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पैगम्बर किसे कहते हैं | इस्लाम में पैगंबर किसे कहते हैं अथवा क्या होता है Prophets and messengers in Islam in hindi
Prophets and messengers in Islam in hindi पैगम्बर किसे कहते हैं | इस्लाम में पैगंबर किसे कहते हैं अथवा क्या होता है ?
इस्लाम का आगमन (The Advent of Islam)
इस्लाम के आगमन या उदय से पूर्व अरब समाज में अनेक सामाजिक समस्याएं व्याप्त थीं। यह एक कबीलाई समाज था। इसका केन्द्र कोई कबीला या गोत्र समूह होता था। यह पितृसत्तात्मक समाज था जिसमें पुरुषों को तो सभी अधिकार मिले हुए थे। लेकिन स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं दिया गया था और उन्हें उपभोग की वस्तु समझा जाता था। उनकी अदला बदली होती थी और यहाँ तक कि उन्हें मेहमानों के आगे शारीरिक भोग के लिए पेश भी किया जाता था। कुल मिलाकर अरब समाज में ऐसी ही अनेक बुराइयाँ व्याप्त थीं और समाज विघटन के कगार पर पहुँच गया था। समाज के सुधारकों और विद्वानध्ज्ञानी लोगों ने अरब समाज में सुधार लाने के बारे में सोचना शुरू किया। पैगम्बर मुहम्मद भी अरबों की धार्मिक जिंदगी में आई इस गिरावट को लेकर परेशान थे। उन्होंने इन लोगों के सामने जीवन के नये मूल्य रखे और उनके नैतिक जीवन को सही रास्ते पर लाने की कोशिश की। उन्होंने पुराने खून के रिश्ते की अपेक्षा विश्वास के आधार पर लोगों को परस्पर एक करने का प्रयास किया। यह नया समुदाय इस्लामी या मुस्लिम समुदाय था जिसका आधार भाईचारा था । इस्लाम का शाब्दिक अर्थ है ‘‘ईश्वर की इच्छा के आगे पूर्ण समर्पण‘‘ लेकिन इसमें भाग्यवाद का कोई स्थान नहीं है। अपने नैतिक अर्थ में, इस्लाम धार्मिकता के आदर्श की प्राप्ति का प्रयास करने को महत्व देता है। इस्लाम जिस शब्द से लिया गया है उसका अर्थ है “शांति‘‘ । इस तरह सच्चा मुसलमान ईश्वर/परमेश्वर की इच्छा के आगे समर्पित रहता है और उसके आदेशों को मानता है और अपने साथी लोगों के साथ शांति के साथ रहता है।
इस्लाम के सिद्धांत (Tenets of Islam)
इस्लाम स्वयं को पैगम्बर मुहम्मद का चलाया हुआ नया धर्म नहीं बताता, यह तो उन तमाम पूर्व धर्मों की आगे की कड़ी है जिन्हें परमेश्वर ने मूसा और ईसा सहित सभी पैगम्बरों पर प्रकट किया था। इस्लाम के अनुसार निम्नलिखित में विश्वास होना चाहिएः
ऽ ईश्वर
ऽ ईश्वर के फरिश्ते
ऽ ईश्वर की पुस्तक
ऽ ईश्वर के पैगम्बर
ऽ न्याय का दिन या पुनर्जन्म
इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा (Islamic Concept of God)
हर मुसलमान यह विश्वास करता है कि परमेश्वर एक है और अकेला है, वह सर्वशक्तिमान, शाश्वत और सर्वमहान है । सभी उसके प्रति विनीत हैं। सभी को उसमें लीन होकर आनंदित होना चाहिए और उसके प्रति विनयशील होना चाहिए, क्योंकि वे सभी गौण प्राणी हैं जो उसकी कृपा के अभिलाषी हैं और परमेश्वर उन पर अपनी कृपा करता है जो पवित्र हैं और उसके आदेशों को मानते हैं।
ईश्वर के फरिश्ते (The Angels of God)
ईश्वर ने फरिश्तों को बनाया है। सभी मुसलमानों को उन फरिश्तों के अस्तित्व में विश्वास करना चाहिए, लेकिन उन फरिश्तों को पूजना मना है। फरिश्ते तो ईश्वर की रचना हैं और शारीरिक इच्छाओं से मुक्त हैं।
ईश्वर की पुस्तक (The Book of God)
मुसलमान यह विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने विभिन्न युगों में किताबें भेजी हैं जिनमें ईश्वर के दर्शन होते हैं। मुसलमान पवित्र कुरान में विश्वास करते हैं जो पैगम्बर मुहम्मद पर प्रकाश डालती है।
पैगम्बर (The Messengers of God)
जैसे मुसलमान ईश्वर की भेजी किताबों में विश्वास करते हैं, वैसे ही वे उसके संदेशावाहकों या पैगम्बरों में भी विश्वास करते हैं जिन्हें उसने अलग-अलग युगों में मनुष्यों को, अविश्वास (कुफ), मूर्तिपूजा (बुतपरस्ती) और अर्धविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए यहाँ भेजा। पवित्र कुरान ईश्वर के भेजे पैगम्बरों में कोई भेद नहीं करती। लेकिन उसके अनुसार, मुहम्मद साहब ईश्वर के आखिरी पैगम्बर हैं।
न्याय का दिन या पुनर्जन्म (The Day of Judgement or Resurrection)
मुसलमान न्याय के दिन (आखिरत) में भी विश्वास करते हैं। उनका विश्वास है कि मृत लोग कब्रों से उठेंगे (पुनर्जीवित) होंगे। उस दिन सभी को अपने कामों का हिसाब देना होगा। मुसलमान स्वर्ग और नरक (जन्नत और जहन्नुम) में भी विश्वास करते हैं।
मुसलमान के कर्तव्य (The Duty of a Muslim)
इन विश्वासों के अलावा, मुसलमान के कर्तव्य, ये भी हैंः
प) कलमे का पाठ
पप) पांच वक्त की नमाज-सूर्योदय के समय, दोपहर में तीसरे पहर, सूर्यास्त के ठीक बाद और उसके डेढ़ घंटे बाद शुक्रवार को दोपहर के समय विशेष सामूहिक नमाज और प्रवचन सुनना उनके लिए अनिवार्य है।
पपप) जकात अदा करना या धर्मार्थ के रूप में दान देना
पअ) मुस्लिम कैलेंडर के नौवें महीने यानी ‘‘रमजान‘‘ में उपवास (रोजा) रखना
अ) जिनकी हैसियत है उन्हें अपनी जिंदगी में एक बार मक्का में पवित्र काबा की तीर्थ यात्रा (हज) करनी चाहिए।
भक्ति की इन रीतियों का पालन करके मुसलमान अपने मनोभावों और इच्छाओं को अपने वश में कर लेता है, और इस्लाम के नियमों का पालन करके गरिमा, मानव व्यवहार और नैतिकता के चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है।
इस तरह, इस्लाम के अनुसार, एक मुसलमान को उपर्युक्त बातों में विश्वास करना चाहिए और इस प्रकार ईश्वर की इच्छा के आगे समर्पण करने हेतु इन परम्पराओं का पालन करना चाहिए इससे उसे मृत्यु के बाद स्वर्ग (जन्नत) में जगह मिलेगी।
कार्यकलाप 1
अपने किसी मुस्लिम मित्र/सहकर्मी या किसी ऐसे परिचित व्यक्ति द्वारा निभाए जाने वाले मुस्लिम कर्तव्यों को ध्यान में रखकर लगभग दो सौ शब्दों का नोट तैयार कीजिए। यदि संभव हो तो, अध्ययन केन्द्र के अन्य छात्रों के साथ अपने नोट का मिलान करें।
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