्रक्रिया का मूल्यांकन कर सकेंगे,
ऽ परस्पर विरोधी ब्रह्माण्ड-मीमांसाओं के धर्मान्तरित व्यक्तियों के जीवन पर पड़े प्रभावों को दर्शा सकेंगे, और
ऽ बदलते जनजातीय धर्म में निरंतरता के लक्षणों का वर्णन कर सकेंगे।

प्रस्तावना
पिछली इकाई (इकाई 17) में आपने भारत में धार्मिक बहुलवाद के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया था। आपने समूचे देश में धार्मिक समुदायों के भौगोलिक वितरण के बारे में पढ़ा। आपने उनके जनसांख्यिकीय पहलुओं तथा फिर विभिन्न धर्मों की मूल्य प्रणालियों की सामाजिक तथा सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक बुनियादों के बारे में जानकारी प्राप्त की। भारत में जनजातियां कुल आबादी का करीब 7 प्रतिशत हिस्सा हैं (1981 की जनगणना)। इस इकाई में हम दो केस-अध्ययनों की सहायता से भारत में जनजातीय धर्मों की प्रकृति एवं विकास का वर्णन करने जा रहे हैं। ये दो विषय बिहार के बिरहोर तथा मेघालय के खासी जनजातियां के बारे में हैं। इस इकाई में हम जनजातीय धर्म के दो केसों की परीक्षा उसकी विशिष्ट विशेषताओं पर और अधिक प्रकाश डालने के लिए करेंगे।

जैसा कि आप जानते हैं, जनजातीय धर्म मौखिक परंपराओं पर आधारित है। जनजातीय लोग अपने विश्वासों को रोजमर्रा की भाषा में अभिव्यक्त करते हैं। उनके कर्मकाण्ड दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। पूजा के लिए पेड़, नदियां, पहाड़, सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी जैसी प्राकृतिक चीजें होती हैं। चढ़ावा प्रायः भोजन व पेय पदार्थों, पालतू पक्षियों व जानवरों, आदि के रूप में होता है। कर्मकाण्ड आमतौर पर सामूहिक तौर पर किए जाते हैं और मौखिक तौर पर उच्चरित किए जाते हैं। कर्मकाण्ड शब्द से, जिसका प्रयोग अक्सर अनुष्ठान, समारोह अथवा रूढ़ि के स्थान पर किया जाता रहा है, यह तात्पर्य लगाया जा सकता है कि यह कोई गैर-नैसर्गिक व्यवहार है जो कि दोहराए जाने वाला, सांकेतिक एवं अर्थपूर्ण है। इसके अर्थ किसी ऐसे औपचारिक कृत्य से हैं, जो किसी निर्धारित मानदंडों का पालन करते हुए किया जाता है, जो एक सार्वजनिक अथवा साझा अर्थ रखने वाले किसी प्रतीक के जरिये अभिव्यक्त होता है। ये प्रतीक पवित्र मूल्यों अथवा सांसारिक गतिविधियों से पृथक करके रखे गए हों। पवित्र वह है जो कि साधारण, सांसारिक जीवन की उन गतिविधियों से श्रेष्ठ है, जो कि अपवित्र की श्रेणी में नहीं हैं। आदिवासी विश्व दृष्टि प्राकृतिक घटनाओं तथा जीवन के अनुभवों में रची-बसी है। उनकी ब्रह्माण्ड-मीमांसा सामाजिक तौर पर प्रभावी है अर्थात अस्तित्ववादी परन्तु गैर-व्याख्यामूलक है। यह खासतौर पर इसलिए व्याख्यात्मक नहीं है, क्योंकि आदिवासी स्वयं तत्व-मीमांसा की उत्सुकता नहीं रखते, अर्थात वे अपने अस्तित्व के कारणों के बारे में जानने की उत्सुकता अथवा तत्व मीमांसा का अस्तित्व क्यों और कैसे है, आदि नहीं रखते। किन्तु धर्म की जटिल अवस्थाओं के संपर्क में आने के बाद, अब वे व्याख्यात्मक संरचना को अपना रहे हैं।

यह इकाई आपको दोनों ही स्थितियों से अवगत कराएगी अर्थात प) जनजातीय धर्म की एक सरलता की अवस्था में होना, तथा पप) जनजातीय धर्म का धर्मशास्त्रीय जटिलताएं हल करने की अवस्था में होना । अनुभाग 18.2 जनजातीय धर्मों की व्याख्या उनकी मूल अवस्था में करता है। इसके लिए आइए, हम बिहार के बिरहोरों का उदाहरण लें। धर्मशास्त्रीय जटिलताएं प्राप्त करते जनजातीय धर्म का वर्णन करने की दृष्टि से हमने आगे के अनुभाग 18.3 में मेघालय के खासियों का उदाहरण प्रस्तुत किया है। अनुभाग 18.4 इन दोनों जनजातियों की पार-सांस्कृतिक तुलना प्रस्तुत करती है तथा अंत में अनुभाग 18.5 में इकाई का सारांश प्रस्तुत किया गया है।

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