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Principle of Equipartition of Energy in hindi ऊर्जा के समविभाजन का सिद्धांत क्या है सूत्र समीकरण बताइए
ऊर्जा के समविभाजन का सिद्धांत क्या है सूत्र समीकरण बताइए Principle of Equipartition of Energy in hindi ?
ऊर्जा के समविभाजन का सिद्धान्त (Principle of Equipartition of Energy)
पिछले अध्याय में ऊर्जा के समं विभाजन सिद्धान्त, एक आदर्श गैस के अणुगति सिद्धान्त के कुछ परिणामों के निष्कर्ष के रूप में, प्रस्तुत किया गया था । यहाँ हम यह प्रदर्शित करते हैं कि किस प्रकार यह सिद्धान्त बोल्ट्जमान सांख्यिकी के परिणामस्वरूप होता है, तथा इसके क्या सीमा बंधन हैं। एक अणु की ऊर्जा, सामान्यतः कला निर्देशाकाश में उस कोष्ठिका के सब निर्देशांकों का फलन होती है, जिसमें अणु का कला बिन्दु स्थित होता है। मान लीजिए कि z कोई स्वेच्छ निर्देशांक ( arbitrary coordinate) है और इस निर्देशांक से सहसम्बद्ध ( associated) εz ऊर्जा है। यदि कला निर्देशाकाश (phase space) में बंटन (distribution), निर्देशांकों के सतत फलन (continuous function) से निरूपित किया जा सकता है, तो निर्देशांक z में वितरण बंटन फलन Z के व्यापक व्यंजक की स्थापना कर, 2 के अतिरिक्त अन्य सब निर्देशांकों पर समाकलन कर प्राप्त किया जा सकता है। परिणाम का निम्न रूप होगा :
अब यदि ऊर्जा εz , z का एक द्विघाती फलन (quadratic function) है, अर्थात् यदि उसका स्वरूप εz=az^2 होता है, जहाँ a एक स्थिरांक है, और यदि z की सीमाएँ 0 से ∞ या – ∞ से ∞ तक हैं, तो
अर्थात्, प्रत्येक निर्देशांक के लिए, जिसके लिए ऊर्जा निर्देशांक के द्विघाती फलन होने के प्रतिबंध की पूर्ति करती है, ताप T पर ऊष्मागतिक संतुलन में प्रति कण माध्य ऊर्जा kT/2 होती है। यह समविभाजन सिद्धान्त का व्यापक कथन है। स्थानान्तरण वेग निर्देशांकों (translational velocity coordinates) Vx› Vy तथा Vz के लिए उपर्युक्त प्रतिबन्धों की पूर्ति होती है, क्योंकि उदाहरण के लिए vx होती है और प्रत्येक की परास . से सम्बद्ध ऊर्जा mvx^2/2 तक होती है। सरल आवर्त दोलित्र के विस्थापन x के लिए भी इस प्रतिबन्ध की पूर्ति होती है, क्योंकि -∞ से ∞ से विस्थापन x से सम्बद्ध स्थितिज ऊर्जा kx2/2 जहाँ k बल स्थिरांक है । गुरुत्वीय क्षेत्र में एक गैस के ऊर्ध्वाधर निर्देशांक 2 के लिए इसकी पूर्ति नहीं होगी, क्योंकि स्थितिज ऊर्जा mgz, z का एक रैखिक फलन है, अतः माध्य गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा KT/2 नहीं होगी। इसी प्रकार क्वान्टित निकायों के लिए भी उपर्युक्त प्रतिबंध की पूर्ति नहीं होगी। इन निकायों के लिए ऊर्जा के विविक्त मान होते हैं व ऊर्जा के निर्देशांकों के सतत फलन के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
द्विपरमाणुक गैस की विशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat of a Diatomic Gas)
पिछले अध्यायों में वर्णित सिद्धान्त से एकपरमाणुक आदर्श गैस के लिए Cv का मान 3R/2 प्राप्त हुआ था। यह ताप बृहत परिसर में एकपरमाणुक गैसों के लिए किये गये प्रयोगों से अच्छी सहमति में है। अब हम एक ऐसे गैस पर विचार करेंगे जिसके अणु बहु-परमाणुक (polyatomic) हैं। यदि अणु की ऊर्जा इसके द्रव्यमान केन्द्र के स्थिति निर्देशांकों और ≥ पर निर्भर नहीं होती, और यदि अणुओं के बीच कोई पारस्परिक स्थितिज ऊर्जा नहीं है तो संवितरण फलन (partition function), V के समानुपाती होगा जैसा कि एकपरमाणुक गैस के लिए होता है और गैस का अवस्था-समीकरण p = nRT/V ही होता है। परन्तु बहु-परमाणुक गैस की विशिष्ट ऊष्माधारिता एकपरमाणुक गैस के लिए ऊष्माधारिता से भिन्न होगी, क्योंकि एक बहुपरमाणुक गैस में स्वयं की एक ” आन्तरिक ऊर्जा” हो सकती है, जो घूर्णन, कंपन और इलेक्ट्रॉनिक उत्तेजन के कारण होती है। जब एक बहु- परमाणुक गैस को ऊष्मा प्रदान की जाती है, तो उसका केवल एक भाग ही औसत स्थानान्तरण गतिज ऊर्जा में वृद्धि के लिए उपलब्ध होता है, शेष आण्विक आन्तरिक ऊर्ज की वृद्धि में चला जाता है। चूँकि ताप T माध्य स्थानान्तरण गतिज ऊर्जा के समानुपाती होता है, अतः एक निश्चित दी हुई ऊष्मा के लिए एक बहु- परमाणुक गैस में ताप वृद्धि एक एकपरमाणुक गैस की अपेक्षा कम होती है और इसके संगत विशिष्ट ऊष्माधारिता अधिक होती है।
अब पहले हम एक द्विपरमाणुक गैस की विशिष्ट ऊष्मा के चिरसम्मत सिद्धान्त ( classical theory) पर विचार करते हैं। द्वि-परमाणुक अणुओं को परिमित दूरी पर दो परमाणुओं (जिन्हें द्रव्यमान बिन्दुओं के रूप में माना जाता है) द्वारा रचित डम्बल आकृति की संरचनाओं (dumbell-like structures) के रूप में चित्रित किया जा सकता है। द्रव्यमान केन्द्र की तीन स्थानान्तरण-स्वतंत्रता की कोटियों में प्रत्येक से सह-सम्बद्ध ऊर्जा KT/2 है, जैसी कि एक एकपरमाणुक गैस के लिए होती है। चूंकि घूर्णन की गतिज ऊर्जा कोणीय वेग के वर्ग के समानुपाती होती है, समविभाजन kT/2 होती है । परन्तु यदि परमाणु द्रव्यमान बिन्दु (point-masses) हैं तो उनको मिलाने वाली रेखा के प्रति घूर्णन का कोई महत्त्व नहीं है (इस रेखा के प्रति जड़त्व आघूर्ण नगण्य होता है) और इस प्रकार परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के लम्ब तल में परस्पर लम्बवत् दो अक्षों के प्रति केवल दो घूर्णन स्वातन्त्र्य – कोटियाँ (degrees of freedom) प्रभावी होती हैं। अन्त में, अणुओं को सरल आवर्ती दोलक मानकर, परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कम्पन से सह सम्बद्ध माध्य ऊर्जा KT होती है kT/2 गतिज ऊर्जा के लिये तथा kT/2 स्थितिज ऊर्जा के लिए)। अत: एक अणु की माध्य ऊर्जा 3kT/2 स्थानान्तरण के लिए, KT घूर्णन के लिए, और KT कम्पन के लिये है। यदि N अणुओं के एक समुच्चय (assembly) की कुल आन्तरिक ऊर्जा U हो तो
उपर्युक्त सिद्धान्त प्रयोग से अच्छी सहमति में नहीं है। चित्र (6.10 -1) हाइड्रोजन के लिए ताप फलन के रूप में Cv/R के प्रायोगिक मानों का एक ग्राफ है । अत्यन्त निम्न तापों पर Cv / R, 3/2 के बराबर होता है जो एक एकपरमाणुक R गैस के लिए मान है। ताप में वृद्धि के साथ-साथ C में वृद्धि होती है और कक्ष ताप के निकट यथेष्ट परास में R का मान लगभग 5/2 होता है, जो घूर्णन अथवा कम्पन की ऊर्जा (परन्तु दोनों नहीं) को स्थानान्तरण-ऊर्जा में जोड़ने पर प्राप्त मान से सैद्धान्तिक रूप से प्राप्त होता है। केवल अत्यधिक उच्च तापों पर Cv / R का मान 7/2 के निकट पहुंचता है, जिसकी उपरोक्त समीकरण प्रागुक्ति करता है।
ताप के साथ Cv के परिवर्तन के लिए आइन्स्टाइन ने 1907 में पहली व्याख्या दी थी, उन्होंने ऊर्जा के क्वान्टीकरण की संकल्पना का उपयोग किया, जिसको कुछ समय पूर्व प्लांक ने एक कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित विकिरण के स्पेक्ट्रम में ऊर्जा के वितरण की व्याख्या करने के लिए प्रस्तुत किया था। क्वान्टम यांत्रिकी के सिद्धान्त एक घूर्णी अथवा कंपमान अणु की ऊर्जा को विविक्त मानों के समुच्चय (set of descrete values) में से किसी एक मान तक सीमित (restrict) रखते हैं। अतः ऊर्जा अणु के उन निर्देशांकों के सतत फलन के रूप में अभिव्यक्त नहीं की जा सकती, जो उसकी अवस्था निर्दिष्ट करते हैं, और संगत कला बिन्दु (phase points) कला निर्देशाकाश (phase space) में अविच्छिन्न रूप से वितरित नहीं होते। अतः उन प्रतिबन्धों की पूर्ति नहीं होती जिनके फलस्वरूप समविभाजन सिद्धान्त प्राप्त होता है और यह सिद्धान्त लागू नहीं होता ।
क्वान्टम यांत्रिकी के अनुसार, एक घूर्णी अणु की ऊर्जा निम्न मानों के समुच्चय में से कोई एक हो सकती है,
उपर्युक्त समीकरणों में, n एक पूर्णांक है अथवा शून्य है, h एक सार्वत्रिक नियतांक है जिसे प्लान्क का नियंतांक कहते हैं और यह 6.62377 × 10^ -34 जूल- सेकण्ड के बराबर होता है, 1 द्रव्यमान केन्द्र के प्रति अणु का जड़त्व-आघूर्ण है, और v कम्पन – आवृत्ति है। उपयुक्त समीकरणों की व्युत्पत्ति क्वान्टम यांत्रिकी द्वारा की जा सकती है।
प्रसंभाव्य ऊर्जा-अवस्थाओं अणु किस प्रकार वितरित होते हैं, यह ज्ञात करने के लिए हमें सर्वप्रथम घूर्णन और कम्पन के लिए संवितरण फलनों (partition functions) का मानांकन करना आवश्यक है। कंपन की समस्या अधिक सरल है अतः इस पर हम पहले विचार करेंगे ।
जहाँ θकम्पन hv/k के लिए प्रयुक्त किया गया है और इसकी ताप की विमा होती है। यह कम्पन के लिए अभिलाक्षणिक ताप (characteristic temperature) कहलाता है । द्विपरमाणुक अणुओं की कंपन- आवृत्तियाँ v विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के अवरक्त भाग में होती हैं । अवरक्त भाग में उत्सर्जन तथा अवशोषण स्पेक्ट्रम के अध्ययन से का और उसके द्वारा अभिलाक्षणिक ताप θकम्पन्न का मान ज्ञात किया जा सकता है। चूंकि ऊर्जा εकम्पन्न एक निर्देशांक का सतत फलन नहीं है, अतः समीकरण (6) में योग का मानांकन सीधे ही करना आवश्यक है, हम इसके लिए कला निर्देशाकाश में एक कोष्ठिका के आयतन H को प्रयुक्त करने की तथा योग को समाकलन से प्रतिस्थापित करने की युक्ति का उपयोग नहीं कर सकते । समीकरण (6) को निम्न रूप में लिखा जा सकता है।
अर्थात 0K के निकट सभी अणु कम्पन्न की निम्नतम ऊर्जा अवस्था में होते है | चूँकि इस अवस्था की ऊर्जा ऊर्जा शून्य नहीं होती वरन hv/2 के बराबर होती है जिससे परमशून्य पर कुल कंपन्न ऊर्जा (gravitational energy) Uकम्पन्न शून्य न होकर Nhv/2 के बराबर होगी। अतः परम शून्य ताप वह ताप नहीं है जिस पर कंपन- ऊर्जा शून्य हो जाती है वरन् वह ताप है जिस पर अणु निम्नतम प्रसंभाव्य ऊर्जा अवस्था में होते हैं। परम शून्य से ऊपर किसी ताप पर सभी ऊर्जा अवस्थाऐं कुछ सीमा तक भरी होती हैं। किसी ताप पर कुल ऊर्जा निम्न सम्बन्ध से मिलती हैं ::
अतः क्वान्टम यांत्रिकी में एक दोलित्र की माध्य ऊर्जा, चिरसम्मत यांत्रिकी द्वारा प्रागुक्त मान KT की अपेक्षा ताप का एक अधिक जटिल फलन है । अत्यंत निम्न तापों पर, जहाँ T << θकम्पन्न है और इसके लिए निम्न सन्निकटन प्रयुक्त किया जा सकता है :
अर्थात अत्यधिक उच्च तापों पर दोनों क्वांटम एवं चिरसम्मत यांत्रिकी उष्मीय संतुलन में माध्य ऊर्जा के लिए समान मान प्रदान करती है |समीकरण 11 में Nk को nR से प्रतिस्थपित कर तथा सम्पूर्ण समीकरण को n से विभाजित कर हम मोलर कंपन्न ऊर्जा Uकंपन्न प्राप्त करते है | तब कम्पन्न के लिए विशिष्ट ऊष्मा
अब हम साधारण रूप में चित्र (6.10-2) में प्रदर्शित ग्राफ के लक्षणों को समझ सकते हैं। लगभग 50 K के ताप तक, लगभग सब अणु अपनी घूर्णन तथा कम्पन की निम्नतम ऊर्जा अवस्थाओं में होते हैं, जो ऊष्मा गैस में प्रवाहित होती है वह केवल स्थानान्तरीय ऊर्जा में वृद्धि करने का कार्य करती है, और विशिष्ट ऊष्मा, एकपरमाणुक गैस के समान, 3R/2 होती है। लगभग 50 से लगभग 250K तक ताप परास में, अधिक ऊर्जा की घूर्णन अवस्थाएँ भरने लगती हैं (हाइड्रोजन के लिए घूर्णन = 86 K) और 250K से ऊपर अणु चिरसम्मत सिद्धान्त के अनुरूप आचरण करते हैं। लगभग 500 K से अधिक ताप पर कुछ अणु उच्चतर कंपन ऊर्जा की अवस्थाओं में जाने लगते हैं और C सीमांत चिरसम्मत मान 7R / 2 को पहुंचने लगती है ।
अणु जो यहाँ दी गई सरल व्याख्या में व्यापक सिद्धान्त के महत्त्वपूर्ण लक्षणों में से अनेकों की उपेक्षा कर दी गई है। इनमें से कुछ हैं : (अ) H2 की भांति के अणुओं जिसके परमाणु एक ही प्रकार के हैं, तथा NO की भांति वे भिन्न प्रकार के परमाणुओं से बने हैं, के आचरण में अन्तर; (ब) आकाशीय क्वान्टीकरण के परिणामस्वरूप घूर्णन ऊर्जा स्तरों की अपभ्रष्टता; (स) उच्च तापों पर इलेक्ट्रॉनिक उत्तेजन से सहसम्बद्ध ऊर्जा; (द) घूर्णी व कंपन अवस्थाओं के युग्मन; और (ई) यह तथ्य कि कंपन परिशुद्ध रूप से सरल आवर्ती नहीं है। फिर भी इस सिद्धान्त से गैसों की विशिष्ट ऊष्माधारिताओं के परिकलित सैद्धान्तिक मान प्रायोगिक मानों से सहमति में होते हैं व यथार्थ माने जा सकते हैं।
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