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Quantum Statistics in hindi क्वांटम सांख्यिकी क्या है , का आविष्कार सूत्र किसे कहते हैं परिभाषा
जानिये Quantum Statistics in hindi क्वांटम सांख्यिकी क्या है , का आविष्कार सूत्र किसे कहते हैं परिभाषा ?
क्वान्टम सांख्यिकी (Quantum Statistics)
प्रस्तावना (Introduction)
पिछले अध्याय में हम चिरसम्मत सांख्यिकी अर्थात् मैक्सवैल-बोल्ट्जमान सांख्यिकी का विस्तृत विवेचन कर चुके हैं। जब चिरसम्मत सांख्यिकी का अनुप्रयोग सामान्यतः प्रेक्षित घटनाओं, जैसे ताप, दाब व ऊर्जा आदि की व्याख्या के लिए किया गया तो यह उन्हें स्पष्टतः समझाने में समक्ष रही परन्तु कई अन्य प्रायोगिक रूप में प्रेक्षित परिघटनाओं जैसे कृष्णिका विकिरण का वितरण, निम्न तापों पर ठोसों की विशिष्ट ऊष्मा इत्यादि के स्पष्टीकरण में असफल रही। फोटोन (जो कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण से संबंधित क्वान्टम है) की ऊर्जा उसकी आवृत्ति की समानुपाती होती है, अतः सांख्यिकीय विश्लेषण जिसके फलस्वरूप ऊर्जा बंटन प्राप्त होता है वह फोटोन गैस की आवृत्ति (अथवा तरंगदैर्घ्य) में भी बंटन प्रदान करता है। मैक्सवेल – बोल्ट्जमान सांख्यिकी से प्राप्त परिणाम आवृत्ति में वृद्धि के साथ-साथ आवृत्ति की एकांक परास में फोटोनों की संख्या की सतत रूप से वृद्धि की प्रागुक्ति करता है, जबकि प्रतिष्ठित प्लांक के नियम के अनुसार, वास्तविक बंटन एक उच्चिष्ठ प्रदर्शित करता है और उच्चिष्ठ के दोनों ओर यह शून्य तक उपगामित: ह्रासित होता है।
ये सभी कठिनाइयाँ क्वान्टम यांत्रिकी से सुलझाई जा सकती हैं। नए और पुराने सिद्धान्तों में सारभूत अन्तर सृक्ष्म-अवस्था को परिभाषित करने और किसी विशिष्ट स्थूल अवस्था के संगत सूक्ष्म अवस्थाओं की संख्या की गणना करने की विधि में है। वास्तव में क्वान्टम सांख्यिकी में मैक्सवेल – बोल्ट्जमान साख्यिकी एक सीमान्त अवस्था के रूप में सन्निहित है, कला निर्देशाकाश में जब कला बिन्दुओं का घनत्व अत्यल्प होता है, तब यह दूसरे में परिवर्तित हो जाती हैं।
कृष्णिका विकिरण (Black Body Radiation)
कृष्णिका से उत्सर्जित विकिरण का विक्षेपण (dispersion) करने पर अविरत स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है। स्पेक्ट्रम के विभिन्न भागों में विकिरण तीव्रता अलग-अलग पाई जाती है। यदि विकिरण तीव्रता और स्पेक्ट्रम के उस भाग की तरंगदैर्घ्य में एक सम्बन्ध स्थापित किया जाय तो प्राप्त वितरण नियम को कृष्णिका का ऊर्जा वितरण नियम (law of distribution of energy or black-body radiation) कहते हैं। कृष्णिका के लिए भिन्न-भिन्न परम तापों पर उत्सर्जित विकिरणों का स्पेक्ट्रमी ऊर्जा वितरण का प्रारूप चित्र में दिखाया गया है। इन वक्रों के अध्ययन से निम्न परिणाम प्राप्त होते हैं-
(i) किसी दिये हुए ताप ( माना 1449 K ) पर तरंगदैर्घ्य के बढ़ने से E का मान पहले बढ़ता है तथा एक उच्चतम मान प्राप्त करता है और फिर घटता जाता है। इससे स्पष्ट है कि एक दिये ताप पर कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित विकिरण की मात्रा एक नियत तरंगदैर्घ्य λm पर अधिकतम होती है।
(ii) ताप के बढ़ने पर प्रत्येक तरंगदैर्घ्य के लिए विकिरण ऊर्जा का मान बढ़ जाता है।
(iii) अधिकतम विकिरण ऊर्जा के लिए तरंगदैर्घ्य λm विकिरण के परमताप T के व्युत्क्रमानुपाती होती है, अर्थात् λm और T का गुणनफल नियतांक होता है। λm T= b (नियतांक) अतः जैसे-जैसे वस्तु का ताप बढ़ता है अधिकतम विकिरण ऊर्जा की तरंगदैर्घ्य कम होती जाती है। इस नियम को वीन का विस्थापन नियम (Wein’s displacement law) कहते हैं। नियतांक b का मान लगभग 0.293 सेमी-केल्विन होता है। (iv) चिरसम्मत ऊष्मागतिकी (classical thermodynamics) के आधार पर वीन ने दर्शाया कि λ व λ + dλ तरंगदैयों के मध्य कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित विकिरणों की ऊर्जा, वीन के विकिरण नियम (Wein’s radiation law) द्वारा दी जाती है-
यह नियम केवल लघु तरंगदैर्घ्य वाले विकिरणों के लिए लागू होता है।
(v) दीर्घ तरंगदैर्घ्यं वाली तरंगों के लिए रैले – जीन्स ( Rayleigh and Jeans) ने निम्न नियम प्रतिपादित किया :
चिरसम्मत सांख्यिकी की असफलताएँ (Failure of Classical Statistics)
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि वीन का नियम लघु तरंगदैयों के लिए उपयुक्त है। उच्च ताप व दीर्घ तरंगदैर्घ्यं के लिए वीन का नियम प्रायोगिक वक्रों (चित्र 7.2-1) को समझाने में असफल रहा। इसी प्रकार रैले जीन्स का नियम प्रायोगिक वक्रों को दीर्घ तरंगदैयों के विकिरणों पर वितरण को स्पष्ट करने में सफल है परन्तु लघु तरंगदैर्घ्य क्षेत्र में यह नियम पूर्णतः असफल सिद्ध हुआ । यह असफलता चिरसम्मत – भौतिकी ( classical physics) की पराबैंगनी विपदा (The ultraviolet catastrophe) कहलाती है। इससे यह सिद्ध हो गया कि चिरसम्मत भौतिकी की मूल अवधारणाओं में त्रुटि है और उनका निराकरण आवश्यक है ।
रैले-जीन्स व वीन विकिरण नियम के दोषपूर्ण होने के कारण इनको पूर्ण तरंगदैर्घ्य परास के लिए प्रयुक्त करना संभव नहीं था। मैक्स प्लांक (Max Planck) ने उपर्युक्त दोनों नियमों के गणितीय विश्लेषण का अध्ययन कर यह जानने का प्रयत्न किया कि उनमें प्रयुक्त सांख्यिकी में किस प्रकार के परिवर्तन किये जायें कि पूरे प्रायोगिक वक्र का स्पष्टीकरण किया जा सके। इसके फलस्वरूप प्लांक ने विद्युत-चुम्बकीय दोलित्र की प्रकृति के बारे में कुछ नये विचार प्रस्तुत किये, जिससे नई सांख्यिकी जिसे क्वान्टम सांख्यिकी कहते हैं, का उदय हुआ ।
प्लांक के शब्दों में- “Considering the distribution of energy U among N oscillators of frequency v, if U is viewed as divisible without limit, then an infinite number of distributions are possible. We consider however and this is essential point of the whole calculation-U as made of an entirely determined number of finite equal parts and we make use of the natural constant h = 6.55 x 10^-27 erg sec. This constant when mulitplied by the common frequency v of the oscillators gives the element of energy in ergs.”
आवृत्ति v के N दोलित्रों में ऊर्जा U कि वितरण पर विचार करते हुए यदि हम U को बिना किसी सीमा के विभाज्य मानें तो अनंत संख्या में वितरण संभव होंगे। हम मानते हैं- और यह पूर्ण परिकलन का मुख्य बिन्दु है – कि U में पूर्णत: 6.55 × 10-27 अर्ग-से. निर्धारित संख्या में परिमित समान भाग होते हैं और हम इसके लिए प्राकृतिक नियतांक h का उपयोग करते हैं। इस नियतांक को जब दोलित्रों की सर्वनिष्ठ आवृत्ति v से गुणा किया जाता है तो इससे ऊर्जा अल्पांश ∈ का मान अर्ग में प्राप्त होता है।
चिरसम्मत यांत्रिकी में किसी कण की स्थिति व संवेग इच्छित यथार्थता के साथ निर्धारित किये जा सकते हैं और कला निर्देशाकाश में अवस्था का निरूपण एक बिन्दु से किया जा सकता है। क्वान्टम यांत्रिकी के अनुसार स्थिति व संवेग के एक साथ यथार्थ निर्धारण की एक सीमा होती है, जिसे हाइजनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धान्त द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
से
किसी भी साख्यिकी में निकाय के प्रेक्षण योग्य गुणों का ज्ञान निकाय की स्थूल अवस्थाओं अर्थात् संख्या N प्राप्त होता है तथा किसी स्थूल अवस्था की प्रायिकता W उसके संगत सूक्ष्म अवस्थाओं की संख्या से परिभाषित होती है। चिरसम्मत सांख्यिकी में कणों को विभेद्य (distinguishable) माना जाता है अर्थात् कला आकाश में यदि कणों a ब b परस्पर स्थान बदलते हैं तो सूक्ष्म अवस्था भिन्न मानी जाती है। क्वान्टम सांख्यिकी के अनुसार विभिन्न कणों की पहचान अर्थहीन है और उनको विभेद्य मानकर सूक्ष्म अवस्थाओं की गणना त्रुटिपूर्ण है।
7.4 क्वान्टम सांख्यिकी के अभिग्रहीत (Postulates of Quantum Statistics)
A-तरंग फलन (Wave function ) व संकारक संकल्पना (Operator concept)
प्रकृति में प्राप्त सभी निकाय क्वान्टम यांत्रिकी का पालन करते हैं। निकाय की अवस्था स्थिति व संवेग के व्यापक निर्देशांकों q व p द्वारा निरूपित की जाती है। अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार, q व p का एक साथ यथार्थ मापन संभव नहीं है। निकाय की अवस्था एक तरंग फलन, जिसे अवस्था फलन (state function) भी कहते हैं, द्वारा ज्ञात की जाती है। तरंगफलन 𝚿(q,t) में निम्न विशेषतायें होती हैं :-
(a) 𝚿(q, t) वास्तविक होना आवश्यक नहीं है यह सम्मिश्र (complex) भी हो सकता है।
(b) यह q वt का सतत् एकमानी व परमित फलन होता है।
(c) 𝚿𝚿* या |𝚿|^2 तरंग फलन 𝚿 द्वारा निरूपित अवस्था में निकाय की प्रायिकता (probability) होती है। प्रसामान्यीकृत (normalised) अवस्था फलन के लिए
∫ 𝚿𝚿* dτ = 1 जहाँ dτ आयतन अल्पांश है व समाकलन पूर्ण आकाश के लिये है। इस प्रकार फलन 𝚿 (x) द्वारा निरूपित कण की अवस्था में बिन्दु x पर अंतराल dx में स्थित होने की प्रायिकता |𝚿(x)|^2dx होगी । (ii) निकाय की प्रत्येक प्रेक्षणीय राशि (observable quantity) से एक संकारक (operator) सम्बद्ध किया जा सकता है। संकारक एक ऐसी युक्ति या नियम है जिसके द्वारा एक फलन से दूसरा फलन प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरणस्वरूप संकारक d/dt जब फलन f = sin t पर प्रयुक्त होता है तो फलन f = cost प्राप्त होता है। क्वान्टम यांत्रिकी में प्रयुक्त संकारक हर्मिटी संकारक (Hermitian Operator) होते हैं। यदि 𝚿1 ਕ 𝚿2 कोई ऐसे स्वेच्छ अवस्था फलन हैं जो स्वीकार्य तरंग फलन के आवश्यक गुण रखते हैं तो संकारक A हर्मिटी होने के लिए
प्रत्येक गतिकीय चर (dynamical variable) A = f (q, p) के लिए संकारक A होता है तथा गतिकीय चर A के अवस्था 𝚿 में प्रत्याशित मान ( expectation value) को <A> से निरुपित करते है और इसका मान होता है
(iii) जब भी किसी भौतिक राशि A का मापन किया जाता है तो केवल वे मान प्राप्त होते हैं जो कि क्वान्टम संकारक A के लिए उपयुक्त मान (proper values) होते हैं, गणितीय रूप में यदि
AΦ = аф …..(5)
तो a को फलन ф से सम्बद्ध उपयुक्त मान, अभिलाक्षणिक मान या आइगन मान (eigen value) कहते हैं तथा फलन ) ф जो उपर्युक्त समीकरण को संतुष्ट करता है आइगन फलन (eigen function) कहलाता है। दिये गये सीमा प्रतिबन्धों के साथ उपर्युक्त समीकरण को संतुष्ट करने वाले आइगन मान यदि a1 , a2 , …… हैं तथा संगत आइगन फलन ф1 , Φ2,…… हैं तो अवस्था फलन 𝚿 को आइगन फलनों के रैखिक संयोजन (linear combination) के रूप में व्यक्त कर सकते हैं, अर्थात्
जब निकाय की अवस्था तरंगफलन 𝚿 के अनुरूप होती है तो राशि A के मापन से उपयुक्त मान a1 प्राप्त करने की प्रायिकता |Ci|^2 होती है। यदि दो या दो से अधिक रैखिकतः स्वतंत्र आइगन फलन अथवा उनके एकघात संयोजन समान आइगन मान से सम्बद्ध होते हैं तो निकाय अपभ्रष्ट (degenerate) कहलाता है। समान आइगन मान के लिए रैखिकतः स्वतंत्र आइगन फलनों की संख्या अपभ्रष्टता की कोटि ( order of degeneracy) कहलाती है। उदाहरणस्वरूप हाइड्रोजन के स्पेक्ट्रम में प्रत्येक ऊर्जा आइगन मान En के लिए दिगंशीय (azimuthal) क्वान्टम संख्या l के 0 से (n – 1) तक n मान तथा चुम्बकीय क्वान्टम संख्या ml के – l से + l तक (2l + 1) मान तथा चक्रण क्वान्टम संख्या के दो मान संभव है। अतः ऊर्जा स्तर En की अपभ्रष्टता की कोटि है :
p और r के संगत क्वान्टम संकारक प्रयुक्त करने से हैमिल्टनी प्रचालक होता है । )
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