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prevost theory of heat exchange in hindi प्रिवोस्ट का ऊष्मा विनिमय सिद्धान्त : हर वस्तु शून्य केल्विन को छोड़कर बाकी सभी ताप पर ऊष्मा विकिरण उत्सर्जित करता है या चारो तरफ के बाह्य वातावरण से ऊष्मा का अवशोषण करता है।

वस्तु या पिंड द्वारा ऊष्मा उत्सर्जन की दर का मान इस बात पर निर्भर करता है की वह कितना अधिक गर्म है , अधिक गर्म वस्तु अधिक दर से ऊष्मा का उत्सर्जन करती है।  यदि किसी वस्तु को ऐसी जगह या चार दिवारी में रखा जाए जहाँ का ताप वस्तु से अधिक हो तो वस्तु गर्म होने लगती है अर्थात ऊष्मा का अवशोषण करती है जब तक ही वस्तु और चारो तरफ का ताप बराबर न हो जाए , इसी प्रकार जब किसी गर्म वस्तु को ठंडी चार दिवारी के भीतर रखा जाए तो तो यह वस्तु ऊष्मा का उत्सर्जन करती है जब तक कि वस्तु और चार दिवारी का ताप समान न हो जाए , इसे ही प्रिवोस्ट का ऊष्मा विनिमय सिद्धांत कहते है।

प्रिवोस्ट का नियम शून्य केल्विन ताप पर लागू नही होता है , इसके अलावा हर ताप हर इसे लागु किया जा सकता है। क्योंकि शून्य केल्विन ताप पर अर्थात परम शून्य ताप पर पिंडो के मध्य ऊष्मा का विनिमय रुक जाता है।

प्रिवोस्ट के ऊष्मा विनिमय सिद्धान्त को तीन शर्तों के रूप में पढ़ सकते है –

1.जब उत्सर्जन की मात्रा , अवशोषण की मात्रा से अधिक हो अर्थात उत्सर्जन >अवशोषण।

इस स्थिति में वस्तु के ताप में कमी आती है , इस स्थिति में वस्तु प्रारंभ में अधिक गर्म रहती है और धीरे धीरे ऊष्मा का उत्सर्जन करके ठंडी होती जाती है।

2. जब वस्तु की उत्सर्जन की मात्रा ,अवशोषण की मात्रा से कम हो तो वस्तु का तापक्रम का मान बढ़ता जाता है अर्थात वस्तु धीरे धीरे अधिक गर्म होती जाती है।

3.जब वस्तु में ऊष्मा उत्सर्जन की मात्रा  और ऊष्मा अवशोषण की मात्रा के बराबर हो तो वस्तु का ताप न बढ़ता है और न कम होता है अर्थात नियत बना रहता है , वस्तु की इस स्थिति को ऊष्मा साम्यावस्था की स्थिति कहते है।